बुधवार को हुए श्रृंखलाबद्ध धमाकों से हुई तबाही को गुरूवार की सुबह सुबह अखबारों में देख मन हिल गया। लाशों की तस्वीरें, घायलों के कराहते चेहरे, घटनास्थल पर पड़े चिथड़े दिनभर आंखों के सामने घूमते रहे। नेताओं के रुटीन, खोखले सांत्वना भरे बयानों की तरफ तो नज़र घुमाने की भी इच्छा न हुई। हर धमाके या आतंकी हमले के कुछ दिनों तक यही चलता रहता है। अगले दिन शुक्रवार को अखबारों में पढ़ा- "फिर पटरी पर लौटी जिंदादिल मुंबई", "नए फौसले के साथ काम पर लौटे मुंबईवासी", "आतंक के मुंह पर तमाचा" जैसे शीर्षकों से अखबार सजे हुए थे। पढ़कर अच्छा लगा पर याद आया २००६ के हमलों के अगले दिन भी ऐसी ही खबरें अखबारों में छपी थी। मुंबई हो या कोई अन्य शहर जहां ऐसे हादसे हुए हों, वहां जिंदगी कुछ ही दिनों में पटरी पर आ जाती है। क्योंकि इस आपाधापी भरे जीवन में इंसान चाहकर भी नहीं रुक पाता। हां, लोगों में पीड़ितों के प्रति सहानुभूति है, वे उनका दर्द महसूस करते हैं। हमलावरों के साथ ही अशक्त सरकार के प्रति रोष भी है, कहीं डर भी है और साथ में है साहस आगे बढ़ने का। घायलों की स्थिति उन्हें द्रवित करती हैं। वे रुकना चाहते हैं पर जिंदगी की जिम्मेदारियां उनके कदम आगे ढकेल देती है। परंतु ऐसे हमलों के बाद नागरिकों द्वारा डर को पछाड़ते हुए जिंदादिली से आगे बढ़ना आतंक के मुंह पर तमाचा भी है। जनता अपने इस हौसले भरे कदम के साथ यह जताती है कि हम कमज़ोर नहीं। तुम आतंक फैला सकते हो पर हमारे हौसले के आगे ये बहुत छोटे हैं। इस तरह बुधवार के हमलों के बाद अगले दिन मुंबई का पटरी पर लौटना आतंकियों को करारा जवाब था।
अब प्रश्न उठता है कि सरकार कब इन हिसंक तत्वों के गाल पर तमाचा जडेगी। कब आतंकियों को ये संदेश देगी कि आइंदा हमला करने की योजना भी बनाई तो अपनी खैर मनाना। जरा सोचिए क्या बीत रही होगी १३ जुलाई को हमले में मारे गए उन बेगुनाहों के परिवारवालों पर। उनके लिए तो जिंदगी मानो थम सी गई है। बाहर दुनिया चलायमान है, नेताओं की जुबानें चल रही हैं, आतंकियों की गोलियां चल रही हैं मगर उनके लिए जिंदगी उस एक पल में रुक गई है। जो घायल हुए हैं, उन पर क्या बीतती होगी जब वे टीवी पर घायलों को मुआवजे देने की खबर सुनते होंगे? क्या हमारे जान की कीमत चंद रुपये हैं। क्यों गया मैं उस जगह। काश घर में होता। क्या ऐसी कोई जगह है जहां मैं सुरिक्षत महसूस कर सकता हूं? कहीं इस अस्पताल में भी तो बम नहीं रखा है। ऐसे न जाने कितने प्रकार के सवाल बिस्तर पर लेटे उस घायल में मन में चलते होंगे। पर ये सवाल क्या सरकार चलाने वालों के मन में आते होंगे?
शायद नहीं। क्योंकि अगर आते होते तो ५ साल पहले मुंबई में खूनी खेल खेलने वाला कसाब अब तक जिंदा नहीं होता। अफजल गुरू जैसे दहशतगर्द को अब तक सजा मिल गई होती। इन हमलावरों को सजा न देकर सरकार क्या संदेश देना चाहती है कि आइए हमला करिए और चैन से यहां रहिए। पांच साल पहले जब मुंबई हमला हुआ तब कहा गया कि चूक हुई है। चूक होना अलग बात है और उस चूक को न सुधारना दूसरी बात। हमले की वजह चूक थी पर कसाब को तत्काल फांसी देकर ये संदेश दिया जा सकता था कि हम पर हमला करने वाले का यही हश्र होता है। पर कसाब का अब तक जिंदा रहना ही आतंकियों के हौसले को बढ़ाने के लिए काफी है। मुंबई हमले २००६ में मारे गए लोगों के परिजन जब कसाब को जिंदा देखते होंगे, अखबारों में उस पर खर्च होती भारी मात्रा की खबर पढ़ते होंगे तो उनके दिल टूट जाते होंगे। लोकतंत्र और सरकार पर से तो उनका भरोसा उठ जाता होगा। आप ही बताइए क्या यही कसाब ९/११ के हमलों में अमेरिका में पकड़ा गया होता तो क्या वो अब तक जिंदा रहता। बिलकुल नहीं। उसे तो कबकी फांसी मिल चुकी होती।
फिर आखिर भारत आतंकवाद के मोर्चे पर कोई करारा जवाब देने से क्यों हिचकता है। अमेरिका की तरह पाकिस्तान में घुसकर अपने दुश्मन को मारने की बात छोड़िए। अपने देश में खून की होली खेलने वाले हत्यारों को सजा देकर तो अपनी दृढ़ता दिखाई जा सकती है। अब तो बस आशा ही की जा सकती है कि कोई तो ठोस कदम भारत की तरफ से उठाया जाएगा। आतंकवाद का खात्मा कोई रातों रात या चंद दिनों में नहीं हो सकता। यह भी सत्य है कि कितनी भी चौकस व्यवस्था हो इतने बड़े देश के हर एक गली-मोहल्ले को सुरक्षित नहीं किया जा सकता किंतु आतंकवाद के खिलाफ छोटे-छोटे ठोस कदमों को बढ़ाकर पीड़ित जनता के घावों पर मरहम तो लगाया जा सकता है।
शुक्रवार, जुलाई 15, 2011 |
Category:
आलेख
|

वर्ल्ड कप शुरू होने में दो दिन ही बचे है लेकिन माह भर पूर्व से ही वर्ल्ड कप से जुड़ी अटकलों, बयानबाजी और रायशुमारी का दौर शुरू हो गया था जिसमें दो बातें हर दूसरे खिलाड़ी के मुंह से सुनने मिलीं। पहला कि वर्तमान भारतीय टीम अब तक की सबसे सशक्त भारतीय टीम है और यह वर्ल्ड कप वही जीतेगी। और दूसरी बात कि सचिन का यह आखिरी वर्ल्ड कप है और टीम इंडिया इसे जीतकर सचिन को तोहफा देगी। इसमें दूसरी बात को लेकर चौतरफा कुछ ज्यादा ही हो-हल्ला हो रहा है। हाल ही में भारतीय टीम के अधिकांश युवा खिलाडियों ने यही बात दोहराई वहीं ज्यादातर विदेशी खिलाड़ियों के बयानों में भी इस बात का उल्लेख था। ऐसा माहौल क्यों बनाया जा रहा है जैसे ये सचिन का आखिरी वर्ल्ड कप है और इस बार ये कप हर हाल में उनके हाथों में थमाना ही है। ऐसे बयान टीम इंडिया और साथ ही सचिन पर सिर्फ बेवजह दबाव ही बना रहे हैं। इसका प्रमाण अभ्यास सत्र के दौरान देखा जा सकता है जहां सचिन अब ताबड़तोड़ रन बनाने के लिए भारी बल्ले से अभ्यास कर रहे हैं। टेनिस एल्बो से उबरने के बाद पिछले दो सालों में सचिन अपनी पुरानी रंगत में दिख रहे हैं। पिछला साल तो टेस्ट में रनों के लिहाज से उनका सर्वश्रेष्ट साल था। २०१० में उन्होंने ७८.१० की औसत से १५६२ रन बनाए जिसमें सात शतक शामिल थे। टेनिस एल्बो से उबरने के बाद सचिन ने हल्के बल्ले का इस्तेमाल शुरू किया क्योंकि उनका पुराना भारी बल्ला टेनिस एल्बो की समस्या को फिर से उभार सकता था। लेकिन अभ्यास सत्र में सचिन द्वारा भारी बल्ले का इस्तेमाल साफ दर्शाता है कि सचिन ने अपने उपर कितना दबाव ले रखा है। डर केवल इस बात का है कि कहीं यह दबाव टीम इंडिया पर हावी हो जाए।
वर्ल्ड कप जैसे महासंग्राम को नैसर्गिक खेल के द्वारा ही जीता जा सकता है । लेकिन जैसा माहौल अभी बनाया जा रहा है वह कहीं टीम इंडिया की तैयारियों को प्रभावित न कर दे। जब १९८३ में भारत ने वर्ल्ड कप जीता था तब भारत को कमजोर माना जा रहा था और कहा जा रहा था वह शुरूआती मैचों में ही बाहर हो जाएगी लेकिन भारत ने कपिल देव की अगुवाई में वेस्टइंडीज जैसी दिग्गज टीम को फायनल में हराकर अब तक का एकमात्र विश्व कप दिलाया। २००३ वर्ल्ड कप में शिरकत करने के पूर्व टीम इंडिया न्यूजीलैंड से ५-२ से हारी थी। विशेषज्ञों ने २००३ में टीम इंडिया की संभावनाओं को सिरे से नकार दिया था। सचिन भी अपने फार्म में नहीं थे। जहीर, हरभजन, युवराज, सहवाग आदि खिलाड़ी युवा थे और पहली बार वर्ल्ड कप में हिस्सा ले रहे थे। लेकिन टीम इंडिया ने तमाम अटकलों को झुठलाते हुए फायनल का सफर तय किया। विश्व कप से पूर्व आलोचकों के निशाने पर रहे सचिन-सौरव ने भी शानदार प्रदर्शन किया। जहां सचिन ने सर्वाधिक ६७३ रन बनाए वहीं सौरव ने ४६५ रन बनाए। विश्व कप में अच्छे प्रदर्शन के लिए सशक्त टीम की नहीं सही समय पर सटीक प्रदर्शन करने वाले ११ खिलाड़ियों की जरूरत होती है। अब जब भारत को विश्व कप का दावेदार माना जा रहा है तो ये बेवजह का दबाव टींम इंडिया को बिखेर सकता है। जब भी खिलाड़ी पिच पर उतरेंगे उनके दिमाग में यह बात उतरेगी कि उसे ये विश्वकप हर हाल में सचिन के लिए जीतना है वहीं सचिन भी जब एक-एक गेंद का सामना करेंगे उनके दिमाग में यह बात गूंजती रहेगी कि यह उनका आखिरी विश्वकप है और उन्हें इस बार अपना सब कुछ न्यौछावर करना होगा।
जहां तक सचिन के आखिरी विश्व कप को लेकर बातें हो रही हैं तो सचिन को तो उनके आलोचकों ने ४-५ सालों पहले ही खत्म मान लिया था। २००२ में भी उनके प्रदर्शन पर सवालिया निशान लगे थे लेकिन उन्होंने २००३ विश्व कप में लाजवाब प्रदर्शन किया। उसके बाद ३-४ साल वे खराब फार्म और टेनिस एल्बो की चोट से संघर्ष करते रहे लेकिन २००८ के बाद जैसे फिर युवा होकर अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में लौटे। सचिन ने अपनी मानसिक दृढ़ता, समर्पण, समय के साथ खुद में बदलाव लाते हुए अपने कैरियर की उम्र को बढ़ाया है और यह तो वो भी नहीं जानते उनका आखिरी मैच कब होगा। खुद कहा कि उनका सपना है विश्वकप जीतना पर जरूरी नहीं यह उनका आखिरी विश्व कप हो। मुमकिन है वे अगल विश्व कप भी खेलें। और हो सकता है युवराज, रैना और धोनी आदि युवा खिलाड़ी जो सचिन को विश्वकप की ट्राफी तोहफे में देने जैसी बातें कर रहे हैं खुद अगले वर्ल्ड कप में न दिखें। धोनी तो कप्तानी और किस्मत के सहारे अपनी खराब बल्लेबाजी को ढंक रहे हैं वहीं युवराज-रैना जैसे सितारों की चमक फीकी पड़ती जा रही है इसलिए क्या पता ये कब गुम हो जाएं, क्योंकि क्रिकेट में जो दिखता है वही टिकता है। और सचिन ने अपने खेल को हमेशा दिखाया है, आलोचकों को करारा जवाब दिया है। इसलिए जरूरी है कि खिलाड़ी भारतवासियों के लिए यह विश्व कप जीतें न कि सचिन के लिए या किसी और खिलाड़ी के लिए। विश्व कप की ट्राफी हाथ में थामना सचमुच एक अद्भुत अहसास है, चाहे वो सचिन हो या कोई युवा खिलाड़ी हर कोई इसे महसूस करना चाहेगा। इसलिए बस इतना कहूंगा दे घुमा के इंडिया।
बुधवार, फ़रवरी 16, 2011 |
Category:
आलेख,
खेल
|