धोनी की कप्तानी वाली टीम इंडिया टी-20 वर्ल्ड कप क्या नहीं उठा पाई हमारे मित्र मोंटी क्रिकेटिया ने पूरे मोहल्ले को सर पर उठा लिया। अपने घर से पिछले धरने-प्रदर्शन का अधजला पुतला उठाकर और उस पर धोनी का पोस्टर चिपकाकर निकल आए चौक पर धोनी का पुतला जलाने।


मैं दूर खड़ा उसको देख रहा था। जैसे ही वो पुतले में आग लगाने लगा मैंने रोकते हुए कहा, अरे बंधु क्या हुआ? इतने तमतमाए हुए क्यों हो और धोनी के पुतले को लिए हुए कहां फिर रहे हो?

उसने पुतले को एक किनारे पटकते हुए कहा- धोनी अब कप्तान रहने लायक नहीं है, दो बार टीम इंडिया टी-20 विश्व कप से बाहर हो गई है। इसलिए मैं चौक पर धोनी का पुतला जलाकर अपना गुस्सा निकालूंगा।

मैंने टोकते हुए कहा- तुम भी खूब हो। कल तक जिस धोनी के छक्कों पर तुम तालियां पीट रहे थे, आज उसी के तुम छक्के छुड़ा रहे हो। ऐसा कर दिया धोनी ने कि तुम उसके पीछे पड़ गए हो?

मोंटी बोला- मुझे धोनी से नहीं धोनी के सफाई से परेशानी है?

मैं चौंकते हुए बोला- अब भला धोनी की सफाई से तुम्हें क्यों परेशानी होने लगी। बड़े-बुजुर्गों ने भी कहा है साफ-सफाई से रहना चाहिए।तो इसमें परेशानी कैसी?

मोंटी समझाते हुए बोला- अरे नहीं, मैं उस सफाई की बात नहीं कर रहा बल्कि उस सफाई की बात कर रहा हूं जो धोनी हारने के बाद बार-बार सबको दे रहे हैं। चुपचाप अपनी हार क्यों नहीं मान लेता।

मैंने उसे समझाया, देखो धोनी अब एक ब्रांड बन चुका है। कितनी कंपनियों का वह ब्रांड एंबेसडर है। उसने चॉकलेट, पेन, पेंसिकल से लेकर गाड़ी, मोबाइल और कपड़े तक बेचे हैं। हो सकता है उसे किसी डिटर्जेंट कंपनी ने अपना ब्रांड एंबेसडर बना लिया हो और धोनी सफाई देने के बहाने उसी डिटर्जेंट का प्रचार कर रहे हों कि फलां डिटर्जेंट लगाओ और हार के दाग मिटाओ।

मोंटी खीझते हुए बोला- धोनी बहाना बना रहा है कि आईपीएल की नाइट पार्टियों के कारण वर्ल्ड कप में उनकी हार हुई है। किसने बोला था रात-रातभर नाचने-गाने? मुझे तो लगता है कि धोनी को अब सिर्फ आईपीएल में ही दिलचस्पी है वर्ल्ड कप जीतने में उसका अब मन रहीं रहा।

मैंने अपना तर्क रखते हुए कहा- देखो मैं तो धोनी को गलत नहीं मानता। अब धोनी ने एक बार वर्ल्ड कप जीत लिया, हो गया। अब तुम चाहते हो कि वह हर बार जीते। हो सकता है यह धोनी का उसूल हो कि एक बार जो चीज उठा ली उसे दोबारा नहीं उठाएंगे इसलिए पहला टी-20 वर्ल्ड कप जीतने के बाद बाकी दोनों वर्ल्ड कप से वे जल्दी ही बाहर हो गए। वैसे भी टी-20 वर्ल्ड कप तो दो साल में एक बार आता है पर आईपीएल तो हर साल होता है वो भी दो महीने के लिए। कहां वर्ल्ड कप के 3-4 मैच और कहां आईपीएल के 14-15 मैच वो भी एक के बाद एक। सांस लेने तक की फुर्सत नहीं, अब तुम ही बताओ वर्ल्ड कप में ज्यादा मेहनत लगती है कि आईपीएल में। इस साल तो आईपीएल में धोनी की चेन्नई टीम जीत गई। अगले साल फिर नीलामी होगी और धोनी की बोली और बढ़ेगी शायद आसमान छू जाए ऐसे में आईपीएल पर ध्यान देना यादा जरूरी है। वर्ल्ड कप में खेले तो बस मैच फीस मिलनी है लेकिन आईपीएल में तो हर चौके-छक्के और कैच पर पैसा ही पैसा। वर्ल्ड कप में कुछ मेहनत नहीं करना पड़ता वो तो कोई भी जीत जाएगा लेकिन आईपीएल में तो मेहनत ही मेहनत है। पहले ऊंचे दाम पर बोली लगने की मेहनत, फिर ग्यारह देशी-विदेशी खिलाड़ियों के बीच अपनी जगह बनाने की मेहनत, छक्के पे छक्के लगाने की मेहनत ताकि बालीवुड हिरोइनों की नजरों में हीरो बन जाएं और हां मैच जीत गए तो रात को पार्टी में नाचने-गाने की मेहनत। हाय राम इतनी मेहनत। और कहां वर्ल्ड कप जो दो साल में एक बार आता है, गिनती के 4-5 मैच और बस छोटी सी प्राइज मनी। न कोई ग्लैमर न पार्टी। तो ये कोई क्यूं ले वो न ले।

मेरे इस जवाब ने मोंटी को निरुत्तर कर दिया, फिर भी वह कहीं से शब्दों को ढूंढकर लाया और बोला- चलो तुम्हारी बात मान लेता हूं। लेकिन जिस तरह टीम इंडिया का फार्म चल रहा है, मुझे नहीं लगता कि टीम जून में होने वाले एशिया कप को जीत पाएगी।

मैंने समझाते हुए कहा- अमा यार, तुम भी अजीब हो। इतनी सी बात नहीं समझते। तुम एशिया के बाहर निकलो, जरा ग्लोबल बनो। जून में होने वाले एशिया कप को छोड़ो और सितंबर में होने वाले चैंपियंस लीग को पकड़ो। एशिया कप में तो सिर्फ भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका खेलेंगे लेकिन चैंपियंस लीग में तो देश-विदेश की क्लब टीमें और आईपीएल की तीन टीमें भी खेलेंगी जिसमें धोनी की चेन्नई टीम भी शामिल है। एशिया कप मतलब वही 4-5 मैच वही छोटा सा प्राइज मनी और वही हल्की सी ट्राफी लेकिन चैंपियंस लीग मतलब ज्यादा पैसा, ज्यादा ग्लैमर और ज्यादा चीयरलीडर्स। मतलब बल्ले-बल्ले पार्टी-शार्टी।

मोंटी बोला- तुम्हारा मतलब टीम इंडिया एशिया कप भी हारेगी और धोनी फिर सफाई देगा? लेकिन उस बार क्या बोलेगा?

मैंने बात साफ करते हुए कहा- धोनी ने तो एशिया कप में हारने के बाद देने वाली सफाई की लिस्ट भी बना ली है।

इतना सुनते ही शांत मोंटी के अंदर फिर गुस्सा उबल उठा और वह बोला- अब मैं एक नहीं धोनी के दो पुतले जलाउंगा एक एडवांस में क्योंकि जून में एशिया कप में टीम जब हारेगी तब मैं बारिश के कारण पुतला जला नहीं पाउंगा।

मैं मोंटी को उसके प्यारे पुतलों के साथ छोड़कर अपने रास्ते निकल लिया क्योंकि मैं कुछ देर और ठहरता तो मेरी बातें सुनकर उसे कई पुतले जलाने पड़ते।

चलिए बाकी के पुतले मैं उससे सर्दियों में जलवाउंगा, आग तापने के काम तो आएंगे। आपको मेरा यह व्यंग्य कैसा लगा जरुर बताइएगा।


पूरे शहर में सन्नाटा पसरा है। गली-मोहल्ले, नुक्कड़, चौक सब सूने पड़े हैं। न तो इंसानों के कदमों की आवाज सुनाई पड़ रही है और न ही उनके शोर-शराबे की। चारों तरफ सिर्फ कुत्तों के भौंकने की आवाज गूंज रही है। ये नजारा है कुत्तों द्वारा आयोजित भारत बंद का। अखिल भारतीय श्वान संघ ने कुत्ते शब्द के दुरुपयोग और इंसानों द्वारा कुत्तों के मान-सम्मान को ठेस पहुंचाने के विरोध में भारत बंद का आयोजन किया है। अखिल भारतीय श्वान संघ के अध्यक्ष कालू ने आपात बैठक बुलाकर भारत बंद आयोजित करने का प्रस्ताव पारित किया। सब कुत्ते आज राष्ट्रपति के सामने अपनी व्यथा रखने जा रहे हैं। उनके मान-सम्मान पर जो चोट इंसान करता आया है वो अब उनके बर्दाश्त के बाहर हो चुका है। गली-गली से कुत्ते दिल्ली में इकट्ठा होने लगे। पालतू कुत्ते, गली के कुत्ते, काले कुत्ते, गोरे कुत्ते, लंगड़े कुत्ते, मोटल्ले कुत्ते, मरियल कुत्ते और खुजली वाले कुत्ते भी। सब के सब सड़कों पर रैली निकालकर एक स्वर में भौंककर अपना विरोध दर्ज कराना लगे। श्वान संघ ने इंसानों के सख्त हिदायत दे रखी थी कि कोई भी इंसान बंद के दौरान सड़क पर नजर आया तो इतना काटेंगे कि  पेट में १४  नहीं १४०० इंजेक्शन लगेंगे।
इस रैली का चुपके से कवरेज कर रहे फर्राटा चैनल के जुझारू रिपोर्टर ने किसी तरह हिम्मत जुटाकर श्वान संघ के अध्यक्ष का इंटरव्यू लेने की ठानी। वह कुछ कदम आगे बढ़ा ही था कि १०-१२ कुत्तों का झुंड उस पर लपक पड़ा। श्वान संघ के अध्यक्ष कालू ने तब कुत्तों को दूर रहने का आदेश दिया। उस रिपोर्टर को अपने पास यह सोचकर बुलवाया  कि चलो इंटरव्यू दे देता हूं, अपनी भी थोड़ी पब्लिसिटी हो जाएगी। वह रिपोर्टर किसी तरह अपने आपको संभालते हुए अध्यक्ष कालू के पास पहुंचा। जाते ही तपाक से पूछा, आप लोग ये बंद क्यों कर रहे हो। अध्यक्ष का खून खौल गया उसने उस पर अपना प्रश्न रॉकेट की तरह दागते हुए पूछा तुम इंसान इतनी बार भारत बंद करवाओ तो ठीक और हम कुत्तों ने एक बार भारत बंद करवा दिया तो तुम्हारे पेट में दर्द हो रहा है। रिपोर्टर इस प्रश्न के सामने निरुत्तर हो गया। घबराकर वह बोला- म..म...मेरा मतलब है कि आप लोग ये भारत बंद क्यों कर रहे हो? आपकी क्या मांगें हैं? अध्यक्ष बोला- तुम इंसानों ने हम कुत्तों के मान-सम्मान का फालूदा कर दिया है। जब देखों हमारे अपमान करते रहते हो। अपने आपसी लड़ाई में हम कुत्तों के नाम का दुरुपयोग करते हो। लड़ाई तुम करते हो और इज्जत हमारी उछालते हो। रिपोर्टर बोला- आप जरा खुलकर बताएं। बात को साफ कीजिए।

अध्यक्ष बोला- हम कुत्ते हमेशा वफादार रहते हैं, लेकिन तुम इंसानों ने हमेशा बेवफाई की है। सबसे पहले इसकी शुरुआत तुम लोगों के हीरो धर्मेन्द्र ने की। उसकी लड़ाई गब्बर से थी। गब्बर ने जय को मारा, उसी ने बसंती को कैद किया. लेकिन उसे कुत्ते का खून पीना है गब्बर का नहीं। ये कहां का इंसाफ है भई। हमने क्या किया था। गब्बर के चमचे बसंती का नाच देख लें तो ठीक हैं लेकिन हम कुत्तों के सामने बसंती नहीं नाच सकती, क्यों भला? पता है उसके कारण मैं और मेरी पत्नी कभी मिल नहीं पाए। वो रामगढ़ में रहती थी लेकिन मैं कभी उसे मिलने नहीं जा पाया, धर्मेन्द्र के डर से। पता नहीं कबवह  मेरा खून पी जाता। मुझे पर जो इमोशनल अत्याचार हुआ उसका दोषी कौन है?

अध्यक्ष आगे बताता है- तुम इंसान लड़ते समय एक दूसरे को गाली देते हुए कुत्ता कहते हो। कोई भी इंसान ऐसे ही कु्त्ता नहीं बन सकता। कुत्ता बनने के लिए कुत्ते का गुण होना आवश्यक है। कुत्ता होने के लिए वफादार होना जरूरी है और इंसानों में तो वफादारी लुप्त हो चुकी है। तो तुम लोग बिना हमारे परमिशन के किसी को कुत्ते की उपाधि कैसे दे सकते हो। बोलो।

रिपोर्टर को अध्यक्ष की बात में दम लगा। वह सोच में पड़ गया।

अध्यक्ष आगे बढ़ते हुए बोला- अभी थोड़े समय पहले दो फिल्मस्टारों ने आपसी लड़ाई में हमको बेवजह शामिल कर दिया। आमीर खान ने शाहरुख खान को नीचा दिखाने के लिए अपने कुत्ते का नाम शाहरुख रख दिया और ब्लाग में लिख दिया कि शाहरुख मेरे पैर चाट रहा है। जब उसके दिल को ठंडक मिल गई तब बाद में शाहरुख से माफी भी मांग ली। उसे शाहरुख से नहीं हमसे माफी मांगनी चाहिए थी। अरे हमसे बिना पूछे उसने अपने कुत्ते का नाम शाहरुख कैसे रखा. अपनी लड़ाई में हमको शामिल क्यों किया। क्या हम अपनी लड़ाई में इंसानों को शामिल करते हैं।  नहीं ना।

अध्यक्ष के इन तथ्यों ने रिपोर्टर के दिल पर करार वार किया।

अध्यक्ष बोला- एक और किस्सा बताता हूं, हाल ही में नितिन गडकरी ने लालू और मुलायम को भी कुत्ते की उपाधि देते हुए कहा कि वे दोनों कुत्ते की तरह सोनिया गांधी के तलवे चाटते थे। अब बताओ किस आधार पर गडकरी ने लालू-मुलायम को कुत्ता कह दिया। कुत्ते तो प्यार से अपने मालिक के तलवे चाटते हैं क्योंकि उसे भी अपने मालिक से प्यार मिलता है। इसमें उसका कोई स्वार्थ नहीं होता। लेकिन लालू और मुलायम थोड़ी न सोनिया से प्यार या स्नेह करते हैं जो वे उसके तलवे चाटेंगे। उन्हें तो बस सरकार में अपने हिस्से से प्यार था। इंसानों द्वारा इतनी बार कुत्तो के इज्जत की धज्जियां उड़ाने के बाद अब हमें और बर्दाश्त नहीं होता। इसी के विरोध में हमने भारत बंद का आयोजन किया है और अब राज्यपाल के पास जाकर हम अपनी मांगें रखेंगे।
पहली मांग तो यह कि कोई भी इंसान बिना कुत्ते के गुणों को जाने किसी दूसरे इंसान को कुत्ता नहीं कहेगा। दूसरी कि भी अपनी लड़ाई में हम कुत्तों को नहीं घसीटेगा। तीसरा धरम पाजी को अपना डायलाग कुत्ते मैं तेरा खून पी जाऊंगा छोड़ना पड़ेगा, छोड़ो उनकी तो अब पिक्चर भी नहीं आती डायलॉग क्या बोलेंगे, ठीक है तीसरी वाली मांग कैंसल। बाकी की मांगें राज्यपाल को बताएंगे। बस अब इंटरव्यू खत्म,अध्यक्ष बोला। अब हमारा समय बर्बाद मत करो हमे राष्ट्रपति के पास जाना है।

रिपोर्टर अपने घर आया और उसने अपने कुत्ते को खोल दिया जिसे उसने अपने विरोधी के नाम पर रखा था। शायद उसे भी कुत्ते शब्द का असली मतलब पता चल चुका था। उसका पालतू कुत्ता भी दौड़कर बाकी कुत्तों के साथ शामिल होकर चल पड़ा राष्ट्रपति भवन। रैली फिर आगे बढ़ने लगी और भौंकने की आवाज से पूरा शहर फिर गूंजने लगा।

दो हफ्तों से दो लोगों ने मेरा जीना मुहाल कर रखा है। टीवी पर देखो तो शोएब-सानिया, अखबारों में शोएब-सानिया, इंटरनेट पर शोएब सानिया और यहां तक कि एसएमएस में भी इन्हीं के चर्चे। आखिर में तंग आकर मै टीवी, मोबाइल बंद कर खुद को कमरे में बंद कर एकांत तलाशने लगा। किसी तरह मैं इन दोनों से बच तो गया लेकिन १२ अप्रैल को सानिया के निकाह दिन मैंने टीवी चालू कर ही दिया, सोचा कि चलो सानिया भारत से विदा हो रही है, उसे आखिरी बार देख लेता हूं। अभी मैं सानिया को दुल्हन के चमकदार लिबास में निहार ही रहा था कि तभी फोन घनघनाया। दूसरी तरफ से आवाज आई बेटा जल्दी घर आओ,  सानिया के निकाह से दुखी बंटी ने आग लगा ली है। मुझे धक्का सा लगा। मुझे यह तो पता था कि सानिया के निकाह के दिन सैंकड़ों दिल टूटेंगे लेकिन इसकी शुरूआत मेरा ही दोस्त बंटी से होगी इसका अंदाजा नहीं था, शायद था भी। बंटी इसके बारे में तो बताया ही नहीं,  बंटी मेरा दोस्त और सानिया मिर्जा का धुर प्रशंसक या फैन या फिर कहें कि ए.सी. है। उसके कमरे में सानिया के पोस्टर्स हैं, किताब-कापियों में सानिया है, कपड़ों में भी सानिया है और दिल में भी। कुल मिलाकर ये पूरे सानियामय हो चुका था। जिस दिन से सानिया पहली बार टेनिस खेलती हुई टीवी पर नजर आई, बस उस दिन से बंटी की शामत आई। क्रिकेट का उभरता हुआ खिलाड़ी कब टेनिस की तरफ परावर्तित हो गया, कब मोटे बल्ले की जगह जालीदार रैकेट ने ले ली पता ही नहीं चला। बंटी टेनिस के बारे में कुछ नहीं जानता था। न तो उसे फोरहैंड पता था न बैकहैंड और न ही सर्व अब उसके लिए तो सानिया ही सर्वेसर्वा थी।
अपने परममित्र का ऐसा हाल देखकर दुख तो होता लेकिन साथ ही सानिया को धन्यवाद देने की इच्छा भी होती है कि क्रिकेट के पीछे पागल देश में कोई दूसरा खेल तो लोकप्रिय हुआ। मगर इसमें बंटी जैसे लोगों को भी श्रेय देना चाहिए जिन्होंने दिन-रात टीवी पर टेनिस देखकर डूबते स्पोर्ट्स चैनलों की टीआरपी बढ़ाई है और सूने टेनिस कोर्ट को हरा-भरा किया है।
सुबह १० बजे तक बिना लात खाए नहीं उठने वाला बंटी अब सुबह-सुबह उठकर टेनिस कोर्ट जाने लगा, शायद इस उम्मीद से कि टेनिस प्लेयर बन जाऊं तो सानिया के साथ युगल जोड़ी तो जमा ही लूंगा। ये जोड़ी तो नहीं जम पाई लेकिन पढ़ाई के साथ बंटी की जोड़ी जरूर टूट गई। दो बार १२वीं में बंटी फेल हो गया। फिर भी उसका दीवानापन कम नहीं हुआ। कुछ महीने पहले जब सोहराब-सानिया की सगाई हुई तब तो मानो वो टूट ही गया, हमने सोचा चलो अब तो इस कमबख्त की अक्ल ठिकाने पर आएगी लेकिन जैसी ही सानिया की सगाई टूटी उसके चेहरे पर मुस्कान छा गई, जैसे कोई बल्लेबाज आउट हो जाए लेकिन अम्पायर उसे नॉट आउट करार देकर उसे खेलने का एक और मौका दे दे। बस ऐसा ही मौका मानो बंटी को मिल गया था, सोचने लगा बॉस इस बार तो सानिया को पटा ही लूंगा। अभी वो हसीन ख्वाब बुन ही रहा था कि पता कहां से शोएब मियां ने सानिया के जिंदगी में आ टपके। अब बंटी दुखी है बहुत दुखी साथ ही सोहराब मिर्जा से हमदर्दी भी है, वही सोहराब जिसे कुछ महीने पहले ये महाशय गालियां दे रहे थे।
खैर जब मैं बंटी के घर पहुंचा तो देखा कि बंटी के कमरे से धुआं निकल रहा है,  मैं डर गया कहीं बंटी ने खुद को आग तो नहीं लगा ली लेकिन जब देखा तो वह तो सानिया के पोस्टर्स को आग लगा रहा था। मेरी जान में जान आई। चलो कमबख्त अकल के मारे को बुद्धि तो आई। मैने भी गुस्सा उतारते हुए एक-दो पोस्टर जला दिए। मेरा दो्स्त तो बच गया पता नहीं बाकी बंटियों का क्या हाल होगा। कितनो की आह निकली होगी।
मैं खुश था कि बंटी सानियामेनिया से बाहर आ गया था। अगले दिन जब मैं उसके घर गया तो देखा कि दीवारों पर बैडमिंटन सेनसेशन और आजकल सुर्खियों में छाई सायना नेहवाल के पोस्टर्स लगे हैं और टीशर्ट भी सायना वाली। और महाशय टीवी पर बैडमिंटन देख रहे हैं। मैं समझ गया ये सानियामेनिया से निकलकर सायनामेनिया की गिरफ्त में आ गया है। मैं अपने अंदर की खुशी समेटकर मायूस सा बाहर आया और इंतजार करने लगा अपने दोस्त के दिल के एक और बार टूटने का।


'सात अजूबे इस दुनिया में आठवीं अपनी जोड़ी' जी हां, शोएब और सानिया मिर्जा की जोड़ी के बारे में भी कुछ ऐसा ही कहा जा सकता है। जितनी सुखिर्यां अपने खेल जीवन में इन दोनों खिलाड़ियों ने अपने खेल जीवन में अकेले नहीं बटोरी उससे कहीं ज्यादा साथ रहकर बटोर लीं। एक तरफ सानिया मिर्जा हैं जो कि भारत की टेनिस सनसनी हैं लेकिन उन्होंने अपने खेल से कम दीगर बातों से ज्यादा सनसनी फैलाई, मसलन कभी छोटी स्कर्ट से उपजा बवाल तो कभी तिरंगे का अपमान, और हर दूसरे दिन उनके नाम से जारी होते फतवे। भले ही सानिया टेनिस प्रतियोगिताओं के पहले-दूसरे दौर में बाहर होती रही लेकिन विज्ञापन जगत में उनकी चमक बरकरार रही। दूसरी तरफ पाकिस्तान के पूर्व कप्तान शोएब मलिक ने भी अपने खेल से कम और अपनी अनुशासनहीनता और टीम में टकराव पैदा करने के कारण ज्यादा चर्चा में रहे। हाल ही में उनको अनुशासनहीनता और खराब प्रदर्शन के कारण टीम से एक साल के लिए निलंबित कर दिया गया था। उन पर मैच फिक्सिंग जैसे संगीन आरोप भी लगे थे।
खैर दो दिन पूर्व तमाम कश्मकशों के बीच सानिया-शोएब का निकाह हो ही गया। पर इस निकाह ने पूरे हफ्तेभर टीवी चैनलों और अखबारों को खूब मसाला दिया। आयशा शोएब की पत्नी होने का दावा कर रही थी लेकिन शोएब इससे मुकरते रहे लेकिन अंत में उन्होंने इस बात को स्वीकार किया और आयशा को तलाक देकर सानिया से निकाह की राह साफ की। वैसे इससे पहले सानिया अपने बचपन के मित्र सोहराब मिर्जा से सगाई तोड़ चुकी थीं और तभी लगने लगा था कि कुछ तो बात जरूर है। सानिया का नाम कभी अभिनेता शाहिद कपूर के साथ जोड़ा जा रहा था तो कभी उनके युगल टेनिस में उनके जोड़ीदार महेश भूपति के साथ लेकिन सानिया तो शोएब की मलिका बनी। बहरहाल सानिया और शोएब का निकाह हो गया है और हम आशा करते हैं कि यह अनोखी जोड़ी शादी के बाद भी सुर्खियों में रहेगी।


भारत के लिए कहा जाता है कि यहां अनेकता में एकता है। सुनने में यह बहुत अच्छा लगता है पर यह सिर्फ उपरी सच है। सच तो यह है कि हम कभी एक थे ही नहीं। हम पहले भी जाति, धर्म, संप्रदाय के नाम पर लड़ते थे और अब भी लड़ रहे हैं। कहने को तो देश ने बहुत तरक्की कर ली है लेकिन असल में हमारे सिर्फ पहनावे में बदलाव आया है। धोती-कुर्ता से पेंट-शर्ट में आ गए हैं लेकिन हमारी सोच वही है। हम आज भी गैर-जरूरी बातों पर लड़ते हैं और मूलभूत समस्याओं को अनदेखा करते रहते हैं। दरअसल मिलकर रहना हमें आता ही नहीं, हमें बांटना ही पसंद है। मुगलों के आने के पहले भी हम आपस में लड़ते थे। समाज छूत-अछूत, ऊंच-नीच में बंटा हुआ था। मुगल शासन के बाद अंग्रेज आए और हम पर राज करने लगे और हम बस आपस में लड़ते ही रह गए। इसी का फायदा अंग्रेजों ने उठाया और १५० साल हम पर राज किया और जब आजादी दी तब भी भारत को दो मुल्कों में बांटकर। जो हिन्दू-मुसलमान देश की आजादी के लिए जाति-धर्म से उठकर साथ लड़ते थे आजादी के समय उन्हीं में फूट डाल दी गई और बन दिया भारत और पाकिस्तान। आजादी के बाद भारत में भी मिलकर रहा जा सकता था लेकिन हमारी तो आदत है बांटने की, हम कैसे साथ मिलकर रह सकते हैं। जाति, भाषा, धर्म के नाम पर कई दंगें हुए, न जाने कितने मासूमों की जान गई लेकिन फिर भी हमने सबक नहीं लिया है। कोई भी स्वार्थी आदमी या संगठन अपने स्वार्थ के लिए नफरत की चिंगारी लगा देता है और हम लोग बिना कुछ सोचे समझे एक-दूसरे का घर जलाने पर उतारू हो जाते हैं। चिंगारी लगाने वाला अपने घर में चैन से बैठकर तमाशा देखता है और हम लोग एक-दूसरे के जान के दुश्मन बने रहते है। इतने सारे दंगे सब इसी सोच का परिणाम है। हम हमेशा से पाकिस्तान और चीन को भारत के लिए खतरा मानते आए हैं लेकिन उससे बड़ा खतरा हमारी आपसी लड़ाई, हमारे भेदभाव जो इस देश को तोड़ रहे हैं। और बहुत से लोग इसमें अपनी वैमनस्यता के जलते हुए तवे पर अपनी रोटियां सेंक रहे हैं। राज ठाकरे मराठी मानुस को लेकर राजनीति कर रहा है। तो कोई किसी बात पर फतवा जारी कर रहा है, कोई खलिस्तान की मांग कर रहा है तो किसी को तेलंगाना चाहिए। और भी ऐसे बहुत से अंदरुनी टकराव हमारे समाज और देश में देखने को मिलते हैं। सब बस तोड़ने में लगे हैं, जोड़ने में बहुत कम लोग। और आम जनता तो भेड़चाल की आदि है। जिसने जो कह दिया बस चल पड़ी उसके पीछे। मैं कहता हूं तोड़ दो इस देश को, सब बांट दो इस देश को, जिसका जो राज्य-राष्ट्र बनाना है अलग से बना लो, कोई किसी दूसरे राज्य के लोगों को आने मत दो। वो भी बांटे, तुम भी बांटो, मैं भी बांटता हूं देश को। सब मिलकर देश के इतने टुकड़े कर दो कि पता ही मत चले कि ये कभी भारत था। पर क्या तब हम सब खुश रहेंगे और वो लोग जो स्वार्थ की राजनीति करते हैं। इन सबका फायदा क्या होगा, क्या तब अमन-शांति कायम पाएगी? क्या वहां कोई टकराव नहीं होगा? बांटना किसी चीज का हल नहीं, जोड़ने से ही हम देश को आगे ले जा सकेंगे नहीं तो तो २०२० क्या २२०० तक भी भारत विकसित नहीं हो पाएगा। हम जितना अलग रहेंगे, उतने ही कमजोर रहेंगे। फिर कोई बाहरी ताकत इस बात का फायदा उठाकर हम पर राज करेगी फिर चाहे वो चीन हो या अमेरिका या फिर कोई और। जाति, भाषा, धर्म जैसे मुद्दों को उछालने वाले लोगों को भारत की जनता के भूखे पेट, बेरोजगारी से निराश युवकों के चेहरे, महंगाई से खाली हुई आम जनता की जेब दिखाई नहीं देते?
अब वक्त है अपनी सोच को दुरुस्त करने का, जो भी पार्टी लोगों को बांटने का काम करे, या सामाजिक सदभाव को चोट पहुंचाए फिर चाहे वो भाजपा हो, कांग्रेस हो, सपा हो, एमएनएस हो कोई भी पार्टी या व्यक्ति हो, जनता को ऐसे लोगों का बहिष्कार करना चाहिए और इन्हें जरा भी समर्थन नहीं देना चाहिए क्योंकि ये न किसी का भला नहीं चाहते, ये चाहते हैं तो बस अपना भला।
एक और बात कहना चाहूंगा कि बहुत से ऐसे पढ़े-लिखे गंवार हैं इस देश में जो चुनाव के दिन अपने मताधिकार का प्रयोग नहीं करते तभी तो मतदान का प्रतिशत ५५-६५ के आसपास ही रहता है। पढ़े-लिखे लोग अपने मताधिकार का इस्तेमाल ज्यादा अच्छे ढंग से कर सकते हैं, अपने विवेक का अच्छी तरह से इस्तेमाल कर सकते हैं। इसलिए अपने अधिकार को पहचानिए और चुनाव के समय ऐसे प्रतिनिधि चुनिए जो देश को जोड़ें, न कि तोड़ें। किसी भी सामाजिक ढांचे में बदलाव रातोंरात नहीं आता लेकिन धीरे-धीरे उसे सुधारा तो जा ही सकता। एक छोटी सी शुरूआत करनी होगी हम सबको अपने-अपने स्तर पर जो देश को एकता के सूत्र में पिरोये और देश को आगे ले जाए।