loveये प्यार भी बड़ी दिलचस्प चीज होती है। ये प्यार ही तो प्रेरणा देती है। शादी के पहले गर्लफ्रैंड प्रेरित करती है और शादी के बाद बीवी। जिंदगी में कुछ भी करने के लिए प्रेरणा की बहुत जरूरत होती है। और मुझे प्रेरित करती है मेरी प्रेमिका "यूपा"। "यूपा" का पूरा नाम है यूपीए सरकार। यूपा तो मैं उसे प्यार से बुलाता हूं (UPA= यूपा)। यूपीए उसका नाम है और सरकार उसका सरनेम। न..न..न... वो बंगाली नहीं है और न ही उसका जादूगर पी.सी.सरकार से कुछ रिश्ता-नाता है। हां, लेकिन वो जादूगरनी जरूर है। उसी के मोहपाश में तो बंधा हूं मैं। ऐसी है मेरी यूपा।


पहली बार मैंने उसे २००४ में देखा था। वो लहराती, बलखाती केन्द्र में आई थी। मैंने तभी उसे अपना प्रेमपत्र(वोट) दे दिया था। उस समय वो थोड़ी लंगड़ी थी। दरअसल उसका "लेफ्ट" पांव उसे बार-बार दगा दे जाता था। वो जब भी आगे बढ़ना चाहती उसका "लेफ्ट" पैर साथ छोड़ जाता। २००९ में उसने फिर से मुझे पुकारा और मदद मांगी। मैंने तब भी उसे अपना प्रेमपत्र दिया और लड़-भिड़कर दूसरों से भी दिलवाया। मैं इस बार यह पुख्ता करना चाहता था कि मेरी यूपा लंगड़ी नहीं रहेगी। और भगवान ने मेरी सुन ली। मेरी यूपा इस बार अच्छे से चलने-फिरने लायक थी। हालांकि वो अब भी बैसाखियों के सहारे थी लेकिन पहले से स्थिर थी। मैंने मोहल्ले में मिठाई बंटवाई। लोग मुझे पागल कहते थे लेकिन क्या करें दिल तो बच्चा है जी, प्यार दीवाना होता है और हम दिल दे चुके सनम।


जमाना प्यार का दुश्मन होता ही है। हमारे भी दुश्मन कम न थे। लोग हमारे सामने यूपा की बुराई करते तो हमारा खून खौल उठता था। हमारे पिताजी भी यूपा को ताने मारते। पापा तो वैसे भी प्यार-व्यार के खिलाफ होते ही हैं। कल जब मैं दोपहर को सो रहा था तब मैंने लोगों के चिल्लाने की आवाज सुनी। बाहर निकलकर देखा तो लोग पेट्रोल की बढ़ी कीमतों के विरोध में हमारी यूपा का पुतला जलाने और उसका घेराव करने निकले थे। हमारे तन-बदन में आग लगाई। हमारे रहते कोई हमारी यूपा का घेराव करे। हमने एक कार्यकर्ता को बुलाकर पूछा कि ये क्या कर रहे हो। कार्यकर्ता कड़क आवाज में बोला- इस दुनिया के हो कि कहां के हो, दिख नहीं रहा हम सरकार का पुतला जलाने जा रहे हैं। इतना सुनना था कि हमारा पारा चढ़ गया, मैंने मुटठी बांधी एक जोरदार मुक्का उस कार्यकर्ता के मुंह पर जमा दिया। वो कार्यकर्ता वहीं ढेर हो गए। हम बाहें खोलकर अपनी विजय का जश्न मनाने लगे। लेकिन इतने में ही उसके चार-पांच साथी ने आकर हमारी हड्डी-पसली एक दी। हम कराहते पर हुए फिर बिस्तर पर पड़ गए।


हम समझ गए कि ये दुनिया हमारे प्यार को कभी नहीं समझ सकेगी। अरे भाई यूपा हमसे बहुत प्यार करती है और हमारे स्वास्थ्य को लेकर चिंतित रहती है। इसलिए जब हम तोंदियल होने लगे तो उसने हमारी स्वास्थ्य की खातिर अनाजों, सब्जियों, तेल के दाम बढ़ा दिए ताकि हम कम खाए। हम लाख प्रयास के बाद भी जब खुद को कम खाने के लिए प्रेरित न कर सके तो मजबूरी में यूपा को अनाज के दाम बढ़ाने ही पड़ गए। पर लोग ये प्यार कहां समझेंगे। कुछ दिनों से हम कुछ ज्यादा ही आरामपरस्त हो गए थे। हम लाख सोचते कि वॉक पर जाया करेंगे पर नहीं जा पाते। कल-कल करते महीने बीत गए लेकिन हम वॉक पर नहीं गए। ऐसे समय में हमारी यूपा को फिर कड़ा कदम उठाना पड़ा हमारे स्वास्थ्य के लिए। उसने पेट्रोल, डीजल के दाम बढ़ा दिए ताकि अब हमें पैदल चलना पड़े और हम फिर से चुस्त-दुरुस्त हो जाएं और साथ ही रसोई गैस के दाम भी बढ़ा दिए ताकि हम कम खाएं। क्या एक प्रेमिका को अपने प्रेमी का ख्याल रखने का हक नहीं है। वो जब भी हमें प्यार करती है, लोग उसका तिरस्कार करते है, हाहाकार करते हैं। लोगों के इस रवैये ने हमें दुखी कर दिया है। हमारे घरवाले भी यूपा को बुरा-भला कहते रहते हैं।


हाल में जब एंडरसन मुद्दा उठा तो लोगों ने कहा कि यूपा आखिर एंडरसन को वापस क्यूं नहीं लाती। तब हमने कहा कि यूपा संस्कारी और गुणी है। वो अतिथि देवो भवः में विश्वास रखती है। अब एंडरसन बाहर से आया था अर्थात अतिथि था, इसलिए अगर यूपा ने उस अतिथि को सकुशल उसके देश भेज दिया तो क्या बुरा किया। अतिथि देवो भवः का पालन करना पाप है क्या। अब जबकि अफजल और कसाब अब तक फांसी से बचे हुए हैं तो फिर कुछ लोगों ने सवाल उठाना शुरू कर दिया कि यूपा ऐसा क्यों कर रही है, वो उनको फांसी क्यों नहीं देती। मैंने उनको समझाने की कोशिश की और कहा कि मेरी यूपा बहुत सहृदयी है, वह पापी को नहीं पाप को खत्म करने में यकीन रखती है। शायद वो इंतजार कर रही है कि अफजल और कसाब के अंदर के शैतान खत्म हों। तो भी उन लोगों ने मेरी बात नहीं मानी और लगे धरना-प्रदर्शन करने।


loverboyलोग मुझे अब ये कहकर परेशान करने लगे हैं कि अगर ऐसा ही हाल रहा तो २०१४ के बाद यूपा वापस नहीं आएगी। मगर मैं भी सच्चा प्रेमी हूं मैं तब बड़ी संख्या में घूम-घूमकर अपनी यूपा के लिए प्रेमपत्र (वोट) इकट्ठे करूंगा और उसे मरने से बचाउंगा। मेरे दोस्त मुझे कहते हैं कि जब तू यूपा से इतना ही प्यार करता है तो राजनीति में उतरकर उसके पास दिल्ली क्यूं नहीं चला जाता है। मैंने कहा जिस दिन मैं राजनीति में उतर गया, उस दिन यूपा के लिए मेरा प्यार खत्म हो जाएगा, क्यूंकि ये राजनीति बड़ी बुरी चीज है। राजनीति में उतरते ही मेरी प्रेमिकाएं बदल जाएंगी, तब कभी राजग मेरी प्रेमिका बन जाएगी, तो कभी सपा, राजद क्योंकि राजनीति में टिके रहने के लिए मौकापरस्त होना बहुत जरूरी है। और क्या सच्चे प्रेमी मौकापरस्त हो सकते हैं, आप ही बताइए? इसलिए मैंने तय कर लिया है चाहे आप लोग कुछ भी बोले, मैं यूपा से प्यार करना नहीं छोड़ूंगा और यूपाधुन जपता रहूंगा। आईलवयू यू..यू..यू..यूपा।
'टिप्पणी' वैसे तो है बहुत छोटा सा शब्द लेकिन अपने में जैसे पूरे संसार को समेटे हुए है। एक समय लोग टिप्पणी से दूर भागा करते थे। लोगों द्वारा की गई टिप्पणियां रास नहीं आती थी लेकिन अब जमाना बदल गया है । आधुनिक युग है, ट्विटर और ब्लॉगिंग का जमाना है, टिप्पणियों का खजाना है। अगर आप पर टिप्पणी नहीं होती मतलब आपके फालोवर्स नहीं यानी कोई पूछ-परख नहीं। मतलब साफ है आप जमाने के साथ नहीं बल्कि सालों पीछे चल रहे हैं। अब बेचारे प्यारेलालजी को ही ले लीजिए। ये दस वर्ष पहले कवि थे, साहित्यकार थे, रचनाकार थे। इन्होंने एक से बढ़कर दर्दीले शायरी, रसहीन कविताएं, बेसिर-पैर की कहानियां लिखी लेकिन किसी ने इनकी कद्र नहीं की। लिखने के इनके नैसर्गिक गुण की इस तरह अवज्ञा होते देख इनका दिल पीड़ा से भर उठता था। कोई एक टिप्पणी ही कर देता, तारीफ के दो शब्द ही कह देता इनका दिल बाग-बाग हो जाता, लेकिन इस निष्ठुर समाज ने इनके दिल के बाग को बसने ही नहीं दिया। प्यारेलालजी नित नए जुगाड़ करते अपनी कविताएं पढ़वाने के- कभी दोस्तों को बार में टल्ली होते तक पिलाते ताकि उन्हें श्रोता मिल सके लेकिन दोस्त टल्ली होकर वहीं सो जाते और कोई श्रोता न बचता। कभी वेटर को टिप देने के बहाने अपनी कविता झेलाने की कोशिश करते लेकिन वह भी चपल चीते की तरह टिप लेकर फरार हो जाता। इसके बाद प्यारेलालजी ने दूसरा पैंतरा अपनाया। अब वे मंदिर में भजन के बहाने जाने लगे और धीरे से अपनी कविताएं की पर्चियां बंटवाने लगे लेकिन लोगों ने इसे भगवान की छपवाने की चिट्ठियां (वही ५१ लोगों को यह पर्ची बांटो वाली चिट्ठियां) समझकर लेने से इनकार कर दिया। बेचारे प्यारेलालजी यहां भी उनको टिप्पणीविहीन रह गए। अब वे घर के पास चौक में खड़े होकर श्रोता पकड़ने लगे। हर आने-जाने वाले से जबरदस्ती बात करते और बीच में अपनी एक कविता उसको चिपका देते। लोगों ने इनके खौफ से उस गली में घुसना बंद कर दिया। हर गली में इन चिपकू कवि महोदय के पोस्टर चस्पा दिए गए कि इनसे बचकर रहें ये प्राणघातक और समयनाशक कवि हैं, ये कहीं भी, कभी भी आपको पकड़ सकते हैं। अंत में प्यारेलालजी ने घर में ही श्रोता तलाशने शुरू कर दिए बीवी, बच्चों और मेहमानों तक को नहीं बख्शा पर यहां भी उन्हें टिप्पणी नसीब नहीं हुई। आखिर में जब इनकी श्रीमतीजी ने इनको तलाक की धमकी दी तब कहीं जाकर ये माने और दस वर्ष पहले साहित्य जगत से संन्यास लेकर साहित्य और लोगों दोनों को राहत दी।


लंबी शांति आने वाले तूफान का संकेत होती है।  दस साल तक अपने मुंह और हाथ को बांधकर रखे प्यारेलाल जी के अंदर का लेखक जोर मारने लगा था। वे एक बार फिर अपने विचारों से समाज को हिला देना चाहते थे। लेखक प्यारेलाल नामक तूफान बस आने ही वाला है। मगर कैसे? ये यक्ष प्रश्न प्यारेलालजी के सामने आ खड़ा हुआ।  टिप्पणी प्राप्त करने के पुराने सारे पैंतरे फेल हो चुके थे। अगर इस बार भी एक भी टिप्पणी हासिल नहीं हुई तो जीवन निरर्थक हो जाएगा। इसलिए उन्हें वर्तमान तकनीकी युग में तकनीक से हाथ मिलाया। झट से एक कम्प्यूटर खरीद लाए और कवि-लेखक का चोला उतारकर ब्लॉगर का चोला पहन लिया। वैसे 'ब्लॉगर' बोलने में भी बड़ा स्टायलिश लगता है, है ना। तो मैं बात कर रहा था प्यारेलालजी की। उन्होंने झटपट अपना ब्लाग बनाया और एक पोस्ट लिख दिया। अब बारी थी उस सुनहरे पल की 'टिप्पणी' की।' लेकिन टिप्पणी तो तब आएगी ना जब किसी को पता होगा कि इन्होंने आज ब्लाग पर तूफान मचाया है। इसलिए इन्होंने प्रचार की शुरूआत घर से की और रसोई में खाना बना रही श्रीमतीजी को जबर्दस्ती अपना ब्लाग पढ़वाने लगे। वहां रसोई में खाना जल रहा था इसलिए श्रीमतीजी ने बिना पढ़े ही टालने के मकसद से 'अच्छा लिखा है' कहकर फिर रसोई में चली गई। प्यारेलालजी को पहली टिप्पणी मिल ही गई पर मन अब भी असंतुष्ट था।  जैसे चातक पक्षी की प्यास सिर्फ मेघ की बूंदों से बूझती है उसी तरह एक सच्चे ब्लागर की टिप्पणियों की प्यास सिर्फ टाइप किए गए टिप्पणियों से ही बुझती है। मुख से की गई टिप्पणियां यह प्यास नहीं बुझा सकती। लिखित टिप्पणी होने से लोगों को साबित किया जा सकता है कि 'देखिए, हमारे लेख भी पढ़े जाते हैं नेट पर'। इसीलिए अब उन्होंने जबरन अपने पाठक बनाने शुरू कर दिए। उन्होंने घर की आयाबाई, दूधवाला, धोबी से लेकर वॉचमैन तक के ईमेल आईडी बना दिए और उन्हें कम्प्यूटर सिखा दिया ताकि उनके पोस्ट पर कम से कम इनकी टिप्पणियां तो आ ही जाएंगी। लेकिन हाय री किस्मत! ये लोग भी एहसानफरामोश निकले। किसी ने भी टिप्पणी नहीं की। आयाबाई बस आरकुटिंग करती रहती, धोबी मैट्रीमोनी साइट सर्च मारता रहता और वाचमैन तो इससे भी बढ़कर पोर्न साइट्स में डूबा रहता। किसी को इतनी भी फुर्सत नहीं कि प्यारेलाल जी का दुख समझे और टिप्पणी देकर उनके सूने ब्लाग को हरा-भरा कर दे।

ब्लागर को ढीठ होना चहिए। और प्यारेलालजी भी कम ढीठ नहीं थे। उन्होंने अपने ब्लाग को प्रचारित करने का दूसरा तरीका खोज निकाला। उन्होंने चिट्ठियों में अपना ब्लाग एड्रेस लिखकर मोहल्ले की सभी छतों पर फेंक दिया। पड़ोस के पहलवान की पत्नी ने वह चिट्ठी उठाकर अपने पति को दे दी। अब पहलवान तो था अनपढ़ उसने उसे प्रेमपत्र समझा और जाकर प्यारेलालजी के चेहरे का नक्शा बिगाड़ दिया। प्यारेलालजी टूटी-फूटी हालत में घर पहुंचे।

इधर प्यारेलालजी व्यग्रता के मारे प्रतिपल अपने ब्लाग को इस उम्मीद से रिफ्रेश करते कि कभी तो पाठक मिलेंगे और टिप्पणियों की बारिश होगी जिससे उनके लेखन की फसल लहलहाएगी। लेकिन यहां तो मामला ही उल्टा था, टिप.. टिप.. करके भी टिप्पणियां नहीं बरस रही थी। टिप.. टिप.. टिप.. टिप.. टिप्पणी की एक बूंद ही मिल जाए, प्यारेलालजी के मन में बस यही बात सालती रहती। वे यही सोचते- कोई तो मिलेगा जो गलती से ही सही पर मेरा ब्लाग पढ़ेगा। बाकी ब्लागर्स के समय लोग यह गलती कर देते हैं पर मेरे समय ही लोग सुधर जाते हैं। वे अपने आपको कोस ही रहे थे कि तभी ब्लाग में एक बेनाम टिप्पणी टिप..टिप.. करते हुए आई। प्यारेलालजी की आंखें चमक उठीं। उन्होंने टिप्पणी पढ़नी शुरू की। टिप्पणी में लिखा था- "क्या पकाऊ लेख लिखा है। पकाकर काला कर दिया। आज मैं अपनी प्रेयसी से प्रणय निवेदन करने जा रहा था लेकिन तुम्हारे पकाऊ लेख ने पूरा मूड बिगाड़ दिया।" ऐसी टिप्पणी पढ़कर प्यारेलालजी गुस्से के मारे लाल हो गए। वे सोचने लगे कि ऐसी  गंदी टिप्पणी कौन कर सकता है। उनका पहला शक मोहल्ले के मजनूं शायर "आशिक आवारा" पर गया क्योंकि वही रोज किसी न किसी से प्रणय निवेदन करता है और सैंडलें खाता है। पर उनके मन में एक खुशी थी। आज पहली बार उन्होंने टिप्पणी की बूंद को चखा था। कड़वी ही सही पर टिप्पणी तो मिली। ये सोचकर मंत्रमुग्ध हो रही रहे थे कि दूसरी टिपपणी भी आ गई। वे खुशी के मारे दोहरे हो गए। टिप्पणी में लिखा था- "ब्लागिंग से जी भर गया हो तो अब थोड़ा भोजन से पेट भर लो। टेबल पर खाना लगा दिया है।" ये टिप्पणी उनकी श्रीमतीजी ने किया था। प्यारेलालजी विस्मयभरी नजरों से अपनी पत्नी को देखने लगे और बोले, "तुमने ये टिप्पणी कैसे कर दी, कम्प्यूटर पर तो मैं बैठा हूं"। श्रीमती बोली- "दरअसल मैंने भी चुपके से लैपटॉप लेकर ब्लागिंग शुरू कर दी थी। काम भी करती गई और ब्लागिंग भी। ये देखिए मेरा ब्लाग।" प्यारेलालजी हतप्रभ से अपनी श्रीमतीजी को देखने लगे। फिर जब उन्होंने अपनी श्रीमतीजी का ब्लाग देखा तो चकरा गए। हर पोस्ट पर पूरे मोहल्ले की ४०-५० टिप्पणियां थीं। वे वहीं ढेर हो गए। श्रीमतीजी के ब्लाग पर टिप्पणियों की बारिश और हमारे ब्लाग पर टिप्पणी के छींटे भी नहीं। लेकिन इससे प्यारेलालजी को एक और आइडिया मिल ही गया। अब उन्होंने प्यारे से प्यारी बनने की ठान ली। म.. म..मतलब.. अब उन्होंने प्यारी के नाम से नया ब्लाग बनाने की सोची, कम से कम अब तो टिप्पणियां आएंगे ही और मैं चाहे कितना ही पकाऊ लेख लिख लूं, लड़के उसकी तारीफ जरूर करेंगे।
वैसे आप भी टिप्पणी और सुझाव देकर प्यारेलालजी की मदद कर सकते हैं। उनका ब्लागएड्रेस है- http://pareshanpyarelal.blogspot.com। आप मदद करना चाहेंगे?
लो, गई भैंस पानी में। पूरी मेहनत पर पानी फिर गया। घोटाले, धौंसबाजी, घपले, आपराधिक कृत्य करके जितनी भी इज्जत बनाई थी, सब धूमिल हो गई। पार्टी में जो नेता पहले सीना तानकर धौंस जमाते हुए चला करते थे, आज गर्दन झुकाए सभाकक्ष में जा रहे हैं। दरअसल ये सब पायरेटड नेता मतलब पायरेटड सीडी देखते पकड़ाए नेता। और इनको इनके टुच्चे कारनामे के कारण पार्टी ने इन्हें बैठक के लिए दिल्ली बुलाया है।

neta cartoonचुनावों में क्रासवोटिंग के डर से इनकी नेत्री ने ७५ विधायकों को एक होटल में छुपाया था और वहां उनके मनोरंजन के लिए 'राजनीति' फिल्म उनको दिखा दी वो भी पायरेटड सीडी से। बस यहीं से सारी आफत शुरू हुई। इन नेताओं को क्रासवोटिंग के डर से होटल में छुपाया गया था पर पायरेटड सीडी कांड के बाद तो ये क्रासवोटिंग तो क्या वोटिंग करने से भी कतरा रहे हैं। दरअसल जब से इन्होंने ये टुच्चा कारनामा किया है पूरी नेता बिरादरी में इनकी जंग हंसाई हो रही है। ये कहीं बाहर आने-जाने लायक नहीं रहे। सबसे मुंह छिपाए फिर रहे हैं। अरे भई, पकड़ाना ही था तो घोटाले में पकड़ाते, हत्या, अपहरण में पकड़ाते मगर यह क्या पायरेटड सीडी देखते पकड़ा गए। पूरे राजनीतिक जगत में थू-थू हो रही है। पूरा मार्केट वैल्यू नीचे गिर गया। कल तक जो पार्टी के छोटे-मोटे कार्यकर्ता गर्दन झुकाकर इनके पैरों में पड़े रहते थे, आज इन्हें 'पायरेटड', 'पायरेटड' कहकर चिढ़ा रहे हैं। इनके ऊपर १०-२० एसएमएस चुटकुले तो इन कार्यकर्ताओं ने खड़े-खड़े बना दिए। पार्टी का रिवाज है कि जो नेता जिस कांड में पकड़ाएगा उसका 'निक नेम' उसी आधार पर रख दिया जाएगा। जैसे कोई नेता डामर घोटाला में पकड़ाया तोउसका निकनेम हुआ 'डामर, पानी घोटाले वाले नेता का 'पानी' आदि। अब ये नेता पायरेटड सीडी देखते पकड़ाए हैँ इसलिए इनका निकनेम पड़ गया 'पायरेटड'।
इसलिए इन 'पायरेटड' नेताओं को राष्ट्रीय अध्यक्ष ने दिल्ली बुलाया है इस घटना पर सफाई देने के लिए। इन नेताओं की नेत्री भी इन लोगों के साथ आई है। (बैठक शुरू होती है)
राष्ट्रीय अध्यक्ष नेत्री से- "ये क्या किया आप लोगों ने, पार्टी की भद्द पिटवा दी। रुके थे पांच सितारा होटल में और वहां ऐसा गैर सितारा काम कर दिया। तुम्हारे इस टुच्चे कारनामे ने पूरी पार्टी की चमक फीकी कर दी। अरे किसी बड़े मामले में फंसते तो किसी को भिड़ाया जाता, इसी बहाने पार्टी को कुछ काम तो मिलता, वैसे ही खाली बैठे रहते हैं लेकिन इस टुच्चे कांड के लिए जुगाड़ लगाने में भी शर्म आ रही है। अरे हम राष्ट्रीय पार्टी हैं, कोई छोटे-मोटे टुच्ची पार्टी नहीं पर तुम लोगों ने पायरेटेड सीडी देखकर पार्टी की इज्जत मिट्टी में मिला दी। अरे जब पांच सितारा होटल में विधायकों को छुपा सकती हो तो इन्हीं किसी मल्टीप्लेक्स ले जाकर फिल्म नहीं दिखा सकती।"
नेत्री- "मैं क्या करती। वैसे ही सत्ता से बाहर हैं, पार्टी में फंड की भी कमी है इसलिए पायरेटड सीडी से काम चला लिया।"
राष्ट्रीय अध्यक्ष- "अच्छा, पांच सितारा होटल में रुकने का पैसा है लेकिन मल्टीप्लेक्स जाने का नहीं। "
नेत्री- "अध्यक्ष महोदय, पार्टी फंड अभी खस्ताहाल है, जब हम सत्ता में थे तभी उस होटल में पहले से ही एडवांस राशि जमा करा दी थी भविष्य के लिए। हमें पता था हम सत्ता के भले ही बाहर हो जाएं लेकिन होटलवाले हमको बाहर नहीं कर पाएंगे। इसलिए होटल में पैसा नहीं देना पड़ा।"
राष्ट्रीय अध्यक्ष- "एक तो सत्ता से बाहर हैं, कोई मुद्दा भी नहीं मिल रहा था जिसे उछालें। अभी-अभी एंडरसन मामले पर कांग्रेस को घेर ही था। पार्टी की मार्केट वैल्यू बढ़ ही रही थी कि तुम लोगों के टुच्चे कारनामे ने पूरा वैल्यू डाऊन कर दिया। कल की ही बात ले लो। अगले हफ्ते रैली निकालकर केन्द्र सरकार का पुतला जलाने का का र्यक्रम है तो सोचा कि थोक के भाव पुतले ले लेते हैं। लेकिन पुतले वाले ने पुतले देने से इंकार कर दिया, कहने लगा हम छोटी-मोटी पार्टियों को पुतला नहीं देते। मैंने कहा कि हम राष्ट्रीय पार्टी हैं तो वो कहने लगा कि जिस तरह के प्रकरण में तुम्हारे पार्टी के नेता पकड़ाए हैं, वैसे प्रकरण में छोटी-मोटी पाटी के नेता पकड़ाते हैं। राष्ट्रीय पार्टी के नेता पायरेटड सीडी में फिल्म नहीं देखते बल्कि खुद का मल्टीप्लेक्स बनवा लेते हैं या फिर पूरी फिल्म ही बनवा लेते हैं। "
(अध्यक्ष पायरेटड नेताओं की तरफ मुखातिब होते हुए) "देखा तुम लोगों ने तुम लोगों के कारण पुतले वाले तक हमको भाव नहीं दे रहे ।"
(एक पायरेटड नेता बीच में बोल पड़ा) "हम क्या करें, होटलवालों ने ही हमको पायरेटड सीडी दे दी।"
राष्ट्रीय अध्यक्ष (गुस्से में)- तुम तो चुप ही रहो। ये आइडिया तुम्हारा ही होगा क्योंकि तुम ही कंजूस हो और डुप्लीकेट चीजें रखते हो। चाइना मोबाइल, सेकंड हैंड गाड़ी, सालों पुरानी घड़ी। तुम तो नेता के नाम पर कलंक हो। नेता को अपव्ययी होना चाहिए मितव्वययी नहीं। तुम तो कार्यकर्ता बनने लायक भी नहीं हो।
(इतने में एक वरिष्ठ नेता बोलता है) "मुझे तो लगता है कि इसमें विरोधी पार्टियों की चाल है। उन्हीं लोगों ने पायरेटड सीडी भिजवाई होगी और फिर इन लोगों को पकड़वा दिया ताकि इस टुच्चे प्रकरण में फंसकर हमारी पार्टी की "रेपोटेशन" खराब हो। या फिर हो सकता है कोई घर का भेदी हो, मतलब भीतरघात की आशंका। अध्यक्ष महोदय, मैं इस भीतरघात के जांच की मांग करता हूं और यदि ये काम विरोधी दल का है तो कार्यकर्ताओं से आह्वान करता हूं कि विरोधी दलों के घरों में थोक के भाव पायरेटड सीडी भिजवा दें।" (इतना सुनते ही कार्यकर्ता बाजार की तरफ दौड़ पड़ते हैं पायरेटड सीडी लेने और इसके बाद  बैठक को खत्म कर दिया जाता है।)
(कुछ देर बाद पायरेटड सीडी प्रकरण से व्यथित "राजनीति" फिल्म के निर्देशक प्रकाश झा सभा कक्ष में आते हैं। सभाकक्ष में उस समय बैठक खत्म होने के बाद सारे नेता नाश्ते का मजा ले रहे हैं।)
प्रकाश झा- "मैं आप लोगों के द्वारा पायरेटड सीडी में फिल्म देखने से दुखी हूं। जब कानून बनाने वाले ही कानून तोड़ेंगे तो देश का क्या होगा?"
सभी नेता एक स्वर में- "आप गलत कह रहे हैं। सबसे पहले बात तो कानून हमने बनाया ही नहीं, वो पहले से बना हुआ है। और दूसरी बात कानून चाहे बने या टूटे देश जैसा है वैसा ही रहने वाला है। यहां हजार लोगों को मौत के हवाले करके एंडरसन जैसे लोग साफ बच जाते हैं फिर हमने तो बस पायरेटड सीडी में फिल्म देखी है और आप इस पर इतना हल्ला मचा रहे हैं।"
(प्रकाश झा निराश होकर वापस लौट जाते हैं लेकिन तभी एक हल्की सी मुस्कान उनके चेहरे पर आती है क्योंकि उनको अपनी अगली फिल्म का विषय जो मिल गया है- "भोपाल गैस हादसा।" फिल्म के किरदारों का खासा मन में तैयार करते हुए वे पार्टी कार्यालय से बाहर निकल जाते हैं)
शुद्ध घी खाकर वृद्ध की मौत, शुद्ध घी के सेवन से सैंकड़ों बीमार। चौंक गए क्या। अरे ये मैं नहीं, बल्कि अखबारें बोल रही हैं। सारे अखबार बस इसी तरह के शीर्षकों से अटे पड़े हैं। अब जो अशुद्ध खाने का आदि हो उसे अगर शुद्ध चीज खिला दी जाए तो तबीयत तो खराब होगी ही। अशुद्ध चीजें पचाने की आदि अंतड़ियां शुद्ध चीज कहां से पचा पाएंगी। ये मिलावट का युग है। मिलावट ही सत्य है, मिलावट ही सर्वत्र है। आज मिलावट फैशन है और पैशन भी। जो मिलावटी नहीं वह आउटडेटड है। बदलते जमाने के साथ शुद्ध गंगा नदी ने भी अपने आपको अपडेट कर लिया और अशुद्ध हो गई। आप हाथ में गंगाजल लेकर तर्पण करते हैं, लेकिन हाथ में गंगाजल छोड़कर सब कुछ आ जाता है मसलन, कचरा, तेल, हेयरपिन, बासी फूल, विसर्जित किए गए मूतिर्यों के अवशेष सब कुछ। ऐसा लगता है मानो सारा संसार हाथों में आ गया है। अब सरकार भी मिलावटी बनती हैं मतलब मिली-जुली। साफ-सुथरी सरकार अब चलन के बाहर हो गई हैं, अब तो दागी नेताओं की सरकार है। जनता ने भी इस मिलावट को अब स्वीकार कर लिया है। बिना मिलावट की गई चीजें तो अब हम हमको जमती ही नहीं । जब तक दूध में पानी न हो दूध का मजा नहीं आता। भूसे मिले चायपत्ती के बगैर चाय बेस्वाद लगती है। मिलावटी तेल में सिके हुए पूड़ी और तले हुए पकौड़ों की तो बात ही क्या। बच्चा भी पैदा होते ही अब मां का दूध नहीं पीता बल्कि बोतलबंद सोया दूध पीता है।

इन अशुद्ध चीजों के बीच सबकी जिंदगी मजे से गुजर ही रही थी, पर पता नहीं कहां से मार्केट में शुद्ध घी आ गई। इस शुद्ध घी के अचानक टपकने से लोगों में हाहाकार मच गया। सब को डर सताने लगा कि कहीं शुद्ध घी खाकर वे बिस्तर न पकड़ लें। कुछ खुरापाती किस्म के लोगों ने शुद्ध घी का नायाब इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। बहू अपनी सास को शुद्ध घी से बने पकौड़े खिलाने लगी ताकि वह जल्दी स्वर्ग सिधार जाए। आफिस में एक कर्मचारी अपने विरोधी कर्मचारी को रास्ते से हटाने के लिए उसे शुद्ध घी से बुने लड्डू खिलाने लगा। स्कूल में एक बच्चे ने अपने जन्मदिन पर टीचर को शुद्ध खोवे से बनी मिठाई खिला दी ताकि टीचर ५-६ दिन के लिए बिस्तर पकड़ ले और होमवर्क से मुक्ति मिल जाए।

दिन ब दिन शुद्ध घी से बीमार लोगों की संख्या बढ़ने लगी। हॉस्पीटल हाऊसफुल होने लगे। छुटभैये और झोलाछाप डॉक्टरों की भी निकल पड़ी। एक डॉक्टर अपने मरीज से कहता है- अजी शुक्र है आपने ८० प्रतिशत शुद्ध घी से बना लड्डू खाया था इसलिए बच गए, कहीं १०० प्रतिशत शुद्ध घी वाला लड्डू खाया होता तो स्वर्ग सिधार गए होते। जरा देखकर खाया कीजिए आजकल मार्केट में शुद्ध घी आ गई है। पत्नी अपने पति से बोली- देखा जी, इसलिए कहती हूं दूर रहा करो उस रमेश से, जरूर उसी ने आपको शुद्ध घी का लड्डू खिलाया होगा, वो आपसे जलता जो है। मैं आज ही शुद्ध घी के पकौड़े बनाती हूं आप इसे राजेश को खिलाकर उसको सबक सिखाना।

शुद्ध घी ने इतनी दहशत फैला दी कि लोग दुकानदारों को शक की नजरों से देखने लगे। जो दुकानदार दशकों से अपनी मिलावट कला से लोगों की सेवा करते आए थे, अब शक के दायरे में आने लगे। लोगों को शंका होने लगी कि कहीं ये दुकानदार उन्हें शुद्ध घी न पकड़ा दें। गली-मोहल्ले, चौक-चौराहों पर बस इसी बात के चर्चे थे कि आखिर ये शुद्ध घी अचानक आया कहां से? कुछ ने कहा इसमें अंडरवर्ल्ड का हाथ होगा। कुछ को इसमें पाकिस्तान के साजिश की बू आने लगी। तालिबान को जैसे ही शुद्ध घी के आतंक के बारे में पता चला उसने शुद्ध घी से तबाही मचाने की सोची। आतंकवादियों ने सोचा बंदूक और खून खराबा करके हम ५०-१०० लोगों को मार पाते हैं लेकिन लोगों को शुद्ध घी खिलाकर एक बार में ही ५-१० हजार लोगों का काम तमाम कर देंगे। तालिबान ने तत्काल रामू, भोला, बंसी, दुकालू के यहां की १००० गायें अपहरण कर ली। अब आतंकवादियों ने बंदूक छोड़कर डेयरी खोल ली और गायों का दूध दुहकर शुद्ध घी बनाने लगे। शुद्ध घी के किस्से अमेरिका तक भी पहुंच चुके थे। तब अमेरिका ने अपने नया परमाणु बम बनाने का कार्यक्रम रोककर शुद्ध घी बम बनाने का कार्यक्रम शुरू कर दिया। अमेरिका को इसके लिए गायों की जरूरत थी। जिस तरह तेल के लिए उसने इराक पर हमला कर दिया था उसी तरह अब वह गायों के लिए भारत की तरफ देखने लगा। हमारी कमजोर लड़खड़ाती सरकार न पहले अमेरिका के दबाव के आगे कुछ कहती थी और न अब उसने कुछ कहा।

शुद्ध घी के आतंक से लंबे समय से सुस्त एवं निर्जीव पड़े विपक्ष के नेताओं को एक मुद्दा मिल गया जिसे वे चुनाव में भुना सकते थे। विपक्ष ने संसद में इस मुद्दे को खूब उछाला और सरकार की खूब मिट्टीपलीद की। विपक्ष के एक जोशीले नेता ने ऊंचे स्वर में कहा- शुद्ध घी का बाजार में आना जनता की सेहत के साथ खिलवाड़ है। आज के मिलावटी युग में अगर कोई शुद्ध चीज आ जाएगी तो गड़बड़ तो होगी ही ना। अब हम सारे दागी नेताओं के बीच अगर कोई सच्चा, सज्जन नेता आ जाएगा तो राजनीति प्रदूषित होगी ही ना, पूरा समीकरण बिगड़ जाता है। मुझे तो शुद्ध घी के बाजार में आने के पीछे केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री का हाथ लग रहा है। उन्हीं के संरक्षण में चल रही डेयरियों से शुद्ध घी के सप्लाई की खबरें आ रही हैं। इसकी उच्चस्तरीय जांच होनी चाहिए। केन्द्रीय गृहमंत्री ने इसके लिए समिती बना दी। समिति बनाना सभी मुद्दों का रामबाण इलाज है। कोई मुद्दा हो, बस जांच समिति बना दीजिए, ४-५ महीने या फिर साल फुर्सत। गृहमंत्री ने भी इसी रामबाण इलाज का प्रयोग करते हुए समिती बना दी।

जिस तरह छल, कपट, राग, द्वेष के युग में सत्य, धर्म, निष्ठा अपना स्थान नहीं बना सकती। उसी तरह अशुद्ध माहौल में शुद्ध चीजें कहां से अपना स्थान बना पाती। कुछ समय तक शुद्ध घी ने अपने को समाज बनाए रखने की कोशिश की लेकिन लोगों ने इसका भी तोड़ निकाल लिया और उसे अशुद्ध करने के लिए जुगाड़ जमा ही लिया। कुछ समय तक शुद्ध घी से आतंकित लोग अब फिर अपनी जिंदगी में लौट आए। बाजार में अब शुद्ध घी का नामोनिशान नहीं है। मैंने यह व्यंग्य बिस्तर पर पड़े-पड़े लिखा क्योंकि मेरे हास्य व्यंग्य से जलने वाले मेरे एक मित्र ने मुझे उस समय शुद्ध घी के लड्डू खिलाकर बिस्तर पर पटक दिया था। खैर अब मैं चलता उसी मित्र के पास उसे शुद्ध घी का हलवा खिलाकर उसका हाजमा खराब करने, ये शुद्ध घी मैंने खास उसी के लिए बचाकर रखा था सबक सिखाने के लिए। आप लोग भी बचकर रहिएगा कहीं शुद्ध घी आपके शहर में आतंक न मचाने लग जाए।
बच गया एंडरसन करके खून हजार...
न्याय मांगती रह गई पीड़ितों की चित्कार...
भ्रष्ट नेताओं ने निभाई एंडरसन से यारी..
भेज दिया स्वदेस उसको रोक के गिरफ्तारी....
ये है भारत देश जहां कण-कण में भ्रष्टाचार...
बच गया एंडरसन करके खून हजार...


२ दिसंबर ८४ की थी वो जहरीली रात....
मौत लगाए बैठी थी सबके जीवन पर घात....
चिमनी से तब निकला एमआईसी का फुंकार...
लील गया कई जानें, कईयों को किया लाचार....


न्याय की राह तकते पीड़ित फिर रहे मारे-मारे....
और अपराधी घूम रहे हैं मस्ती में मतवारे...
ढाई दशक बाद जब आई न्याय की बारी...
तब उजागर हुई नेताओं की सारी भ्रष्टाचारी...
केस कमजोर बनाया ताकि अपराधी चढ़ें न सूली...
लाचार कानून सजा दे पाया वो भी बस मामूली...
धन्य है भारत का कानून, धन्य है सरकार...
भारत के कण-कण में फैला है भ्रष्टाचार...


अमेरिका में छिपा हुआ है एंडरसन फरार...
भारत उसको लाने की जहमत क्यूं उठाए सरकार...
देख रही दुनिया होते न्याय को तार-तार...
बच गया एंडरसन करके खून हजार...