नेट में कल मैंने एक खबर पढ़ी कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की रिपोर्ट के अनुसार भारत में सबसे ज्यादा दुखी लोग है। यह खबर पढ़ते ही मैं अपना सिर पकड़कर बैठ गया। भारत और डिप्रेस्ड...????  सिर पर अपना हाथ रखा देख मैंने झट उसे हटाया क्योंकि सिर पर हाथ रखकर बैठना तो डिप्रेशन का पोज़ है। मतलब कि मैं भी डिप्रेस्ड हूं। उन दुखियारे भारतीयों में मेरा भी नाम है। हे राम ! जरूर डब्ल्यूएचओ वालों ने मुझे इस डिप्रेस्ड पोज में देख लिया होगा और मुझे भी दुखियारों में शामिल कर लिया होगा। अरे मैं तो हूं ही चिंतक किस्म का। व्यंग्य लिखने के प्रयास के दौरान सोचने के लिए सिर पर हाथ रख लेता हूं। मेरी मां कहती हैं मेरा दिमाग खाली है। बस वही चेक करने के लिए कभी -कभी सिर पर हाथ रख लेता हूं। पर भैया इसका मतलब यह थोड़ी कि हमकों भी दुखियारा घोषित कर दो। अरे दुखियारे हो हमारे मित्र, हमारे दुश्मन, हमारे पाठक, हमारे पड़ोसी पोंगा पंडितजी। हम भला क्यूं दुखियारे होने लगे???

खबर में आगे लिखा था कि ३५.९ प्रतिशत मेजर डिप्रेसिव एपिसोड (एमडीई) से ग्रस्त हैं। इन दुखियारे लोगों के डिप्रेशन की बहुत सारी वजह है- मसलन कम तनख्वाह, दूसरी की सफलता से दुखी होना, दूसरों की निंदा करना, हर समय यहां-वहां की चिंता करना, अकेलापन आदि। ये सब लक्षण तो मुझमें भी थे- मेरी तनख्वाह कम है, कलमाड़ी-राजा आदि भ्रष्ट लोगों की सफलता से मैं दुखी हूं, इसलिए ईर्ष्यावश उनके उपर व्यंग्य लिखता हूं उनकी निंदा करता हूं, सबको पता है चिंतन तो मेरा स्वभाव है, यहां वहां की चिंता भी मैं करता हूं, और अपनी प्रियतमा से भी मैं काफी समय से दूर हूं- मतलब फिलहाल अकेला हूं। ये सारे दुखियारे होने के लक्षण तो शत-प्रतिशत मुझसे मैच करते हैं। अब यह तो प्रमाणित हो गया कि मैं दुखियारा हूं। हे राम ये तूने क्या किया?

अपने सारे दुखों का इलाज मुझे सिर्फ उस ऊपरवाले के पास ही दिखता है। वो जो परम अल्पज्ञानी है। जो खुद सबसे बड़ी समस्या है- हमारे पोंगापंडित जी जो सामने वाले फ्लैट के सबसे उपरी मंजिल में रहते हैं। मैं दौड़ पड़ा उनके फ्लैट की ओर... दुखों का बोझ अपने ऊपर लिए हुए। लिफ्ट बंद देखकर मैं सीढ़ी के रास्ते गया। ज्यों-ज्यों सीढ़ी चढ़ता गया मेरा दुख सब तरफ से बाहर निकलने लगा। आंख, नाक, माथे, गले सब जगह से दुख बहने लगा। अंत में दुख से नहाया हुआ मैं उनके कमरे तक पहुंचाया। मैं पूरी तरह दुख से नहाया हुआ था। मुझे देख पोंगापंडित जी चौंक पड़े- अरे तुम्हारी ये हालत। कल तक चेहरे पर चस्पी तुम्हारी चिर-परिचित कुटिल मुस्कान कहां गई। आज ये दुखियारा लुक क्यों अपनाए हुए हो? क्या बात है, हम पर रोज व्यंग्यात्मक नजर रखने वाली तुम्हारी आंखें घुसी हुई हैं, बाल बिखरे हुए, चेहरे का तेज तो ऐसे गुल है जैसे फ्यूज्ड बल्ब  हो,  हम पर रोज व्यंग्य का वार करनी वाली आपकी लंबी जुबान छुपी-छुपी सी है, पसीने से नहाए हुए हो इतनी दुर्गंध आ रही है कि हमारे यहां की मक्खियां बेहोश हो कर गिर रही हैं। अच्छा हुआ आ गए कल ही मक्खी-मच्छर मारने वाली दवा खत्म हुई थी। रात को आए होते तो और बेहतर होता, कम्बख्त मच्छरों ने बड़ा परेशान किया। खैर , अब अंदर आकर अपना दुखड़ा सुनाओ, अपनी चोटी घुमाते हुए पंडितजी ने मुझे निमंत्रित किया।

मैंने अपना दुखड़ा पुराण शुरू किया। अरे क्या बताऊं पंडितजी- कल तक हम जो दिल में फीलगुड वाला फैक्टर लिए घूमते थे वो सब काफूर हो गया। अरे जिस सुमित को महंगाई डायन नहीं डरा पाई, इतने घोटाले और भ्रष्टाचार नहीं तोड़ पाए। अरे जो रिसेशन की आंधी में भी खुशियों का दीया जलाता रहा उस सुमित को डब्ल्यूएचओ की एक रिपोर्ट ने दुखियारा घोषित कर दिया। मेरी तनख्वाह कम है, भ्रष्टाचारियों की सफलताओं से मैं जलता हूं, उनकी निंदा करता हूं और अपनी प्रियतमा से पिछले झगड़े के बाद से मैं बिलकुल अकेला हूं-  ये सब लक्षण दुखियारा होने की ओर संकेत करते हैं, यानी मैं हूं टोटल दुखियारा। पंडितजी की आंखें भर आईं- शायद मेरा दुख उनके बर्दाश्त नहीं हुआ।

कुछ देर शांत रहने के बाद फव्वारे की तरह फूटते हुए पंडितजी बोले- बस इतने से दुख हो गया तुमको। तुम्हारी तनख्वाह भले ही कम हो पर है तो सही, हमा्री तो बिलकुल जीरो है, एकदम निठल्ले हैं हम। तुम तो कम से कम कलमाड़ी-राजा जैसे बड़े लोगों की निंदा करते हो, उन पर व्यंग्य कसते हो, हम तो तुम्हारे जैसे छोटे-मोटे लोगों की भी निंदा करते हैं। तुम्हारे लिखे व्यंग्य को अगर एक पाठक भी मिल जाता है तो हम उसे तुम्हारे लेख नहीं पढ़ने देते अपितु उसे दूसरे लेखक की तरफ घुमाने में लग जाते हैं। और रही बात अकेलेपन की तो कम से कम तुम्हारी प्रियतमा तो थी,  हमने तो आज तक किसी लड़की से बात तक नहीं की ऊपर से शादी की उम्र भी निकलती जा रही है। उस बाबा रामदेव की राखी सावंत दीवानी है और हमको तो कोई देखती तक नहीं। अरे सुमितजी कम से कम आप थोड़े ऊंचे दर्जे के दुखियारे हैं पर हम तो एकदम निम्न दर्जे के दुखियारे हैं। मैंने जैसे ही सुना- ऊंचे दर्जे का दुखियारा मेरा दुख ३-४ किलो कम हो गया। वो क्या है ना शुरू से ही हमें ऊंचे दर्जे का कहलाना बहुत पसंद रहा है।

बस फिरथा क्या कुछ देर के बाद हम दोनों ऊंचे एवं निम्न दर्जे के दुखियारे अपने दुखों पर आंसू बहाने लगे। चूंकि मैं पोंगा पंडितजी के अनुसार ऊंचे दर्जे का दुखियारा था इसलिए मैं रौब के साथ एक साफ तौलिया लिए रोने लगा, साथ ही पंडितजी से थोड़ा दूर चला गया ताकि उनके निम्न दर्जे के दखियारे आंसू मुझ पर न पड़े। काफी देर के इस रुदनासन के बाद पंडितजी बोले- अरे सुमितजी आगे और कुछ तो लिखा होगा खबर में वो तो बताइए। मैंने कहा- हां, लिखा है ना। आगे लिखा है कि अगर इस डिप्रेशन का तुरंत इलाज न किया गया तो आगे गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। इतना सुनते ही पंडितजी आंसू पोछकर उठ खड़े हुए। वे बोले- बस अब बहुत हुआ रोना, अब निदान की बारी है। हम आज से ही दुखी होने के सारे रास्ते बंद कर देंगे।

सर्वप्रथम तो अब हम पंडितजी से बाबाजी का रूप धरेंगे। सत्संग कराएंगे, लोगों को ज्ञान बांटेंगे, अपना ट्रस्ट खोलेंगे। लोगों के भक्तिपूर्वक दान से हमारे ट्रस्ट में कई सौ करोड़ रुपए इकट्ठा हो जाएंगे।  इस तरह हम कम आय जैसी पीड़ा से सदा के लिए मुक्त हो जाएंगे। रही बात अकेलेपन की तो बाबा बनते ही हमारे आसपास शिष्य-शिष्याओं की भीड़ होगी, अकेलेपन की प्राब्लम भी समाप्त। इतने ऊंचे जीवनस्तर पर पहुंचने के बाद न तो हमें किसी से ईर्ष्या हो सकती है, न हमें किसी प्रकार की चिंता की आवश्यकता होगी। अंत में रही बात जीवनसाथी की तो हमारा इतना क्रेज देखकर बॉलीवुड तो क्या हालीवुड अभिनेत्रियों भी हमारे लिए क्रेजी हो जाएंगी। लो हो गया सभी समस्याओं का हल, अब आप बोलो। 

जिन पंडितजी को मैने परमअल्पज्ञानी की उपाधि दी थी उनके द्वारा पलभर में इतने सारे समस्याओं का हल बताने पर मैं अवाक् रह गया। उनके मुख से मिसाइल की तरह निकले शब्दों ने एकाएक मेरी नजर में उनका स्थान बहुत ऊपर उठा दिया था। तब उनको साष्टांग दंडवत प्रणाम करते हुए मैं बोला- हे पंडितजी। अपनी समस्याएं तो आपने निपटा ली, अब मेरी समस्याओं का भी हल बताएं। पंडितजी कुछ अकड़कर बोले- हां बालक जरूर। बालक सुनते ही मैं चौंक। पंडितजी आपने मुझे बालक बोला। पंडितजी बोले- बाबा का स्वरूप तो मैंने अभी से ही धर लिया है। अब तुम मेरे लिए सुमितजी नहीं अपितु बालक हो, वत्स हो, मेरे फर्स्ट एंड फोरमोस्ट भक्त हो। मैंने कहा- ठीक है गुरूजी सब मंजूर है। पंडितजी आगे बोले- सबसे पहले तो तुम ये लिखना-विखना बंद करो, कुछ कर्म करो, कर्मप्रधान बनो। कुछ ऐसा करो कि लोग तुम्हारे बारे में लिखें। किसी सरकारी विभाग में घुसे। जहां भी जाओ भ्रष्टाचार की सीमा को पार करते जाओ। अगर चपरासी भी होगे तो उस करोड़पति चपरासी की तरह होना जो हाल ही में उड़ीसा में पकड़ाया था। अगर अधिकारी हुए तो ऐसा अधिकारी होना जिसके यहां इनकम टैक्स वाले छापा मार-मारकर त्रस्त हो जाएं। इन शार्ट बालक! तुम जहां भी रहना भ्रष्टाचार का झंडा बुलंद किए रहना। फिर देखना तुम्हें किसी की सफलता से ईर्ष्या नहीं होंगी अपितु लोग तुमसे ईर्ष्या करेंगे। वैसे भी ईर्ष्या मनुष्य का शत्रु है,  इसलिए जलो मत बराबरी करो पुत्र। ऐसा करते ही तुममें विश्व बंधुत्व की भावना आ जाएगी, तुम्हें सभी भ्रष्टाचारी अपने भाई प्रतीत होंगे। रही बात अकेलेपन से ग्रस्त होने की तो वो तो तुम भूल जाओ, तुम्हारे पास इतना धन होगा कि तुम खुद का स्वयंवर रचा सकते हो वो भी टीवी पर। 

धन्य हो गुरूजी, मैं पंडितजी की जय-जयकार करने लगा। आपने तो चुटकी में मेरे सभी समस्याओं का निदान बता दिया। मैं मूरख न जाने किस मृगतृष्णा में भटक रहा था, किन अंधेरी गलियों में अपना रास्ता तलाश रहा था। मैंने नामसझी में आपको परमअल्पज्ञानी कहा लेकिन आपके मुख से निकले इन चमत्कारी शब्दों ने मेरे ज्ञानचक्षु खोल दिए। मेरे मन में जो बाकी लोगों के प्रति दुर्भावना का मैल था, उसे साफ कर दिया।  आप महान है, परमज्ञानी है। आपकी जय हो। प्रसन्न मुद्रा में मैं बाहर निकला। अब शरीर में जहां-तहां से हो रहा दुखों क स्त्राव बंद हो चुका था। दुखों से भीगी मेरी कमीज सूखकर नई हो चुकी थी। पंडितजी के ज्ञान के साबुन ने उसे साफ करते हुए सर्फ एक्सेल, रिन जैसे साबुनों को फेल कर दिया। दुखों के कारण तन से आ रही दुर्गंध मेरे इर्द-गिर्द फैल चुके ज्ञान के आभामंडल के कारण दूर हो चुकी थी और उसकी जगह पंडितजी के ज्ञान की खुशबू आ रही थी जिसका प्रभाव कुछ-कुछ डियोड्रैंट के विज्ञापनों जैसा था। ज्ञान की खुशबू के कारण कल तक हमको एक नजर तक न देखने वाली बबली अब बबलगम चबाते हुए हमें बड़े प्यार से देख रही थी। अंततः अब मैं दुखियारों की श्रेणी से बाहर आ चुका था। पंडितजी की जय हो।

हमारी रायपुर नगर निगम की संवेदनशीलता का मैं कायल हूं। जिस चीज के बारे में सोचता हूं उसे ये बना देती है। मेरी पुरानी रचना (मुहांसे वाली कैटरीना) में मैंने अपने शहर में नित नई बनती सड़कों के बारे में बताया था। मैं शुरू से शहर में रहा, घर के पास ना तालाब था,  न गांव की तरह घर के पास बहती नदी। तालाबों में खुद की नाव चलाने की तमन्ना तो बस तमन्ना बनके दिल के किसी कोने में दब गई थी, जैसे सरकारी फाइलें किसी कोने में दबी रहती हैं। घर के पास एक अदद तालाब की आस हमेशा रहती थी। घर में तो मैंने नाव तक बनवाकर रखी थी पर उसे तालाब का इंतजार था। बहरहाल, कुछ सालों पहले नगर निगम ने बरसों से लोकल ट्रेन की स्पीड से बन रहे अंडरब्रिज को पूरा करवाया। अंडरब्रिज बनने की मुझे खुशी तो थी पर घर के पास तालाब न बनने की टीस अब भी मन में थी।  


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खैर हम तो जनता-जनार्दन हैं हमारा दिल बहुत बड़ा है और सब कुछ दिल में दबाकर हम आगे बढ़ जाते हैं। अरे हम तो इतने घोटाले, भ्रष्टाचार और महंगाई के दर्द को दिल में दबाकर आगे बढ़ लेते हैं फिर तालाब न बनने का दर्द को मामूली था। बरसात का मौसम आ चुका था। कुछ दिनों तक तो हमारे पगार की छोटी राशि की तरह टिप-टिप करके पानी की बौछारें आई। हफ्तेभर बाद किसी बडे़ घोटाले की बड़ी राशि की तरह अचानक भारी बारिश गिरने लगी। अब जैसे कि आप जानते हैं मैं चिंतक हूं। भारी बारिश के बीच मुझे अपने ऑफिस की चिंता सताने लगी कि बारिश के कारण आफिस नहीं गया तो एक दिन का पैसा कट जाएगा। आप ही बताइए एक तो छोटी सी चादर उपर से उसमें छेद हो जाए तो क्या हालत होगी। इसी डर से मैंने झट से रेनकोट पहना, अपनी फटफटी स्टार्ट की और आफिस के लिए निकल पड़े। जैसे ही अंडरब्रिज पहुंचा तो देखा वह तो तालाब बन चुका है, पानी से लबालब बिलकुल वैसा जैसा मैं सपनों में देखा करता था। नगर निगम ने मुझे सरप्राइज गिफ्ट दिया था। मुझे तालाब चाहिए था और निगम ने अंडरब्रिज की शक्ल में मुझे तालाब दे दिया। इससे एक और बात साबित हो गई कि हमारी निगम संवेदनशील होने के साथ सरप्राइजप्रेमी भी है। वह मार्डन निगम है और आज की पीढ़ी के अनुसार सरप्राइज जैसे ट्रिक अपनाते रहती है। रियलिटी शो में आने वाले ट्विस्ट की तर्ज पर वह हमारे जिंदगियों में भी ट्विस्ट लाकर जिंदगी की टीआरपी बढ़ाने में निपुण है। अगर वह हम पर इमोशनल अत्याचार करती है तो हमें बिग बॉस बनाने वाली भी वही है।



अंडरब्रिज में लबालब पानी को देखकर तो लगा कि कहीं से नाव लाऊं और कूद पड़ूं। लेकिन अपनी घरघराती गाड़ी को देखकर सोचने लगा काश इसकी जगह घऱ से नाव लेकर निकला होता। गाड़ी लेकर अंडरब्रिज के पानी में घुसूंगा को बीच में बंद होना का डर है। परंतु अंडरब्रिज पार करना भी जरूरी था क्योंकि कटने वाले वेतन की चिंता हमारे चिंतक मस्तिष्क में बार-बार खटखटा रही थी। बड़ी मुश्किल थी। हमारी हालत उस मजबूर सरकार की तरह हो गई थी जो किसी घोटाले के आरोपी के खिलाफ कार्रवाई करूं या न करूं की पशोपेश में हो। कार्रवाई की तो गठबंधन हल्ला करेगा और नहीं की तो जनता हल्ला करेगी। मगर जिस तरह एक कमजोर सरकार घोटाले होने के बहुत देर बाद ही सही कार्रवाई करने का मन बनाती है उसी तरह मैंने भी आधे घंटे इंतजार करने के बाद तय किया कि अब तो गाड़ी लेकर ही पानी में घुसना पड़ेगा।


बस भगवान का नाम लिया, अपनी फटफटी स्टार्ट की और सीधे घुस गया पानी में। जैसे कि हमारे देश में लोग भेड़चाल के आदी हैं मेरी देखादेखी कुछ और लोग भी मेरे पीछे आ गए। हममें चिंतन के साथ नेतृत्व गुण भी शुरू से ही रहा हैं और अब इन पानी में फंसे लोगों का नेता बनकर हमें बड़ी अच्छी वाली फीलिंग रही थी। पेट्रोल टंकी तक पानी में डूबी हमारी फटफटी किसी गठबंधन सरकार की तरह धक्क-धक्क  करके चल रही थी। लगता था बस अब बंद हुई, तब बंद हई। लेकिन सच कहूं तो पानी में डूबी हमारी फटफटी हमें किसी नौका से भी ज्यादा सुंदर अहसास दे रही थी। हमने तो नौका के सपने देखे थे यहां तो ऐसा लग रहा था जैसे हम मोटरसायकिल नहीं वाटरमोटरसायकिल या फिर कहें वाटरबाइक चला रहे हों। अब देखिए निगम ने ७० हजार की फटफटी में हमें ७ लाख वाली वाटरबाइक के मजे दिलवा दिए। मैंने आपको बताया ही था हमारी निगम हमारा कितना ख्याल रखती है। कुछ पल के लिए तो हम खुद को धूम श्रेणी की फिल्मों में वाटरबाइक चलाने वाले छुटके बच्चन की तरह समझ रहे थे। कभी-कभी तो हम हॉलीवुड अभिनेताओं को भी टक्कर देते नजर आ रहे थे। 

तभी हमारी फटफटी अचानक बंद हो गई। ऐसा लगा जैसा किसी गठबंधन सरकार से उसके प्रमुख घटक दल ने समर्थन वापस ले लिया हो। हमने फटफटी फिर शुरू करने की कोशिश की पर फटफटी से समर्थन न मिला। वह नाराज घटक दल की तरह अड़ी रही। तभी पीछे आ रही मेरे समर्थकों की गाड़ियां भी बंद हो गई। गाड़ी बंद होते वे मुझे खराब नेता घोषित करने पर तुल गए। मैं समझ गया स्वार्थ की दुनिया है और राजनीति का उसूल है अपनी गलती कभी न मानना। १५ मिनट की नेतागिरी में मुझमें इतनी समझ तो आ चुकी थी। मैंने पैंतरा बदला और कहा-  गलती तुम लोग की है। मैं अच्छा भला दूसरे रास्ते से जा रहा था तुम लोगों ने मुझे जबरन इस पानी में धकेल दिया। मुझे दोष मत दो और यहां से फुटो।  मेरा ध्यान फिर गाड़ी पर गया मैंने भगवान का नाम लेकर गाड़ी शुरू करना चाहा पर बात नहीं बनी। मैंने गाड़ी से विनती की पर वह न मानी। मैंने उसे उसकी गर्लफ्रैंड्स स्कूटी पेप, प्लेजर और एक्टीवा की कसमें दी पर उसने इन सबसे अपनी ब्रेकअप की बात कहकर मेरी बात काट दी। 

अब मेरी समझ में आ चुका था कि आज के भ्रष्ट युग में मेरी फटफटी भी भ्रष्ट हो चुकी है। वह न भगवान के नाम से मानेगी, न ही विनती और कसमो से। उसे तो घूस देना पड़ेगा। मैंने अपनी फटफटी से अबकी बार ताव से कहा- चालू होने का क्या लेगा साफ साफ बता।। फटफटी तपाक से बोला-  स्ट्रार्ट होने के बदले मुझे अपने लिए एक पर्सनल कमरा चाहिए जहां मैं आराम से रह सकूं और तुम लोग के घरेलू लड़ाई में न फंसू। पिछली बार तुम लोगों की लड़ाई में मेरे मिरर टूट गए और टंकी चपट गई। मैंने कहा ठीक है मंजूर। इतना बोलते ही फटफटी घन....घन... की मधुर ध्वनि के साथ स्टार्ट हो गई। अंडरब्रिज पार करते ही मुझे एक उपाय सूझा। घर में रखी नांव को पानी में उतारने का वक्त आ गया है। दोस्तों को फोनकर मैंने नांव बुलवाई व इस पार से उस पार ले जाने का १० रुपये किराया रख दिया। उस दिन ऑफिस तो नहीं जा पाया एक दिन की पगार भी कट गई। लेकिन लोगों को इस पार से उस पार करवाकर मैंने उससे कई गुना कमा लिया। उसके बाद तो मैंने दो-तीन आफिस जाना मुनासिब ही नहीं समझा। बस तबसे हर साल मुझे इंतजार रहता है सावन का। बढ़ती महंगाई के कारण मैंने नांव का किराया १५ रुपये कर दिया है। आप ही बताइए रेट ठीक है ना अगर कम लगे तो भी बता दीजिएगा, सावन अभी शुरू ही हुआ है रेट एडजस्ट करने का टाइम है अभी।
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दिग्विजय के बयानों से तंग आई भाजपा ने यह कहकर उन्हें चुप कराने की कोशिश की उनमें ओसामा की आत्मा घुस गई है। लेकिन आप ही बताइए जिस तरह दिग्विजयजी के मुंह से  धड़ाधड़ बयानों की सुपरसोनिक मिसाइल निकल रही है उस पर फुलस्टाप लग सकता है क्या?  फिर भी भाजपा का यह बयान था एक बेहद चुटीला व्यंग्य। पहले तो यह बयान पढ़कर हंसी आई लेकिन जैसे कि आप लोग जानते हैं चिंतन करना मेरे स्वभाव में है और दिन में बिना एक-दो बार  चिंतन किए मन तृप्त नहीं होता। बस यह बयान पढ़ते हुए आई हंसी क्षणभर में फुर्र हो गई और चिंतन वाला चेहरा उभरकर आ गया। 


मन में एक विचार खटका कि कहीं सच में तो दिग्विजयजी के शरीर में.........।  न..न..ये नहीं हो सकता। लेकिन हो भी सकता है। मन में विचार कुछ स्पष्ट नहीं आ रहा थे, शायद चिंतन करने वाले मस्तिष्क के हिस्से में बैटरी लो था। हमने तुरंत अपना पावर वाला चश्मा चढ़ाया, हाथों में कलम लिया और एक पूर्ण चिंतक का अवतार धरकर बैठ गए दोबारा चिंतन करने। भारत तो शुरू से भूत-प्रेत, आत्मा की कथाओं वाला देश रहा है। इन कथाओं का ऐसा आकर्षण रहा है कि लोग डरने के बाद भी इन्हें सुनने उत्सुक रहते हैं। भूत-प्रेत के भरोसे तो चैनलवाले भी अपनी टीआरपी बढ़ा लेते हैं, भूत भगाने के नाम पर बाबाओं की रोजी-रोटी क्या छप्पनभोग चल जाती है। हो सकता है यही टीआरपी ओसामा की आत्मा को भारत खींच लाई हो। फिर सोचा नहीं.... देश तो तरक्की कर रहा है। भूत-प्रेत तो गांव-देहात में रहते हैं। फिर याद आया... काहे की तरक्की ७० प्रतिशत आबादी तो अब भी गांव में बसती है। शायद ओसामा की आत्मा पाकिस्तान से निकलकर सरहद पार करते हुए गांवों के रास्ते होते हुए दिग्विजयजी के शरीर में घुस गई हो। अगर दिग्विजयजी के शरीर में ओसामा की आत्मा नहीं है फिर तो कोई प्राब्लम नहीं लेकिन अगर है तो समझ लीजिए टेंशनों की बाढ़ मुंह बाए खड़ी है।



घर में अकेले चितंन करते करते बोरियत होने लगी ती तो सोचा थोड़ा पड़ोस के परमअल्पज्ञानी पोंडा पंडितजी से चर्चा की जाए। उन्होंने कहा मुझे अपने दिब्य (पंडितजी शुद्ध हिन्दी वाले हैं इसलिए दिव्य को दिब्य कहते हैं) ज्ञान आभास होता है कि ओसामा ने अपनी मौत के चंद मिनटों पूर्व ही तय कर लिया था कि उनकी आत्मा को यहीं पृथ्वीलोक में किसी प्राणी के शरीर में घुसना है। पर इतने अरबों की की जनसंख्या में किसके शरीर में घुसा जाए यह समस्या थी। ओसामा की मौत के बाद दिग्विजयजी ने जैसे ही ओसामा को ओसामाजी कहा, उसी समय ओसामा ने इसे इन्वीटेशन मान लिया होगा। चंद घंटों में ही सही व्यक्ति मिल गया। न ऑनलाइन पोल का झंझट, न वोटिंग  ना कोई रिटलिटी शो का ड्रामा क्या किस्मत है ओसामा। या यह भी हो सकता है कि दिग्विजय के निरंतर खुले रहने वाले मुख को उन्होंने खुल जा सिम सिम की तरह अंदर आने का न्यौता समझ लिया होगा और सांस के साथ उनके अंदर चले गए होंगे।


ओसामा दिग्विजयजी के अंदर कैसे गए ये छोड़िए यहां बात हो रही थी  आने वाली परेशानियों की। मैं तो बोलता हूं ज्यादा हल्ला नहीं करना चाहिए। श...श...श...।  इस खबर को यहीं दबा देना चाहिए। अगर खुदा ना खास्ता ये खबर ओसामा की मौत के जश्न में डूबे अमरिकियों को लग गई तो समझ लीजिए वो लोग अपना हाथों का जाम फेंककर बंदूक लेकर यहां दौड़ पड़ेंगे।  और कहीं पड़ोसी पाकिस्तान में यह खबर फैल गई तो अलकायदा में भी खलबली मच सकती है। ओसामा के जाने के बाद शीर्ष पद का उम्मीदवार सपने टूटने के गम से डिप्रेशन में जा सकता है। और सबसे खतरनाक न्यूज चैनल वाले जो अफवाह को भी खबर की तरह पेश करने में महिर है तुरंत इस खबर पर सीरीज चालू कर देंगे। चैन से सोना है तो जाग जाइए........। ओसामा की आत्मा कहीं से भी आपमें घुस सकती है। अपना मुंह, आंख, कान बंद रखिए।  कान में रूई ठूंस लीजिए। आपके कान के पास चल रही जूं में भी ओसामा की आत्मा हो सकती है। चैन से रहना है तो डकार मारना छोड़ दीजिए। आपकी ३० सेकंड की  डकार मौका दे सकती है ओसामा की आत्मा को आपके अंदर घुसने का.... वगैरह वगैरह.....। 


खैर एक अच्छे विपक्ष की तरह भाजपा ने मर्ज तो बताया ही साथ ही इलाज करने का बीड़ा भी अपने सिर पर ले लिया। उन्होंने कहा कि दिग्विजयजी का झाड़-फूंक हम कराएंगे। भाजपा का यह "केयरिंग नेचर" मुझे बहुत पसंद आया। मैं तो यही कहूंगा- "सलामत  रहे विपक्षाना तुम्हारा"। पर आखिर में मेरी एक सलाह है कि जिस बाबा-बैगा के पास आप इन्हें लें जाएं वो बुश और ओबामा को "काम्बो पैक" होना चाहिए। अजी, ओसामा की आत्मा को भगाने के लिए बुश-ओबामा के "काम्बो पैक" को १० साल लग गए तो उनसे कम चलेगा ही नहीं। ठीक है पोंगापंडितजी अब चिंतन टाइप समाप्त,  बाकी का चिंतन कल अब इजाजत दीजिए । यह कहते हुए मैं पोंगा पंडितजी के यहां से प्रस्थान करना ही उचित समझा।
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बुधवार को हुए श्रृंखलाबद्ध धमाकों से हुई तबाही को गुरूवार की सुबह सुबह अखबारों में देख मन हिल गया। लाशों की तस्वीरें, घायलों के कराहते चेहरे, घटनास्थल पर पड़े चिथड़े दिनभर आंखों के सामने घूमते रहे। नेताओं के रुटीन, खोखले सांत्वना भरे बयानों की तरफ तो नज़र घुमाने की भी इच्छा न हुई। हर धमाके या आतंकी हमले के कुछ दिनों तक यही चलता रहता है।  अगले दिन शुक्रवार को अखबारों में पढ़ा- "फिर पटरी पर लौटी जिंदादिल मुंबई", "नए फौसले के साथ काम पर लौटे मुंबईवासी", "आतंक के मुंह पर तमाचा" जैसे शीर्षकों से अखबार सजे हुए थे। पढ़कर अच्छा लगा पर याद आया २००६ के हमलों के अगले दिन भी ऐसी ही खबरें अखबारों में छपी थी। मुंबई हो या कोई अन्य शहर जहां ऐसे हादसे हुए हों, वहां जिंदगी कुछ ही दिनों में पटरी पर आ जाती है। क्योंकि इस आपाधापी भरे जीवन में इंसान चाहकर भी नहीं रुक पाता। हां, लोगों में पीड़ितों के प्रति सहानुभूति है, वे उनका दर्द महसूस करते हैं। हमलावरों के साथ ही अशक्त सरकार के प्रति रोष भी है, कहीं डर भी है और साथ में है साहस आगे बढ़ने का। घायलों की स्थिति उन्हें द्रवित करती हैं। वे रुकना चाहते हैं पर जिंदगी की जिम्मेदारियां उनके कदम आगे ढकेल देती है। परंतु ऐसे हमलों के बाद नागरिकों द्वारा डर को पछाड़ते हुए जिंदादिली से आगे बढ़ना आतंक के मुंह पर तमाचा भी है। जनता अपने इस हौसले भरे कदम के साथ यह जताती है कि हम कमज़ोर नहीं। तुम आतंक फैला सकते हो पर हमारे हौसले के आगे ये बहुत छोटे हैं। इस तरह बुधवार के हमलों के बाद अगले दिन मुंबई का पटरी पर लौटना आतंकियों को करारा जवाब था।



अब प्रश्न उठता है कि सरकार कब इन हिसंक तत्वों के गाल पर तमाचा जडेगी। कब आतंकियों को ये संदेश देगी कि आइंदा हमला करने की योजना भी बनाई तो अपनी खैर मनाना। जरा सोचिए क्या बीत रही होगी १३ जुलाई को हमले में मारे गए उन बेगुनाहों के परिवारवालों पर। उनके लिए तो जिंदगी मानो थम सी गई है। बाहर दुनिया चलायमान है, नेताओं की जुबानें चल रही हैं, आतंकियों की गोलियां चल रही हैं मगर उनके लिए जिंदगी उस एक पल में रुक गई है। जो घायल हुए हैं, उन पर क्या बीतती होगी जब वे टीवी पर घायलों को मुआवजे देने की खबर सुनते होंगे? क्या हमारे जान की कीमत चंद रुपये हैं। क्यों गया मैं उस जगह। काश घर में होता। क्या ऐसी कोई जगह है जहां मैं सुरिक्षत महसूस कर सकता हूं?  कहीं इस अस्पताल में भी तो बम नहीं रखा है। ऐसे न जाने कितने प्रकार के सवाल बिस्तर पर लेटे उस घायल में मन में चलते होंगे। पर ये सवाल क्या सरकार चलाने वालों के मन में आते होंगे?


शायद नहीं। क्योंकि अगर आते होते तो ५ साल पहले मुंबई में खूनी खेल खेलने वाला कसाब अब तक जिंदा नहीं होता। अफजल गुरू जैसे दहशतगर्द को अब तक सजा मिल गई होती। इन हमलावरों को सजा न देकर सरकार क्या संदेश देना चाहती है कि आइए हमला करिए और चैन से यहां रहिए। पांच साल पहले जब मुंबई हमला हुआ तब कहा गया कि चूक हुई है। चूक होना अलग बात है और उस चूक को न सुधारना दूसरी बात। हमले की वजह चूक थी पर कसाब को तत्काल फांसी देकर ये संदेश दिया जा सकता था कि हम पर हमला करने वाले का यही हश्र होता है। पर कसाब का अब तक जिंदा रहना ही आतंकियों के हौसले को बढ़ाने के लिए काफी है। मुंबई हमले २००६ में मारे गए लोगों के परिजन जब कसाब को जिंदा देखते होंगे, अखबारों में उस पर खर्च होती भारी मात्रा की खबर पढ़ते होंगे तो उनके दिल टूट जाते होंगे। लोकतंत्र और सरकार पर से तो उनका भरोसा उठ जाता होगा। आप ही बताइए  क्या यही कसाब ९/११ के हमलों में अमेरिका में पकड़ा गया होता तो क्या वो अब तक जिंदा रहता। बिलकुल नहीं। उसे तो कबकी फांसी मिल चुकी होती।


फिर आखिर भारत आतंकवाद के मोर्चे पर कोई करारा जवाब देने से क्यों हिचकता है। अमेरिका की तरह पाकिस्तान में घुसकर अपने दुश्मन को मारने की बात छोड़िए। अपने देश में खून की होली खेलने वाले हत्यारों को सजा देकर तो अपनी दृढ़ता दिखाई जा सकती है। अब तो बस आशा ही की जा सकती है कि कोई तो ठोस कदम भारत की तरफ से उठाया जाएगा। आतंकवाद का खात्मा कोई रातों रात या चंद दिनों में नहीं हो सकता। यह भी सत्य है कि कितनी भी चौकस व्यवस्था हो इतने बड़े देश के हर एक गली-मोहल्ले को सुरक्षित नहीं किया जा सकता किंतु आतंकवाद के खिलाफ छोटे-छोटे ठोस कदमों को बढ़ाकर पीड़ित जनता के घावों पर मरहम तो लगाया जा सकता है।
सुबह की गरमागरम का चाय बिना किसी चटखारे खबर के बेस्वाद लगती है। चाय की चुस्कियां लेते हुए अखबार में किसी मजेदार खबर की तलाश में नजरें इस पन्ने से उस पन्ने घुमाए जा रहे था कि एक खबर पर नजर पड़ी। "कांग्रेस ने अपने कार्यकर्ताओं व नेताओं से मना किया है कि वे बाबा रामदेव के शिविर में न जाएं"। इस खबर को पढ़ते ही मन में कुछ मज़ेदार पात्र उभरने लगे। आप सब "न आना इस देस लाड़ो" धारावाहिक से वाकिफ तो होंगे और इसकी सबसे चर्चित पात्र अम्माजी से भी। बस इस फरमान को सुनकर ऐसा लगा जैसे मानो कांग्रेस अम्माजी की तरह अपनी लाडो (कार्यकर्ताओं) को समझा रही हो कि "न जाना उस शिविर लाडो"।


naa-aana-iss-des-laado 1कांग्रेस लोकतंत्र का चोगा ओढ़े और हाथ में अनुशासन का डंडा लिए अपनी लाडो से कहती है- "लाडो, म्हारे को पता है कि तुम लोगों में से बहुत उस बाबा रामदेव के शिविर में जाया करते थे, पर एक बात म्हारी आज से साफ-साफ समझ ले लाडो, आज से उस बाबा के शिविर के बाहर भी तुम में से कोई दिखाई दी, तो म्हारे से बुरा कोई ना होगा। योगा -वोगा जो तुम सबणे करणा है सो यही करो।" 


कुछ लाडो विद्रोही थीं वे बोल पड़ी- "अम्माजी, योग तो सिर्फ शिविर में होता है, बाबा से जो हमारा नाता है वो क्या आपके एक फरमान से हम तोड़ लें।"  ऐसे विद्रोही तेवर अम्मजी को सहन न हुए और वे बोलीं " मतलब लाडो थारे को भी योग का रोग लग गया। म्हारे को पता था एक दिण ऐसा ही होगा। म्हारी लाडो अब म्हारे से जबान चलावेगी। बड़ा बुरा होवे ये योग का रोग। क्यूं लाडो वो बाबा तेरे घर के सामने तांडव करे है, थारी अम्माजी के सिर में दर्द पैदा करे है और तू क्या उस बाबा के शिविर में जाने जिद करे है। पता नहीं उस बाबा ने योग सिखाते सिखाते कौण सी जड़ी-बूटी म्हारी लाडो को पिला दी है कि अब तू म्हारे से बैर पाल रही है। इसीलिए मैं शुरू से ऐसी लाडो (कार्यकर्ताओं) के जन्म खिलाफ थीं जो परिवार का नाम खराब कर सके हैं। अब ध्यान से सुन लाडो म्हारी बात आखिर बार। अगर तन्ने यहां रहना है तो म्हारी बात माननी पड़ेगी वरना आगे जो होगा वो सोच ले।" 


लाडो बोली "ना, अम्माजी मैं कब बोली मैं आपकी बात ना मानूंगी। पर दिक्कत है ये है अम्माजी कि बाबा ने रोग का ऐसा रोग लगाया है कि जब तक सुबह १ घंटे शरीर को आड़ा-टेढ़ा न करूं शरीर दर्द करता है। "


yogaअम्माजी खुश होते हुए बोली "अरी बांवरी, ये बात थी तो पहले बोलणा था ना, मैं न जाणे क्या क्या समझ रही थी थारे बारे में म्हारी लाडो।  योगा सीखणे खातिर किसी को बुलवा ले, अरे योग सिखाणे वालो की कमी है क्या। वो कौन सी लड़की है जो फिलम में आती है, साथ में योगा भी करती है हां- शिल्पा शेट्टी, उससे सीख लो वो कैसी रहेगी। " ना वो ना आ पाएगी अम्माजी, वो तो घर-गृहस्थी और क्रिकेट में ही व्यस्त रहती है, लाडो बोली।


"ऐसा के, पर उसकी डीवीडी तो आवे है ना बाजार में वो ले आना, सारा परिवार उसे बड़े परदे पर देखकर मिलकर योग करेगा, इतना बड़ा मैदान है म्हारा। वैसे सच बोलूं तो म्हारे भी दिल में योग सीखने की इच्छा बहुत समय से थी, क्या पता कल म्हारे को भी कहीं आमरण अनशन करना पड़ा गया तो उन ९-१० दिन योग करके ही टाइमपास करना पड़ेगा ना। रुक लाडो अभी छोटू से डीवीडी मंगवा लेती हूं, अरे छोटूं... कहां मर गया, जा भई जल्दी शिल्पा शेट्टी की योगा की डीवी ले आ। "