तारीफ सुनना सब पसंद करते हैं। सबकी ख्वाहिश होती है कि वे जहां जाएं उनकी तारीफ हो। मगर ये कमबख्त इंसानी फितरत..... हम तारीफ तो थोक में सुनना चाहते हैं लेकिन दूसरे की तारीफ चिल्हरों में करते हैं। जैसे खुद चंदा मांगने जाएं तो १०० से कम में नहीं मानेंगे लेकिन किसी भिखारी को १ रुपये से ज्यादा दान देने पर जान निकल जाती है। वैसे तारीफपसंद लोगों की भी काफी वैरायटी होती है। कुछ अपने मुंह मिट्ठू मियां बनते हैं, ऐसे लोग खुद ही अपना गुणगान कर अपना काम चला लेते हैं..। ये लोग बड़े खुद्दार किस्म के होते हैं, तारीफ के मामले में ये किसी का एहसान लेने में यकीन नहीं करते थे। पर पिछले दशक के आखिर तक ये खुद्दाम किस्म के मिट्ठु लुप्तप्राय हो गए। फिर जमाना आया दूसरों के मुंह मिट्ठू मियां बनने वालों का। ये कुछेक लोगों के मुंह से अपने तारीफ सुन सातवें आसमान पर पहुंच जाया करते थे। कुछ समय बाद ये ज्यादा तारीफें झेल नहीं पाए और आठवें आसमान पर पहुंचकर ये मिट्ठू भी लुप्तप्राय हो गए।

बंधुवर आज का जमाना है सबके मुंह मिट्ठू मियां बनने वालों का। ऐसे लोग तारीफ करने वालों का जत्था लिए ही साथ में चलते हैं। जब तक ५-६ लोग थोक में इनकी तारीफ न करें, इनका खाना नहीं पचता। इसी बिरादरी में हमारे एक मित्र भी आते हैं। वे बड़े ही सभ्य व सज्जन टाईप हैं और जब भी उन्हें अपनी तारीफ करवानी होती है, वे साथ खड़े चार-पांच लोगों को आगे कर देते हैं। एक बार इनके पिताजी ने इनसे पूछा कि परीक्षा कैसी गई। हमारे मित्र ने कहा- बहुत अच्छी गई, लेकिन हमने कैसे लिखा यह आपको हमारे मित्र बताएंगे। इतना कहते ही उन्होंने हम चार दोस्तों को आगे कर दिया। हम उनके शेर सदृश्य पिताजी के सामने निरीह बकरियों की तरह खड़े थे। एक बार यही मित्र इंटरव्यू देने गए जहां इनसे पूछा गया कि आप अपनी तारीफ में क्या कहना चाहेंगे। इतना सुनते ही हमारे मित्र ने हम सात-आठ दोस्तों को फोन किया और हमें वहां बुलाकर तारीफों का ऐसा टेप बजवाया कि उनकी तो नौकरी लग गई लेकिन हमारी लगी-लगाई नौकरी छूट गई। पर क्या करें हर एक फ्रेंड जरुरी होता है...।

आजकल जमाना आउटसोर्सिंग का है। अपना काम किसी दूसरे से करवाना। बेचारे सरकारी मुलाजिम आउटसोर्सिंग नहीं कर पाते इसलिए आपस में ही फाइल को आगे बढ़ा-बढाकर, तो कभी भी गोल-गोल घुमाकर आउटसोर्सिंग का लुत्फ उठाने की कोशिश करते रहते हैं.। इसलिए हमारे मित्र की तरह बहुत से लोग तारीफों की आउटसोर्सिंग भी करवाने लगे हैं। जब शादियां से लेकर तलाक तक ठेके पर करवाई जा सकती है, तो तारीफें क्यो नहीं। तारीफों के पुल बांधना कोई बच्चा का खेल तो है नहीं ना..। दूसरों के मुंह से तारीफ करवाने का एक फायदा यह है कि तारीफों ज्यादा ऑथेंटिक यानी विश्वसनीय लगती हैं। पर जैसे की मैंने उपर बताया कि इंसानी फितरत...। किसी दूसरे के लिए तारीफों के दो शब्द बड़े जतन से निकलते हैं। तारीफों की डिमांड ज्यादा है पर सप्लाई कम। तारीफ पाना हर इंसान का मौलिक अधिकार है, और किसी के मौलिक अधिकारों का हनन मुझे कतई मंजूर नहीं। भले ही मैं स्कूल में नागरिक शास्त्र की कक्षाओं में नदारद रहा हूं, लेकिन तारीफ का अधिकार तो मैं सबको दिलाकर रहूंगा।


बस इसी तारीफों की कमी को पूरा करने के लिए ही तो भगवान ने मुझे धरती पर भेजा है। छोटे-मोटे काम करके मैं वैसे भी ऊब चुका था, उपर से घरवाले मुझ पर बरस पड़ते कि- पता नहीं ये लड़का क्या करेगा।  वैसे भी कहते हैं खाली दिमाग शैतान का घर.....। मेरे दिमाग में भी कई बार यह ख्याल आया कि आखिर मैं दुनिया में करने क्या आया हूं। पर, अब मुझे पता चल चुका है कि मैं जनकल्याण के लिए आया हूं। बस इसी जनकल्याण के विचार को मन में लिए मैंने अपनी कंपनी तारीफ कंस्ट्रक्शन्स खोली है। न हींग न फिटकरी और रंग बिलकुल चोखा। बिलकुल मस्त धंधा है। नो इन्वेस्टमेंट फुल प्राफिट। जब लोग दूसरों की शादी (बर्बादी) कराकर पैसा कमा सकते हैं तो मैं तारीफ करके पैसा क्यों नहीं कमा सकता। तारीफ सुनकर चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। और वैसे भी किसी बहुत ज्ञानी आदमी ने कहा है कि किसी के चेहरे पर मुस्कान लाने से बड़ा कोई पुण्य नहीं। उस ज्ञानी आदमी का नाम मैं आपको बताता..... पर वो आदमी अभी लिखने में व्यस्त है।


वैसे मेरी कंपनी तारीफों के सिर्फ पुल ही नही बनाती। जब बंदे का काम तारीफों की दो सीढ़ियों में ही निपट सकता है तो फिजूल ही तारीफों का पुल बनाकर तारीफें बर्बाद क्यों करना। मटेरियल बच गया तो दूसरे के काम आ जाएंगी। ग्राहक भगवान होता है और और ग्राहक के डिमांड के हिसाब से तारीफों की सीढ़ी, तारीफों के कदम, जरुरत पड़ने पर कई बार तारीफों के अंडरब्रिज, फ्लाईओवर, ४ लेन, ८ लेन रोड भी बनवा  देते हैं।


एक कर्मचारी हमारे पास आए जो साल दर साल अपने बॉस की तारीफ कर प्रमोशन पाए जा रहे थे, लेकिन इस बार उनका डिमोशन हो गया, कारण कि बॉस हर बार वही पुरानी तारीफें सुनकर उब चुका था। हमने तुरंत अपनी रेस्क्यू टीम को उनके आफिस भेजा जिन्होंने ऐसी तारीफें की कि उसकी नौकरी तो बची ही, साथ ही प्रमोशन भी हो गया। कुछ समय बाद एक दुखी लेखक हमारे पास आए। लेखन उनका ठीक-ठाक था, मगर ताउम्र तारीफों का अकाल रहा। लेखक क्या चाहे, बस दो तारीफ। हमारी टीम ने उनके कवि सम्मेलन में तारीफों की जो शुरूआत की, उसके बाद तो भेड़चाल की आदि भीड़ १५ मिनट तक ताली बजाती रही। हालांकि, सच कहें तो उनकी लिखी कविता सच में सिरदर्द थी। पर सिर के दर्द को सिर का सेहरा बनाना ही तो तारीफ कंस्ट्रक्शंस का काम है।

कुछ समय पहले एक महिला हमारे पास आई जिन्हें लगता था कि उनके पति उनसे प्यार नहीं करते क्योंकि वे आजकल उनकी तारीफ में कसीदे नहीं पढ़ते। वो तो तलाक लेने पर उतारु थीं, तभी हमने उनके पति को हमारी तारीफ पब्लीशर्स की लेटेस्ट किताब तारीफ के काबिल पकड़ाई, साथ ही गारंटी दी कि १० साल तक तो तारीफें खत्म नहीं होंगी। इस तरह हमने उनकी शादीशुदा लाइफ में १० साल का टॉप अप डाल दिया। इस केस के बाद मुझे लगा मुझे मेट्रीमोनी में भी हाथ आजमाना चाहिए। वैसे तारीफ कंस्ट्रक्शंस ने जितनी जल्दी तरक्की की है उसके बाद भविष्य में बहुत कुछ शुरु करने का इरादा है। फिलहाल के लिए आपसे एक दरख्वास्त। अगर आपकी कहीं थोक के भाव तारीफ हो रही हो, तो समझ लीजिएगा इसमें थोड़ा हाथ तारीफ कंस्ट्रक्शंस का भी होगा। अगर आप मुझे धन्यवाद देना चाहें, तो बेशक दीजिएगा। क्योंकि भले ही तारीफों का कुआं खोद कर रखा है हमने, पर तारीफों के प्यासे तो हम भी हैं।
वेलेंटाइन डे पर हुआ भारत-श्रीलंका का वनडे मैच बड़ा ही रोमांटिक था... म..म..माफ कीजिएगा रोमांचक था। वो क्या है, कभी-कभी मेरी जुबान जरा फिसल जाती है। पर कुछ भी कहें ये मैच वाकई था बहुत रोमांटिक... इतना रोमांटिक कि प्रेमकथाओं के प्रख्यात निर्देशक यश चोपड़ा भी इसे देख जल-भुनकर खाक हो गए। प्यार नाम है त्याग का, औरों को खुश रखने का। प्यार में कोई ऊंच-नीच नहीं होती, सब बराबर होते हैं। और इस मैच में भी यह सब देखना मिला। बड़ा ही रोमांटिक मैच था। रोमांटिक तो होना ही था, अब जब खिलाड़ियों को प्रेम दिवस के दिन भी मैच खिलाया गया तो बेबस खिलाड़ी करते ही क्या। वे तो प्यार का खुमार लिए मैदान पर ही उतर गए, इस वादे के साथ कि मैदान पर ही सारा प्यार उढेल देंगे। क्या खिलाड़ी, क्या अंपायर सब मानो मैदान पर ही अपना प्यार दिखाने उतारु थे। लेकिन इन सब रोमांटिक खिलाड़ियों के बीच सबसे रोमांटिक निकले अपने कैप्टन कूल धोनी। 

श्रीलंका के तीन विकेट जल्दी आउट हो गए। धोनी को डर लगने लगा कि कहीं श्रीलंकाई पारी जल्दी न निपट जाए। इधर अंपायरों ने भी जल्दी मैच खत्म होने की उम्मीद में अपनी धर्मपत्नियों को फोन घुमाया और डेट पर जाने के लिए तैयार रहने कहा। धोनी को अंपायरों का यह स्वार्थीपन पसंद नहीं आया।  इसलिए उन्होंने विकेटों का मोह त्यागा और अपने गेंदबाजों को प्यार का पाठ पढ़ाया और प्रेम से गेंदबाजी करने कहा। गेदंबाजों ने इतने प्यार से गेंदबाजी की कि श्रीलंका ने जैसे-तैसे ९ विकेट पर २३६ रन बना ही लिए। उन्होंने वेलेंटाइन गिफ्ट के तौर पर ८ रन अतिरिक्त भी दिए।  गेंदबाज चाहते तो आखिरी विकेट भी उखाड़ सकते थे लेकिन जैसे मैने पहले कहा था कि त्याग ही तो प्रेम का दूसरा स्वरूप है। 

इसके बाद भारत की बल्लेबाजी आई। सचिन, कोहली व रोहित एक के बाद एक १५ रन बनाकर आउट हो गए। उन्हें डर था कि कहीं मैच के चक्कर में १४ फरवरी १५ फरवरी में न तब्दील हो जाए।  दूसरी तरफ श्रीलंकाई गेंदबाजों ने गंभीर के प्रति भरपूर प्यार दिखाया और उन्हें बतौर गिफ्ट रन बांटते चले गए। रैना को तो मैदान पर रहने का मन ही नहीं था और वे ८ रन बनाकर चलते बने। मैच को लंबा खिंचते देख और क्रोधी धर्मपत्नी का फोन आता देख अंपायर ने ओवर में एक गेंद कम गिनकर मैच जल्दी निपटाने की जुगत भिड़ाई। पर रोमांटिक धोनी ने एक के बाद एक गेंद सड़ाना शुरु किया और इस प्रेममय मैच को लंबी खिंचते गए। वे चाहते तो मैच ४० ओवर में ही निपटा देते पर प्यार का मज़ा तो आहिस्ता-आहिस्ता ही आता है। 

इस बीच गंभीर के मन में श्रीलंकाई गेंदबाजों के प्यार को देखकर लालच आ गया और वे शतक लगाने के सपने बुनने लगे। लेकिन लवगुरु धोनी को मालूम है कि प्यार में लालच का कोई स्थान नहीं होता और उन्होंने गंभीर को रन आउट करा वापस पैवेलियन भेज दिया। भारत के क्रिकेटप्रेमी तो धोनी-धोनी चिल्ला ही रहे थे पर इसके बाद तो श्रीलंकाई क्रिकेटप्रेमी भी धोनी नाम का जप करने लगे। इधर धोनी धीमे-धीमे अपनी पारी को आगे बढ़ा रहे थे और डेट पर जाने की उम्मीद में खड़े अंपायरों को खून के आंसू रुला रहे थे। उधर जडेजा आज कुछ जड़ने के मूड में नहीं थे। अश्विन को भी विन-लॉस में कोई रुचि नहीं थी। तभी धोनी ने ध्यान दिया कि हमारे तो बस ७ विकेट गिरे ही है वहीं श्रीलंका के तो ९ विकेट गिरे थे। प्यार में ऊंच-नीच मंजूर नहीं। लवगुरु धोनी ने ठान लिया कि दो और विकेट गिराने ही होंगे। 

वहीं श्रीलंकाई कप्तान भी कम रोमांटिक नहीं थे। उनको भी अहसास हुआ कि धोनी ने कुछ ज्यादा ही त्याग कर दिया है। अब त्याग करने की बारी उनकी है। २ ओवर में धोनी भला २४ रन कैसे बनाएंगे। इसलिए उन्होंने अपने उपकप्तान को गेंद सौंपी और वेलेंटाइन गिफ्ट के तौर पर फुलटॉस गेंदें फेंकने कहा। पठान ने छक्का जड़ा इसके बाद धोनी ने उन्हें रनआउट करा ८वां विकेट गिरा दिया। अंतिम ओवर में ९ रन चाहिए थे। जयवर्द्धने धोनी के पास और बोले- ये मैच तुम जीतो, धोनी ने कहा- नहीं, तुम जीतो। इधर धोनी को दोनी टीमों के क्रिकेटप्रेमियों की आंखों में जीत की उम्मीद दिख रही थी। पर आज किसी एक की उम्मीद तो टूटनी ही थी, वह भी बहुत बुरे तरह से। बड़ा ही इमोशनल सीन था। भावनाओं के समुंदर उमड़ रहे थे। आंखों में आंसू थे और मन में कई सवाल।

सबको खुश कैसे रखा जा सकता है। पर वॉट नो वन कान्ट, धोनी कैन। लवगुरु धोनी ने २ रन लिए, फिर एक रन लिए, फिर विनय कुमार ने रन लिया, फिर धोनी ने एक रन। इसके बाद २ गेंदों पर ४ रन बनाने थे। धोनी ने विनय कुमार को आउट करा ९वें विकेट का आंकड़ा पूरा किया। अब आखिरी गेंद पर ४ रन बनाने थे। बैट को गदा की तरह धारण करने वाले धोनी स्ट्राइक पर थे। उन्होंने अपनी शक्तिशाली भुजाओं से वेगवान शॉट मारा, गेंद जैसे बाउंड्री लाइन पार ही करने वाली थी। दिल की धड़कन ऊपर-नीचे हो रही थी। गेंदबाज मलिंगा अपने नूडल्स जैसे बालों में चेहरा छुपा रहे थे। फरिश्ते वैसे तो यहां आसमान से टपकते हैं, पर यहां एक फरिश्ता जमीन से निकला और उसने चौका रोक दिया। धोनी ने राहत की सांस ली और तीन रन दौड़ लिए।  जयवर्द्धने के चेहरे पर भी मुस्कान थी। मैच टाई हो गया। बराबर रन, बराबर विकेट, बराबर अतिरिक्त रन और बराबर प्यार। दोनों ने एक-दूसरे को वेलेंटाइन डे की शुभकामाएं दी। धोनी ने बतौर तोहफा अब तक प्वाइंट टेबल में शून्य पर रही श्रींलंका को २ अंक दिए। वहीं जयवर्द्धने ने भी बदले में २ अंक दिए। इस प्रेममय माहौल के बीच कई बार अपनी धर्मपत्नी से डांट खा चुके अंपायर ने भी लवगुरु धोनी से इजाजत मांगी। धोनी ने उन्हें नाइट शो के दो सिनेमा टिकट देकर रुखसत किया। अब तक धोनी के लिए जिस अंपायर के मन में नफरत के भाव थे, उन्हें भी लवगुरु धोनी ने अपना मुरीद बना लिया। चहुंओर बस धोनी का ही नाम था। अब तक रोमांचक रहे धोनी...... अब रोमांटिक धोनी हो चुके थे। वेलेंटाइन डे पर हुआ यह मैच रोमांचक.... नहीं रोमांटिक था।


यूं तो सामान्य आदमी के शरीर में २०६ हड्डी होती है लेकिन बंधुवर सचेत हो जाइए। एक एक्सट्रा हड्डी भी हमारे शरीर में न जाने कबसे चिपकी बैठी है और हमें इसका पता ही नहीं। या फिर पता होने के बाद भी हम इसे अपने  शरीर का अंग नहीं मानते। परिस्थिति विकट है। यह पोर्टेबल २०७वीं हड्डी कईयों के शरीर से तो चौबीसों घंटे चिपके रहती है और जिनसे नहीं चिपकी है उनसे भविष्य में चिपक ही जाएगी।  ये हड्डी जो पहले मेहमान के तौर पर आई थी तो अब मानो शरीर की परमनेंट मेंबर ही बन गई है। परमनेंट मेंबर बन गई कोई बात नहीं, क्योंकि मेहमान तो भगवान होता है लेकिन इसने तो जैसे राजा की पदवी हासिल कर ली है। शरीर के सभी अंग इसी के सेवा में लगे रहते हैं। आंखें इसे ही ढूंढती हैं, हाथ इसे छूने बेकरार रहते हैं। मुझे ऐसा लगने लगा है कि मैंने इस हड्डी की कुछ ज्यादा ही बुराईयां कर दी है। हे भगवान, ये तो घोर पाप हो गया मुझसे। जिस हड्डी का मैं ५-६ साल से भरपूर दोहन कर रहा हूं, आज उसी की बुराई कर दी। मैं अनजाने ही एहसानफरामोशों की फेहरिस्त में शामिल हो गया।


खैर गलती की है तो सुधारना भी पड़ेगा। बुराईयां बहुत हुई, पर इसकी खूबियां भी बैं.। प्लास्टिक व मेटल की बनी यह पोर्टेबल हड्डी चपटी, लंबी, स्लाइड, टच आदि विविध रुपों में आती है, बिलकुल पतिव्रता पत्नी की तरह जैसा आप चाहें वैसे ढल जाती है । पर एक बार यह आपसे चिपक गई तो आप लाख जतन कर लें ये हटेगी नहीं। इस हड्डी को मैंने छह साल पहले खुद से चिपकाया पर मुझे इसका अहसास चंद दिनों पहले कराया हमारे मित्र ने। हम दोनों गाड़ी पर सैर करने निकले। मित्र महोदय फरार्टे से गाड़ी चला रहे थे और हम उतने ही फर्राटे से अपने मोबाइल पर मैसेज टिपटिपा रहे थे। हमारा मैसेज टिपटिपाना शायद हमारे मित्र को पसंद नहीं आया और उन्होंने गाड़ी का एक्सीडेंट कर दिया। धड़ाम.... की आवाज के साथ हम दोनों सड़क पर गिरे लेकिन हमारे हाथ से मोबाइल अलग नहीं हुआ। फिर हाथ में मोबाइल पकड़े-पकड़े ही हमने गाड़ी को उठाया। अबकी बार हमारा मित्र चिल्लाते हुए बोला- ये मोबाइल तुम्हारे हाथ से अलग होगा कि नहीं। या ये तेरे शरीर की २०७वीं हड्डी है जो हाथ से अलग ही नहीं होती।


मैं अपने जिस मित्र के दिमाग को सूख चुकी नदी समझा करता था उसमें से इतने अनमोल मोती जैसे वचन सुनकर मुझे बड़ा अचरज हुआ। सहसा मुझे अपने मित्र में भगवान नजर आने लगे , क्योंकि ऐसा ज्ञान तो भगवान ही दे सकते हैं। मित्र देवो भवः सुना तो था लेकिन तब यकीन भी हो रहा था।  मैंने श्रद्धाभाव से अपने मित्र की तरफ देखा और उसके चरणस्पर्श करते हुए उसे धन्यवाद दिया। इसके बाद मैंने २०७वीं हड्डी की पदवी पाने वाली अपनी मोबाइल तरफ देखा। मैं किसी बिछड़े हुए प्रेमी की तरह उसे निहार रहा था, और मेरी मोबाइल मुझे एकतरफा प्रेम करने वाली प्रेमिका की तरह, जिसे विश्वास था कि ५-६ साल बाद उसका बाद उसका प्यार लौटेगा।


डार्विन के सिद्धांत के अनुसार आने वाले समय में वैसे भी यह इंसान के शरीर की २०७वीं हड्डी बन ही जाएगी इसलिए काल करै सो आज कर की तर्ज पर हमने २४घंटे खुद से चिपके रहनी वाली मोबाइल को २०७वीं हड्डी मान ही लिया। डार्विन महोदय कह गए हैं कि कोई भी जीव माहौल व जरुरत के हिसाब से खुद को ढाल लेता है। समय के साथ अनुपयोगी अंग उसके शरीर से हटते जाते हैं और जिस अंग या चीज की उसे ज्यादा जरुरत  होने लगती है वह विकसित होने लग जाते हैं। मनुष्यों के पूर्वजों की के पास लंबी पूंछ थी व दिमाग आकार में कम था वहीं आज के मनुष्य में पूंछ नदारद है और दिमाग जरुरत से ज्यादा तेज हो गया है।  इस आधार हम कह सकते हैं कि आने वाले समय में ये हमारे शरीर की स्थायी सदस्य बन ही जाएगी। बंधुवर, हमारी २०७वीं हड्डी तो बढ़िया काम कर रही है, अगर आपकी २०७वीं हड्डी आपको तकलीफ दे तो आप २०७वीं हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. सुमित से संपर्क साध सकते हैं। अब अपने ब्लॉग में अपना ही प्रचार न करो ये अच्छा थोड़ी न  लगता है...।


ramdev-rakhi-sawantदुनिया में दो लोग कुछ भी कर सकते हैं- पहले तो जाहिर सी बात है रजनीकांत ही होंगे। लेकिन जो दूसरा नाम है वो है असली धमाका। जी हां, धमाके पे धमाके करने वाली ड्रामा क्वीन राखी सावंत। राखी जब भी कुछ करती हैं लोगों को चौंका कर रख देती हैं, अब क्या करें उनका रेपुटेशन ही ऐसा बन गया है। लेकिन इस बार तो राखी ने सबको हिला दिया जब उन्होंने रामदेव से शादी करने की इच्छा जाहिर की। कहां हमारे बाबा बेचारे ब्रहामचारी और उनके पीछे पड़ गई स्वयंवरवाली। परंतु राखी द्वारा इस प्रेम निवेदन के बहुत दिनों बाद भी जब रामदेव की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई तो हम समझ गए कि ये एकतरफा प्रेम का मामला है। वैसे इसे प्रेम कहना उचित नहीं होगा, ये आकर्षण हो सकता है। वैसे ये प्रेम है या आकर्षण इस पर विस्तृत चर्चा हम अगले साल वेलेंटाइन डे पर जागरण जंक्शन में होने वाले प्रेममय कांटेस्ट के दौरान कर लेगें। पर अभी के लिए तो हम दुखी थे। वो क्या है ना एकतरफा प्यार से हमें बड़ा दुख होता है। हम अपने जमाने के पहंचे हुए एकतरफा प्रेमी रहे हैं। बहुत सारे एकतरफा प्यार के भुक्तभोगी। अब जैसा कि आप जानते हैं हमें दूसरे के फटे मे टांग अड़ाने की बहुत बुरी आदत है। अगर फटा न भी हो तो हम फाड़कर उसमें अपना टांग अड़ाते हैं। बस हमने राखी को एकतरफा प्यार के दर्द से बचाने की ठान ली। बाबा रामदेव और राखी की बात को आगे बढ़ाने का निर्णय किया। वैसे  न तो राखी ने बाबा रामदेव से प्रतिक्रिया मांगी थी और न बाबा प्रतिक्रिया देने के किसी मूड में थे, पर हम तो हम हैं, मैच मेकिंग के लिए बिलकुल आमादा।

हमने झट से जुगाड़शास्त्र द्वारा किसी तरह बाबा रामदेव और राखी सावंत की कुंडलियां जुगाड़ी और चल पड़े अपने प्रिय मित्र पोंगा पंडितजी के पास। मैंने सोचा पहले कुंडिलयां मिला ली जाएं दोनों की वरना मालूम पड़ रहा कि मैंने दोनों की बात बना दी और आखिर में कुंडली ही नहीं मिलीं। पोंगापंडितजी के घर पहुंचने ही मैंने उनको दोनों की कुंडलियां थमा दी और हांफते हुए बोला- बड़ी जल्दी में हूं। बस जल्दी से दोनों की कुंडिलयां देखिए और बताइए कितने गुण मिलते हैं। पंडितजी उस समय किसी दूसरे जोड़े की कुडंलियां जांच रहे थे। वे बोले- क्या हुआ, इतनी जल्दी में क्यूं हों, किसकी कुंडिलयां है ये। मैं उनके सामने पड़ी पुरानी कुंडलिया हटाते हुए बोला- इन्हें हटाइए और लीजिए जल्दी जांचिए बाबा रामेदव और राखी सावंत की कुडंलियां, एकदम फटाफट।


बड़े बेमन से उन्होंने कुंडिलयां जांचनी शुरू की लेकिन जांचने के कुछ क्षणों बाद ही वे सुपरफास्ट ट्रैन की तरह पटरी पर दौड़ने लगे। वाह-वाह पहले तो इनके गुण दूर-दूर तक नहीं मिलते थे लेकिन परिस्थितयों ने ऐसा खेल खेला कि ३० गुण मिल रहे हैं। मीडिया में रहने का गुण जो राखी में ऊंचे स्तर तक था और बाबा जो मीडिया से दूरी बनाकर रखते थे, हाल के दिनों में ऐसा छाए कि मीडिया वाले गुण इनमें समा गए। स्वास्थ्य को लेकर सजग दोनो ही रहते हैं। राखी तो शुरू से ही वाचाल रही हैं लेकिन हाल  के दिनों में बाबा ने भी बोलना सीख लिया और ऐसा बोला कि सबकी बोलती बंद कर दी। तो भैया सुमित, मेरे तरफ से तो ये रिश्ता एक फिट है। अब बाकी तुम्हारा सिरदर्द है।


मैंने धन्यवाद देते हुए कहा- आपने इतना बता दिया बस और क्या चाहिए। बड़ी कृपा आपकी। हम तो पैदाइशी मैचमेकर हैं। जब मेट्रीमोनियल साइट्स का निर्माण भी नहीं हुआ था, हम तो तबसे सक्रिय हैं। हमारा बस चले तो हम तो किसी को कुवारा ही न रहने दें, सबकी शादी करवा दें। खैर, हम निकल पड़े अपने मकसद पे। सबसे पहले राखी से पूछना जरूरी था कि बाबा में उन्होंने ऐसा क्या देखा जो वे उनके प्रति आकर्षित हो गई। घर पहुचने पर पहले तो राखी ने हमको हडकाया पर खुद को मीडियावाला बताने पर अंदर बुलाकर अपने हाथों से जलपान की व्यवस्था की। मैंने पहला समोसा उठाते हुए पहला सवाल दागा- राखीजी, अपने असफल लव अफेयर, असफल स्वयंवर और असफल कैरियर के बाद आप अब ये क्यों मानती हैं कि बाबा में ही आपका भविष्य है। राखी बोली- सबसे पहले तो मेरा अफेयर मेरी गलती थी, नादानी थी।  स्वयंवर तो मैंने खास बाबाजी के लिए ही रचवाया था पर बाबा के वहां न पहुंचने से मैं दुखी हुई, इसलिए शादी का ड्रामा करने के बाद मैंने उसे तोड़ दिया। मैं तो शुरू से ही बाबा की दीवानी हूं।


तो राखीजी आप खुद को बाबाजी की दीवानी बताती हैं पर ये बताइए बाबा में ऐसा क्या देखा जो आप इंप्रेस हुई। राखी- देखिए मैं तो शुरू से ही उनके योग पर लट्टू हूं। जिस गति से वे अपना पेट घुमाते हैं उसी गति से मेरा डांस भी लोगों का दिल धड़काता है। सलमान, शाहरुख, आमिर ने तो सिक्स पैक बनाएं, लेकिन बाबा के तो नेचुरल फ्लैक्सीबल एब्स हैं। जैसा कि मैंने बताया कि स्वयंवर तो मैंने बाबा के लिए ही करवया था लेकिन वे नहीं आए इसलिए इस बार मैंने खुले आम प्रेम निवेदन किया है और बस बाबा की एक हां की देरी है, मैं चैनल वालों से बोलकर हमारा पर्सनल स्वयंवर करा दूंगी।


म..म..मतलब कि आप चाहती हैं बाबा वैसे ही उल-जुलूस कलाबाजियां करें जैसे स्वयंवर के दौरान अन्य प्रतियोगियों ने किए थे, मैंने सवाल दागा। राखी- हां, दरअसल बाबा में ही वो स्टेमिना है कि वे सारे टास्क बखूबी कर सकते हैं। उनकी फिट बॉडी और स्वास्थ्य के प्रति उनकी सजगता की ही तो मैं दीवानी हूं। उनसे शादी करने से मुझे योग ट्रेनर का भी फायदा मिल जाएगा और मैं भी फिट रहूंगी। मुझे पहले बाबा का चुप रहने वाला स्वभाव कुछ खास पसंद नहीं था, लेकिन हाल के दिनों में उनके मुंह से एक के बाद तूफानी बयान निकले हैं कि उन्होंने तो मुझे भी हरा दिया। मैं तो हूं ही बड़बोली, और बाबा द्वारा ऐसे बोलबचन तो मानो सोने पर सुहागा हैं।


मेरे हिसाब से बाबा मेरे लिए परफेक्ट वर हैं। इतना बड़ा बिजनेस हैं, पापुलर हैं, फिट हैं, जवान हैं, सफल हैं, मुझे और क्या चाहिए। आपने कहा कि आप हनीमून चांद पर मनाना चाहेंगी, ऐसा क्यूं?? देखिए, लोग तो मुझे पहले ही कहते थे कि मैं इस दुनिया की नहीं हूं, किसी और ही दुनिया में रहती हूं। और बाबा भी मुझे इस दुनिया के नहीं लगते। इसलिए मैं उनके साथ अपना हनीमून इस दुनिया से बाहर चांद पर मनाना चाहती हूं।


पर क्या आपको लगता है कि बाबा और आपकी जोड़ी जमेगी?? जमेगी क्यों नहीं, राखीजी तुनकते हुए बोली। जोड़ी जमने के लिए दोनों का एक जैसा होना जरूरी नहीं बल्कि एक-दूसरे का पूरक होना जरूरी है। बाबा बोलते कम हैं और मैं बड़बोली हूं, अगले अनशन के समय वे कुर्सी पर बैठे रहेंगे और मैं बोलती रहूंगी, बोलती रहूंगी और बौलती रहूंगी। आप तो जानते ही हैं जब मैं बोलती हूं सबकी बोलती बंद हो जाती है। और जहां तक बात है रात को पुलिस द्वारा लाठीचार्ज की तो मुझे देखकर किसी की लाटी उठाने की भी हिम्मत नहीं होगी, आप जानते हैं मैं कितनी खतरनाक हूं।


पर राखीजी बाबा से पहले आप राहुल गांधी के पीछे पड़ी थी। राखी- देखिए, मैं किसी के पीछे  नहीं पड़ती, लोग मेरे पीछे पडते हैं। वैसे भी राहुल का नाम तो मैंने ऐसे ही बाबा को जलाने के लिए लिया था। आप तो जानते ही हैं ना, ज्येलसी फैक्टर। पर, बाबा तो तब जलेंगे न जब उनके मन में आपके लिए कुछ हो, वे तो बह्मचारी हैं। और मुझे नहीं लगता कि उनकी आपसी शादी करके अपना ब्रह्मचर्य तोड़ने में कोई दिलचस्पी है। मेरा द्वारा इतना कहते ही राखीजी बौखला गई और मेरे हाथ का समोसा छीनते हुए बोली, चलो उठो। तो तुम हो असली फसाद। तुम ही हो बाबा को मेरे खिलाफ भड़काने वाले। तुम नहीं चाहते कि मेरी उनसे शादी हो, तुम चाहते हो वे आजीवन ब्रह्मचारी रहें।  मैं समझ गई, तुम मुझे पसंद करते हो। अगर मुझे इतना ही पसंद करते हो तो मेरे स्वंयवर में आ जाते। अब जब मैं सेटल होने की सोच रही हूं तो मुझे बाबा के खिलाफ और बाबा को मेरे खिलाफ भड़का रहे हो। तुम नहीं चाहते बाबा और मैं मिले। मैं इन धुआंधार आरोपों से चित हो चुका था। कुछ हिम्मत कर मैं बोला- ये आप क्या कह रही हैं। म..म..मैं आपको पसंद नहीं करता, न मैं आप दोनों के बीच आ रहा हैं। राखीजी बोली- चुप करो तुम। मुझे मत समझाओ। मैं सबको बता दूंगी, प्रेस कांफ्रेंस करवाउंगी। कहां है मीडिया, यहां आओ। मेरे और बाबा के बीच दरार डालने वाला मुझे मिल गया....। पकड़ो इसको।

नाग पंचमी है और सांप को दूध पिलाने का रिवाज है। वैज्ञानिक कहते हैं सांप दूध नहीं पीते, वे दूध पी नहीं सकते पर हमारे घर वालों ने कहा जा सांप को दूध पिला के आ। वैसे भी बहुत सारे पाप किए हैं जीवन में तूने, आज उतारने का दिन है। सांप जितना दूध पीएगा उतना तेरा पाप उतरेगा। मैंने कहा- सांप दूध नहीं पीता, वो चूहा खाता है, कीड़-मकौड़े खाता है। वह तो मांसाहारी है। पर मां की आंख में गुस्सा देख मैं दूध का कटोरा लिए वहां से भागा। पर अब यक्ष प्रश्न यह था कि सांप को कहां ढूंढा जाए।फिर भी मैं गलियां छानते रहा। देखा एक बिल में सांप घुसने की कोशिश कर रहा है। मैंने उसका पूंछ पकड़ा औरउसे बाहर निकाला। सांप फन फैलाकर खड़ा हो गया और बोला- क्या हुआ तुझे। तुम इंसानों के डर से ही तो छुप रहा था। मेरे सारे साथी समय पर छुप गए। उन्होंने मुझे चेताया भी कि छिप जा नहीं तो मनुष्य आ जाएंगे। आज नाग पंचमी है, तुझे जबर्दस्ती दूध पिलवाएंगे। पर मैंने लापरवाही कर दी और तुमने मुझे पकड़ लिया। अब बोलो क्या चाहिए। मैंने कहा- चाहिए कुछ नहीं बस, ये दूध पी लो। सांप मूंह फेरते हुए बोला- नहीं पीता। मैं बोला- सांप हो तुम, दूध तो पीना ही पड़ेगा। सांप बोला- चल इमोशनल अत्याचार मत कर। पी लूंगा, पर पहले मेरी व्यथा सुनी पड़ेगी तुमको। मैंने बोला- बस इतनी सी बात है, लोगों की परेशानियां सुनना और उन्हें सुलझाना तो मेरा प्रिय शगल है। शुरू हो जाओ- नागराज, व्यथपुराण आरंभ किया जाए।



सांप रोते हुए बोला- तुम मनुष्यों ने हम भोले-भाले सांपों का बहुत शोषण किया है। हमारी इजाजत के बिना हमें मुहावरों में जबरन ठूंस-ठूंसकर खलनायक का दर्जा दे दिया तो कभी फिल्मों में हमें फिट करके पैसे बना लिए और हमें इतने सालों बाद तक रायल्टी तक नहीं मिली है। हमारी सर्प उत्थान समिति इसके खिलाफ सर्पमोर्चा निकालने की सोच रही है। खैर यहां तक तो हमने किसी तरह बर्दाश्त कर भी लिया मगर हद तो तब हो गई जब तुम इंसानों ने हमारे निजी जीवन तक को भी नहीं छोड़ा। जंगलों में कैमरे लगा दिए। नाग-नागिन रोमांस करने जाएं तो उसकी शूटिंग, बिल से बाहर निकले तो शूटिंग, बिल में छुपे रहे तो भी शूटिंग। इतनी शूटिंग हो गई कि दहशत में कई नागिनों ने तो अंडे देना ही बंद कर दिए। पहले मैं बस्तर के घने जंगल में रहता था। एक बार मैं बड़ी मशक्कत के बाद मानी एक नागिन के साथ प्रणय करने जा रहा था कि तभी रास्ते में मुझेएक जीव वैज्ञानिक ने उठा लिया और उंगली दिखा-दिखाकर मेरी विशेषताएं बताने लगा। मैं बेबस सा फुफकारते हुए बोला- " मेरी जितनी विशेषताएं बताना है बता ले, लेकिन अगर आज मैं अपनी प्रेमिका से नहीं मिल पाया तो सोच लेना तुझे तेरी सुहागरात नहीं मनाने दूंगा।" इंसानों की आबादी तो बढ़ती रही लेकिन सांपों की आबादी पर अल्पविराम लग गया।



फिर भी सांप सब कुछ रेंगते-रेंगते सहते रहे। सांप के आहार में चूहे, गिलहरी जैसे छोटे जानवर आते हैं लेकिन इंसानी करतूत के कारण इनका आहार भी छिन गया। गिलहरी और मेंढक तो ढूंढे नहीं मिलते हैं फिर भी जिस दिन मिल गए समझो उस दिन सांपों की दिवाली होती थी। इसलिए सांपों ने मजबूरन चूहे को ही अपने मेनू में टॉप पर रख लिया। पर यहां भी उनका निवाला छिन गया। चूहों की तलाश में हमने शहरों और गांवों का रुख किया क्योंकि जहां भरपूर अनाज वहां भरपूर मोटे-मोटे चूहे। परंतु यूरिया और खाद मिले अनाज खाने वाले चूहे को खाने से कई सांपों के पेट में मरोड़ होने लगा और कई तो मौके पर ही लुढ़क गए। सांपों की ऐसी दुर्गति देखकर सांपों ने प्रकृति के विपरीत जाकर शाकाहारी होने का फैसला किया, जिनमे मैं भी था। एक सुबह मैं अपनी प्रेमिका नागिन के लिए भोजन की तलाश में निकला। पिछले वर्ष की बात है नागपंचमी के दिन हम दोनों ने दूध में "मिल्क बाथ" लिया उसके बाद सोचा कुछ खाया जाए। पास ही में हनुमानजी का मंदिर था। मैंने हनुमान जी की मूर्ति के पास भोग में चढ़ने वाला सामान मिठाई, फल, आदि देखा। मैंने सोचा क्यों न यहीं फन मारा जाए, मंदिर भी पास ही में है पांच मिनट में काम निपट जाएगा। मैं सब बटोर ही रहा था कि मुझे किसी ने देख लिया। मुझे देखने वाला सनसनी की खोज में निकला टीआरपी की मार से पीड़ित न्यूज चैनल का सनसनाता रिपोर्टर था। मुझे हनुमानजी को चढ़ा भोग खाता देख उसने मुझे हनुमानभक्त सांप की पदवी दे दी और फौरन अपने जैसे अन्य सनसनीपिपासु पत्रकारों को वहां मिनटों में खड़ा कर दिया। लोग इकट्ठे होते चले गए, दो आए, चार आए, आठ आए, पलक झपकते ही पूरा मंदिर हाऊसफुल हो गया। कुछ देर बाद तो मुझ हनुमानभक्त सांप को देखने टिकट लगने लगा था। कुछ चलताऊ किस्म के टपोरियों ने तो वहां साइड में साइकिल और गाड़ी स्टैंड भी लगा दिया। सायकिल का १० मोटसायकिल का २० और कार का ५० रुपए मात्र। हां प्रेसवालों और वीआईपी लोगों के लिए मुफ्त।



मैंने अब तक कईयों का बेड़ा पार लगा दिया था। सुबह से दोपहर हो गई मैं उसी अवस्था में अपनी कुंडली में मिठाई, फल और भोग का प्रसाद लपेटे हुआ था। मैं तो आया था ५ मिनट के लिए लेकिन तुम खुरापाती इंसानों ने ५ घंटे की परेड करवा दि। इतने में ही किसी पंडित ने घोषणा की कि यह सांप परम हनुमान भक्त है। पिछले जनम में ये परम हनुमान भक्त था और इस जन्म में सर्प रूप में फिर हनुमानजी के चरणों में अपनी भक्ति दिखाने आया है। मैं सोचने लगा- "खाली पेट न होय भक्ति, मैं तो खाना जुगाड़ने आया था या ये लोग मुझसे भक्ति करवाने पर तुले हैं। इस पंडित को अपने इस जन्म का ठीक से पता नहीं और मेरे पिछले जनम की कहानी सुना रहा है।" सभी रिपोर्टर पंडित की इस बात को लाइव दिखाने लगे। पंडित भी खुद को कैमरे के सामने पाकर अपने लुक पर ध्यान देने लगा और बीच-बीच में अपने बाल और धोती भी ठीक करता। इधर मैं बाहर निकलने के लिए जरा सी हलचल क्या करता कि सारे कैमरे और माइक मेरी ओर घूम जाते। सांप की तरह दिख रहे वे तार से बंधे माइक मुझे और भयभीत कर रहे थे। मगरमच्छ के मुंह की खुले हुए कैमरे मुझे कथित हनुमानभक्त सांप को खा जाने आतुर प्रतित हो रहे थे।



इसी बीच थका हुआ मैं जरा देर के लिए सो गया। तभी किसी ने हल्ला कर दिया कि हनुमानभक्त सांप को हनुमानजी के चरणों में अद्भुत शांति का अनुभव मिल रहा है, तभी वो उनके पैरों में सो गया। देखों किस तरह खुद को हनुमानजी के चरणों में खुद को अर्पित कर दिया है। इतना सुनते ही मैं फिर जाग गया। तुम लोग शांति से सोने भी नहीं देते। मैं भागने के प्रयास में दाएं मुड़ने का प्रयास करता तो कोई एक नई कहानी के साथ पेश हो जाता है। बाएं मुड़ता तो फिर कोई कहानीकार नई कहानी बना देता। ऐसे लग रहा था मानो देश के सारे कहानीकार यहीं उपस्थित हो गए हैं और मुझे बेब सांप के साथ अपना बैर निभा रहे हैं। एक चलते-फिरते भजन गायक ने तो तत्काल मेरे ऊपर आरती बना दी और अपना आरती गायन भी शुरू कर दिया। कुल मिलाकर सबकी अपनी अलग-अलग कहानी थी, पर सबका हीरो एक ही था- " मैं हनुमानभक्त सांप"।



अभी ये सब चल ही रहा था कि मुझे दूध पिलाने लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा। कुंवारे-कुंवारियां विशेषकर दूध पिलाने आए क्योंकि पंडितजी ने घोषणा कर दी थी कि इस हनुमानभक्त सांप को दूध पिलाने वाले कुवारे-कुवारियों की शादी महीनेभर के भीतर हो जाएगी। मैं सोचने लगा- "अबे निकम्मों, तुम लोगों के चक्कर में मेरी खुद की शादी नहीं हुई। बमुश्किल एक नागिन मिली है उसी के साथ लिव इन रिलेशनशिप में हूं और तुम लोग मुझे दूध पिलाकर अपनी शादी करवाने के जुगाड़ में हो। अरे निर्दयियों कुछ तो रहम करो। अगर मैंने इतना सारा दूध पी लिया तो मेरा रंग तो ऐसे ही काले से गोरा हो जाना है काले से गोरे होने कारण जात बाहर हो जाऊंगा वो अलग।" फिर भी लोग मुझे दूध पिलाने लड़ते-मरते रहे।



मैं अब भागने का प्रयास में हनुमानजी की मूर्ति के चक्कर लगाने लगा। तो लोग इसका अर्थ निकालने लगे कि सांप भक्तिधुन में नाच रहा है और उसे मोक्ष मिलने वाला है। मैं भी सोचने लगा- "तुम लोगों को जो सोचना है सोचो, एक बार यहां से निकल जाऊं कसम खाता हूं दोबारा नहीं आऊंगा। मेरे लिए तो फिलहाल यहां से निकलना ही मोक्ष समान है।"



शाम से रात हो गई। मैं भी बाहर न जाने के कारण उकता गया था। सबकी नींद उड़ाने वाले रिपोर्टर धीरे-धीरे नींद की गिरफ्त में आ गए। मैंने मौका देखा और अपनी केंचुली निकालकर धीरे वहां से खिसक लिया। नींद खुलने के बाद रिपोर्टरों ने जब सांप को गायब देखा और सिर्फ उसकी केंचुली देखी तो फिर टीवी पर ब्रैकिंग न्यूज फ्लैश करने लगे- हनुमानभक्त सांप हनुमानजी में समा गया। ऐसी अद्भुत भक्ति कभी किसी ने देखी न होगी। सांप अपनी केंचुली यहां छोड़कर हनुमानजी की मूर्ति में समा गया। जय हो हनुमानभक्त सांप की। सब रिपोर्टर फिर से हनुमानजी की मूर्ति और केंचुली की फोटो उतारने में मशगूल हो गए। लोगों द्वारा हनुमानभक्त सांप की आरती गायन और कहानी लेखन का कार्यक्रम फिर से शुरू हो गया। मैं ये सब देख अपनी नागिन के साथ भागा जो मेरा इतने देर इंतजार करने के बाद बिल्लू सांप के साथ जाने का मन बना चुकी थी। शुक्र है आखिर मैं से भाग पाया और अपनी नागिन को भी पा लिया। तब से मैंने कसम खाई है नागपंचमी के दिन तो मुझे दिखना ही नहीं है। सांप की ऐसा हृदयविदारक कहानी सुन मेरी आंख भर आई। मैंने कटोरी का दूध खुद पी लिया और बोला, जाओ मेरे भाई, पाय लागूं, भाभी को चरणस्पर्श कहना। भतीजे-भतीजीयों को मेरा प्यार देना। मुझे अश्रुजल बहाता देख वह सरपट भागा। पर पीछे खड़े पोंगापंडितजी सब सुन चुके थे। उन्होंने तुरंत एसएमएस द्वारा द रिटर्न ऑफ हनुभक्त सांप की खबर फैलानी शुरू कर दी। मैं बस आंसू बहाते रहा। जब आंख खोला तो देखा कि पंडितजी मुझे भक्त ऑफ हनुमानभक्त सांप की उपाधि दे चुके थे। और मेरा आस-पास कैमरे की चकाचौंध थी। भागने की जगह भी न थी। मैं चिल्लाया- हे नागराज, मुझे बचाओ............।



पोंगापंडितजी का बम्पर ऑफर- अगर आप लोग हनुमानभक्त सांप की आरती को अपना रिगटोन बनाना चाहते हैं तो अपने मोबाइल से saap लिखकर 55555 पर भेज दीजिए। हनुमानभक्त सांप की केंचुली के फोटो और उससे बने ताबीज के लिए आप संपर्क कर सकते हैं बाबा नागराज से। घरपहुंच सेवा उपलब्ध है। घरपहुंच सेवा का अतिरिक्त चार्ज लगेगा क्योंकि हमारे हॉकर कोई नागराज नहीं हैं जो उड़कर आप लोगों के घर टपक जाएंगे, गाड़ी से आना पड़ेगा और पेट्रोल भी महंगा हो गया है।