आवश्यकता है मूर्खों की, इच्छुक व्यक्ति कृपया आवेदन करें। एक बार मूर्ख बनने पर 500 रुपये दिया जाएगा।  मैं अखबार में इश्तेहार देने के लिए कागज पर यह सब लिख ही रहा था कि गलत टाइमिंग पर टपकने में उस्ताद मेरे मित्र साहूजी आ गए। आते ही मेरे हाथ से वह कागज छीना और चौंकते हुए पूछने लगे-  यह भी कोई इश्तहार हुआ अखबार में देने लायक। इश्तहार देना ही है तो शादी का दो, शादी की उम्र भी हो गई है। मैंने कहा- मित्र, बहुत जरुरी है यह इश्तहार देना, शादी तो होती रहेगी पर पहले जरुरी है मूर्ख दिवस पर किसी को मूर्ख बनाना। साहूजी बोले- वही तो मैं कह रहा हूं, शादी कर लो मूर्ख अपने आप बन जाओगे।

मैंने कहा- आप समझे  नहीं मुझे मूर्ख बनना नहीं मूर्ख बनाना है।  मैं बहुत चिंतित हूं दिन ब दिन मूर्खों की घटती संख्या से। मुझे डर है कि अगर इसी तरह मूर्खों की संख्या घटती रही तो मूर्ख दिवस विलुप्त  हो जाएगा।  जिस गति से लोग मूर्ख से समझदार बनते जा रहे हैं वह खतरे की घंटी है। बांघों के लिए जैसे संरक्षण कार्यक्रम चल रहे हैं वैसे ही हमें मूर्ख संरक्षण कार्यक्रम चलाना चाहिए। खैर, यह तो हुई भविष्य की बात फिलहाल मुझे मूर्खों की अर्जेंट आवश्यकता है। काश.... डोमिनोज में मूर्ख भी मिलते, 30 मिनट में उन्होंने एकाध की होम डिलिवरी मेरे घर करा दी होती।  साहूजी  तपाक से बोले- इतना चिंतित न हो, जब तक तुम इस धरती पर हो, मूर्खों की पताका लहराती रहेगी। मैंने कहा- माना मैं मूर्ख हूं पर खुद को मूर्ख बनाने में क्या मजा। पिछले कई सालों से मैं मूर्ख दिवस पर किसी को मूर्ख नहीं बना पाया हूं। इसका मुझे बड़ा दुख है। कुछ इसी तरह का दुख मुझे तब हुआ था जब मैं सायकिल को छो़ड़कर मोटरसायकिल पर आया था। मैंने सोचा मेरी तरक्की हो गई पर पेट्रोल ने हमपे ऐसा जुल्म ढाया है कि तरक्की की राह कच्ची हो गई।

साहूजी मुझे सांत्वना देते हुए बोले- पहले तो आप १ अप्रैल का मोह त्यागिए। भई ये मूर्ख दिवस अब १ अप्रैल को नहीं, सालभर बनाया जाता है। अब देखिए कुछ दिनों पहले सरकार बोल रही थी पेट्रोल के दाम नहीं बढ़ेंगे, फिर अचानक बढ़ा दिए और हमको इंस्टेंट (क्षणिक) मूर्ख बनाया गया। अब अपने प्रधानमंत्रीजी को ही लीजिए। पहले कार्यकाल में उनको गठबंधन सरकार की ऐसी गाड़ी चलाने मिली जिसके टायर पंक्चर थे, इंजन खराब था, पेट्रोल भरवाने वाली सहयोगी पार्टियां अकड़ दिखाती थी। वह कार्यकाल तो जैसे-तैसे चला, यह कार्यकाल तो उससे भी बढ़कर है। इस बार तो बड़े-बड़े घोटाले हुए। घोटाला कोई और करता है इस्तीफे की मांग इनकी उठने लगती है। घोटाला करने वाले खुश पर माथे पर शिकन इनके। मनमोहनजी को तो 8 सालों से अप्रैल फूल बनाया जा रहा है। पर मनमोहनजी भी कम नहीं। इधर जब अन्ना लोकपाल का टोल प्लाजा बनाकर सड़क पर खड़े हो गए और टोल के रूप में लोकपाल बिल मांगने लगे तो मनमोहन जी अन्ना को जोकपाल पकड़ाकर गच्चा देकर भाग गए और अन्ना को फूल बना गए।  दूसरी ओर बाबा रामदेव के अनशन के दौरान पुलिस ने पहले कहा लाठीचार्ज नहीं करेंगे और फिर जनता को मूर्ख बनाते हुए रात को लाठीचार्ज कर दिया। इधर रामदेव भी अपने लंबे बालों का फायदा उठाकर झट लड़की का रूप धरकर पुलिस को मूर्ख बनाकर भाग निकले।

साहूजी आगे बोले- दरअसल बंधु ये पूरा मूर्ख चक्र है। सब एक-दूसरे को मूर्ख बना रहे है। आप चाहे आम जनता रहें या नेता मूर्ख बनने से बच नहीं पाएंगे। मूर्खता एक धर्मनिरपेक्ष भावना है जो सब में बराबरी से समाई हुई है। हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, हम सब मूरख भाई-भाई। पहला दूसरे को मूर्ख बनाता है, दूसरे तीसरे को, तीसरा चौथे को और चौथा पहले को। आप और हम भी इसी चक्र के स्टॉपेज प्वाइंट हैं। हमारे आफके बिना ये चक्र पूरा नहीं होता। पिछले दिनों ही मैं मूर्ख बना था।  दूध में पानी मिलाना तो अब अनिवार्य हो गया है,  पर मेरे दूधवाले ने मुझे शुद्ध दूध पिलाकर मूर्ख बना दिया और बदहजमी करा गया। तब से ऐसी हालत हो गई है कि दूध का जला हूं, चाय भी पानी डाल-डालकर पी रहा हूं।

कभी नेता जनता को मूर्ख बनाते हैं, कभी जनता नेता को। नेताजी जितनी गति से वादे करते हैं और उतनी ही गति से भूलते भी जाते हैं। जनता भी चपल हो गई है, शराब इससे लेती है, कंबल उससे और वोट किसी तीसरे को दे देती है। नेता नेता को भी मूर्ख बना रहे हैं, सांप के डसने से सांप भी मर रहे हैं। गठबंधन का वादा किसी के साथ करते हैं, और जाकर किसी दूसरे से मिल जाते हैं। एक बार मैंने भी अपने यहां के दागी नेता को मूर्ख बनाने की कोशिश की, पर सफल न हो पाया। चुनाव में खड़े दोनों उम्मीदवार सांपनाथ और नागनाथ थे। मैंने दोनों को ही वोट नहीं दिया। लेकिन बाकी लोगों ने सांपनाथ को जीता दिया, करते भी क्या ऑप्शन ही नहीं था जनता बेचारी मूर्ख बन गई। खैर ये सब छोड़िए, आप क्या बोल रहे थे सुमितजी कि आपने कभी किसी को मूर्ख नहीं बनाया। कल ही मुझे अपनी बिना पेट्रोल वाली मोटरसायकिल पकड़ाकर मूर्ख बनाया। साहूजी के इतना कहते ही मैं मुस्कुराया। उन्होंने आगे मेरे द्वारा मूर्ख बनाने के किस्से जारी रखें जिससे मेरी मुस्कान और बढ़ती गई। मुस्कुराते मुस्कूराते होठों का फैलाव इतना हो गया कि वे दुखने लगे। पर होठों के दर्द पर तारीफों का मरहम काम कर रहा ता। इधर होठों के बीच से झांकते दातों के बीच मच्छरों को घुसपैठ का रास्ता दिखाई दे रहा था.....।

साहूजी आगे बोले- सबसे बड़ा मूर्ख तो मैं हूं जो आज आफिस जाने के बजाए 1 घंटा आपके साथ खराब कर बैठा। इतनी तारीफ सुनने के बाद मेरा फर्ज बनता था कि मैं उनको आफिस छोडूं।  मैंने साहूजी को आफिस छो़ड़ने की पेशकश की और उनके साथ बाहर आ गया। तभी साहूजी- जोर से चिल्लाए। अप्रैल फूल बनाया, हमको मजा आया। आज तो संडे है, संडे को कोई आफिस जाता है भला। मेरे चेहरे पर चस्पी लंबी सी मुस्कान तुरंत उतर गई। घुसपैठ की उम्मीद में आगे बढ़ रहे मच्छऱ निराश होकर लौट गए। मैं भी वापस अपने कमरे में लौट आया और फिर लिखने लगा...... "आवश्यकता है मूर्खों की....."।
मार्निंग वॉक करना स्वास्थ्य के लिए बेहद  लाभकारी है। इस लाभ में तब और वृद्धि हो जाती है जब वॉक के दौरान किसी सुंदर युवती से आपकी टॉक हो जाए। लेकिन यह लाभ तब घाटे का सौदा साबित होता है जब कोई अनचाहा आदमी आपसे टकरा जाए। ऐसे ही आज सुबह वॉक के दौरान हमारे मोहल्ले के शर्माजी हमसे टकरा गए। कुछ बुदबुदाते हुए वे बड़े गुस्से से मेरी तरफ ही आ रहे थे। मैंने लाख प्रयास किया पर बच न पाया। मेरी किस्मत ही खराब है- न मैं महंगाई की मार से बच पाता हूं, न पेट्रोल की वार से। स्कूल में टीचर से बच नहीं पाता था, और अब आफिस में बॉस से। लोग कहते हैं मैं बचने के प्रयास के दौरान अपना १०० प्रतिशत नहीं देता, इसलिए बच नहीं पाता। कोई बात नहीं अगली बार जरूर बचूंगा। खैर अब तो मैं शर्माजी के हत्थे चढ़ ही गया  था।  मेरे पास आकर वे फिर बुदबुदाने लगे। मैंने कहा शर्माजी- वाइब्रेशन मोड से नार्मल मोड में तो आइए। शर्माजी हांफते हुए बोले- क्या बताउं इतना गुस्सा आ रहा है कि बीपी हाई हो गया है, दिमाग फ्राई हो गया है और गला सूखकर ड्राई हो गया है। मैंने कहा- आराम से बैठिए, पानी पीजिए फिर बताइए क्या हुआ। दो मिनट शांत रहने के बाद शर्माजी फिर रुद्र अवतार में आ गए और बोले- हद हो गई, कलमाड़ी कहता है मैं कुर्सी नहीं छोड़ूंगा, भारतीय ओलंपिक संघ का पद नहीं त्यागूंगा। मैंने कहा- बस इतनी सी बात और आप अपना खून जला रहे हैं। यही तो दिक्कत है आप  जैसे आम आदमियों की, कॉमन मैन कहीं के। आप तो ऐसे उतावले हो रहे हैं जैसे कि उनके हटते ही आपको उस कुर्सी पर बिठाने वाले हैं।

चलिए चाय पीते-पीते इस मामले पर चिंतन करते हैं, मैंने शर्माजी को चाय के लिए पूछा और कहा- शर्माजी आप ठहरे आम आदमी, नौकरीपेशा टाईप, जिंदगी भर बस सैलरी उठाई और घर चलाया है। आपको क्या पता कुर्सी की लत क्या होती है। मुझे मालूम है आपका कभी मन नहीं हुआ होगा कि आप अपने आफिस की कुर्सी से चिपके रहें। आप तो बस इसी जुगत में रहते हैं कि कब आफिस बंद हो और आप घर में पैर पसारकर सोएं, कॉमन मैन कहीं के।  लेकिन जो कर्मठ लोग होते हैं वो लोग हमेशा कुर्सी से चिपके रहते हैं चाहे दिन हो रात। हमारे कलमाड़ी जी भी इसी श्रेणी के हैं। अपितु मैं क्षमा चाहूंगा कि मैंने इसे कुर्सी की लत कहा, दरअसल ये तो कुर्सी का प्रेम है।

शर्माजी को मेरी बातें समझ नहीं आ रही थीं। मैंने कहा- देखिए शर्माजी मैं इसे विस्तार से समझाता हूं। नेताजी का कुर्सी पर बैठना बिलकुल अरेंज मैरिज जैसा है। अरेंज मैरिज में दो अजनबियों की शादी हो जाती है फिर बड़े आहिस्ता-आहिस्ता उन दोनों में प्रेम पनपता है और कुछ सालों बाद ऐसी हालत हो जाती है कि दोनों एक जिस्म दो जान हो जाते हैं (नोटः ऐसा मामला १०० में से सिर्फ १० खुशनसीबों में पाया जाता है)। उसी तरह जब कोई नेता-अफसर किसी कुर्सी पर बैठता है तो शुरु में उतना मोह नहीं रहता, लेकिन धीरे-धीरे उसे अपनी कुर्सी से प्यार हो जाता है। कलमाड़ी जी के साथ भी ऐसा ही केस है। अरे कलमाड़ी तो १५ सालों से उस कुर्सी पर काबिज हैं, प्यार होना तो लाजिमी था। आप ये क्यों नहीं देखते कि उनके इस व्यवहार से उनका प्रेमपूर्ण व्यक्तित्व की झलक मिलती है। पर शर्माजी आप को क्या पता प्यार का बंधन क्या होता है, आप तो खुद अपनी श्रीमतीजी से भागते फिरते रहते हैं, कॉमन मैन कहीं के।

अबकी बार शर्माजी मुझे टोकते हुए बोले- चलिए मान लिया कलमाड़ी बहुत कर्मठ हैं, प्रेम पुजारी टाईप हैं। पर घोटालों का क्या? अच्छे खासे कॉमनवेल्थ गेम्स को उन्होंने कम ऑन वेल्थ गेम्स बना दिया। वेल्थ की इतनी हेरा-फेरी हुई कि जनता की हेल्थ खराब हो गई। मैं शर्माजी को रोकते हुए बोला- बस फिर कर दी न, आम आदमी वाली बात। अरे जनता को आप बहुत अंडरएस्टीमेट करते हैं।  जनता की पाचन क्षमता बहुत जबर्दस्त है वो तो ऐसे घोटाले यूं ही पचा जाती है। और घोटाले करने से एक बात स्पष्ट होती है कि कलमाड़ीजी मेहनती होने के साथ-साथ दिमाग के धनी भी हैं। घोटाला करने बिलकुल दूध में से मक्खन निकालने जैसा मेहनत का काम है। इसमें अतिरिक्त मेहनत भी लगती है, और दिमाग भी। घोटाला यूं ही नहीं हो जाता। कुर्सी से प्रेम सिर्फ वही कर सकता है जो तन, मन और धन से कुर्सी से जुड़ा हो। कुर्सी पर बैठते ही पहले कलमाड़ीजी का तन जुड़ा कुर्सी से, १५ साल में मन तो जुड़ना ही था और कितना धन जुड़ गया ये तो पूरे देश ने देख ही लिया। मेरे भैय्या यही तो है कुर्सीप्रेम। कोई सालों से कुर्सी पर काबिज है, तो कोई कुर्सी छूट जाने के बाद भी कुर्सी के पीछे दीवाना है। इधर येद्दियुरप्पा का सीएम की कुर्सी के लिए लड़ना, उधर उत्तराखंड में बहुगुणा का अपनी कुर्सी बचाने के लिए जुगत लगाना सब कुर्सीप्रेम का ही परिचायक हैं।

इसलिए इन कुर्सीप्रेमियों को मस्त रहने दीजिए। मैं तो कहता हूं शर्माजी इस कुर्सीप्रेम वाले युग में आप भी प्रेम करने के लिए एक कुर्सी ढूंढ लीजिए, वरना आप सिंगल के सिंगल रह जाएंगे। आज जो कुर्सी पर बैठे वो स्पेशल है, जो कुर्सी के सामने खड़े रहे वो कॉमन। शर्माजी मेरी बात बड़ी ध्यान से सुन रहे थे। वे बोले- आपने तो मेरी आंखें खोल दीं, लेकिन एक बात मुझे अच्छी नहीं लगी। आप बार-बार मुझे कॉमन मैन कहीं के क्यों कह रहे थे, आप कौन सा स्पेशल हो गए। मैंने आश्चर्य से उन्हें देखा और बोला- कमाल कर दिया आपने शर्माजी, पूरे मोहल्ले में हल्ला है और आपको पता ही नहीं। मुझे मोहल्ला समिति का अध्य्क्ष बनाया गया और अब कोई कुछ भी करे मैं सालों तक इस कुर्सी को नहीं छोड़ूंगा.....। शर्माजी मुझे अवाक् देखते रह गए और चल दिए...... शायद अब किसी और के पास जाकर मेरे द्वारा कुर्सी न छोड़ने का मामला उठाएंगे।




घोटालों की होली













यूपीए तोड़ रही है, भ्रष्टाचार के रिकार्ड सारे,
क्या अफसर, क्या नेता, भष्ट यहां हैं सारे,
सरकार के मंत्रियों पर चढ़ा घोटाले का रंग है,
देख के घोटाले की होली, सारी दुनिया दंग है,
किसी ने बनाया कॉमन से वेल्थ,
तो कोई हुआ 2जी से मालामाल,
जिसने चुना था इनको, वही जनता रही बेहाल,
बहुत हुआ सब घोटाला, अब जनता सबक सिखाएगी,
अगले साल चुनावी होली में अपना रंग दिखलाएगी,

बाबा-अन्ना की होली













सुन सरकार के घोटालों की किलकारी,
बाबा-अन्ना तैयार हुए ले लोकपाल की पिचकारी,
काले धन का  राग अलाप बाबा कूदे मैदान में,
आंदोलन का रंग भर बैठे रामलीला मैदान में,
कालाधन तो नहीं आया, पर पुलिस दौड़ाने आई,
इस आपाधापी में बाबा की जुल्फें काम आई,
झट रूप धर के महिला का बाबा बच के निकले,
प्रेस कान्फ्रेंस दे सलवार सूट में, बाबा आश्रम को निकले,














इसके बाद आए अन्ना खेलने लोकपाल की होली,
सर पर चढ़ा अन्ना टोपी आई टीम अन्ना की टोली,
लोकपाल की पिचकारी से देश हुआ सराबोर,
लोकपाल लोकपाल का जप सुनाई दिया चहुंओर,
देख अन्ना का ऐसा क्रेज, भ्रष्टों की टोली बिचकाई,
अन्ना को उसने सरकारी लोकपाल की गुलाल लगाई,
सरकार लोकपाल का फीका रंग, देख अन्ना बौराए,
चले अन्ना आगे-आगे, पूरा देश उनके पीछा आए,


जनता होए कन्फ्यूज












नागनाथ-सांपनाथ को देख, जनता के उड़े फ्यूज,
किसे वोट दे, किसे न दें, जनता होए कन्फ्यूज,
जनता होए कन्फूज कि चुना पहले मुलायमराज,
मुलायम तो निकले कठोर, और आया गुंडाराज,
देखके गुंडाराज, जनता का मन पछताया,
अगली बार लिया बदला, माया को ताज पहनाया,
पर माया निकली जादूगर, अपना मायाजाल फैलाया,
मूर्तियां लगवाती रहीं माया, यह देख जनता फिर पछताया,
जनता फिर होए कन्फ्यूज, किसी को न चुनते काश,
राईट टू रिजेक्ट होता, तो करते सबको रिजेक्ट आज,
कन्फ्यूज जनता मजबूर भी है, फिर चुना मुलायमराज,
मायाजाल खत्म हुआ, अब क्या फिर शुरु होगा गुंडाराज?




(बुरा न मानो होली है............)






















८ साल बाद ओलंपिक में हम फिर दहाड़ेंगे
विश्व विजेता का इतिहास हम फिर दोहराएंगे,
हाकी का स्वर्णिम दौर जो छूट गया था पीछे
नए जोश से, नए उमंग से वापस लाएंगे,

अभी बस दी है ओलंपिक में दस्तक,
मंजिल तो बहुत दूर है
फ्रांस तो हार गया, अब तोड़ना
बाकियों का गुरूर है,

८ साल से टीस थी जो दिल में, मिलकर मिटाएंगे
हाकी के मैदान पर तिरंगा फहराएंगे
विश्व विजेता का इतिहास हम फिर दोहराएंगे,


जय हिंद
तारीफ सुनना सब पसंद करते हैं। सबकी ख्वाहिश होती है कि वे जहां जाएं उनकी तारीफ हो। मगर ये कमबख्त इंसानी फितरत..... हम तारीफ तो थोक में सुनना चाहते हैं लेकिन दूसरे की तारीफ चिल्हरों में करते हैं। जैसे खुद चंदा मांगने जाएं तो १०० से कम में नहीं मानेंगे लेकिन किसी भिखारी को १ रुपये से ज्यादा दान देने पर जान निकल जाती है। वैसे तारीफपसंद लोगों की भी काफी वैरायटी होती है। कुछ अपने मुंह मिट्ठू मियां बनते हैं, ऐसे लोग खुद ही अपना गुणगान कर अपना काम चला लेते हैं..। ये लोग बड़े खुद्दार किस्म के होते हैं, तारीफ के मामले में ये किसी का एहसान लेने में यकीन नहीं करते थे। पर पिछले दशक के आखिर तक ये खुद्दाम किस्म के मिट्ठु लुप्तप्राय हो गए। फिर जमाना आया दूसरों के मुंह मिट्ठू मियां बनने वालों का। ये कुछेक लोगों के मुंह से अपने तारीफ सुन सातवें आसमान पर पहुंच जाया करते थे। कुछ समय बाद ये ज्यादा तारीफें झेल नहीं पाए और आठवें आसमान पर पहुंचकर ये मिट्ठू भी लुप्तप्राय हो गए।

बंधुवर आज का जमाना है सबके मुंह मिट्ठू मियां बनने वालों का। ऐसे लोग तारीफ करने वालों का जत्था लिए ही साथ में चलते हैं। जब तक ५-६ लोग थोक में इनकी तारीफ न करें, इनका खाना नहीं पचता। इसी बिरादरी में हमारे एक मित्र भी आते हैं। वे बड़े ही सभ्य व सज्जन टाईप हैं और जब भी उन्हें अपनी तारीफ करवानी होती है, वे साथ खड़े चार-पांच लोगों को आगे कर देते हैं। एक बार इनके पिताजी ने इनसे पूछा कि परीक्षा कैसी गई। हमारे मित्र ने कहा- बहुत अच्छी गई, लेकिन हमने कैसे लिखा यह आपको हमारे मित्र बताएंगे। इतना कहते ही उन्होंने हम चार दोस्तों को आगे कर दिया। हम उनके शेर सदृश्य पिताजी के सामने निरीह बकरियों की तरह खड़े थे। एक बार यही मित्र इंटरव्यू देने गए जहां इनसे पूछा गया कि आप अपनी तारीफ में क्या कहना चाहेंगे। इतना सुनते ही हमारे मित्र ने हम सात-आठ दोस्तों को फोन किया और हमें वहां बुलाकर तारीफों का ऐसा टेप बजवाया कि उनकी तो नौकरी लग गई लेकिन हमारी लगी-लगाई नौकरी छूट गई। पर क्या करें हर एक फ्रेंड जरुरी होता है...।

आजकल जमाना आउटसोर्सिंग का है। अपना काम किसी दूसरे से करवाना। बेचारे सरकारी मुलाजिम आउटसोर्सिंग नहीं कर पाते इसलिए आपस में ही फाइल को आगे बढ़ा-बढाकर, तो कभी भी गोल-गोल घुमाकर आउटसोर्सिंग का लुत्फ उठाने की कोशिश करते रहते हैं.। इसलिए हमारे मित्र की तरह बहुत से लोग तारीफों की आउटसोर्सिंग भी करवाने लगे हैं। जब शादियां से लेकर तलाक तक ठेके पर करवाई जा सकती है, तो तारीफें क्यो नहीं। तारीफों के पुल बांधना कोई बच्चा का खेल तो है नहीं ना..। दूसरों के मुंह से तारीफ करवाने का एक फायदा यह है कि तारीफों ज्यादा ऑथेंटिक यानी विश्वसनीय लगती हैं। पर जैसे की मैंने उपर बताया कि इंसानी फितरत...। किसी दूसरे के लिए तारीफों के दो शब्द बड़े जतन से निकलते हैं। तारीफों की डिमांड ज्यादा है पर सप्लाई कम। तारीफ पाना हर इंसान का मौलिक अधिकार है, और किसी के मौलिक अधिकारों का हनन मुझे कतई मंजूर नहीं। भले ही मैं स्कूल में नागरिक शास्त्र की कक्षाओं में नदारद रहा हूं, लेकिन तारीफ का अधिकार तो मैं सबको दिलाकर रहूंगा।


बस इसी तारीफों की कमी को पूरा करने के लिए ही तो भगवान ने मुझे धरती पर भेजा है। छोटे-मोटे काम करके मैं वैसे भी ऊब चुका था, उपर से घरवाले मुझ पर बरस पड़ते कि- पता नहीं ये लड़का क्या करेगा।  वैसे भी कहते हैं खाली दिमाग शैतान का घर.....। मेरे दिमाग में भी कई बार यह ख्याल आया कि आखिर मैं दुनिया में करने क्या आया हूं। पर, अब मुझे पता चल चुका है कि मैं जनकल्याण के लिए आया हूं। बस इसी जनकल्याण के विचार को मन में लिए मैंने अपनी कंपनी तारीफ कंस्ट्रक्शन्स खोली है। न हींग न फिटकरी और रंग बिलकुल चोखा। बिलकुल मस्त धंधा है। नो इन्वेस्टमेंट फुल प्राफिट। जब लोग दूसरों की शादी (बर्बादी) कराकर पैसा कमा सकते हैं तो मैं तारीफ करके पैसा क्यों नहीं कमा सकता। तारीफ सुनकर चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। और वैसे भी किसी बहुत ज्ञानी आदमी ने कहा है कि किसी के चेहरे पर मुस्कान लाने से बड़ा कोई पुण्य नहीं। उस ज्ञानी आदमी का नाम मैं आपको बताता..... पर वो आदमी अभी लिखने में व्यस्त है।


वैसे मेरी कंपनी तारीफों के सिर्फ पुल ही नही बनाती। जब बंदे का काम तारीफों की दो सीढ़ियों में ही निपट सकता है तो फिजूल ही तारीफों का पुल बनाकर तारीफें बर्बाद क्यों करना। मटेरियल बच गया तो दूसरे के काम आ जाएंगी। ग्राहक भगवान होता है और और ग्राहक के डिमांड के हिसाब से तारीफों की सीढ़ी, तारीफों के कदम, जरुरत पड़ने पर कई बार तारीफों के अंडरब्रिज, फ्लाईओवर, ४ लेन, ८ लेन रोड भी बनवा  देते हैं।


एक कर्मचारी हमारे पास आए जो साल दर साल अपने बॉस की तारीफ कर प्रमोशन पाए जा रहे थे, लेकिन इस बार उनका डिमोशन हो गया, कारण कि बॉस हर बार वही पुरानी तारीफें सुनकर उब चुका था। हमने तुरंत अपनी रेस्क्यू टीम को उनके आफिस भेजा जिन्होंने ऐसी तारीफें की कि उसकी नौकरी तो बची ही, साथ ही प्रमोशन भी हो गया। कुछ समय बाद एक दुखी लेखक हमारे पास आए। लेखन उनका ठीक-ठाक था, मगर ताउम्र तारीफों का अकाल रहा। लेखक क्या चाहे, बस दो तारीफ। हमारी टीम ने उनके कवि सम्मेलन में तारीफों की जो शुरूआत की, उसके बाद तो भेड़चाल की आदि भीड़ १५ मिनट तक ताली बजाती रही। हालांकि, सच कहें तो उनकी लिखी कविता सच में सिरदर्द थी। पर सिर के दर्द को सिर का सेहरा बनाना ही तो तारीफ कंस्ट्रक्शंस का काम है।

कुछ समय पहले एक महिला हमारे पास आई जिन्हें लगता था कि उनके पति उनसे प्यार नहीं करते क्योंकि वे आजकल उनकी तारीफ में कसीदे नहीं पढ़ते। वो तो तलाक लेने पर उतारु थीं, तभी हमने उनके पति को हमारी तारीफ पब्लीशर्स की लेटेस्ट किताब तारीफ के काबिल पकड़ाई, साथ ही गारंटी दी कि १० साल तक तो तारीफें खत्म नहीं होंगी। इस तरह हमने उनकी शादीशुदा लाइफ में १० साल का टॉप अप डाल दिया। इस केस के बाद मुझे लगा मुझे मेट्रीमोनी में भी हाथ आजमाना चाहिए। वैसे तारीफ कंस्ट्रक्शंस ने जितनी जल्दी तरक्की की है उसके बाद भविष्य में बहुत कुछ शुरु करने का इरादा है। फिलहाल के लिए आपसे एक दरख्वास्त। अगर आपकी कहीं थोक के भाव तारीफ हो रही हो, तो समझ लीजिएगा इसमें थोड़ा हाथ तारीफ कंस्ट्रक्शंस का भी होगा। अगर आप मुझे धन्यवाद देना चाहें, तो बेशक दीजिएगा। क्योंकि भले ही तारीफों का कुआं खोद कर रखा है हमने, पर तारीफों के प्यासे तो हम भी हैं।