लो, गई भैंस पानी में। पूरी मेहनत पर पानी फिर गया। घोटाले, धौंसबाजी, घपले, आपराधिक कृत्य करके जितनी भी इज्जत बनाई थी, सब धूमिल हो गई। पार्टी में जो नेता पहले सीना तानकर धौंस जमाते हुए चला करते थे, आज गर्दन झुकाए सभाकक्ष में जा रहे हैं। दरअसल ये सब पायरेटड नेता मतलब पायरेटड सीडी देखते पकड़ाए नेता। और इनको इनके टुच्चे कारनामे के कारण पार्टी ने इन्हें बैठक के लिए दिल्ली बुलाया है।

neta cartoonचुनावों में क्रासवोटिंग के डर से इनकी नेत्री ने ७५ विधायकों को एक होटल में छुपाया था और वहां उनके मनोरंजन के लिए 'राजनीति' फिल्म उनको दिखा दी वो भी पायरेटड सीडी से। बस यहीं से सारी आफत शुरू हुई। इन नेताओं को क्रासवोटिंग के डर से होटल में छुपाया गया था पर पायरेटड सीडी कांड के बाद तो ये क्रासवोटिंग तो क्या वोटिंग करने से भी कतरा रहे हैं। दरअसल जब से इन्होंने ये टुच्चा कारनामा किया है पूरी नेता बिरादरी में इनकी जंग हंसाई हो रही है। ये कहीं बाहर आने-जाने लायक नहीं रहे। सबसे मुंह छिपाए फिर रहे हैं। अरे भई, पकड़ाना ही था तो घोटाले में पकड़ाते, हत्या, अपहरण में पकड़ाते मगर यह क्या पायरेटड सीडी देखते पकड़ा गए। पूरे राजनीतिक जगत में थू-थू हो रही है। पूरा मार्केट वैल्यू नीचे गिर गया। कल तक जो पार्टी के छोटे-मोटे कार्यकर्ता गर्दन झुकाकर इनके पैरों में पड़े रहते थे, आज इन्हें 'पायरेटड', 'पायरेटड' कहकर चिढ़ा रहे हैं। इनके ऊपर १०-२० एसएमएस चुटकुले तो इन कार्यकर्ताओं ने खड़े-खड़े बना दिए। पार्टी का रिवाज है कि जो नेता जिस कांड में पकड़ाएगा उसका 'निक नेम' उसी आधार पर रख दिया जाएगा। जैसे कोई नेता डामर घोटाला में पकड़ाया तोउसका निकनेम हुआ 'डामर, पानी घोटाले वाले नेता का 'पानी' आदि। अब ये नेता पायरेटड सीडी देखते पकड़ाए हैँ इसलिए इनका निकनेम पड़ गया 'पायरेटड'।
इसलिए इन 'पायरेटड' नेताओं को राष्ट्रीय अध्यक्ष ने दिल्ली बुलाया है इस घटना पर सफाई देने के लिए। इन नेताओं की नेत्री भी इन लोगों के साथ आई है। (बैठक शुरू होती है)
राष्ट्रीय अध्यक्ष नेत्री से- "ये क्या किया आप लोगों ने, पार्टी की भद्द पिटवा दी। रुके थे पांच सितारा होटल में और वहां ऐसा गैर सितारा काम कर दिया। तुम्हारे इस टुच्चे कारनामे ने पूरी पार्टी की चमक फीकी कर दी। अरे किसी बड़े मामले में फंसते तो किसी को भिड़ाया जाता, इसी बहाने पार्टी को कुछ काम तो मिलता, वैसे ही खाली बैठे रहते हैं लेकिन इस टुच्चे कांड के लिए जुगाड़ लगाने में भी शर्म आ रही है। अरे हम राष्ट्रीय पार्टी हैं, कोई छोटे-मोटे टुच्ची पार्टी नहीं पर तुम लोगों ने पायरेटेड सीडी देखकर पार्टी की इज्जत मिट्टी में मिला दी। अरे जब पांच सितारा होटल में विधायकों को छुपा सकती हो तो इन्हीं किसी मल्टीप्लेक्स ले जाकर फिल्म नहीं दिखा सकती।"
नेत्री- "मैं क्या करती। वैसे ही सत्ता से बाहर हैं, पार्टी में फंड की भी कमी है इसलिए पायरेटड सीडी से काम चला लिया।"
राष्ट्रीय अध्यक्ष- "अच्छा, पांच सितारा होटल में रुकने का पैसा है लेकिन मल्टीप्लेक्स जाने का नहीं। "
नेत्री- "अध्यक्ष महोदय, पार्टी फंड अभी खस्ताहाल है, जब हम सत्ता में थे तभी उस होटल में पहले से ही एडवांस राशि जमा करा दी थी भविष्य के लिए। हमें पता था हम सत्ता के भले ही बाहर हो जाएं लेकिन होटलवाले हमको बाहर नहीं कर पाएंगे। इसलिए होटल में पैसा नहीं देना पड़ा।"
राष्ट्रीय अध्यक्ष- "एक तो सत्ता से बाहर हैं, कोई मुद्दा भी नहीं मिल रहा था जिसे उछालें। अभी-अभी एंडरसन मामले पर कांग्रेस को घेर ही था। पार्टी की मार्केट वैल्यू बढ़ ही रही थी कि तुम लोगों के टुच्चे कारनामे ने पूरा वैल्यू डाऊन कर दिया। कल की ही बात ले लो। अगले हफ्ते रैली निकालकर केन्द्र सरकार का पुतला जलाने का का र्यक्रम है तो सोचा कि थोक के भाव पुतले ले लेते हैं। लेकिन पुतले वाले ने पुतले देने से इंकार कर दिया, कहने लगा हम छोटी-मोटी पार्टियों को पुतला नहीं देते। मैंने कहा कि हम राष्ट्रीय पार्टी हैं तो वो कहने लगा कि जिस तरह के प्रकरण में तुम्हारे पार्टी के नेता पकड़ाए हैं, वैसे प्रकरण में छोटी-मोटी पाटी के नेता पकड़ाते हैं। राष्ट्रीय पार्टी के नेता पायरेटड सीडी में फिल्म नहीं देखते बल्कि खुद का मल्टीप्लेक्स बनवा लेते हैं या फिर पूरी फिल्म ही बनवा लेते हैं। "
(अध्यक्ष पायरेटड नेताओं की तरफ मुखातिब होते हुए) "देखा तुम लोगों ने तुम लोगों के कारण पुतले वाले तक हमको भाव नहीं दे रहे ।"
(एक पायरेटड नेता बीच में बोल पड़ा) "हम क्या करें, होटलवालों ने ही हमको पायरेटड सीडी दे दी।"
राष्ट्रीय अध्यक्ष (गुस्से में)- तुम तो चुप ही रहो। ये आइडिया तुम्हारा ही होगा क्योंकि तुम ही कंजूस हो और डुप्लीकेट चीजें रखते हो। चाइना मोबाइल, सेकंड हैंड गाड़ी, सालों पुरानी घड़ी। तुम तो नेता के नाम पर कलंक हो। नेता को अपव्ययी होना चाहिए मितव्वययी नहीं। तुम तो कार्यकर्ता बनने लायक भी नहीं हो।
(इतने में एक वरिष्ठ नेता बोलता है) "मुझे तो लगता है कि इसमें विरोधी पार्टियों की चाल है। उन्हीं लोगों ने पायरेटड सीडी भिजवाई होगी और फिर इन लोगों को पकड़वा दिया ताकि इस टुच्चे प्रकरण में फंसकर हमारी पार्टी की "रेपोटेशन" खराब हो। या फिर हो सकता है कोई घर का भेदी हो, मतलब भीतरघात की आशंका। अध्यक्ष महोदय, मैं इस भीतरघात के जांच की मांग करता हूं और यदि ये काम विरोधी दल का है तो कार्यकर्ताओं से आह्वान करता हूं कि विरोधी दलों के घरों में थोक के भाव पायरेटड सीडी भिजवा दें।" (इतना सुनते ही कार्यकर्ता बाजार की तरफ दौड़ पड़ते हैं पायरेटड सीडी लेने और इसके बाद  बैठक को खत्म कर दिया जाता है।)
(कुछ देर बाद पायरेटड सीडी प्रकरण से व्यथित "राजनीति" फिल्म के निर्देशक प्रकाश झा सभा कक्ष में आते हैं। सभाकक्ष में उस समय बैठक खत्म होने के बाद सारे नेता नाश्ते का मजा ले रहे हैं।)
प्रकाश झा- "मैं आप लोगों के द्वारा पायरेटड सीडी में फिल्म देखने से दुखी हूं। जब कानून बनाने वाले ही कानून तोड़ेंगे तो देश का क्या होगा?"
सभी नेता एक स्वर में- "आप गलत कह रहे हैं। सबसे पहले बात तो कानून हमने बनाया ही नहीं, वो पहले से बना हुआ है। और दूसरी बात कानून चाहे बने या टूटे देश जैसा है वैसा ही रहने वाला है। यहां हजार लोगों को मौत के हवाले करके एंडरसन जैसे लोग साफ बच जाते हैं फिर हमने तो बस पायरेटड सीडी में फिल्म देखी है और आप इस पर इतना हल्ला मचा रहे हैं।"
(प्रकाश झा निराश होकर वापस लौट जाते हैं लेकिन तभी एक हल्की सी मुस्कान उनके चेहरे पर आती है क्योंकि उनको अपनी अगली फिल्म का विषय जो मिल गया है- "भोपाल गैस हादसा।" फिल्म के किरदारों का खासा मन में तैयार करते हुए वे पार्टी कार्यालय से बाहर निकल जाते हैं)
शुद्ध घी खाकर वृद्ध की मौत, शुद्ध घी के सेवन से सैंकड़ों बीमार। चौंक गए क्या। अरे ये मैं नहीं, बल्कि अखबारें बोल रही हैं। सारे अखबार बस इसी तरह के शीर्षकों से अटे पड़े हैं। अब जो अशुद्ध खाने का आदि हो उसे अगर शुद्ध चीज खिला दी जाए तो तबीयत तो खराब होगी ही। अशुद्ध चीजें पचाने की आदि अंतड़ियां शुद्ध चीज कहां से पचा पाएंगी। ये मिलावट का युग है। मिलावट ही सत्य है, मिलावट ही सर्वत्र है। आज मिलावट फैशन है और पैशन भी। जो मिलावटी नहीं वह आउटडेटड है। बदलते जमाने के साथ शुद्ध गंगा नदी ने भी अपने आपको अपडेट कर लिया और अशुद्ध हो गई। आप हाथ में गंगाजल लेकर तर्पण करते हैं, लेकिन हाथ में गंगाजल छोड़कर सब कुछ आ जाता है मसलन, कचरा, तेल, हेयरपिन, बासी फूल, विसर्जित किए गए मूतिर्यों के अवशेष सब कुछ। ऐसा लगता है मानो सारा संसार हाथों में आ गया है। अब सरकार भी मिलावटी बनती हैं मतलब मिली-जुली। साफ-सुथरी सरकार अब चलन के बाहर हो गई हैं, अब तो दागी नेताओं की सरकार है। जनता ने भी इस मिलावट को अब स्वीकार कर लिया है। बिना मिलावट की गई चीजें तो अब हम हमको जमती ही नहीं । जब तक दूध में पानी न हो दूध का मजा नहीं आता। भूसे मिले चायपत्ती के बगैर चाय बेस्वाद लगती है। मिलावटी तेल में सिके हुए पूड़ी और तले हुए पकौड़ों की तो बात ही क्या। बच्चा भी पैदा होते ही अब मां का दूध नहीं पीता बल्कि बोतलबंद सोया दूध पीता है।

इन अशुद्ध चीजों के बीच सबकी जिंदगी मजे से गुजर ही रही थी, पर पता नहीं कहां से मार्केट में शुद्ध घी आ गई। इस शुद्ध घी के अचानक टपकने से लोगों में हाहाकार मच गया। सब को डर सताने लगा कि कहीं शुद्ध घी खाकर वे बिस्तर न पकड़ लें। कुछ खुरापाती किस्म के लोगों ने शुद्ध घी का नायाब इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। बहू अपनी सास को शुद्ध घी से बने पकौड़े खिलाने लगी ताकि वह जल्दी स्वर्ग सिधार जाए। आफिस में एक कर्मचारी अपने विरोधी कर्मचारी को रास्ते से हटाने के लिए उसे शुद्ध घी से बुने लड्डू खिलाने लगा। स्कूल में एक बच्चे ने अपने जन्मदिन पर टीचर को शुद्ध खोवे से बनी मिठाई खिला दी ताकि टीचर ५-६ दिन के लिए बिस्तर पकड़ ले और होमवर्क से मुक्ति मिल जाए।

दिन ब दिन शुद्ध घी से बीमार लोगों की संख्या बढ़ने लगी। हॉस्पीटल हाऊसफुल होने लगे। छुटभैये और झोलाछाप डॉक्टरों की भी निकल पड़ी। एक डॉक्टर अपने मरीज से कहता है- अजी शुक्र है आपने ८० प्रतिशत शुद्ध घी से बना लड्डू खाया था इसलिए बच गए, कहीं १०० प्रतिशत शुद्ध घी वाला लड्डू खाया होता तो स्वर्ग सिधार गए होते। जरा देखकर खाया कीजिए आजकल मार्केट में शुद्ध घी आ गई है। पत्नी अपने पति से बोली- देखा जी, इसलिए कहती हूं दूर रहा करो उस रमेश से, जरूर उसी ने आपको शुद्ध घी का लड्डू खिलाया होगा, वो आपसे जलता जो है। मैं आज ही शुद्ध घी के पकौड़े बनाती हूं आप इसे राजेश को खिलाकर उसको सबक सिखाना।

शुद्ध घी ने इतनी दहशत फैला दी कि लोग दुकानदारों को शक की नजरों से देखने लगे। जो दुकानदार दशकों से अपनी मिलावट कला से लोगों की सेवा करते आए थे, अब शक के दायरे में आने लगे। लोगों को शंका होने लगी कि कहीं ये दुकानदार उन्हें शुद्ध घी न पकड़ा दें। गली-मोहल्ले, चौक-चौराहों पर बस इसी बात के चर्चे थे कि आखिर ये शुद्ध घी अचानक आया कहां से? कुछ ने कहा इसमें अंडरवर्ल्ड का हाथ होगा। कुछ को इसमें पाकिस्तान के साजिश की बू आने लगी। तालिबान को जैसे ही शुद्ध घी के आतंक के बारे में पता चला उसने शुद्ध घी से तबाही मचाने की सोची। आतंकवादियों ने सोचा बंदूक और खून खराबा करके हम ५०-१०० लोगों को मार पाते हैं लेकिन लोगों को शुद्ध घी खिलाकर एक बार में ही ५-१० हजार लोगों का काम तमाम कर देंगे। तालिबान ने तत्काल रामू, भोला, बंसी, दुकालू के यहां की १००० गायें अपहरण कर ली। अब आतंकवादियों ने बंदूक छोड़कर डेयरी खोल ली और गायों का दूध दुहकर शुद्ध घी बनाने लगे। शुद्ध घी के किस्से अमेरिका तक भी पहुंच चुके थे। तब अमेरिका ने अपने नया परमाणु बम बनाने का कार्यक्रम रोककर शुद्ध घी बम बनाने का कार्यक्रम शुरू कर दिया। अमेरिका को इसके लिए गायों की जरूरत थी। जिस तरह तेल के लिए उसने इराक पर हमला कर दिया था उसी तरह अब वह गायों के लिए भारत की तरफ देखने लगा। हमारी कमजोर लड़खड़ाती सरकार न पहले अमेरिका के दबाव के आगे कुछ कहती थी और न अब उसने कुछ कहा।

शुद्ध घी के आतंक से लंबे समय से सुस्त एवं निर्जीव पड़े विपक्ष के नेताओं को एक मुद्दा मिल गया जिसे वे चुनाव में भुना सकते थे। विपक्ष ने संसद में इस मुद्दे को खूब उछाला और सरकार की खूब मिट्टीपलीद की। विपक्ष के एक जोशीले नेता ने ऊंचे स्वर में कहा- शुद्ध घी का बाजार में आना जनता की सेहत के साथ खिलवाड़ है। आज के मिलावटी युग में अगर कोई शुद्ध चीज आ जाएगी तो गड़बड़ तो होगी ही ना। अब हम सारे दागी नेताओं के बीच अगर कोई सच्चा, सज्जन नेता आ जाएगा तो राजनीति प्रदूषित होगी ही ना, पूरा समीकरण बिगड़ जाता है। मुझे तो शुद्ध घी के बाजार में आने के पीछे केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री का हाथ लग रहा है। उन्हीं के संरक्षण में चल रही डेयरियों से शुद्ध घी के सप्लाई की खबरें आ रही हैं। इसकी उच्चस्तरीय जांच होनी चाहिए। केन्द्रीय गृहमंत्री ने इसके लिए समिती बना दी। समिति बनाना सभी मुद्दों का रामबाण इलाज है। कोई मुद्दा हो, बस जांच समिति बना दीजिए, ४-५ महीने या फिर साल फुर्सत। गृहमंत्री ने भी इसी रामबाण इलाज का प्रयोग करते हुए समिती बना दी।

जिस तरह छल, कपट, राग, द्वेष के युग में सत्य, धर्म, निष्ठा अपना स्थान नहीं बना सकती। उसी तरह अशुद्ध माहौल में शुद्ध चीजें कहां से अपना स्थान बना पाती। कुछ समय तक शुद्ध घी ने अपने को समाज बनाए रखने की कोशिश की लेकिन लोगों ने इसका भी तोड़ निकाल लिया और उसे अशुद्ध करने के लिए जुगाड़ जमा ही लिया। कुछ समय तक शुद्ध घी से आतंकित लोग अब फिर अपनी जिंदगी में लौट आए। बाजार में अब शुद्ध घी का नामोनिशान नहीं है। मैंने यह व्यंग्य बिस्तर पर पड़े-पड़े लिखा क्योंकि मेरे हास्य व्यंग्य से जलने वाले मेरे एक मित्र ने मुझे उस समय शुद्ध घी के लड्डू खिलाकर बिस्तर पर पटक दिया था। खैर अब मैं चलता उसी मित्र के पास उसे शुद्ध घी का हलवा खिलाकर उसका हाजमा खराब करने, ये शुद्ध घी मैंने खास उसी के लिए बचाकर रखा था सबक सिखाने के लिए। आप लोग भी बचकर रहिएगा कहीं शुद्ध घी आपके शहर में आतंक न मचाने लग जाए।
बच गया एंडरसन करके खून हजार...
न्याय मांगती रह गई पीड़ितों की चित्कार...
भ्रष्ट नेताओं ने निभाई एंडरसन से यारी..
भेज दिया स्वदेस उसको रोक के गिरफ्तारी....
ये है भारत देश जहां कण-कण में भ्रष्टाचार...
बच गया एंडरसन करके खून हजार...


२ दिसंबर ८४ की थी वो जहरीली रात....
मौत लगाए बैठी थी सबके जीवन पर घात....
चिमनी से तब निकला एमआईसी का फुंकार...
लील गया कई जानें, कईयों को किया लाचार....


न्याय की राह तकते पीड़ित फिर रहे मारे-मारे....
और अपराधी घूम रहे हैं मस्ती में मतवारे...
ढाई दशक बाद जब आई न्याय की बारी...
तब उजागर हुई नेताओं की सारी भ्रष्टाचारी...
केस कमजोर बनाया ताकि अपराधी चढ़ें न सूली...
लाचार कानून सजा दे पाया वो भी बस मामूली...
धन्य है भारत का कानून, धन्य है सरकार...
भारत के कण-कण में फैला है भ्रष्टाचार...


अमेरिका में छिपा हुआ है एंडरसन फरार...
भारत उसको लाने की जहमत क्यूं उठाए सरकार...
देख रही दुनिया होते न्याय को तार-तार...
बच गया एंडरसन करके खून हजार...
मैं खुद को ढूंढ रहा हूँ,
कौन हूं मैं, क्यां हूं मैं,
ये खुद से पूछ रहा हूँ,
मैं खुद को ढूंढ रहा हूँ...।


आँखों में सपने लिए
घर से निकल पड़ा हूँ,
कहां हैं मेरी राहें, कहां हैं मेरी मंजिल
अपने वजूद को ढूंढ रहा हूँ,
अनसुलझे प्रश्न हैं कई
उनके उत्तर ढूंढ रहा हूँ,
मै खुद को ढूंढ रहा हूं...।

भीड़ से खुद को कैसे अलग दिखाऊं,
जीवन की दौड़ में कहीं पिछड़ न जाऊं,
अपने अंर्तद्वंद्व से लड़ रहा हूँ,
मैं खुद को ढूंढ रहा हूँ...।


हारा हूँ कई बार पर कमजोर नहीं हुआ,
लाख गलतियां की हैं पर अफसोस नहीं हुआ,
बस अब हर कदम पर जीतने की चाह है,
वही मेरी मंजिल वही मेरी राह है,


चाहत को इरादा बनाया है,
कमजोरी को ताकत बनाया है,
पूरे हुए अरमां, मिल गई मंजिल,
अब नई मंजिल के लिए निकल पड़ा हूँ


नई राहें हैं, नई मंजिल हैं,
पर प्रश्न अब भी है वही,
कौन हूँ मैं, क्या हूँ मैं,
ये खुद से पूछ रहा हूँ,
खुद को ढूंढ रहा हूँ,
मैं खुद को ढूंढ रहा हूँ...
ट्रीं..ट्रीं… सुबह ६ बजे अलार्म की घंटी बजती है। रोज ९ बजे उठने वाले शर्मा जी ६ बजे ही उठ गए। नहा-धो कर नाश्ता करके हो गए आफिस के लिए रवाना। दरअसल उस दिन ३१ मई था यानी तम्बाकू निषेध दिवस और शर्मा जी हैं तम्बाकू निषेध समिति के अध्यक्ष। आज तम्बाकू निषेध दिवस पर वार्षिक बैठक बुलाई गई और यह आपाधापी इसीलिए मची हुई है। शर्मा जी आफिस पहुंचते हैं। आफिस का ताला खोलने का प्रयास करते हैं लेकिन वो खुलता नहीं, शायद ताला जाम हो गया था इतने महीने से खुला जो नहीं था। खैर काफी मशक्कत के बाद शर्मा जी ताला खोल ही लेते हैं।

थोड़ी देर बाद चपरासी आता है। शर्माजी चपरासी को डांटते हुए कहते हैं- आज आफिस क्यों नहीं खोला? चपरासी हंसते हुए कहता है- क्या साहब। इतने महीनों से आफिस नहीं खुला ना इसलिए आदत नहीं थी आफिस खोलने की। शर्माजी कहते हैं- ठीक है, चलो जाओ समोसे और कोल्ड्रिंक का इंतजाम करो। बैठक शुरू होने वाली है।

कुछ देर बाद सारे पदाधकारी आफिस आ जाते हैं। शर्माजी उनका स्वागत करते हुए कहते हैं- आइए, आइए वर्माजी, मिश्रा जी आपका ही इंतजार था। आज तम्बाकू निषेध दिवस था इसलिए सोचा इस सूने आफिस को थोड़ा हरा-भरा कर लें। इसलिए आज वार्षिक बैठक आयोजित कर ली। तभी चपरासी समोसा और कोल्ड्रिंक लेकर आता है। सभी उसका लुत्फ उठाते और हुए अपनी हाकंने लगते हैं।

कुछ देर बाद बैठक शुरू होती है। अध्यक्ष शर्मा जी कहते हैं- आज तम्बाकू निषेध दिवस है और इसीलिए आज वार्षिक बैठक आयोजित की गई है। पिछली बैठक में लागू की गई नीतियों, कार्यक्रमों पर और भविष्य के कार्यक्रमों पर चर्चा की जाएगी। सबसे पहले वर्मा जी आप बताइए पिछले साल सरकार द्वारा आबंटित राशि का क्या उपयोग हुआ। वर्माजी कहते हैं- शर्माजी उसका ब्यौरा आप ज्यादा बेहतर दे पाएंगे क्योंकि उसी आबंटित राशि में से तो आप अपने परिवार को विदेश घुमाने ले गए थे। शर्माजी समझाते हुए कहते  हैं- घूमने कौन गया था हम तो विदेश में हो रहे तम्बाकू निषेध कार्यक्रमों का अवलोकन करने गए थे। मिश्राजी हंसते हुए कहते हैं- चलिए आप किसे समझा रहे हैं, जैसे हम जानते ही नहीं आप क्या अवलोकन करने गए थे। वर्माजी आगे ब्यौरा देते हुए कहते हैं- उस आबंटित राशि में से कुछ के बैनर-पोस्टर-फ्लैक्स छपे, कुछ विज्ञापन छपवाए, कुछ रैलियां निकाली और बाकी बची राशि तो हम सबने बांट ली थी, क्यूं भूल गए क्या।

शर्मा जी- मतलब अभी समिति कोष ठन ठन गोपाल है। लेकिन चिंता की कोई बात नहीं। इस वर्ष पहले से बड़ी राशि आबंटित होने वाली है तम्बाकू निषेध कार्यक्रमों के लिए। उस राशि से कोई कार्यक्रम हो न हो अपने कार्यक्रम तो हो ही जाएंगे। ( पूरे कमरे मे ठहाके गूंजने लगते हैं।)

(कुछ देर बाद शर्मा जी गुप्ता जी की तरफ रुख करते हुए) तो गुप्ताजी बताइए पिछले साल कितने पोस्टर, फ्लैक्स छपे और कितने विज्ञापन जारी किए।
गुप्ताजी- अध्यक्ष जी। पिछले साल गली-मोहल्लों को पोस्टर-फ्लैक्स से पाट दिया गया। विज्ञापन भी ताबड़तोड़ छपवाए गए। लेकिन न तो इससे तंबाकू सेवन कम हुआ और न ही लोग जागरुक। पूरा पैसा बर्बाद हुआ। इसीलिए इस बार मेरी गुजारिश है कि पोस्टर-फ्लैक्स कम छपवाएं जाएं और छपवाने का ठेका मेरे भतीजे को दिया जाए जिसने अभी अभी नई प्रिंटिंग प्रेस डाला है। और अपने बंदों ने मैगजीन-अखबार खोले हैं बस उनका ख्याल रखते हुए उन्हें थोक के भाव विज्ञापन जारी करना है। शर्मा जी- चलिए ठीक है। जैसी आपकी इच्छा गुप्ताजी। इस बार आपके भतीजे का भी कल्याण कर देंगे।

(अब श्रीमती खरे की बारी थी। वे कहने लगी) – पिछली बार आप लोगों ने मुझे रैलियों में खूब मशक्कत करवाई। धूप में घूम-घूमकर मेरा रंग उतर गया। और तो और अखबारों में मेरी फोटो भी नहीं छपी। अपने पड़ोसियों को तो मैं अच्छे से जला भी नहीं पाई उल्टा खुद ही हंसी की पात्र बन गई। ना बाबा ना,  इस बार मैं रैलियों में नहीं जाने वाली।

अध्यक्ष शर्मा जी दिलासा देते हुए- खरे मैडम। अजी, आपको किसने कहा है इतनी रैलियां निकालकर धूप में घूमने के लिए। बस दो-तीन रैलियां निकालिए और खत्म कीजिए। फिर कौन याद रखता है कब था तम्बाकू निषेध दिवस कब था। बाकी की रैलियां अगले साल निकालेंगे। और हां, इस बार आपकी फोटो अखबार में जरूर छपेगी वो भी बड़ी। इसकी ग्यारंटी में लेता हूं।

शर्माजी- अरे चौबेजी आप चुप क्यों बैठे हैं? आपकी भी कोई शिकवा-शिकायत हो तो सुना दीजिए।
चौबेजी- शिकवा-शिकायत तो कुछ नहीं है, बस एक दरख्वास्त है। पिछले साल तम्बाकू निषेध के लिए हुए नाटक की नायिका का फोन नंबर और घर का पता हमें दे दीजिए। नाटक के दौरान उसके द्वारा तम्बाकू छोड़ने की दी गई नसीहत का किसी पर असर पड़ा हो या न हो लेकिन हमारे चेन स्मोकर बेटे पर जरूर पड़ा है। उस नायिका को देखने के बाद उसने सिगरेट तो छोड़ दी लेकिन उस नायिका की याद में अब वह आधा हो रहा है।

शर्माजी- बैठक के बाद आप हमसे नम्बर ले लेना। (फिर चपरासी को बुलाते हुए) रामू जरा फाइल से धूल तो हटा दो और चौबेजी को उस नायिका का नंबर खोज के दे दो। (चपरासी फाइल को उलटने-पलटने लगता है)

(बैठक का आखिरी दौर आ जाता है) अध्यक्ष शर्मा जी- तो साथियों इस वर्ष क्या-क्या नीतियां अपनानी हैं। सबसे पहले तो समिति का फंड बढ़वाना है। और लोगों को जागरुक करने में राशि ज्यादा नहीं खर्च करनी है। चाहे कितना ही कह लो तम्बाकू छोड़ने के लिए न तो जनता तम्बाकू छोड़ेगी न तम्बाकू की बिक्री कम होगी। तो क्यों फिजूल में पोस्टर छपवाकर और रैलियां निकलवाकर पैसे खर्च करना। वो पैसा हमारे काम आ जाएगा। (सब एकसाथ सिर हिलाते हैं)

शर्माजी- चलिए भई अब बैठक खत्म। अब अगले साल मिलेंगे। रामू फाइल छोड़ जरा इधर आना, सामने वाले पान दुकान से ५ पैकेट सिगरेट, ५० गुटखा पाउच. २० पान लेकर आना। आज आफिस खुला ही है तो पैसा ले और पान दुकान का पुराना हिसाब भी चुकता कर दे। तो इस तरह संपन्न हुई तम्बाकू निषेध दिवस की आपात वार्षिक बैठक और आफिस फिर साल भर के लिए सूना हो जाएगा।