alarm_clock_12ट्रीं...ट्रीं...अलार्म ने तीसरी बार मेरी "ड्रीम एक्सप्रेस" को रोकने की कोशिश की और मैंने उसे पिछले दोनों बार की तरह इस बार भी चपेट जमाकर उसे चुप कराया और तकिए से मुंह ढंककर वापस अपनी "ड्रीम एक्सप्रेस" शुरू कर दी। अभी मेरी ड्रीम एक्सप्रेस ने गति पकड़नी शुरू की ही थी कि पिताजी ने बाल पकड़कर मुझे उठा दिया। आंखों को मसलकर मैंने नींद से जागने की कोशिश की फिर चार गालियां सुनने के पश्चात ही मैंने मुंह धोया। बाहर बालकनी में चाय का कप और अखबार हाथ में लेकर मैं इधर-उधर झांकने लगा लेकिन रितु, स्वाति, पिंकी, साक्षी कोई नहीं दिखी शायद सब की सब कॉलेज चली गई थी और मैं निखट्टू आज फिर कॉलेज नहीं जा पाया। सामने देखा तो बंदरों की तरह हंसता हुआ मेरा दोस्त बिल्लू दिखाई दिया। सुबह-सुबह बिल्लू की शक्ल देखकर मैं डर गया कहीं आज फिर दिन खराब न हो जाए। तीन सप्ताह पहले सुबह सुबह बिल्लू की ही शक्ल देखी थी और शाम को मेरी शक्ल रूपा के भाइयों ने बिगाड़ दी थी।

आखिर में कोई चारा न बचने के बाद मैंने अखबार की ओर नजरें घुमाना ही मुनासिब समझा और चाय की चुस्कियां लेने लगा। खेल के पृष्ठों से गुजरते हुए जैसे ही व्यापार के पृष्ठ से बचने की कोशिश कर रहा था एक खबर पर नजर ठहर गई। वैसे तो आजकल व्यापार पृष्ठ पढ़ने से भी डर लगता है। वही महंगाई, भाव बढ़े, सोना आसमान पर ग्राहक जमीन पर जैसी खबरें पढ़ने से चाय का स्वाद भी कड़वा हो जाता है। लेकिन आज जो खबर पढ़ी वह तो गजब की थी। खबर पढ़ते ही चाय मीठी लगने लगी। शीर्षक था "महंगाई की दर १७.६० से १४.७५ और खाद्य मुद्रास्फीति १६.९० से १२.९२ प्रतिशत हो गई" नीचे उपशीर्षक था- "महंगाई घटी"। अब हम हैं भारत की रट्टाऊ शिक्षा के पढ़े-लिखे होनहार और हर रट्टाऊ पढ़े-लिखे इंसान का यह कर्तव्य होता है कि भले ही उसे किसी शब्द  का अर्थ न पता हो, उसे अर्थ पता होना का  दिखावा जरूर करना चाहिए। तभी उसे जीनियस समझा जाता है। जैसे जो बैट और बल्ले के बारे में नहीं जानते है वह भी क्रिकेट के बारे में ऐसे विस्तार से बातें करते हैं जैसे बचपन से क्रिकेट खेलते रहे हों। भले ही वो क्रिकेट में बाइचुंग भुटिया को घुसा देंगे, ध्यानचंद को सचिन का कोच बना देंगे लेकिन बोलना नहीं छोड़ेंगे और धुप्पल में ऐसे लोगों को हां में हां मिलाने भी मिल जाते हैं।
hurray2वैसे तो मझे नहीं मालूम कि ये महंगाई, मुद्रास्फीति की दर कैसे तय होती है, ये तो देश की बाकी जनता भी नहीं जानती लेकिन मैंने बस इतना पढ़ा था कि दर कम हुई है मतलब महंगाई कम हुई है। भले ही महंगाई आंकड़ों में कम हुई हो लेकिन कम तो हुई ना। ये तो जश्न का मौका था भई। लोग वैसे भी आंकड़ों में ही ज्यादा यकीन रखते हैं। आंकड़े ही सत्य हैं। आंकड़ों में लिखा रहे कि ८० प्रतिशत जनता को भोजन मिल रहा है, लोग मान लेंगे भले ही आधे से ज्यादा आबादी रोटी को तरसते रहे। सब आंकड़ों की जादूगरी है, और हम तो जादूगरी पर ही फिदा हैं। अब मुझे पूरी दुनिया को बताना था कि दुखी होने की जरूरत नहीं महंगाई कम हो गई। इसलिए मैं स्नान करने चला गया। चूंकि महंगाई कम हो चुकी थी इसलिए मैंने सस्ते साबुन को तुरंत साबुनदान से निकाल फेंका और महंगे साबुन से स्नान करने लगा। महंगाई के कारण रोज घर पर ही नाश्ता करना पड़ रहा था लेकिन चूंकि आंकड़ों में महंगाई कम हो चुकी थी इसलिए मैं बंगाली स्वीट्स में नाश्ता करने चला गया। समोसों का स्वाद लेते हुए मैंने २ किलो रसगुल्ले का भी आर्डर दे दिया। मुझे खुश देख चटर्जी अंकल ने पूछ ही लिया- "क्या बात है बेटे, आज बहुत खुश लग रहे हो।" मैंने भी चहकते हुए बोला- "बात ही खुशी की है, महंगाई और खाद्य मुदास्फीति दर कम हो गई मतलब महंगाई कम हो गई।" यह बात सुनकर चटर्जी अंकल ने सिर पकड़ लिया। मैंने अखबार दिखाते हुए कहा- "देखिए, अखबार में छपा है।" वे फिर पूछने लगे- "बेटा ये होता क्या है।" मैंने समझाते हुए कहा- "आप खाद्य मुद्रास्फीति नहीं जानते, खाद्य मुद्रास्फीति मतलब फूड इन्फ्लेशन। आप फूड इन्फ्लेशन जैसे अंग्रेजी और व्यावसायिक शब्दों से दूर हैं इसलिए तो आज के आधुनिक ग्राहक आपकी इस पुरानी खंडहर होटल से दूर हैं। ऐसे शब्दों को जानना बहुत जरूरी है नहीं तो आप पिछड़े कहलाएंगे और पिछडे लोगों को कोई आदर नहीं देता। हो सकता है मैं भी कल आपके इस होटल में नाश्ता करना बंद दूं।" मेरे शार्ट एंड स्वीट प्रवचन की घुड़की पीकर अंकल को ज्ञान आ आ चुका था। वे बोले-"बेटा मैं समझ गया फूड इन्फ्लेशन क्या है, मैं भी तो पढ़ा-लिखा हूं। मैंने कहा- क्योंकि खाद्य मुद्रास्फीति का दर कम हो गया है, आपको मिठाइयां के दाम कम कर देने चाहिए।" मैंने २ किलो रसगुल्ले लिए और चटर्जी अंकल को उनके हाल पर छोड़कर चला आया।rasgulla
अब मैंने अपने ज्ञान का प्रसार सबको करने की सोची। सामने से शर्मा आंटी आती दिखाई दी। मैंने रसगुल्ला देते हुए कहा,"लीजिए मिठाई खाइए आंटी,  महंगाई कम हो गई है।" आंटी ने पूछा- अरे पागल बाजार में आग लगी है, सब्जी-टमाटर पहुंच के बाहर हैं, फलों का नाम लेने पर भी पैसा लग जाता है और तू कह रहा है महंगाई कम हो गई। मैं समझाते हुए बोला- "देखिए, अखबार में लिखा है फूड इन्फ्लेशन रेट कम हो गई मतलब यही हुआ न कि महंगाई कम हो गई।" आंटी चकराकर बोली- "ये फूड इन्फ्लेशन रेट क्या बला है।" मैंने चौंकते हुए पूछा, "आपको फूड इन्फ्लेशन रेट नहीं पता। आज नारी सशक्तिकरण का जमाना है। ग्लोबलाइजेशन है। नारी ज्ञान देने वाली है, पढ़ाई और नौकरियों में नारी ही आगे है और आप पूछ रही हैं फूड इन्फ्लेशन रेट क्या है? आप आधुनिक नारी नहीं हैं, तभी तो इस मोहल्ले में आपकी बखत नहीं है। २ साल पहले ही मोहल्ले में आई सोफिया आंटी आपसे ज्यादा आधुनिक और एजुकेटड हैं।" अब आंटी की "इमेज" का सवाल था। वह बोली- "जानती हूं ना। मैं तो ऐसे ही पूछ रही थी।" मैंने कहा- तो अब आप मानती हैं न कि फूड इन्फ्लेशन रेट १६.९० से १२.९२ पर आ गया, मतलब महंगाई कम हुई ना। तो फिर जाइए जश्न मनाइए। पकवान बनाइए, दोपहर के खाने के लिए मुझे आमंत्रित कीजिए क्योंकि मैंने ही आपको ये खुशखबरी दी है और आधुनिकता का पाठ भी पढ़ाया है।
drunk3अपने दोपहर के भोजन का इंतजाम कर मैं आगे बढ़ा और ऐसे व्यक्ति को ढूंढने लगा जिसे मैं अपना ज्ञान बघार सकूं। चौक पर महंगाई की मार से पूरी ताकत से लड़ने वाले जांबाज "बेवड़ों" को देखा। इनकी जिद को मैं सलाम करता हूं। चाहे कितनी भी महंगाई आ जाए, कुछ भी हो जाए इनके कोटे में कोई कमी नहीं आती। महंगाई कितना ही फुंकार मारे ये वीर एक बोतल दारू धकेलकर उसका फन कुचलने को आतुर रहते हैं। मैं ऐसे लड़ाकों से बात करना चाहता था। मैं पास गया और बोला कि बधाई हो महंगाई कम हो गई। ये लीजिए रसगुल्ला खाइए। उन बेवड़ों ने अपनी नशीली आंखों से मुझे देखा फिर डोलते हुए पास आए और बोले- "महंगाई क्या है भई। हमको तो नही मालूम। हम तो पहले भी दिन में चार बार टुन्न हुआ करते थे और अब भी होते हैं और आगे भी होते रहेंगे। आओ तुम भी महंगाई का सामना करो। ये क्या रसगुल्ला खिला रहे हो यार कोई नमकीन-वमकीन हो तो बताओ, हमारा चखना खत्म हो गया है।" मैंने पीछे हटते हुए कहा- मैं रसगुल्ला बांटकर ही तो महंगाई कम होने का जश्न मना लूंगा। आप लोग लगे रहिए। जाकर बंगाली होटल से नमकीन ले लीजिए उसने रेट कम कर दिए। इतना सूनते ही सभी बेवड़ों ने दौड़ लगा दी।
उन पियक्कड़ों से किसी तरह पीछा छुड़ाया। मैंने तय कर लिया आइंदा किसी बेवड़े को छेडऩे की हिम्मत नहीं करूंगा। उनकी साधना में मैं विघ्न नहीं डालूंगा वरना अपनी साधना में ये लोग मुझे भी जबर्दस्ती शामिल कर लेंगे। इतनी भागदौड़ के बाद मुझे घर की याद आई। घर जा ही रहा था कि सामने से साक्षी आते दिखी। मुझे देखते ही बोली- "क्या बात है, आज बहुत रसगुल्ला बांट रहे हो। अब महंगाई कम हुई ही है तो चलो फिल्म चलते हैं। तुम ही तो मोहल्लेभर में ढिढोरा पीटते फिर रहे हो कि महंगाई कम हो गई और अब फिल्म का नाम लिया तो शक्लें बना रहे हो।" मैंने सोचा फिल्म मतलब केवल फिल्म ही नहीं साथ में रेस्टारेंट में जेब कटवाना आदि-इत्यादि और अगर साथ में लगेज(सहेली) भी हुई तो डबल खर्चा। जेब में हाथ डाला तो जेब ठंडा था। फिर याद आया परसो ही तो पापा की दी पॉकेट मनी साक्षी पर उड़ा दी थी। सब्जी लाने के लिए दिए गए पैसों से गोलगप्पे खाए थे। अब अगर और पैसा मांगा तो घर में उल्टा टांग दिया जाऊंगा। जिस तरह अफसर जनता के लिए आबंटित पैसों को अपने ऊपर उड़ाते हैं उसी भ्रष्टाचार धर्म का पालन करते हुए मैंने भी अपने घर के सब्जी, किताबें, पंखे, कपड़े, राशन आदि के लिए आबंटित पैसों को साक्षी पर उड़ाया था। पिछले ही महीने मेरे इस भ्रष्टाचार का भंडाफोड़ हुआ था इसलिए मैं इन्वेस्टीगेशन आफिसर (पापा) की नजर में था। और पैसे मांगने की हिम्मत नहीं थी।  मैंने जेब में फिर हाथ डाला तो कुछ गर्माहट का अहसास हुआ शायद ५०-१०० रुपए थे। मैंने किसी तरह उसे घर रवाना कर अपने जेब कटने से बचाया। उसे क्या पता महंगाई कम होने का जश्न मना रहा मैं खुद महंगाई से पीड़ित हूं। खैर उस दिन इन आंकड़ों ने अपनी जादूगरी दिखा ही दी और मेरे मोहल्ले मे महंगाई कम हो गई। सरकार ने तो आंकड़ों में महंगाई की थी लेकिन मैंने अपनी विलक्षण दिमागखाऊ प्रतिभा से असलियत में कर दिया। अपने मोहल्लेवालों का दिमाग खाकर मैं ऊब चुका हूं, मुझे बदलाव चाहिए। बचके रहिएगा, मैं आपका भी दिमाग खा सकता हूं और महंगाई कम हुई का नारा लगाते हुए आपके शहर में धमक सकता हूं।brain
rain1ये तो सबको पता है कि मौसम विभाग भरोसे लायक बिलकुल नहीं है। इसलिए हम तो मौसम की भविष्यवाणी पर विश्वास ही नहीं करते। जब मौसम विभाग कहता है कि आज बारिश होने वाली है, उस दिन तो हम बेधड़क बिना छाते-रेनकोट के घूमते हैं क्योंकि हमें पता है बारिश नहीं होने वाली। लेकिन इस साल जब मौसम विभाग ने रो-रोकर उस पर विश्वास करने के लिए कहा तो हमारी दिल पसीज गया। आपको तो पता ही है हम कितने कोमलहृदयी हैं। मौसम विभाग का इस तरह रोज-रोज रोना हमसे देखा नहीं गया और हमने सोचा चलो इस बार इन पर विश्वास कर लेते हैं। प्रीमानसून बारिश हुई भी तब हमें लगा कि शायद मौसम विभाग ने सचमुच काम करना शुरू कर दिया है। लेकिन फिर वही ढाक के तीन पात। दो दिन प्री-मानसून का ट्रेलर दिखाने के बाद मानसून नाम की फिल्म रिलीज ही नहीं हुई। काले बादल मंडराते और जीभ चिढ़ाकर चले जाते। जून बीता जुलाई आई लेकिन बारिश नहीं आई। मौसम विभाग एक बार फिर बेवफा निकल गई। खैर हमने इन सबके बारे में सोचना बंद किया और लात तानकर बिस्तर पर सो गए। आप तो जानते हैं हम कितने निद्राप्रेमी हैं।



हमें हम सपनों के समुंदर में गोते लगाने ही वाले थे कि मोहल्ले में जोर-जोर से चिल्लाने की आवाज आने लगी। वैसे तो हमारे मोहल्ले में ये चिकचिक आम बात है लेकिन आज कुछ ज्यादा ही आवाज आ रही थी। नींद में खलल हमसे बर्दाश्त नहीं हो रही थी। लेकिन तभी इस कोलाहल के बीच एक मीठी सी आवाज सुनाई देने लगी। कोई सुरीली आवाज में गा रहा थी- "काले मेघा, काले मेघा पानी तो बरसा।" मैं कौतूहलवश बाहर आया कि आखिर मेरे वीरान मोहल्ले में अप्सरा कहां से आ गई। मेरी मां हमेशा कहती हैं कि मुझे जैसे आलसी को सिर्फ मेरी बीवी ही ठीक कर सकती थी। उस अप्सरा की सुरीली आवाज में मुझे वही जादू दिखाई दिया जो मुझे आलस्य से बाहर निकाल सकता था। इधर-उधर देखा तो एक खूबसूरत सी लड़की भीड़ के बीच बड़ी मधुर आवाज में गाना गा रही थी। पता करने पर मालूम चला कि वह शर्मा की बेटी "राधा" है पढ़ाई पूरी करके कल ही आई है। coupleमुझे राधा में अपनी जीवनसंगिनी के दर्शन होने लगे। मैंने तो मन ही मन फैमिली प्लानिंग भी कर ली थी कि बच्चे दो ही अच्छे, लड़की का नाम होगा रिया और लड़के का राहुल। रिया डॉक्टर बनेगी और राहुल इंजीनियर। मैं हसीन सपने बुन ही रहा था कि पीछे से कोई मेरे कान मरोड़ने लगा। पलटकर देखा तो साहू आंटी थी। साहू आंटी चिल्लाकर बोली "अरे निकट्ठू, यहां खड़ा ही रहेगा कि मोहल्लेवालों के साथ इंद्रदेव की आराधना भी करेगा। देख नहीं रहा सब मोहल्लेवासी अपने-अपने तरीके से इंद्रदेव को मनाने में लगे हैं। मैं उधर महिलाओं के साथ भजन कर रही हूं। सारे पुरुष हवन कर रहे हैं। तू जा राधा के साथ फिल्मी गाने गाकर इंद्रदेव को रीझा। शायद तुम्हारे फिल्मी गाने से ही इंद्रदेव खुश हो जाएं।" इतना सुनना था कि मेरे मन में लड्डू फूटने लगे। अपना तो एक ही लक्ष्य था इंद्रदेव रिझे न रिझे मुझे कृष्ण बनकर राधा को रिझाना था। मेरे अंदर लगान का भुवन जाग गया मैं दौड़ता हुआ राधा के पास पहुंचा और उसके सुर के साथ सुर मिलाने लगा- "काले मेघा- काले मेघा, पानी तो बरसा। बिजली की तलवार की नहीं, बूंदो के बाण चला...." वैसे जब मैं गाता हूं तो कौवे भी शर्मा जाते हैं लेकिन उस दिन मैं किशोर कुमार से कम नहीं गा रहा था। अरे भई इंप्रेशन का सवाल था और आप तो जानते हैं ना "फर्स्ट इंप्रेशन इज लास्ट इंप्रेशन"। मैं गायक तो नहीं, मगर ऐ हसीं जब से देखा मैंने तुझको, मुझको गायकी आ गई। मैंने गाना शुरू ही किया था कि जोरदार फुहार आने लगी। rain2सब लोग मेरी तरफ देखने लगे, मेरी राधा भी। सब लोग को लगने लगा कि मेरे गाने ने इंद्रदेव को प्रसन्न कर दिया। अब ये तो इंद्रदेव ही जानते हैं कि वो मेरे गाने से खुश हुए या दुखी होकर आंसू बहाने लगे थे। खैर जो भी हो उस दिन मेरा इतना मान-सम्मान हुआ कि मैं इतने वर्षों तक हुए मेरे तिरस्कार को भूल गया।


image_angry_sunकुछ दिन बीते सूरज ने फिर आग बरसाना शुरू कर दिया। मोहल्लेवासी मेरे घर के सामने खडे़ होकर मेरे उठने का इंतजार करने लगे। इतने में राधा आई और उसने अपनी मीठी आवाज से मुझको उठाया। मैं खुश था, बहुत खुश। इतने सालों में पहली बार मैं बिना पापा की लात और मम्मी की डांट खाए उठा था। और मुझे उठानेवाली कौन थी, मेरी भावी जीवनसंगिनी राधा। मेरे तो पांव ही जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। मैंने बाहर आकर देखा तो साहू आंटी, शर्मा आंटी, गुप्ता आंटी सब हाथ में समोसे, जलेबी, लस्सी लिए मेरे स्वागत के लिए खड़ी थी। मैं सोचने लगा कल तक अगर मैं इनके पेड़ से आम भी तोड़ लेता था तो मोहल्ला सिर पर उठा लेती थी और आज इतनी खातिरदारी, आखिर बात क्या है? साहू आंटी आगे आई और बोली- "बेटा उस दिन तुम्हारे गाने ने इंद्रदेव को प्रसन्न कर दिया था। तीन दिनों से फिर धूप ने कहर बरसाना शुरू कर दिया है। इसलिए हम लोगों ने इंद्रदेव प्रसन्नार्थ समिति बनाया है और तुम्हें इसका अध्यक्ष मनोनीत किया है।" मैंने सोचा, मैं और समिति का अध्यक्ष? आज तक मुझे किसी ने समिति का कार्यकर्ता तक नहीं बनाया और अब सीधा अध्यक्ष? मैं भावविभोर हो उठा। मैं एक भावपूर्ण भाषण देना चाहता था। लेकिन पता होता कि ये लोग मुझे अध्यक्ष बनाने वाले हैं कल रात को भाषण लिख लेता। खैर, अध्यक्ष होने के नाते मुझे कुछ तो कहना था, सो मैं गरजते हुए बोला- "देखिए, आप लोगों को फिक्र करने की जरूरत नहीं है। अब मेरी अध्यक्षता में इंद्रदेव के प्रसन्नार्थ सारे हवन, यज्ञ, भजन किए जाएंगे। बारिश होकर रहेगी, ये मेरा वादा है। अब चूंकि उस दिन मेरे साथ राधा भी गा रही थी इसलिए मैं अध्यक्ष तो राधा उपाध्यक्ष। " सभी लोग हां में सिर हिलाने लगे। दरअसल उनके पास कोई चारा भी नहीं था क्योंकि मुसीबत के समय तो गधे को भी बाप बनाना पड़ता है। rain3


चूंकि अब मैं अध्यक्ष था और हर अध्यक्ष का यह नैतिक कर्तव्य होता है कि अपनी अध्यक्षगिरी दिखाए। रौब जमाए, पैसे बनाए, चोंचले दिखाए वरना आम लोगों को कैसे पत चलेगा कि ये अध्यक्ष है। मैंने भी अपना कर्तव्य निभाते हुए पापा से पैसे मांगे, शाम को उनकी बाइक मांगी और वो इनकार न कर सके। शाम को बाइक पर राधा को डेट पर ले गया। रेस्त्रां गए, खूब पैसे उड़ाए पापा के जो थे और मम्मी ने अलग से भी दिए थे और अगले दिन सुबह साथ फिल्म देखने का भी प्लान बना लिया। इसी तरह एक सप्ताह मौज-मस्ती में बीत गए। इंद्रदेव का तो पता नहीं लेकिन राधा मुझसे जरूर प्रसन्न हो गई थी। मोहल्लेवाले सुबह सुबह फिर मेरे घर के सामने खड़े हो गए और कहने लगे- "बेटा, हफ्तेभर बीत गए तुमने न तो हवन चालू किया, न पूजा-पाठ। कैसे करोगे इंद्रदेव को प्रसन्न।" मुझमें भी अब तक अध्यक्ष के पूरे गुण आ चुके थे। मैं बोला- "देखिए, वो अध्यक्ष ही क्या जो तुरंत काम कर दे, वो कार्यकर्ताओं का काम होता है। अध्यक्ष तो आराम से काम करते हैं।" इतने में एक चाचा निकल आए और बोले, बेटा आज कम से कम मेंढक-मेढकी की शादी ही करा दो। मैंने कहा ठीक है, ठीक है।


frogअब मैं मेंढक-मेंढकी ढूंढने के लिए निकल पड़ा। अब चूंकि मेंढक शहर में तो मिलने से रहे इसलिए मैं जंगल की ओर निकल प़डा और राधा से शादी की तैयारियां करने को कह गया। दोपहर से शाम हो गई लेकिन मेंढक-मेंढकी नहीं मिले। आखिर एक जगह मैंने मेंढक-मेंढकी देखे, एक सांप उनका शिकार करने की फिराक में था। जैसे ही सांप उन पर झपट्टा मारने लगा मैंने मेंढक-मेंढकी को हाथों में उठा लिया। सांप को अपना निवाला इस तरह छिनता देख बड़ा गुस्सा आया। उसने फुंकार भरी और मेरे पैर में डस दिया, मैं मेंढक-मेंढकी को हाथ में लिये वहीं गिर पड़ा। मैंने फिल्मों में देखा था कि सांप डसने के बाद कोई गांव की लड़की आती है और हीरो के पैर से जहर निकालती है। बस मैं भी उसी अवस्था में पड़ा रहा आदिवासी कन्या के इंतजार में जो मेरे पैर से सांप का जहर निकालेगी। आधे घंटे बीते, एक घंटा बीत गया लेकिन कोई नहीं आई। हमारे हाथों में जकड़े मेंढक-मेंढकी भी सोचने लगे कि ये किस निखट्टू से पाल पड़ गया, इतने देर में तो ये घर पहुंच गया होता। इतने में शेर के गुर्राने की आवाज आई, मैंने आव देखा न ताव बस घर के लिए दौड़ लगा दी। वैसे मुझे संशय है कि वो शेर की ही आवाज थी। जैसे-तैसे मैं अपने मोहल्ले पहुंचा। झट से मेंढक-मेंढकी को तैयार किया और शादी कराने लगे लेकिन इतने में ही चाचा ने आकर अड़गा डाल दिया। कहने लगे "अरे मनहूस, ये क्या कर रहा है। तू तो मेंढकों की शादी करा रहा है। ये दोनों मेंढक हैं।" पूरा मोहल्ला हंसने लगा। मुझे काटो तो खून नहीं। मैं संभला और बोला "अरे चाचा आपको ही मेंढकी की पहचान थी तो खुद की चले जाते।" इतना सुनते ही चाचा घर गए और मेंढकी को उठालकर ले आए। मेरे खून खौलने लगा। "अरे जब आपके पास मेंढकी थी तो मुझे जंगल में मरने के लिए क्यूं भेजा। मेरी तो जान पर बन आई थी।" मैं गुस्से के मारे चिल्लाने लगा लेकिन राधा का चांद सा मुखड़ा देखकर मेरा गुस्सा हवा हो गया।


अगले दिन कड़ी धूप में इंद्रदेव की आराधना करने का कार्यक्रम तय हुआ। सब लोगों को मेरे रूप में बकरा जो मिल गया था। इसलिए मुझे सुबह खूब खिलाया पिलाया गया और इसके बाद धोती पहनाकर चौक में कड़ी धूप में खड़ा कर दिया गया। और मुझे सख्त निर्देशित कर दिया गया कि चार घंटे मुझे इसी अवस्था में रहना है। अब क्या करें अध्यक्षगिरी हम पर हावी जो थी, हम मना न कर पाए। दोपहर के १२ बजे सूरज की तीखी धूप मुझ पर वार किए जा रही थी। नजर घुमाकर देखो तो सब के सब अपने घर में आराम फरमा रहे हैं। सब मुझे बलि का बकरा बनाकर घर में पकवान ठूंसने लगे। बंटी आइस्क्रीम खा रहा था, मोंटी बर्फ का गोला और रमेश मुझे क्रिकेट खेलने के लिए उकसाने लगा। मेरा तो मन किया कि ये आराधना-वाराधना छोड़कर भाग जाऊं मगर जैसे ही भागने की सोचता राधा खिडकी से मुस्कुराने लगती है मेरे विचार फिर बदल जाते। एक बड़ी साजिश के तहत राधा को खिड़की के पास बैठाया गया था ताकि मैं अपनी जगह से हिलूं नहीं। शाम के चार बज गए। इन चार घंटों में मेरे शरीर का रंग धूप से झुलसकर गेहूंए से लाल और फिर जलकर काला हो चुका था। अब बर्दाश्त की भी हद होती है। आखिर में मैं चक्कर खाकर वहीं गिर पड़ा। मैं अपेक्षा कर रहा था कि कोई तो आकर अपने प्रिय अध्यक्ष को उठाएगा लेकिन पूरा मोहल्ला दोपहर की नींद लेने में मस्त था, मेरी राधा भी। अंत में रेंगते-रेंगते मैं घर पहुंचा और जाते ही बिस्तर पर बिछ गया।


दो मिनट में आंख लग गई और मेरी "ड्रीम एक्सप्रेस" की गाड़ी शुरू हो गई। सपने में देखा कि मैं स्वर्ग में हूं, इंद्रदेव मेरे सामने खड़े हैं और मुस्कुरा रहे हैं। उनकी मुस्कुराहट ने मेरी खीझ को बढ़ा दिया और मैं चिल्ला पड़ा, "ये क्या इंद्रदेव, आपके चक्कर में मेरी हालत पतली हो गई है और आप मुस्कुरा रहे हो? अगर अच्छे से बारिश करा देते तो मेरी ये हालत न होती। यहां हमारा शहर सूखा पड़ा है और वहां आप राजस्थान में बाढ़ ला रहे हो। एक जगह भरपूर पानी और दूसरी जगह अकाल। बारिश के मौसम में बरसात नहीं होती और ठंड में बौछारें मार देते हो। आपका तो पूरा टाइमटेबल ही गड़बड़ाया हुआ है। दो-तीन महीने अच्छे से पानी गिरा दो, आप भी खुश हम भी खुश।" इंद्रदेव बोले, "मैं बारिश तो करवा दूं लेकिन पूरी पृथ्वी तो धूल और प्रदूषण से ढंकी हुई है और यहां से कुछ दिखाई ही नहीं देता। यहां से पानी छोड़ता हूं रायपुर के लिए और गिरता है राजस्थान में। कई बार तो एक ही जगह कई बार बारिश हो जाती है और कई जगह सूखे रह जाते हैं। मुझे तो तुम लोग दिखाई ही नहीं देते। अब इसमें मैं क्या कर सकता हूं, सब तो तुम लोगों का ही किया-धरा है। यकीन नहीं होता तो पलटकर देखो।" मैंने पलटकर देखा तो हक्का-बक्का रह गया। सचमुच पृथ्वी पर कुछ दिख ही नहीं रहा था। सिर्फ धूल और धुआं। फिर इंद्रदेव बोले "वैसे तो तुम निखट्टू हो लेकिन दिल के साफ हो, अगर तुम इस धुएं को हटा सकते हो तो बोलो, मैं तो बारिश करने के लिए अब भी तैयार हूं। " मैं निरुत्तर था। मेरा गला सूखने लगा। मैंने धीरे से कहा, "देखिए, पूरे धुएं को तो मैं नहीं हटा सकता लेकिन अपने तरफ से कोशिश कर सकता हूं। जैसे अब मैं गाड़ी का उपयोग नहीं करूंगा। हर हफ्ते पौधा लगाऊंगा, उसकी देखरेख करूंगा आदि।" rain4 इंद्रदेव मंद-मंद मुस्कुराए और बोले "जाओ अपने घर जाओ, बारिश शुरू हो गई है।" मैं सपने से जागा, देखा तो कल-कल की ध्वनि सुनाई दे रही थी। खिड़की खोलकर देखा तो सचमुच बारिश हो रही थी। मैं प्रफुल्लित हो उठा लेकिन सोचने लगा अगर इंद्रदेव से मेरी मुलाकात सपना नहीं सच थी तो मुझे अपने वादे को निभाना तो पड़ेगा।


अगले दिन मैं पौधारोपण की तैयारी करने लगा। तभी राधा आई और बोली बाइल निकालो, फिल्म देखने चलते हैं। मैंने कहा बाइक नहीं, रिक्शा से चलते हैं। rain6वो मुंह बिचकाते हुए बोली "रहने दो"। कुछ देर चुप रहने के बाद वह फिर बोली, "चलो तो फिर पास वाले गार्डन में चलते हैं।" मैंने कहा नहीं आज पौधारोपण करूंगा, तुम मेरे साथ चलोगी। वह बोली "नहीं, मैं घर जा रही हूं।" इसी तरह पूरा हफ्ता निकल गया। मैं अध्यक्ष से फिर निखट्टू की श्रेणी में आ चुका था। कल तक मेरी तारीफ में कसीदे पढ़ने वाले फिर से मुझ पर गालियों की परसात करने लगे थे। इंद्रदेव से किए वादे के अनुसार मैं पैदल भ्रमण ही करता था। इसी पैदल भ्रमण के दौरान मैंने राधा को उसके नए बायफ्रैंड के साथ बाइक पर देखा। दिल टूट गया, मैं हंसा और आसमान की तरफ देखते हुए बोला, "क्या इंद्रदेव ! आप तो खुश हो गए लेकिन आपके चक्कर में राधा हाथ से निकल गई। अब मुझ पर इतनी कृपा की है तो एक कृपा और कर दो बारिश के साथ-साथ एक अप्सरा भी मेरे लिए भेज दो।" तभी बादल गरजने लगे, शायद इंद्रदेव ठहाके लगा रहे थे। जोरदार बारिश होने लगी। एक स्कूटी आई और मुझसे टकरा गयी। मैं स्कूटी के ऊपर और स्कूटी वाली मेरे ऊपर। दो मिनट की सॉरी-वारी के बाद उसने अपना नाम बताया "मेघा"। मेघा को देखते ही मेरे दिल में गिटार बजने लगे। मैने आसमान की तरफ देखा और इंद्रदेव से बोला "थैंक यू इंद्रदेव, मेघा (बारिश) के साथ आपनी मेरी मेघा भेज ही दी।" खैर, उस मुलाकात में मेरा टांका मेघा के साथ भिड़ ही गया और कल मैं उस के साथ फिल्म देखने जा रहा हूं। लेकिन इस इंद्रदेव को प्रसन्न करने वाली घटना से मुझे सबक जरूर मिल गया। अब चाहे कोई भी कहे मैं इंद्रदेव प्रसन्नार्थ समिति का अध्यक्ष नहीं बनने वाला, बहुत भुगत चुका हूं। आप लोग बोलेंगे तब भी अध्यक्ष नहीं बनूंगा वरना ये मेघा भी पवन के साथ उड़ जाएगी।

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loveये प्यार भी बड़ी दिलचस्प चीज होती है। ये प्यार ही तो प्रेरणा देती है। शादी के पहले गर्लफ्रैंड प्रेरित करती है और शादी के बाद बीवी। जिंदगी में कुछ भी करने के लिए प्रेरणा की बहुत जरूरत होती है। और मुझे प्रेरित करती है मेरी प्रेमिका "यूपा"। "यूपा" का पूरा नाम है यूपीए सरकार। यूपा तो मैं उसे प्यार से बुलाता हूं (UPA= यूपा)। यूपीए उसका नाम है और सरकार उसका सरनेम। न..न..न... वो बंगाली नहीं है और न ही उसका जादूगर पी.सी.सरकार से कुछ रिश्ता-नाता है। हां, लेकिन वो जादूगरनी जरूर है। उसी के मोहपाश में तो बंधा हूं मैं। ऐसी है मेरी यूपा।


पहली बार मैंने उसे २००४ में देखा था। वो लहराती, बलखाती केन्द्र में आई थी। मैंने तभी उसे अपना प्रेमपत्र(वोट) दे दिया था। उस समय वो थोड़ी लंगड़ी थी। दरअसल उसका "लेफ्ट" पांव उसे बार-बार दगा दे जाता था। वो जब भी आगे बढ़ना चाहती उसका "लेफ्ट" पैर साथ छोड़ जाता। २००९ में उसने फिर से मुझे पुकारा और मदद मांगी। मैंने तब भी उसे अपना प्रेमपत्र दिया और लड़-भिड़कर दूसरों से भी दिलवाया। मैं इस बार यह पुख्ता करना चाहता था कि मेरी यूपा लंगड़ी नहीं रहेगी। और भगवान ने मेरी सुन ली। मेरी यूपा इस बार अच्छे से चलने-फिरने लायक थी। हालांकि वो अब भी बैसाखियों के सहारे थी लेकिन पहले से स्थिर थी। मैंने मोहल्ले में मिठाई बंटवाई। लोग मुझे पागल कहते थे लेकिन क्या करें दिल तो बच्चा है जी, प्यार दीवाना होता है और हम दिल दे चुके सनम।


जमाना प्यार का दुश्मन होता ही है। हमारे भी दुश्मन कम न थे। लोग हमारे सामने यूपा की बुराई करते तो हमारा खून खौल उठता था। हमारे पिताजी भी यूपा को ताने मारते। पापा तो वैसे भी प्यार-व्यार के खिलाफ होते ही हैं। कल जब मैं दोपहर को सो रहा था तब मैंने लोगों के चिल्लाने की आवाज सुनी। बाहर निकलकर देखा तो लोग पेट्रोल की बढ़ी कीमतों के विरोध में हमारी यूपा का पुतला जलाने और उसका घेराव करने निकले थे। हमारे तन-बदन में आग लगाई। हमारे रहते कोई हमारी यूपा का घेराव करे। हमने एक कार्यकर्ता को बुलाकर पूछा कि ये क्या कर रहे हो। कार्यकर्ता कड़क आवाज में बोला- इस दुनिया के हो कि कहां के हो, दिख नहीं रहा हम सरकार का पुतला जलाने जा रहे हैं। इतना सुनना था कि हमारा पारा चढ़ गया, मैंने मुटठी बांधी एक जोरदार मुक्का उस कार्यकर्ता के मुंह पर जमा दिया। वो कार्यकर्ता वहीं ढेर हो गए। हम बाहें खोलकर अपनी विजय का जश्न मनाने लगे। लेकिन इतने में ही उसके चार-पांच साथी ने आकर हमारी हड्डी-पसली एक दी। हम कराहते पर हुए फिर बिस्तर पर पड़ गए।


हम समझ गए कि ये दुनिया हमारे प्यार को कभी नहीं समझ सकेगी। अरे भाई यूपा हमसे बहुत प्यार करती है और हमारे स्वास्थ्य को लेकर चिंतित रहती है। इसलिए जब हम तोंदियल होने लगे तो उसने हमारी स्वास्थ्य की खातिर अनाजों, सब्जियों, तेल के दाम बढ़ा दिए ताकि हम कम खाए। हम लाख प्रयास के बाद भी जब खुद को कम खाने के लिए प्रेरित न कर सके तो मजबूरी में यूपा को अनाज के दाम बढ़ाने ही पड़ गए। पर लोग ये प्यार कहां समझेंगे। कुछ दिनों से हम कुछ ज्यादा ही आरामपरस्त हो गए थे। हम लाख सोचते कि वॉक पर जाया करेंगे पर नहीं जा पाते। कल-कल करते महीने बीत गए लेकिन हम वॉक पर नहीं गए। ऐसे समय में हमारी यूपा को फिर कड़ा कदम उठाना पड़ा हमारे स्वास्थ्य के लिए। उसने पेट्रोल, डीजल के दाम बढ़ा दिए ताकि अब हमें पैदल चलना पड़े और हम फिर से चुस्त-दुरुस्त हो जाएं और साथ ही रसोई गैस के दाम भी बढ़ा दिए ताकि हम कम खाएं। क्या एक प्रेमिका को अपने प्रेमी का ख्याल रखने का हक नहीं है। वो जब भी हमें प्यार करती है, लोग उसका तिरस्कार करते है, हाहाकार करते हैं। लोगों के इस रवैये ने हमें दुखी कर दिया है। हमारे घरवाले भी यूपा को बुरा-भला कहते रहते हैं।


हाल में जब एंडरसन मुद्दा उठा तो लोगों ने कहा कि यूपा आखिर एंडरसन को वापस क्यूं नहीं लाती। तब हमने कहा कि यूपा संस्कारी और गुणी है। वो अतिथि देवो भवः में विश्वास रखती है। अब एंडरसन बाहर से आया था अर्थात अतिथि था, इसलिए अगर यूपा ने उस अतिथि को सकुशल उसके देश भेज दिया तो क्या बुरा किया। अतिथि देवो भवः का पालन करना पाप है क्या। अब जबकि अफजल और कसाब अब तक फांसी से बचे हुए हैं तो फिर कुछ लोगों ने सवाल उठाना शुरू कर दिया कि यूपा ऐसा क्यों कर रही है, वो उनको फांसी क्यों नहीं देती। मैंने उनको समझाने की कोशिश की और कहा कि मेरी यूपा बहुत सहृदयी है, वह पापी को नहीं पाप को खत्म करने में यकीन रखती है। शायद वो इंतजार कर रही है कि अफजल और कसाब के अंदर के शैतान खत्म हों। तो भी उन लोगों ने मेरी बात नहीं मानी और लगे धरना-प्रदर्शन करने।


loverboyलोग मुझे अब ये कहकर परेशान करने लगे हैं कि अगर ऐसा ही हाल रहा तो २०१४ के बाद यूपा वापस नहीं आएगी। मगर मैं भी सच्चा प्रेमी हूं मैं तब बड़ी संख्या में घूम-घूमकर अपनी यूपा के लिए प्रेमपत्र (वोट) इकट्ठे करूंगा और उसे मरने से बचाउंगा। मेरे दोस्त मुझे कहते हैं कि जब तू यूपा से इतना ही प्यार करता है तो राजनीति में उतरकर उसके पास दिल्ली क्यूं नहीं चला जाता है। मैंने कहा जिस दिन मैं राजनीति में उतर गया, उस दिन यूपा के लिए मेरा प्यार खत्म हो जाएगा, क्यूंकि ये राजनीति बड़ी बुरी चीज है। राजनीति में उतरते ही मेरी प्रेमिकाएं बदल जाएंगी, तब कभी राजग मेरी प्रेमिका बन जाएगी, तो कभी सपा, राजद क्योंकि राजनीति में टिके रहने के लिए मौकापरस्त होना बहुत जरूरी है। और क्या सच्चे प्रेमी मौकापरस्त हो सकते हैं, आप ही बताइए? इसलिए मैंने तय कर लिया है चाहे आप लोग कुछ भी बोले, मैं यूपा से प्यार करना नहीं छोड़ूंगा और यूपाधुन जपता रहूंगा। आईलवयू यू..यू..यू..यूपा।
'टिप्पणी' वैसे तो है बहुत छोटा सा शब्द लेकिन अपने में जैसे पूरे संसार को समेटे हुए है। एक समय लोग टिप्पणी से दूर भागा करते थे। लोगों द्वारा की गई टिप्पणियां रास नहीं आती थी लेकिन अब जमाना बदल गया है । आधुनिक युग है, ट्विटर और ब्लॉगिंग का जमाना है, टिप्पणियों का खजाना है। अगर आप पर टिप्पणी नहीं होती मतलब आपके फालोवर्स नहीं यानी कोई पूछ-परख नहीं। मतलब साफ है आप जमाने के साथ नहीं बल्कि सालों पीछे चल रहे हैं। अब बेचारे प्यारेलालजी को ही ले लीजिए। ये दस वर्ष पहले कवि थे, साहित्यकार थे, रचनाकार थे। इन्होंने एक से बढ़कर दर्दीले शायरी, रसहीन कविताएं, बेसिर-पैर की कहानियां लिखी लेकिन किसी ने इनकी कद्र नहीं की। लिखने के इनके नैसर्गिक गुण की इस तरह अवज्ञा होते देख इनका दिल पीड़ा से भर उठता था। कोई एक टिप्पणी ही कर देता, तारीफ के दो शब्द ही कह देता इनका दिल बाग-बाग हो जाता, लेकिन इस निष्ठुर समाज ने इनके दिल के बाग को बसने ही नहीं दिया। प्यारेलालजी नित नए जुगाड़ करते अपनी कविताएं पढ़वाने के- कभी दोस्तों को बार में टल्ली होते तक पिलाते ताकि उन्हें श्रोता मिल सके लेकिन दोस्त टल्ली होकर वहीं सो जाते और कोई श्रोता न बचता। कभी वेटर को टिप देने के बहाने अपनी कविता झेलाने की कोशिश करते लेकिन वह भी चपल चीते की तरह टिप लेकर फरार हो जाता। इसके बाद प्यारेलालजी ने दूसरा पैंतरा अपनाया। अब वे मंदिर में भजन के बहाने जाने लगे और धीरे से अपनी कविताएं की पर्चियां बंटवाने लगे लेकिन लोगों ने इसे भगवान की छपवाने की चिट्ठियां (वही ५१ लोगों को यह पर्ची बांटो वाली चिट्ठियां) समझकर लेने से इनकार कर दिया। बेचारे प्यारेलालजी यहां भी उनको टिप्पणीविहीन रह गए। अब वे घर के पास चौक में खड़े होकर श्रोता पकड़ने लगे। हर आने-जाने वाले से जबरदस्ती बात करते और बीच में अपनी एक कविता उसको चिपका देते। लोगों ने इनके खौफ से उस गली में घुसना बंद कर दिया। हर गली में इन चिपकू कवि महोदय के पोस्टर चस्पा दिए गए कि इनसे बचकर रहें ये प्राणघातक और समयनाशक कवि हैं, ये कहीं भी, कभी भी आपको पकड़ सकते हैं। अंत में प्यारेलालजी ने घर में ही श्रोता तलाशने शुरू कर दिए बीवी, बच्चों और मेहमानों तक को नहीं बख्शा पर यहां भी उन्हें टिप्पणी नसीब नहीं हुई। आखिर में जब इनकी श्रीमतीजी ने इनको तलाक की धमकी दी तब कहीं जाकर ये माने और दस वर्ष पहले साहित्य जगत से संन्यास लेकर साहित्य और लोगों दोनों को राहत दी।


लंबी शांति आने वाले तूफान का संकेत होती है।  दस साल तक अपने मुंह और हाथ को बांधकर रखे प्यारेलाल जी के अंदर का लेखक जोर मारने लगा था। वे एक बार फिर अपने विचारों से समाज को हिला देना चाहते थे। लेखक प्यारेलाल नामक तूफान बस आने ही वाला है। मगर कैसे? ये यक्ष प्रश्न प्यारेलालजी के सामने आ खड़ा हुआ।  टिप्पणी प्राप्त करने के पुराने सारे पैंतरे फेल हो चुके थे। अगर इस बार भी एक भी टिप्पणी हासिल नहीं हुई तो जीवन निरर्थक हो जाएगा। इसलिए उन्हें वर्तमान तकनीकी युग में तकनीक से हाथ मिलाया। झट से एक कम्प्यूटर खरीद लाए और कवि-लेखक का चोला उतारकर ब्लॉगर का चोला पहन लिया। वैसे 'ब्लॉगर' बोलने में भी बड़ा स्टायलिश लगता है, है ना। तो मैं बात कर रहा था प्यारेलालजी की। उन्होंने झटपट अपना ब्लाग बनाया और एक पोस्ट लिख दिया। अब बारी थी उस सुनहरे पल की 'टिप्पणी' की।' लेकिन टिप्पणी तो तब आएगी ना जब किसी को पता होगा कि इन्होंने आज ब्लाग पर तूफान मचाया है। इसलिए इन्होंने प्रचार की शुरूआत घर से की और रसोई में खाना बना रही श्रीमतीजी को जबर्दस्ती अपना ब्लाग पढ़वाने लगे। वहां रसोई में खाना जल रहा था इसलिए श्रीमतीजी ने बिना पढ़े ही टालने के मकसद से 'अच्छा लिखा है' कहकर फिर रसोई में चली गई। प्यारेलालजी को पहली टिप्पणी मिल ही गई पर मन अब भी असंतुष्ट था।  जैसे चातक पक्षी की प्यास सिर्फ मेघ की बूंदों से बूझती है उसी तरह एक सच्चे ब्लागर की टिप्पणियों की प्यास सिर्फ टाइप किए गए टिप्पणियों से ही बुझती है। मुख से की गई टिप्पणियां यह प्यास नहीं बुझा सकती। लिखित टिप्पणी होने से लोगों को साबित किया जा सकता है कि 'देखिए, हमारे लेख भी पढ़े जाते हैं नेट पर'। इसीलिए अब उन्होंने जबरन अपने पाठक बनाने शुरू कर दिए। उन्होंने घर की आयाबाई, दूधवाला, धोबी से लेकर वॉचमैन तक के ईमेल आईडी बना दिए और उन्हें कम्प्यूटर सिखा दिया ताकि उनके पोस्ट पर कम से कम इनकी टिप्पणियां तो आ ही जाएंगी। लेकिन हाय री किस्मत! ये लोग भी एहसानफरामोश निकले। किसी ने भी टिप्पणी नहीं की। आयाबाई बस आरकुटिंग करती रहती, धोबी मैट्रीमोनी साइट सर्च मारता रहता और वाचमैन तो इससे भी बढ़कर पोर्न साइट्स में डूबा रहता। किसी को इतनी भी फुर्सत नहीं कि प्यारेलाल जी का दुख समझे और टिप्पणी देकर उनके सूने ब्लाग को हरा-भरा कर दे।

ब्लागर को ढीठ होना चहिए। और प्यारेलालजी भी कम ढीठ नहीं थे। उन्होंने अपने ब्लाग को प्रचारित करने का दूसरा तरीका खोज निकाला। उन्होंने चिट्ठियों में अपना ब्लाग एड्रेस लिखकर मोहल्ले की सभी छतों पर फेंक दिया। पड़ोस के पहलवान की पत्नी ने वह चिट्ठी उठाकर अपने पति को दे दी। अब पहलवान तो था अनपढ़ उसने उसे प्रेमपत्र समझा और जाकर प्यारेलालजी के चेहरे का नक्शा बिगाड़ दिया। प्यारेलालजी टूटी-फूटी हालत में घर पहुंचे।

इधर प्यारेलालजी व्यग्रता के मारे प्रतिपल अपने ब्लाग को इस उम्मीद से रिफ्रेश करते कि कभी तो पाठक मिलेंगे और टिप्पणियों की बारिश होगी जिससे उनके लेखन की फसल लहलहाएगी। लेकिन यहां तो मामला ही उल्टा था, टिप.. टिप.. करके भी टिप्पणियां नहीं बरस रही थी। टिप.. टिप.. टिप.. टिप.. टिप्पणी की एक बूंद ही मिल जाए, प्यारेलालजी के मन में बस यही बात सालती रहती। वे यही सोचते- कोई तो मिलेगा जो गलती से ही सही पर मेरा ब्लाग पढ़ेगा। बाकी ब्लागर्स के समय लोग यह गलती कर देते हैं पर मेरे समय ही लोग सुधर जाते हैं। वे अपने आपको कोस ही रहे थे कि तभी ब्लाग में एक बेनाम टिप्पणी टिप..टिप.. करते हुए आई। प्यारेलालजी की आंखें चमक उठीं। उन्होंने टिप्पणी पढ़नी शुरू की। टिप्पणी में लिखा था- "क्या पकाऊ लेख लिखा है। पकाकर काला कर दिया। आज मैं अपनी प्रेयसी से प्रणय निवेदन करने जा रहा था लेकिन तुम्हारे पकाऊ लेख ने पूरा मूड बिगाड़ दिया।" ऐसी टिप्पणी पढ़कर प्यारेलालजी गुस्से के मारे लाल हो गए। वे सोचने लगे कि ऐसी  गंदी टिप्पणी कौन कर सकता है। उनका पहला शक मोहल्ले के मजनूं शायर "आशिक आवारा" पर गया क्योंकि वही रोज किसी न किसी से प्रणय निवेदन करता है और सैंडलें खाता है। पर उनके मन में एक खुशी थी। आज पहली बार उन्होंने टिप्पणी की बूंद को चखा था। कड़वी ही सही पर टिप्पणी तो मिली। ये सोचकर मंत्रमुग्ध हो रही रहे थे कि दूसरी टिपपणी भी आ गई। वे खुशी के मारे दोहरे हो गए। टिप्पणी में लिखा था- "ब्लागिंग से जी भर गया हो तो अब थोड़ा भोजन से पेट भर लो। टेबल पर खाना लगा दिया है।" ये टिप्पणी उनकी श्रीमतीजी ने किया था। प्यारेलालजी विस्मयभरी नजरों से अपनी पत्नी को देखने लगे और बोले, "तुमने ये टिप्पणी कैसे कर दी, कम्प्यूटर पर तो मैं बैठा हूं"। श्रीमती बोली- "दरअसल मैंने भी चुपके से लैपटॉप लेकर ब्लागिंग शुरू कर दी थी। काम भी करती गई और ब्लागिंग भी। ये देखिए मेरा ब्लाग।" प्यारेलालजी हतप्रभ से अपनी श्रीमतीजी को देखने लगे। फिर जब उन्होंने अपनी श्रीमतीजी का ब्लाग देखा तो चकरा गए। हर पोस्ट पर पूरे मोहल्ले की ४०-५० टिप्पणियां थीं। वे वहीं ढेर हो गए। श्रीमतीजी के ब्लाग पर टिप्पणियों की बारिश और हमारे ब्लाग पर टिप्पणी के छींटे भी नहीं। लेकिन इससे प्यारेलालजी को एक और आइडिया मिल ही गया। अब उन्होंने प्यारे से प्यारी बनने की ठान ली। म.. म..मतलब.. अब उन्होंने प्यारी के नाम से नया ब्लाग बनाने की सोची, कम से कम अब तो टिप्पणियां आएंगे ही और मैं चाहे कितना ही पकाऊ लेख लिख लूं, लड़के उसकी तारीफ जरूर करेंगे।
वैसे आप भी टिप्पणी और सुझाव देकर प्यारेलालजी की मदद कर सकते हैं। उनका ब्लागएड्रेस है- http://pareshanpyarelal.blogspot.com। आप मदद करना चाहेंगे?
लो, गई भैंस पानी में। पूरी मेहनत पर पानी फिर गया। घोटाले, धौंसबाजी, घपले, आपराधिक कृत्य करके जितनी भी इज्जत बनाई थी, सब धूमिल हो गई। पार्टी में जो नेता पहले सीना तानकर धौंस जमाते हुए चला करते थे, आज गर्दन झुकाए सभाकक्ष में जा रहे हैं। दरअसल ये सब पायरेटड नेता मतलब पायरेटड सीडी देखते पकड़ाए नेता। और इनको इनके टुच्चे कारनामे के कारण पार्टी ने इन्हें बैठक के लिए दिल्ली बुलाया है।

neta cartoonचुनावों में क्रासवोटिंग के डर से इनकी नेत्री ने ७५ विधायकों को एक होटल में छुपाया था और वहां उनके मनोरंजन के लिए 'राजनीति' फिल्म उनको दिखा दी वो भी पायरेटड सीडी से। बस यहीं से सारी आफत शुरू हुई। इन नेताओं को क्रासवोटिंग के डर से होटल में छुपाया गया था पर पायरेटड सीडी कांड के बाद तो ये क्रासवोटिंग तो क्या वोटिंग करने से भी कतरा रहे हैं। दरअसल जब से इन्होंने ये टुच्चा कारनामा किया है पूरी नेता बिरादरी में इनकी जंग हंसाई हो रही है। ये कहीं बाहर आने-जाने लायक नहीं रहे। सबसे मुंह छिपाए फिर रहे हैं। अरे भई, पकड़ाना ही था तो घोटाले में पकड़ाते, हत्या, अपहरण में पकड़ाते मगर यह क्या पायरेटड सीडी देखते पकड़ा गए। पूरे राजनीतिक जगत में थू-थू हो रही है। पूरा मार्केट वैल्यू नीचे गिर गया। कल तक जो पार्टी के छोटे-मोटे कार्यकर्ता गर्दन झुकाकर इनके पैरों में पड़े रहते थे, आज इन्हें 'पायरेटड', 'पायरेटड' कहकर चिढ़ा रहे हैं। इनके ऊपर १०-२० एसएमएस चुटकुले तो इन कार्यकर्ताओं ने खड़े-खड़े बना दिए। पार्टी का रिवाज है कि जो नेता जिस कांड में पकड़ाएगा उसका 'निक नेम' उसी आधार पर रख दिया जाएगा। जैसे कोई नेता डामर घोटाला में पकड़ाया तोउसका निकनेम हुआ 'डामर, पानी घोटाले वाले नेता का 'पानी' आदि। अब ये नेता पायरेटड सीडी देखते पकड़ाए हैँ इसलिए इनका निकनेम पड़ गया 'पायरेटड'।
इसलिए इन 'पायरेटड' नेताओं को राष्ट्रीय अध्यक्ष ने दिल्ली बुलाया है इस घटना पर सफाई देने के लिए। इन नेताओं की नेत्री भी इन लोगों के साथ आई है। (बैठक शुरू होती है)
राष्ट्रीय अध्यक्ष नेत्री से- "ये क्या किया आप लोगों ने, पार्टी की भद्द पिटवा दी। रुके थे पांच सितारा होटल में और वहां ऐसा गैर सितारा काम कर दिया। तुम्हारे इस टुच्चे कारनामे ने पूरी पार्टी की चमक फीकी कर दी। अरे किसी बड़े मामले में फंसते तो किसी को भिड़ाया जाता, इसी बहाने पार्टी को कुछ काम तो मिलता, वैसे ही खाली बैठे रहते हैं लेकिन इस टुच्चे कांड के लिए जुगाड़ लगाने में भी शर्म आ रही है। अरे हम राष्ट्रीय पार्टी हैं, कोई छोटे-मोटे टुच्ची पार्टी नहीं पर तुम लोगों ने पायरेटेड सीडी देखकर पार्टी की इज्जत मिट्टी में मिला दी। अरे जब पांच सितारा होटल में विधायकों को छुपा सकती हो तो इन्हीं किसी मल्टीप्लेक्स ले जाकर फिल्म नहीं दिखा सकती।"
नेत्री- "मैं क्या करती। वैसे ही सत्ता से बाहर हैं, पार्टी में फंड की भी कमी है इसलिए पायरेटड सीडी से काम चला लिया।"
राष्ट्रीय अध्यक्ष- "अच्छा, पांच सितारा होटल में रुकने का पैसा है लेकिन मल्टीप्लेक्स जाने का नहीं। "
नेत्री- "अध्यक्ष महोदय, पार्टी फंड अभी खस्ताहाल है, जब हम सत्ता में थे तभी उस होटल में पहले से ही एडवांस राशि जमा करा दी थी भविष्य के लिए। हमें पता था हम सत्ता के भले ही बाहर हो जाएं लेकिन होटलवाले हमको बाहर नहीं कर पाएंगे। इसलिए होटल में पैसा नहीं देना पड़ा।"
राष्ट्रीय अध्यक्ष- "एक तो सत्ता से बाहर हैं, कोई मुद्दा भी नहीं मिल रहा था जिसे उछालें। अभी-अभी एंडरसन मामले पर कांग्रेस को घेर ही था। पार्टी की मार्केट वैल्यू बढ़ ही रही थी कि तुम लोगों के टुच्चे कारनामे ने पूरा वैल्यू डाऊन कर दिया। कल की ही बात ले लो। अगले हफ्ते रैली निकालकर केन्द्र सरकार का पुतला जलाने का का र्यक्रम है तो सोचा कि थोक के भाव पुतले ले लेते हैं। लेकिन पुतले वाले ने पुतले देने से इंकार कर दिया, कहने लगा हम छोटी-मोटी पार्टियों को पुतला नहीं देते। मैंने कहा कि हम राष्ट्रीय पार्टी हैं तो वो कहने लगा कि जिस तरह के प्रकरण में तुम्हारे पार्टी के नेता पकड़ाए हैं, वैसे प्रकरण में छोटी-मोटी पाटी के नेता पकड़ाते हैं। राष्ट्रीय पार्टी के नेता पायरेटड सीडी में फिल्म नहीं देखते बल्कि खुद का मल्टीप्लेक्स बनवा लेते हैं या फिर पूरी फिल्म ही बनवा लेते हैं। "
(अध्यक्ष पायरेटड नेताओं की तरफ मुखातिब होते हुए) "देखा तुम लोगों ने तुम लोगों के कारण पुतले वाले तक हमको भाव नहीं दे रहे ।"
(एक पायरेटड नेता बीच में बोल पड़ा) "हम क्या करें, होटलवालों ने ही हमको पायरेटड सीडी दे दी।"
राष्ट्रीय अध्यक्ष (गुस्से में)- तुम तो चुप ही रहो। ये आइडिया तुम्हारा ही होगा क्योंकि तुम ही कंजूस हो और डुप्लीकेट चीजें रखते हो। चाइना मोबाइल, सेकंड हैंड गाड़ी, सालों पुरानी घड़ी। तुम तो नेता के नाम पर कलंक हो। नेता को अपव्ययी होना चाहिए मितव्वययी नहीं। तुम तो कार्यकर्ता बनने लायक भी नहीं हो।
(इतने में एक वरिष्ठ नेता बोलता है) "मुझे तो लगता है कि इसमें विरोधी पार्टियों की चाल है। उन्हीं लोगों ने पायरेटड सीडी भिजवाई होगी और फिर इन लोगों को पकड़वा दिया ताकि इस टुच्चे प्रकरण में फंसकर हमारी पार्टी की "रेपोटेशन" खराब हो। या फिर हो सकता है कोई घर का भेदी हो, मतलब भीतरघात की आशंका। अध्यक्ष महोदय, मैं इस भीतरघात के जांच की मांग करता हूं और यदि ये काम विरोधी दल का है तो कार्यकर्ताओं से आह्वान करता हूं कि विरोधी दलों के घरों में थोक के भाव पायरेटड सीडी भिजवा दें।" (इतना सुनते ही कार्यकर्ता बाजार की तरफ दौड़ पड़ते हैं पायरेटड सीडी लेने और इसके बाद  बैठक को खत्म कर दिया जाता है।)
(कुछ देर बाद पायरेटड सीडी प्रकरण से व्यथित "राजनीति" फिल्म के निर्देशक प्रकाश झा सभा कक्ष में आते हैं। सभाकक्ष में उस समय बैठक खत्म होने के बाद सारे नेता नाश्ते का मजा ले रहे हैं।)
प्रकाश झा- "मैं आप लोगों के द्वारा पायरेटड सीडी में फिल्म देखने से दुखी हूं। जब कानून बनाने वाले ही कानून तोड़ेंगे तो देश का क्या होगा?"
सभी नेता एक स्वर में- "आप गलत कह रहे हैं। सबसे पहले बात तो कानून हमने बनाया ही नहीं, वो पहले से बना हुआ है। और दूसरी बात कानून चाहे बने या टूटे देश जैसा है वैसा ही रहने वाला है। यहां हजार लोगों को मौत के हवाले करके एंडरसन जैसे लोग साफ बच जाते हैं फिर हमने तो बस पायरेटड सीडी में फिल्म देखी है और आप इस पर इतना हल्ला मचा रहे हैं।"
(प्रकाश झा निराश होकर वापस लौट जाते हैं लेकिन तभी एक हल्की सी मुस्कान उनके चेहरे पर आती है क्योंकि उनको अपनी अगली फिल्म का विषय जो मिल गया है- "भोपाल गैस हादसा।" फिल्म के किरदारों का खासा मन में तैयार करते हुए वे पार्टी कार्यालय से बाहर निकल जाते हैं)