dead ladyचारों तरफ एक अजीब सी शांति है। लोगों को आना-जाना लगा हुआ है। मंत्रीजी के निवास पर वैसे तो रोज ही आगंतुकों की भीड़ लगी रहती है लेकिन आज इतनी भीड़ के बाद सन्नाटा पसरा है। दरअसल मंत्रीजी की मां का कुछ ही दिनों पूर्व निधन हुआ। आज उनकी याद में शोकसभा आयोजित की गई है। एक के बाद एक लोग आकर माताजी की फोटो के सामने रोकर दुख प्रकट कर रहे हैं और कुछ मंत्रीजी को ढांढस बंधा रहे हैं। अमूमन मगरमच्छ के आंसू बहाने वाले मंत्रीजी की आंखें आज सचमुच नम हैं। उनके पीछे उनके समर्थक भी दहाड़ मार-मारकर रो रहे हैं।


उधर उनका एक समर्थक राजू जैसे ही अपने घर से शोकसभा में जाने के लिए निकला, पीछे से बीवी ने आवाज दी- "अजी, कहां जा रहे हो? माताजी की तबीयत खराब है जरा डॉक्टर को दिखा दो, कल रात से ही खांस रही हैं।" वह चिढ़ता हुआ बोला- "कितनी बार कहा है अच्छे काम से जा रहा हूं तो पीछे से टोका मत करो। ऐसा करो घर में कोई दवाई रखी हो तो मां को खिला दो। शोकसभा से आते ही उन्हें डॉक्टर के  पास ले जाऊंगा। मेरा अभी शोकसभा में जाना बहुत जरूरी है। चुनाव नजदीक हैं, दुख के वक्त मंत्रीजी के साथ रहकर उनकी नजरों में चढ़ना जरूरी है तभी तो पार्टी समिति में कोई अच्छा पद मिलेगा। कब तक यूं ही कार्यकर्ता बना रहूंगा। अब जाओ अंदर।" इतना सुन बीवी इतना अंदर चली गई और दवाई खोजने लगी। दौड़ता-दौड़ता राजू शोकसभा में पहुंचा। जैसे ही पहुंचा भीड़ को देखकर उसकी आंखें फट गईं। यहां तो रोने वालों की लाइन लगी थी। उसका नंबर आते तक कितने ही कार्यकर्ता से सचिव बन जाएंगे और वो कार्यकर्ता का कार्यकर्ता ही रह जाएगा। मंत्रीजी के पीछे टोली बनाकर कार्यकर्ता कोरस में गा रहे थे। उस टोली में श्याम, रवि और किशोर भी थे जिन्होंने उसे कल रात भर दारू पिलाकर टल्ली किया और मंत्रीजी को मक्खन लगाने की जुगत में खुद सुबह सुबह खुद शोकसभा में पहुंच गए। उन तीनों को देख राजू का पारा चढ़ने लगा था। पर वो अब क्या करता इस भीड़ के छंटने का इंतजार भी नहीं किया जा सकता था क्योंकि तब तक मंत्रीजी कितनों के मक्खन में पूरी तरह फिसल चुके होते। इसी पशोपेश में उसे एक तरीका सूझा। उसने दो कदम पीछे लिए और यूसेन बोल्ट का रिकार्ड तोड़ते हुए मेन गेट से माताजी की फोटो तक की दूरी मात्र ८ सेकंड में पूरी कर ली। इसी फर्राटा दौड़ के दौरान उसने कितनों की साडि़यों पर कीचड़ छींटे और कईयों के कुर्ते मैले कर दिए लेकिन इन सबके की परवाह न करते हुए वह सीधा माताजी के फोटो के सामने आकर रुक गया। उसकी एक्सप्रेस गति से माताजी की फोटो भी हिल गई और पास में लगे नारियल और अगरबत्ती भी। किसी तरह उसने अगरबत्ती और नारियल को व्यवस्थित रखने की कोशिश की और फिर गला फाड़-फाड़कर रोने लगा। रोते-रोते वह उन कार्यकर्तां की टोली की तरफ भी देखने लगा, शायद यह जताना चाह रहा था कि "जाओ तुम लोग सिंगल-सिंगल रन लो मैंने तो सीधा छक्का मार दिया है"।

तभी मंत्रीजी आए और उसे उठाते हुए धीरे से कान में बोले- "तुम्हें दुख है मुझे पता है लेकिन जाते हुए मेरे साले से जरूर मिलते जाना। अपनी फर्राटा दौड़ के दौरान तुमने उसके कुर्ते और उसकी पत्नी की साड़ी पर जो कीचड़ की पेंटिंग की है, उसका इनाम देने के लिए वो तुम्हारा इंतजार कर रहा है।" यह सुनकर राजू का गला सूख गया। छुपती नजरों से उसने गेंडे जैसे मंत्रीजी के साले को देखा जिसकी आंखें गुस्से से लाल थी। यह सब देख कार्यकर्ताओं की टोली धीरे से मुस्कुराई और फिर पहले की तरह अपनी रुदाली एक्सप्रेस शुरू कर दी। यह टोली रोने में रुदालियों को भी मात दे रही थी। उस टोली को पता था कि सिंगल-सिंगल लेकर अर्धशतक बनाने में ही समझदारी है, राजू की तरह छक्का मारने पर कैच आउट होने का डर है।

rotlu netaरोने का यह सिलसिला चल ही रहा था कि अचानक गेट के पास बड़ी भीड़ दिखाई दी। कुछ ही महीनों पहले अनुशासनहीनता के कारण पार्टी से निष्कासित नेता राममुरारी अपनी समर्थकों के साथ शोकसभा में शामिल होने आए। सफेद कुर्तेधारियों से घिरे रामुरारी मोटी-मोटी आखों से अश्रुधारा बहाते हुए उपस्थित हुए। राममुरारी की मोटी-मोटी अश्रुधाराओं ने उनकी मोटी-मोटी मूंछों को भींगा दिया था। अपने आंसू पोछते हुए वे मंत्रीजी की तरफ बढ़े और कंधे पर हाथ रखते हुए बोले- "मंत्रीजी की माताजी के आकस्मिक देहांत से मुझे बहुत दुख हुआ है। मैंने नहीं सोचा था कि वे इस तरह हमें छोड़कर चली जाएंगी। ये अवसाद का पल है। मंत्रीजी को माताजी के जाने का बहुत दुख है। पर असल बात तो यह है कि मंत्रीजी की माताजी इनकी मां नहीं थी, वो मेरी मां थी।" इतना सुनते ही मीडियावालों के कैमरे, माइक और डायरियों ने रामुरारी की तरफ रुख कर दिया। राममुरारी की तरफ से किसी विस्फोटक रहस्योद्गाटन की आस में मीडिया पलके बिछाए खड़ी थी। तभी आंख और नाक पोछते हुए राममुरारी ने  कहा- "ये मंत्रीजी की मां नहीं थी, ये आपकी, मेरी और हम सब की मां थी। इन्होंने अपने बेटे की तरह हम सबको अपनी ममता प्रदान की। वे राज्यमाता थी।" ये सब सुनकर किसी मसालेदार खबर की आस में बैठे मीडियावालों के कंधे निराशा में झुक गए और साथ ही उनके कैमरे और माइक भी। रामुरारी ने कहा-"मैं माताजी की गोद में खेला हूं। आज भले ही मुझे पार्टी से निष्कासित कर दिया गया है लेकिन मैंने हमेशा माताजी को अपनी मां माना है और मंत्रीजी को अपना भाई। मुझे आज भी वो दिन याद है जब माताजी प्यार से मुझे अपने हाथों से आलू के पराठे खिलाती थी।" मंत्रीजी सोच में पड़ गए और बोले-"मगर माताजी को तो आलू के पराठे बनाने आते ही नहीं थे। आलू के पराठे तो शांता हमारी आयाबाई बनाती थी।" राममुरारी बात को संभालते हुए बोले-"हां वही तो मैं कह रहा हूं, कि हमारी माताजी आधुनिक थी और इसलिए हमें पिज्जा खिलाया करती थी।" मंत्रीजी फिर बीच में टोकते हुए बोले-"राममुरारी, तुम भूल रहे हो माताजी तो हमारे लिए पिज्जा बनाती नहीं थी बल्कि पिज्जा आर्डर कर हमको आयाबाई के हवाले करके महिला सम्मेलनों में जाती थी।" राममुरारी ने छूटती डोर को पकड़ा और बोले- "वही तो बोल रहा हूं मंत्रीजी, कि माताजी हमारे लिए बड़े प्यार से पिज्जा आर्डर करती थी। और आज उसी प्यार और ममता की कमी महसूस हो रही है। मैं यहां अपना निष्कासन रद्द करवाने और पार्टी में वापसी का कोई जुगाड़ लगाने नहीं आया हूं। मैं इसलिए आया हूं ताकि माताजी के जाने से मेरे जीवन में जो रिक्तस्थान हुआ है उसे रो-रोकर भरने की कोशिश कर सकूं। इसलिए मैं और मेरे समर्थक आज पूरा दिन मंत्रीजी के साथ रहकर उनका दुख बांटेंगे।" मंत्रीजी समझ चुके थे कि ये पट्ठा ऐसे पीछा नहीं छोड़ने वाला। आज बिना पार्टी में वापसी किए ये पीछा नहीं छोड़ेगा। इसलिए उन्होंने राममुरारी को उठाया और अपने साथ बैठा लिया ताकि और लोगों को भी रोने का बराबर मौका मिले।

neta-ji1_thumbरोने और सांत्वना देने का यह सिलसिला शाम तक चलता रहा। सब लोगों ने बारी बारी से अपने रुदनकौशल का परिचय दिया और जमकर रोए। कुछ ने मंत्रीजी के कंधों पर हाथ रखकर अपने करीबी होने का अहसास दिलाने की कोशिश की। मंत्रीजी भी इन सब प्रपंच से वाकिफ थे लेकिन मौके की नजाकत को देखते हुए इन सबका ड्रामा झेल रहे थे और इनके फिल्मी डायलॉग किसी तरह हलफ के नीचे उतार रहे थे। बार-बार वही डायलॉग सुन-सुनकर मंत्रीजी को भी अपचन हो गई थी। जो मंत्रीजी डामर, तेल, चारा से लेकर बारदाना, पेन, पेंसिल तक पचा चुके थे, वे आज इन पिछलग्गुओं के ड्रामे पचाने में असक्षम थे। पर उनकी आंखें किसी और का इंतजार कर रही थी, उनके पार्टी अध्यक्ष का। दरअसल कुछ महीनों बाद चुनाव थे और इस बार उनकी सीट खतरे में थी।

मंत्रीजी सोच में डूबे थे तभी धीर-गंभीर अंदाज में पार्टी अध्यक्ष का आगमन हुआ। उन्होंने बिना किसी औपचारिकता निभाए और रोने -गाने में समय व्यर्थ किए माताजी के फोटो के समक्ष हाथ जोड़े और मंत्रीजी की तरफ मुखातिब हुए। मंत्रीजी के पास जाकर बोले- "आपकी माताजी के निधन का हमें दुख है। पिताजी के जाने के बाद वही आपका साया थी लेकिन उनका आशीर्वाद आपके साथ हमेशा रहेगा। और उन्हीं के आशीर्वाद से खतरे में पड़ी आपकी सीट बच गई। पार्टी ने निर्णय लिया है कि आने वाले चुनाव में आप अपनी इसी सीट से लड़ेंगे। अपना खोया हुआ जनाधार पाने का यह स्वर्णिम मौका है। माताजी के देहांत के बाद आपको भरपूर सांत्वना वोट मिलेंगे। इसलिए कल से ही चुनाव की तैयारी करते हुए जनसम्पर्क शुरू कर दीजिए। " मंत्रीजी यही बात तो सुनना चाहते थे। उन्होंने पार्टी अध्यक्ष को धन्यवाद दिया और पलटकर अपनी माताजी की फोटो की तरफ देखा। उनकी आंखों में आंसू थे- खुशी के, गम के और ग्लानि के। ग्लानि के आंसू इसलिए क्योंकि शायद वह अपनी माता से मन ही मन कह रहे थे- "मुझे माफ कर देना। लेकिन इस चुनाव को जीतने के लिए तेरी मौत का भी तमाशा बनाना पड़ेगा।" मंत्रीजी पार्टी अध्यक्ष को बाहर ले गए और बात को आगे बढ़ाने लगे। शाम हो चुकी थी। लोग अब वापस जाने लगे थे। माताजी की तस्वीर पर चढ़ा हार गिर चुका था और उनके सामने जल रहा दीया भी बुझ चुका था। लेकिन अब उसे ठीक करने वाले कोई नहीं था क्योंकि शोकसभा में आए लोगों के अपने-अपने काम हो चुके थे।

DV795112बस एक पल, बस एक पॉल। जिस पल मैंने पॉल ऑक्टोपस बाबा के बारे में सुना बस उस पल से मैं उस पर मोहित हो गया हूं। वो एक पल ही काफी था मुझे घायल करने के लिए। जो अदा पॉल आक्टोपस में है वो करीना और कैटरीना में भी नहीं। वो नजाकत से लहराते हुए तैरना फिर अदा से किसी झंडे पर बैठ जाना, वाह। वैसे मुझे तो पहले से पता कि ऑक्टोपस कोई साधारण जानवर नहीं है। उसमें जरूर कुछ खास बात होगी, पर दुनिया मानने को तैयार ही नहीं थी। लेकिन मेरा हमेशा से मानना था जो अष्टभुजा हो वो साधारण कैसे हो सकता है और आखिर उसने कमाल दिखा ही दिया। पॉल ऑक्टोपस से इतनी जल्दी ऑक्टोपस बाबा बन गया। इतनी तेजी से प्रसिद्ध हुआ यह पहला बाबा होगा। देश के बाबाओं को न जाने क्या-क्या जतन नहीं करने पड़ते भक्त जुगाड़ने के लिए लेकिन ये अष्टभुजाधारी तो बिना कुछ किए ही इतने भक्तों को पा गया। विश्वकप फुटबॉल में तो यह जुमला ही चर्चित हो गया कि जिस पर पॉल बाबा का आशीर्वाद होगा वही विजयी होगा। कुछ हफ्तों के भीतर ही करोड़ों डालर के सट्टे लगने लगे हैं। वो सेलीब्रिटी बन चुका है। जर्मनी की हार के बाद प्रशंसक तो उसको मार मारकर चटनी बना देना चाहते हैं, लेकिन सेलीब्रिटीज के लिए ये सब आम बाते हैं। पॉल आक्टोपस अब ऑक्टोपस नहीं बाबा बन चुका है। और बाबा के चेले इन उद्दंड प्रशंसकों से निपट लेंगे।


वैसे ऑक्टोपस बाबा अगर भारत में होते तो रातों रात सुपरबाबा का तमगा हासिल कर गए होते। अब तक तो इनके नाम से कई आश्रम खुल गए होते, लाखों भक्त रात-दिन उनके दरबार में मत्था टेक रहे होते। इनकी भविष्यवाणियों के आधार पर फिल्मों के नाम रखे जाते, शादियां की जाती, बच्चों के नाम रखे जाते, राजनीतिक पार्टियां किस पार्टी से गठबंधन करे यह भी ऑक्टोपस बाबा से ही तय करवाती। सभी पार्टियों के नाम से मर्तबान ऑक्टोपस बाबा के शाही जलघर में रख दिए जाते और ऑक्टोपस बाबा जिस पार्टी के मर्तबान पर हाथ रख देते उस पार्टी की किस्मत चमक जाती। पर लगता नहीं ऑक्टोपस बाबा का भारत आगमन हो पाएगा वहां की जनता उन्हें आने ही नहीं देगी। इसलिए मैंने यहीं भारत में एक ऐसे ही चमत्कारी बाबा की तलाश करने का संकल्प ले लिया।

अगले दिन मैं आदत की तरह पिताजी की लात और मां की दांत खाने के बाद ही उठा। इधर-उधर स्वाति, सपना, पूजा को देखने बाद ही आंखों में कुछ ताजगी आई। अब मैं निकल पड़ा उस जीव को ढूंढने जो ऑक्टोपस बाबा की तरह अलौकिक हो, खास हो, भविष्यवाणियां करता हो। घोड़े को देखा, हाथी को देखा, तोते को देखा, गधे, चूहे, बिल्ली सबको देखा। पूरा चिड़ियाघर खंगाल मारा लेकिन ऐसा कोई जीव नहीं दिखा जो ऑक्टोपस बाबा की तरह खास हो। गाय के तबेलों को भी छान मारा लेकिन गाय-भैसों में भी वो बात नजर नहीं आई। हां, उनकी शांति में खलल डालने के कारण मुझे उनकी लात जरूर खानी पड़ी और गोबर के कंडे थापने पड़े वो अलग। थक-हार कर मैं घर वापस आया। अभी चौकdog running पर झुके कंधों के साथ निराशा में डूबा मैं बैठा ही था कि पिल्लू पर नजर पड़ी। पिल्लू हमारे मोहल्ले का चौकीदार है। नहीं...नहीं... वो सीटी बजाने वाला नहीं, भौंकने वाला चौकीदार। पिल्लू मोहल्ले का आवारा कुत्ता है लेकिन पालतू से कम नहीं। मोहल्ले की शान है पिल्लू, सबकी जान है पिल्लू। मुझे उस मरियल से पिल्लू में उस अद्भुत जीव के दर्शन होने लगे जो ऑक्टोपस बाबा को टक्कर दे सकता था। जब भी मैं क्रिकेट मैच खेलने जाता था पिल्लू हमारी टीम के बल्ले पर मूत्र विसर्जन कर देता था और उस दिन इत्तेफाक से हमारी टीम जीत जाती थी। अब मुझे ये इत्तेफाक नहीं पिल्लू की चमत्कारी शक्ति लगने लगी dog peeingथी, जिसे मैं पहचान ही नहीं पाया। पिल्लू में एक और खास बात थी, इस बेवफाई के दौर में इंसानों के साथ रहते हुए भी वह अब तक वफादार था। कुछ खास तो था उसमें। इसलिए जिस पिल्लू को मैं लात मार-मारकर भगाया करता था आज उसे प्यार से पुचकारने लगा और उसे मन ही मन उसे पिल्लू बाबा बनाने की सोचने लगा। क्रिकेट वर्ल्ड कप भी ७-८ महीनों बाद है इसलिए मैंने सोचा कि अबकी बार मैं पिल्लू से भविष्यवाणी करवाऊंगा कि कौन सी टीम मैच जीतेगी। दो देशों के झंडे गाड़ूंगा और जिस झंडे पर पिल्लू ने मूत्र विसर्जन कर दिया और पिल्लू की चमत्कारी शक्तियों ने काम कर दिया तो समझ लो वो टीम जीत जाएगी। अगर ऐसे ही शुरूआती ४-५ मैचों में पिल्लू की शक्तियों ने जादू दिखा दिया तो मेरे पिल्लू को पिल्लेश्वर बाबा बनते और मुझे भी प्रसिद्ध होते देर नहीं लगेगी। और अगर किसी मैच में हार भी गए तो इसके लिए बहानों की फेहरिस्त पहले से तैयार थी। मुझ जैसे निठल्ले के लिए इससे बड़ा पैसा कमाने का फार्मूला नहीं था। लेकिन पिल्लू को देशों के झंडे पर मूत्र विसर्जित करवाने में खतरा था क्योंकि अगले दिन उन देशों के लोग और मीडिया द्वारा मेरे घर पर पत्थर बरसाने का डर था। इसलिए मैंने इसके लिए विकल्प खोजना शुरू कर दिया। साथ ही पिल्लू का नाम पिल्लेश्वर से कुछ अलग रखने की सोची। पिल्लेश्वर चालू नाम लगता है, उसमें वो आकर्षण नहीं था। कुछ देर सोचने के बाद मैंने तय किया कि पिल्लू का नया नाम होगा- "पॉल"। "पॉल" नाम में अन्तर्राष्ट्रीय प्रभाव भी था, इससे विदेशी मीडिया भी मेरे "पॉल बाबा" के चमत्कार को कव्हर करती। अब बारी थी "पॉल" के मूत्र विसर्जन शक्ति के विकल्प को तलाशने की।

अगली सुबह मैं जल्दी उठा, क्यां करूं पैसा और प्रसिद्धि बनाने की मशीन को तैयार जो करना था। भारत को उसके बहुप्रतीक्षित "पॉल बाबा" से रूबरू जो करवाना था। वैसे तुक्के मारने में मैं भी कम नहीं था, कई शर्ते मैंने तुक्का मारकर ही जीती हैं, सो मैंने सोचा अपने इस तुक्का मारू शक्ति और पॉल की शक्ति को मिलाकर कुछ किया जाए। मैंने तय कर लिया कि तुक्का मैं मारूंगा और पॉल को ट्रेन करूंगा कि वो उस देश को झंडे को चाटे जिसे मैंने चुना है। चार-पांच तुक्के सही निकल गए तो हमको प्रसिद्ध होने से कोई नहीं रोक सकता और मीडिया तो ऐसी खबरों को कवर करने के लिए बेकरार रहता ही है। dog lickingअब मुझे पॉल को झंडे पर मूत्र विसर्जन के बजाए झंडे को चाटने की ट्रेनिंग देने थी क्योंकि अब अखबारों में पॉल की मूत्र विसर्जन करते हुए फोटो तो नहीं छप सकती ना। झंडा चाटते हुए पॉल ज्यादा स्टाइलिश लगेगा। इसलिए मैंने अपनी पसंद के देश के झंडे पर पॉल के पसंद के बिस्किट लगा दिए और दूसरी झंडे पर चालू बिस्किट। चूंकि पॉल लालची भी था इसलिए वह मेरी पसंद वाले झंडे को ही चाटता था। कुछ ही महीनों में पॉल पूरी तरह प्रशिक्षित हो चुका था।

dog sadhuअब बारी थी पॉल को पॉल बाबा बनाने की।  इसके लिए मैंने उसे भगवा वस्त्र पहनाए और गले में ५-१० बाजारू मालाएं टांग दी। जिस दिन वर्ल्ड कप का पहला मैच हुआ मैं मोहल्ले के चौक पर खड़ा हुआ और भारत और श्रीलंका के झंडे गाड़ते हुए बोला- "देखो, मेरा पॉल चमत्कारी है, जिस झंडे को पॉल चाटेगा वही टीम जीतेगी।" मैंने पॉल की धीरे से लात मारा और वो जाकर भारत के झंडे को चाटने लगा। लोगों ने इसे मुझ निठल्ले की कोई बेवकूफी समझी और घर चले गए। इत्तेफाक से उस दिन भारत जीत गया। इस घटना के बाद कुछ लोगों ने पॉल की शक्ति पर विश्वास करना शुरू कर दिया। अपनी गाड़ी ने स्टार्ट ले लिया था। दो दिन बाद भारत और बांग्लादेश का मैच था। मैंने फिर चौक पर भारत और बांग्लादेश के झंडे गाड़े। इस बार पॉल की यह करामात देखने पहले ज्यादा दर्शक थे। मैंने धीरे से पॉल को बांग्लादेश का झंडा चाटने का इशारा किया, उसने वैसा ही किया। लोगों ने इसे मजाक में लिया लेकिन कुछ लोगों को पॉल पर भरोसा था और उन्होंने बांग्लादेश पर पैसे लगा दिए। लेकिन मुझे पता था कि भारत ही ऐसी टीम है जो किसी दिन श्रीलंका जैसी टीम को हरा सकती है तो अगले दिन बांग्लादेश जैसी कमजोर टीम से हार भी सकती है। मेरा तुक्का फिर सही पड़ गया और लोगों में पॉल के प्रति विश्वास और भी बढ़ गया। मेरा फार्मूला चल निकला था। लोग अब पॉल के मुरीद हो चुके थे। मैंने कुछ मीडिया के लोगों को भी जुगाड़कर इसे कव्हर करवाया और फिर पॉल अखबारों की सुर्खियां बन गया। न्यूज चैनल भी कहां पीछे हटने वाले थे, उन्हें तो मसाला चाहिए और मसाला बांटने के लिए मैं और पॉल तो थे ही।

इस तरह मेरी उम्मीद के मुताबिक मैं और पॉल कुछ ही दिनों में चर्चित हो गए। पॉल ने बाबा की उपाधि ग्रहण कर ली और मैंने बाबा के गुरू की। क्वार्टरफायनल और सेमीफायनल में भी मेरा तुक्का चल गया और भारत जीत गया, इससे अन्तरार्ष्ट्रीय मीडिया भी हमारी तरफ आकर्षिक हो गई। बेचारे ऑक्टोपस बाबा तो हमारी प्रसिद्धि देख पानी में भी जलने लगे। लेकिन बवाल तो तब हुआ जब वर्ल्डकप का फायनल मैच हुआ। फायनल में आस्ट्रेलिया और भारत का मुकाबला था। अहम मौकों पर भारत के हारने के गुण को देखते हुए मैंने आस्ट्रेलिया पर दांव लगाया और पॉल ने भी आस्ट्रेलिया के झंडे को चाटा। और उम्मीद के मुताबिक भारत हार गया। इसके बाद तो भारत की हार भड़के कुछ प्रशंसक पॉल को दोषी मानकर उसकी जान के पीछे पड़ गए लेकिन मैं निश्चिंत था क्योंकि मुझे पता था अब तक पॉल बाबा के प्रशंसकों की संख्या उन भड़के हुए समर्थकों से कई गुना हो चुकी थी। इतने सारे प्रशंसक अपने पॉल बाबा का नुकसान कैसे होने देते, अंधश्रद्धा तो भारतीयों का नैसर्गिक गुण है, तभी तो कुकुरमुत्ते की तरह हर गली में पैदा होते बाबाओं की रोजी रोटी इतने मजे से चलती है। चूंकि पॉल बाबा अब सेलीब्रिटी बन चुका था लिहाजा उसे जेड श्रेणी की सुरक्षा भी उपलब्ध करा दी गई थी। क्या नेता, क्या व्यापारी सब के सब उसके भगत बन गए। जिस शहर में पॉल बाबा पहुंच जाते वहां जनसैलाब उमड़ पड़ता। शादी के लिए वर-वधु चुनने के लिए भी लोग पॉल बाबा की राय लेने लगे। एक युवक १० लड़कियों की फोटो लेकर आया और पॉल बाबा के सामने रख दिया। पॉल बाबा रोज-रोज की भीड़ से खिसिया चुके थे और वे उन सभी फोटो को नोच-नोचकर खा गए। उस युवक ने इस घटना को दूसरे अर्थ में ले लिया और सोचा कि शायद पॉल बाबा का आदेश है कि जीवनभर शादी मत करो। उसने पॉल बाबा के चरण छुए और जीवनभर कुंवारे रहने का शपथ लेकर चल दिया। उस बेवकूफ को क्या पता कि पॉल तो खीझ के कारण फोटो को नोंच रहा था। खैर, उस दिन के बाद उस युवक से कभी मुलाकात नहीं। हमको इससे क्या, पॉल और मैं तो जिंदगी के मजे ले रहे थे।

इतने महीनों की व्यस्तता और भीड़भाड़ से हम पक चुके थे। हमें अब बदलाव चाहिए था। पैसे भी बहुत थे, सो हम दोनों निकल लिए वर्ल्ड टूर पर सोचा अब डॉलर में कमाया जाए और जर्मनी के एक्वेरियम में बैठे उस ऑक्टोपस बाबा को भी चिढ़ाया जाए, आखिर आइडिया तो उसी को देखकर आया था। दुनिया के लिए वो पॉल बाबा था लेकिन मेरे लिए तो मेरा वफादार पॉल था। पॉल ने अब गाड़ी चलाना भी सीख लिया था, पता नहीं कैसे। हम दोनों स्विट्जरलैंड की हसीन वादियों में लांग ड्राइव का मजा ले रहे थे। हम घूम रहे थे.... घूम रह थे.... और घूम रहे थे.... कि तभी किसी ने मेरे सिर पर जोरदार चपेट मारी और मुझे बालों से पकड़कर उठाया। जोरदार चिल्लाने की आवाज आई- "अरे कुंभकरण! चल उठ सुबह के दस बज गए। कितने सपने देखेगा।" रोज की तरह पिताजी चिल्ला रहे थे। इतना सुनते ही मैं हड़बड़ाकर उठा। अपनी आंखों को मसलता हुआ मैं बाहर आया। बाहर आकर देखा तो पिल्लू रोज की तरह कूड़े में खाना तलाश रहा था। इसका मतलब मैं अभी तक सपने में था। कोई बात नहीं इस सपने को सच में तब्दील करना ही पड़ेगा। मेरे और शोहरत के बीच सिर्फ एक "पॉल" का फासला है। आप लोग क्या कहते हैं, बना दूं पिल्लू को पॉल...?
DOG-car
alarm_clock_12ट्रीं...ट्रीं...अलार्म ने तीसरी बार मेरी "ड्रीम एक्सप्रेस" को रोकने की कोशिश की और मैंने उसे पिछले दोनों बार की तरह इस बार भी चपेट जमाकर उसे चुप कराया और तकिए से मुंह ढंककर वापस अपनी "ड्रीम एक्सप्रेस" शुरू कर दी। अभी मेरी ड्रीम एक्सप्रेस ने गति पकड़नी शुरू की ही थी कि पिताजी ने बाल पकड़कर मुझे उठा दिया। आंखों को मसलकर मैंने नींद से जागने की कोशिश की फिर चार गालियां सुनने के पश्चात ही मैंने मुंह धोया। बाहर बालकनी में चाय का कप और अखबार हाथ में लेकर मैं इधर-उधर झांकने लगा लेकिन रितु, स्वाति, पिंकी, साक्षी कोई नहीं दिखी शायद सब की सब कॉलेज चली गई थी और मैं निखट्टू आज फिर कॉलेज नहीं जा पाया। सामने देखा तो बंदरों की तरह हंसता हुआ मेरा दोस्त बिल्लू दिखाई दिया। सुबह-सुबह बिल्लू की शक्ल देखकर मैं डर गया कहीं आज फिर दिन खराब न हो जाए। तीन सप्ताह पहले सुबह सुबह बिल्लू की ही शक्ल देखी थी और शाम को मेरी शक्ल रूपा के भाइयों ने बिगाड़ दी थी।

आखिर में कोई चारा न बचने के बाद मैंने अखबार की ओर नजरें घुमाना ही मुनासिब समझा और चाय की चुस्कियां लेने लगा। खेल के पृष्ठों से गुजरते हुए जैसे ही व्यापार के पृष्ठ से बचने की कोशिश कर रहा था एक खबर पर नजर ठहर गई। वैसे तो आजकल व्यापार पृष्ठ पढ़ने से भी डर लगता है। वही महंगाई, भाव बढ़े, सोना आसमान पर ग्राहक जमीन पर जैसी खबरें पढ़ने से चाय का स्वाद भी कड़वा हो जाता है। लेकिन आज जो खबर पढ़ी वह तो गजब की थी। खबर पढ़ते ही चाय मीठी लगने लगी। शीर्षक था "महंगाई की दर १७.६० से १४.७५ और खाद्य मुद्रास्फीति १६.९० से १२.९२ प्रतिशत हो गई" नीचे उपशीर्षक था- "महंगाई घटी"। अब हम हैं भारत की रट्टाऊ शिक्षा के पढ़े-लिखे होनहार और हर रट्टाऊ पढ़े-लिखे इंसान का यह कर्तव्य होता है कि भले ही उसे किसी शब्द  का अर्थ न पता हो, उसे अर्थ पता होना का  दिखावा जरूर करना चाहिए। तभी उसे जीनियस समझा जाता है। जैसे जो बैट और बल्ले के बारे में नहीं जानते है वह भी क्रिकेट के बारे में ऐसे विस्तार से बातें करते हैं जैसे बचपन से क्रिकेट खेलते रहे हों। भले ही वो क्रिकेट में बाइचुंग भुटिया को घुसा देंगे, ध्यानचंद को सचिन का कोच बना देंगे लेकिन बोलना नहीं छोड़ेंगे और धुप्पल में ऐसे लोगों को हां में हां मिलाने भी मिल जाते हैं।
hurray2वैसे तो मझे नहीं मालूम कि ये महंगाई, मुद्रास्फीति की दर कैसे तय होती है, ये तो देश की बाकी जनता भी नहीं जानती लेकिन मैंने बस इतना पढ़ा था कि दर कम हुई है मतलब महंगाई कम हुई है। भले ही महंगाई आंकड़ों में कम हुई हो लेकिन कम तो हुई ना। ये तो जश्न का मौका था भई। लोग वैसे भी आंकड़ों में ही ज्यादा यकीन रखते हैं। आंकड़े ही सत्य हैं। आंकड़ों में लिखा रहे कि ८० प्रतिशत जनता को भोजन मिल रहा है, लोग मान लेंगे भले ही आधे से ज्यादा आबादी रोटी को तरसते रहे। सब आंकड़ों की जादूगरी है, और हम तो जादूगरी पर ही फिदा हैं। अब मुझे पूरी दुनिया को बताना था कि दुखी होने की जरूरत नहीं महंगाई कम हो गई। इसलिए मैं स्नान करने चला गया। चूंकि महंगाई कम हो चुकी थी इसलिए मैंने सस्ते साबुन को तुरंत साबुनदान से निकाल फेंका और महंगे साबुन से स्नान करने लगा। महंगाई के कारण रोज घर पर ही नाश्ता करना पड़ रहा था लेकिन चूंकि आंकड़ों में महंगाई कम हो चुकी थी इसलिए मैं बंगाली स्वीट्स में नाश्ता करने चला गया। समोसों का स्वाद लेते हुए मैंने २ किलो रसगुल्ले का भी आर्डर दे दिया। मुझे खुश देख चटर्जी अंकल ने पूछ ही लिया- "क्या बात है बेटे, आज बहुत खुश लग रहे हो।" मैंने भी चहकते हुए बोला- "बात ही खुशी की है, महंगाई और खाद्य मुदास्फीति दर कम हो गई मतलब महंगाई कम हो गई।" यह बात सुनकर चटर्जी अंकल ने सिर पकड़ लिया। मैंने अखबार दिखाते हुए कहा- "देखिए, अखबार में छपा है।" वे फिर पूछने लगे- "बेटा ये होता क्या है।" मैंने समझाते हुए कहा- "आप खाद्य मुद्रास्फीति नहीं जानते, खाद्य मुद्रास्फीति मतलब फूड इन्फ्लेशन। आप फूड इन्फ्लेशन जैसे अंग्रेजी और व्यावसायिक शब्दों से दूर हैं इसलिए तो आज के आधुनिक ग्राहक आपकी इस पुरानी खंडहर होटल से दूर हैं। ऐसे शब्दों को जानना बहुत जरूरी है नहीं तो आप पिछड़े कहलाएंगे और पिछडे लोगों को कोई आदर नहीं देता। हो सकता है मैं भी कल आपके इस होटल में नाश्ता करना बंद दूं।" मेरे शार्ट एंड स्वीट प्रवचन की घुड़की पीकर अंकल को ज्ञान आ आ चुका था। वे बोले-"बेटा मैं समझ गया फूड इन्फ्लेशन क्या है, मैं भी तो पढ़ा-लिखा हूं। मैंने कहा- क्योंकि खाद्य मुद्रास्फीति का दर कम हो गया है, आपको मिठाइयां के दाम कम कर देने चाहिए।" मैंने २ किलो रसगुल्ले लिए और चटर्जी अंकल को उनके हाल पर छोड़कर चला आया।rasgulla
अब मैंने अपने ज्ञान का प्रसार सबको करने की सोची। सामने से शर्मा आंटी आती दिखाई दी। मैंने रसगुल्ला देते हुए कहा,"लीजिए मिठाई खाइए आंटी,  महंगाई कम हो गई है।" आंटी ने पूछा- अरे पागल बाजार में आग लगी है, सब्जी-टमाटर पहुंच के बाहर हैं, फलों का नाम लेने पर भी पैसा लग जाता है और तू कह रहा है महंगाई कम हो गई। मैं समझाते हुए बोला- "देखिए, अखबार में लिखा है फूड इन्फ्लेशन रेट कम हो गई मतलब यही हुआ न कि महंगाई कम हो गई।" आंटी चकराकर बोली- "ये फूड इन्फ्लेशन रेट क्या बला है।" मैंने चौंकते हुए पूछा, "आपको फूड इन्फ्लेशन रेट नहीं पता। आज नारी सशक्तिकरण का जमाना है। ग्लोबलाइजेशन है। नारी ज्ञान देने वाली है, पढ़ाई और नौकरियों में नारी ही आगे है और आप पूछ रही हैं फूड इन्फ्लेशन रेट क्या है? आप आधुनिक नारी नहीं हैं, तभी तो इस मोहल्ले में आपकी बखत नहीं है। २ साल पहले ही मोहल्ले में आई सोफिया आंटी आपसे ज्यादा आधुनिक और एजुकेटड हैं।" अब आंटी की "इमेज" का सवाल था। वह बोली- "जानती हूं ना। मैं तो ऐसे ही पूछ रही थी।" मैंने कहा- तो अब आप मानती हैं न कि फूड इन्फ्लेशन रेट १६.९० से १२.९२ पर आ गया, मतलब महंगाई कम हुई ना। तो फिर जाइए जश्न मनाइए। पकवान बनाइए, दोपहर के खाने के लिए मुझे आमंत्रित कीजिए क्योंकि मैंने ही आपको ये खुशखबरी दी है और आधुनिकता का पाठ भी पढ़ाया है।
drunk3अपने दोपहर के भोजन का इंतजाम कर मैं आगे बढ़ा और ऐसे व्यक्ति को ढूंढने लगा जिसे मैं अपना ज्ञान बघार सकूं। चौक पर महंगाई की मार से पूरी ताकत से लड़ने वाले जांबाज "बेवड़ों" को देखा। इनकी जिद को मैं सलाम करता हूं। चाहे कितनी भी महंगाई आ जाए, कुछ भी हो जाए इनके कोटे में कोई कमी नहीं आती। महंगाई कितना ही फुंकार मारे ये वीर एक बोतल दारू धकेलकर उसका फन कुचलने को आतुर रहते हैं। मैं ऐसे लड़ाकों से बात करना चाहता था। मैं पास गया और बोला कि बधाई हो महंगाई कम हो गई। ये लीजिए रसगुल्ला खाइए। उन बेवड़ों ने अपनी नशीली आंखों से मुझे देखा फिर डोलते हुए पास आए और बोले- "महंगाई क्या है भई। हमको तो नही मालूम। हम तो पहले भी दिन में चार बार टुन्न हुआ करते थे और अब भी होते हैं और आगे भी होते रहेंगे। आओ तुम भी महंगाई का सामना करो। ये क्या रसगुल्ला खिला रहे हो यार कोई नमकीन-वमकीन हो तो बताओ, हमारा चखना खत्म हो गया है।" मैंने पीछे हटते हुए कहा- मैं रसगुल्ला बांटकर ही तो महंगाई कम होने का जश्न मना लूंगा। आप लोग लगे रहिए। जाकर बंगाली होटल से नमकीन ले लीजिए उसने रेट कम कर दिए। इतना सूनते ही सभी बेवड़ों ने दौड़ लगा दी।
उन पियक्कड़ों से किसी तरह पीछा छुड़ाया। मैंने तय कर लिया आइंदा किसी बेवड़े को छेडऩे की हिम्मत नहीं करूंगा। उनकी साधना में मैं विघ्न नहीं डालूंगा वरना अपनी साधना में ये लोग मुझे भी जबर्दस्ती शामिल कर लेंगे। इतनी भागदौड़ के बाद मुझे घर की याद आई। घर जा ही रहा था कि सामने से साक्षी आते दिखी। मुझे देखते ही बोली- "क्या बात है, आज बहुत रसगुल्ला बांट रहे हो। अब महंगाई कम हुई ही है तो चलो फिल्म चलते हैं। तुम ही तो मोहल्लेभर में ढिढोरा पीटते फिर रहे हो कि महंगाई कम हो गई और अब फिल्म का नाम लिया तो शक्लें बना रहे हो।" मैंने सोचा फिल्म मतलब केवल फिल्म ही नहीं साथ में रेस्टारेंट में जेब कटवाना आदि-इत्यादि और अगर साथ में लगेज(सहेली) भी हुई तो डबल खर्चा। जेब में हाथ डाला तो जेब ठंडा था। फिर याद आया परसो ही तो पापा की दी पॉकेट मनी साक्षी पर उड़ा दी थी। सब्जी लाने के लिए दिए गए पैसों से गोलगप्पे खाए थे। अब अगर और पैसा मांगा तो घर में उल्टा टांग दिया जाऊंगा। जिस तरह अफसर जनता के लिए आबंटित पैसों को अपने ऊपर उड़ाते हैं उसी भ्रष्टाचार धर्म का पालन करते हुए मैंने भी अपने घर के सब्जी, किताबें, पंखे, कपड़े, राशन आदि के लिए आबंटित पैसों को साक्षी पर उड़ाया था। पिछले ही महीने मेरे इस भ्रष्टाचार का भंडाफोड़ हुआ था इसलिए मैं इन्वेस्टीगेशन आफिसर (पापा) की नजर में था। और पैसे मांगने की हिम्मत नहीं थी।  मैंने जेब में फिर हाथ डाला तो कुछ गर्माहट का अहसास हुआ शायद ५०-१०० रुपए थे। मैंने किसी तरह उसे घर रवाना कर अपने जेब कटने से बचाया। उसे क्या पता महंगाई कम होने का जश्न मना रहा मैं खुद महंगाई से पीड़ित हूं। खैर उस दिन इन आंकड़ों ने अपनी जादूगरी दिखा ही दी और मेरे मोहल्ले मे महंगाई कम हो गई। सरकार ने तो आंकड़ों में महंगाई की थी लेकिन मैंने अपनी विलक्षण दिमागखाऊ प्रतिभा से असलियत में कर दिया। अपने मोहल्लेवालों का दिमाग खाकर मैं ऊब चुका हूं, मुझे बदलाव चाहिए। बचके रहिएगा, मैं आपका भी दिमाग खा सकता हूं और महंगाई कम हुई का नारा लगाते हुए आपके शहर में धमक सकता हूं।brain
rain1ये तो सबको पता है कि मौसम विभाग भरोसे लायक बिलकुल नहीं है। इसलिए हम तो मौसम की भविष्यवाणी पर विश्वास ही नहीं करते। जब मौसम विभाग कहता है कि आज बारिश होने वाली है, उस दिन तो हम बेधड़क बिना छाते-रेनकोट के घूमते हैं क्योंकि हमें पता है बारिश नहीं होने वाली। लेकिन इस साल जब मौसम विभाग ने रो-रोकर उस पर विश्वास करने के लिए कहा तो हमारी दिल पसीज गया। आपको तो पता ही है हम कितने कोमलहृदयी हैं। मौसम विभाग का इस तरह रोज-रोज रोना हमसे देखा नहीं गया और हमने सोचा चलो इस बार इन पर विश्वास कर लेते हैं। प्रीमानसून बारिश हुई भी तब हमें लगा कि शायद मौसम विभाग ने सचमुच काम करना शुरू कर दिया है। लेकिन फिर वही ढाक के तीन पात। दो दिन प्री-मानसून का ट्रेलर दिखाने के बाद मानसून नाम की फिल्म रिलीज ही नहीं हुई। काले बादल मंडराते और जीभ चिढ़ाकर चले जाते। जून बीता जुलाई आई लेकिन बारिश नहीं आई। मौसम विभाग एक बार फिर बेवफा निकल गई। खैर हमने इन सबके बारे में सोचना बंद किया और लात तानकर बिस्तर पर सो गए। आप तो जानते हैं हम कितने निद्राप्रेमी हैं।



हमें हम सपनों के समुंदर में गोते लगाने ही वाले थे कि मोहल्ले में जोर-जोर से चिल्लाने की आवाज आने लगी। वैसे तो हमारे मोहल्ले में ये चिकचिक आम बात है लेकिन आज कुछ ज्यादा ही आवाज आ रही थी। नींद में खलल हमसे बर्दाश्त नहीं हो रही थी। लेकिन तभी इस कोलाहल के बीच एक मीठी सी आवाज सुनाई देने लगी। कोई सुरीली आवाज में गा रहा थी- "काले मेघा, काले मेघा पानी तो बरसा।" मैं कौतूहलवश बाहर आया कि आखिर मेरे वीरान मोहल्ले में अप्सरा कहां से आ गई। मेरी मां हमेशा कहती हैं कि मुझे जैसे आलसी को सिर्फ मेरी बीवी ही ठीक कर सकती थी। उस अप्सरा की सुरीली आवाज में मुझे वही जादू दिखाई दिया जो मुझे आलस्य से बाहर निकाल सकता था। इधर-उधर देखा तो एक खूबसूरत सी लड़की भीड़ के बीच बड़ी मधुर आवाज में गाना गा रही थी। पता करने पर मालूम चला कि वह शर्मा की बेटी "राधा" है पढ़ाई पूरी करके कल ही आई है। coupleमुझे राधा में अपनी जीवनसंगिनी के दर्शन होने लगे। मैंने तो मन ही मन फैमिली प्लानिंग भी कर ली थी कि बच्चे दो ही अच्छे, लड़की का नाम होगा रिया और लड़के का राहुल। रिया डॉक्टर बनेगी और राहुल इंजीनियर। मैं हसीन सपने बुन ही रहा था कि पीछे से कोई मेरे कान मरोड़ने लगा। पलटकर देखा तो साहू आंटी थी। साहू आंटी चिल्लाकर बोली "अरे निकट्ठू, यहां खड़ा ही रहेगा कि मोहल्लेवालों के साथ इंद्रदेव की आराधना भी करेगा। देख नहीं रहा सब मोहल्लेवासी अपने-अपने तरीके से इंद्रदेव को मनाने में लगे हैं। मैं उधर महिलाओं के साथ भजन कर रही हूं। सारे पुरुष हवन कर रहे हैं। तू जा राधा के साथ फिल्मी गाने गाकर इंद्रदेव को रीझा। शायद तुम्हारे फिल्मी गाने से ही इंद्रदेव खुश हो जाएं।" इतना सुनना था कि मेरे मन में लड्डू फूटने लगे। अपना तो एक ही लक्ष्य था इंद्रदेव रिझे न रिझे मुझे कृष्ण बनकर राधा को रिझाना था। मेरे अंदर लगान का भुवन जाग गया मैं दौड़ता हुआ राधा के पास पहुंचा और उसके सुर के साथ सुर मिलाने लगा- "काले मेघा- काले मेघा, पानी तो बरसा। बिजली की तलवार की नहीं, बूंदो के बाण चला...." वैसे जब मैं गाता हूं तो कौवे भी शर्मा जाते हैं लेकिन उस दिन मैं किशोर कुमार से कम नहीं गा रहा था। अरे भई इंप्रेशन का सवाल था और आप तो जानते हैं ना "फर्स्ट इंप्रेशन इज लास्ट इंप्रेशन"। मैं गायक तो नहीं, मगर ऐ हसीं जब से देखा मैंने तुझको, मुझको गायकी आ गई। मैंने गाना शुरू ही किया था कि जोरदार फुहार आने लगी। rain2सब लोग मेरी तरफ देखने लगे, मेरी राधा भी। सब लोग को लगने लगा कि मेरे गाने ने इंद्रदेव को प्रसन्न कर दिया। अब ये तो इंद्रदेव ही जानते हैं कि वो मेरे गाने से खुश हुए या दुखी होकर आंसू बहाने लगे थे। खैर जो भी हो उस दिन मेरा इतना मान-सम्मान हुआ कि मैं इतने वर्षों तक हुए मेरे तिरस्कार को भूल गया।


image_angry_sunकुछ दिन बीते सूरज ने फिर आग बरसाना शुरू कर दिया। मोहल्लेवासी मेरे घर के सामने खडे़ होकर मेरे उठने का इंतजार करने लगे। इतने में राधा आई और उसने अपनी मीठी आवाज से मुझको उठाया। मैं खुश था, बहुत खुश। इतने सालों में पहली बार मैं बिना पापा की लात और मम्मी की डांट खाए उठा था। और मुझे उठानेवाली कौन थी, मेरी भावी जीवनसंगिनी राधा। मेरे तो पांव ही जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। मैंने बाहर आकर देखा तो साहू आंटी, शर्मा आंटी, गुप्ता आंटी सब हाथ में समोसे, जलेबी, लस्सी लिए मेरे स्वागत के लिए खड़ी थी। मैं सोचने लगा कल तक अगर मैं इनके पेड़ से आम भी तोड़ लेता था तो मोहल्ला सिर पर उठा लेती थी और आज इतनी खातिरदारी, आखिर बात क्या है? साहू आंटी आगे आई और बोली- "बेटा उस दिन तुम्हारे गाने ने इंद्रदेव को प्रसन्न कर दिया था। तीन दिनों से फिर धूप ने कहर बरसाना शुरू कर दिया है। इसलिए हम लोगों ने इंद्रदेव प्रसन्नार्थ समिति बनाया है और तुम्हें इसका अध्यक्ष मनोनीत किया है।" मैंने सोचा, मैं और समिति का अध्यक्ष? आज तक मुझे किसी ने समिति का कार्यकर्ता तक नहीं बनाया और अब सीधा अध्यक्ष? मैं भावविभोर हो उठा। मैं एक भावपूर्ण भाषण देना चाहता था। लेकिन पता होता कि ये लोग मुझे अध्यक्ष बनाने वाले हैं कल रात को भाषण लिख लेता। खैर, अध्यक्ष होने के नाते मुझे कुछ तो कहना था, सो मैं गरजते हुए बोला- "देखिए, आप लोगों को फिक्र करने की जरूरत नहीं है। अब मेरी अध्यक्षता में इंद्रदेव के प्रसन्नार्थ सारे हवन, यज्ञ, भजन किए जाएंगे। बारिश होकर रहेगी, ये मेरा वादा है। अब चूंकि उस दिन मेरे साथ राधा भी गा रही थी इसलिए मैं अध्यक्ष तो राधा उपाध्यक्ष। " सभी लोग हां में सिर हिलाने लगे। दरअसल उनके पास कोई चारा भी नहीं था क्योंकि मुसीबत के समय तो गधे को भी बाप बनाना पड़ता है। rain3


चूंकि अब मैं अध्यक्ष था और हर अध्यक्ष का यह नैतिक कर्तव्य होता है कि अपनी अध्यक्षगिरी दिखाए। रौब जमाए, पैसे बनाए, चोंचले दिखाए वरना आम लोगों को कैसे पत चलेगा कि ये अध्यक्ष है। मैंने भी अपना कर्तव्य निभाते हुए पापा से पैसे मांगे, शाम को उनकी बाइक मांगी और वो इनकार न कर सके। शाम को बाइक पर राधा को डेट पर ले गया। रेस्त्रां गए, खूब पैसे उड़ाए पापा के जो थे और मम्मी ने अलग से भी दिए थे और अगले दिन सुबह साथ फिल्म देखने का भी प्लान बना लिया। इसी तरह एक सप्ताह मौज-मस्ती में बीत गए। इंद्रदेव का तो पता नहीं लेकिन राधा मुझसे जरूर प्रसन्न हो गई थी। मोहल्लेवाले सुबह सुबह फिर मेरे घर के सामने खड़े हो गए और कहने लगे- "बेटा, हफ्तेभर बीत गए तुमने न तो हवन चालू किया, न पूजा-पाठ। कैसे करोगे इंद्रदेव को प्रसन्न।" मुझमें भी अब तक अध्यक्ष के पूरे गुण आ चुके थे। मैं बोला- "देखिए, वो अध्यक्ष ही क्या जो तुरंत काम कर दे, वो कार्यकर्ताओं का काम होता है। अध्यक्ष तो आराम से काम करते हैं।" इतने में एक चाचा निकल आए और बोले, बेटा आज कम से कम मेंढक-मेढकी की शादी ही करा दो। मैंने कहा ठीक है, ठीक है।


frogअब मैं मेंढक-मेंढकी ढूंढने के लिए निकल पड़ा। अब चूंकि मेंढक शहर में तो मिलने से रहे इसलिए मैं जंगल की ओर निकल प़डा और राधा से शादी की तैयारियां करने को कह गया। दोपहर से शाम हो गई लेकिन मेंढक-मेंढकी नहीं मिले। आखिर एक जगह मैंने मेंढक-मेंढकी देखे, एक सांप उनका शिकार करने की फिराक में था। जैसे ही सांप उन पर झपट्टा मारने लगा मैंने मेंढक-मेंढकी को हाथों में उठा लिया। सांप को अपना निवाला इस तरह छिनता देख बड़ा गुस्सा आया। उसने फुंकार भरी और मेरे पैर में डस दिया, मैं मेंढक-मेंढकी को हाथ में लिये वहीं गिर पड़ा। मैंने फिल्मों में देखा था कि सांप डसने के बाद कोई गांव की लड़की आती है और हीरो के पैर से जहर निकालती है। बस मैं भी उसी अवस्था में पड़ा रहा आदिवासी कन्या के इंतजार में जो मेरे पैर से सांप का जहर निकालेगी। आधे घंटे बीते, एक घंटा बीत गया लेकिन कोई नहीं आई। हमारे हाथों में जकड़े मेंढक-मेंढकी भी सोचने लगे कि ये किस निखट्टू से पाल पड़ गया, इतने देर में तो ये घर पहुंच गया होता। इतने में शेर के गुर्राने की आवाज आई, मैंने आव देखा न ताव बस घर के लिए दौड़ लगा दी। वैसे मुझे संशय है कि वो शेर की ही आवाज थी। जैसे-तैसे मैं अपने मोहल्ले पहुंचा। झट से मेंढक-मेंढकी को तैयार किया और शादी कराने लगे लेकिन इतने में ही चाचा ने आकर अड़गा डाल दिया। कहने लगे "अरे मनहूस, ये क्या कर रहा है। तू तो मेंढकों की शादी करा रहा है। ये दोनों मेंढक हैं।" पूरा मोहल्ला हंसने लगा। मुझे काटो तो खून नहीं। मैं संभला और बोला "अरे चाचा आपको ही मेंढकी की पहचान थी तो खुद की चले जाते।" इतना सुनते ही चाचा घर गए और मेंढकी को उठालकर ले आए। मेरे खून खौलने लगा। "अरे जब आपके पास मेंढकी थी तो मुझे जंगल में मरने के लिए क्यूं भेजा। मेरी तो जान पर बन आई थी।" मैं गुस्से के मारे चिल्लाने लगा लेकिन राधा का चांद सा मुखड़ा देखकर मेरा गुस्सा हवा हो गया।


अगले दिन कड़ी धूप में इंद्रदेव की आराधना करने का कार्यक्रम तय हुआ। सब लोगों को मेरे रूप में बकरा जो मिल गया था। इसलिए मुझे सुबह खूब खिलाया पिलाया गया और इसके बाद धोती पहनाकर चौक में कड़ी धूप में खड़ा कर दिया गया। और मुझे सख्त निर्देशित कर दिया गया कि चार घंटे मुझे इसी अवस्था में रहना है। अब क्या करें अध्यक्षगिरी हम पर हावी जो थी, हम मना न कर पाए। दोपहर के १२ बजे सूरज की तीखी धूप मुझ पर वार किए जा रही थी। नजर घुमाकर देखो तो सब के सब अपने घर में आराम फरमा रहे हैं। सब मुझे बलि का बकरा बनाकर घर में पकवान ठूंसने लगे। बंटी आइस्क्रीम खा रहा था, मोंटी बर्फ का गोला और रमेश मुझे क्रिकेट खेलने के लिए उकसाने लगा। मेरा तो मन किया कि ये आराधना-वाराधना छोड़कर भाग जाऊं मगर जैसे ही भागने की सोचता राधा खिडकी से मुस्कुराने लगती है मेरे विचार फिर बदल जाते। एक बड़ी साजिश के तहत राधा को खिड़की के पास बैठाया गया था ताकि मैं अपनी जगह से हिलूं नहीं। शाम के चार बज गए। इन चार घंटों में मेरे शरीर का रंग धूप से झुलसकर गेहूंए से लाल और फिर जलकर काला हो चुका था। अब बर्दाश्त की भी हद होती है। आखिर में मैं चक्कर खाकर वहीं गिर पड़ा। मैं अपेक्षा कर रहा था कि कोई तो आकर अपने प्रिय अध्यक्ष को उठाएगा लेकिन पूरा मोहल्ला दोपहर की नींद लेने में मस्त था, मेरी राधा भी। अंत में रेंगते-रेंगते मैं घर पहुंचा और जाते ही बिस्तर पर बिछ गया।


दो मिनट में आंख लग गई और मेरी "ड्रीम एक्सप्रेस" की गाड़ी शुरू हो गई। सपने में देखा कि मैं स्वर्ग में हूं, इंद्रदेव मेरे सामने खड़े हैं और मुस्कुरा रहे हैं। उनकी मुस्कुराहट ने मेरी खीझ को बढ़ा दिया और मैं चिल्ला पड़ा, "ये क्या इंद्रदेव, आपके चक्कर में मेरी हालत पतली हो गई है और आप मुस्कुरा रहे हो? अगर अच्छे से बारिश करा देते तो मेरी ये हालत न होती। यहां हमारा शहर सूखा पड़ा है और वहां आप राजस्थान में बाढ़ ला रहे हो। एक जगह भरपूर पानी और दूसरी जगह अकाल। बारिश के मौसम में बरसात नहीं होती और ठंड में बौछारें मार देते हो। आपका तो पूरा टाइमटेबल ही गड़बड़ाया हुआ है। दो-तीन महीने अच्छे से पानी गिरा दो, आप भी खुश हम भी खुश।" इंद्रदेव बोले, "मैं बारिश तो करवा दूं लेकिन पूरी पृथ्वी तो धूल और प्रदूषण से ढंकी हुई है और यहां से कुछ दिखाई ही नहीं देता। यहां से पानी छोड़ता हूं रायपुर के लिए और गिरता है राजस्थान में। कई बार तो एक ही जगह कई बार बारिश हो जाती है और कई जगह सूखे रह जाते हैं। मुझे तो तुम लोग दिखाई ही नहीं देते। अब इसमें मैं क्या कर सकता हूं, सब तो तुम लोगों का ही किया-धरा है। यकीन नहीं होता तो पलटकर देखो।" मैंने पलटकर देखा तो हक्का-बक्का रह गया। सचमुच पृथ्वी पर कुछ दिख ही नहीं रहा था। सिर्फ धूल और धुआं। फिर इंद्रदेव बोले "वैसे तो तुम निखट्टू हो लेकिन दिल के साफ हो, अगर तुम इस धुएं को हटा सकते हो तो बोलो, मैं तो बारिश करने के लिए अब भी तैयार हूं। " मैं निरुत्तर था। मेरा गला सूखने लगा। मैंने धीरे से कहा, "देखिए, पूरे धुएं को तो मैं नहीं हटा सकता लेकिन अपने तरफ से कोशिश कर सकता हूं। जैसे अब मैं गाड़ी का उपयोग नहीं करूंगा। हर हफ्ते पौधा लगाऊंगा, उसकी देखरेख करूंगा आदि।" rain4 इंद्रदेव मंद-मंद मुस्कुराए और बोले "जाओ अपने घर जाओ, बारिश शुरू हो गई है।" मैं सपने से जागा, देखा तो कल-कल की ध्वनि सुनाई दे रही थी। खिड़की खोलकर देखा तो सचमुच बारिश हो रही थी। मैं प्रफुल्लित हो उठा लेकिन सोचने लगा अगर इंद्रदेव से मेरी मुलाकात सपना नहीं सच थी तो मुझे अपने वादे को निभाना तो पड़ेगा।


अगले दिन मैं पौधारोपण की तैयारी करने लगा। तभी राधा आई और बोली बाइल निकालो, फिल्म देखने चलते हैं। मैंने कहा बाइक नहीं, रिक्शा से चलते हैं। rain6वो मुंह बिचकाते हुए बोली "रहने दो"। कुछ देर चुप रहने के बाद वह फिर बोली, "चलो तो फिर पास वाले गार्डन में चलते हैं।" मैंने कहा नहीं आज पौधारोपण करूंगा, तुम मेरे साथ चलोगी। वह बोली "नहीं, मैं घर जा रही हूं।" इसी तरह पूरा हफ्ता निकल गया। मैं अध्यक्ष से फिर निखट्टू की श्रेणी में आ चुका था। कल तक मेरी तारीफ में कसीदे पढ़ने वाले फिर से मुझ पर गालियों की परसात करने लगे थे। इंद्रदेव से किए वादे के अनुसार मैं पैदल भ्रमण ही करता था। इसी पैदल भ्रमण के दौरान मैंने राधा को उसके नए बायफ्रैंड के साथ बाइक पर देखा। दिल टूट गया, मैं हंसा और आसमान की तरफ देखते हुए बोला, "क्या इंद्रदेव ! आप तो खुश हो गए लेकिन आपके चक्कर में राधा हाथ से निकल गई। अब मुझ पर इतनी कृपा की है तो एक कृपा और कर दो बारिश के साथ-साथ एक अप्सरा भी मेरे लिए भेज दो।" तभी बादल गरजने लगे, शायद इंद्रदेव ठहाके लगा रहे थे। जोरदार बारिश होने लगी। एक स्कूटी आई और मुझसे टकरा गयी। मैं स्कूटी के ऊपर और स्कूटी वाली मेरे ऊपर। दो मिनट की सॉरी-वारी के बाद उसने अपना नाम बताया "मेघा"। मेघा को देखते ही मेरे दिल में गिटार बजने लगे। मैने आसमान की तरफ देखा और इंद्रदेव से बोला "थैंक यू इंद्रदेव, मेघा (बारिश) के साथ आपनी मेरी मेघा भेज ही दी।" खैर, उस मुलाकात में मेरा टांका मेघा के साथ भिड़ ही गया और कल मैं उस के साथ फिल्म देखने जा रहा हूं। लेकिन इस इंद्रदेव को प्रसन्न करने वाली घटना से मुझे सबक जरूर मिल गया। अब चाहे कोई भी कहे मैं इंद्रदेव प्रसन्नार्थ समिति का अध्यक्ष नहीं बनने वाला, बहुत भुगत चुका हूं। आप लोग बोलेंगे तब भी अध्यक्ष नहीं बनूंगा वरना ये मेघा भी पवन के साथ उड़ जाएगी।

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loveये प्यार भी बड़ी दिलचस्प चीज होती है। ये प्यार ही तो प्रेरणा देती है। शादी के पहले गर्लफ्रैंड प्रेरित करती है और शादी के बाद बीवी। जिंदगी में कुछ भी करने के लिए प्रेरणा की बहुत जरूरत होती है। और मुझे प्रेरित करती है मेरी प्रेमिका "यूपा"। "यूपा" का पूरा नाम है यूपीए सरकार। यूपा तो मैं उसे प्यार से बुलाता हूं (UPA= यूपा)। यूपीए उसका नाम है और सरकार उसका सरनेम। न..न..न... वो बंगाली नहीं है और न ही उसका जादूगर पी.सी.सरकार से कुछ रिश्ता-नाता है। हां, लेकिन वो जादूगरनी जरूर है। उसी के मोहपाश में तो बंधा हूं मैं। ऐसी है मेरी यूपा।


पहली बार मैंने उसे २००४ में देखा था। वो लहराती, बलखाती केन्द्र में आई थी। मैंने तभी उसे अपना प्रेमपत्र(वोट) दे दिया था। उस समय वो थोड़ी लंगड़ी थी। दरअसल उसका "लेफ्ट" पांव उसे बार-बार दगा दे जाता था। वो जब भी आगे बढ़ना चाहती उसका "लेफ्ट" पैर साथ छोड़ जाता। २००९ में उसने फिर से मुझे पुकारा और मदद मांगी। मैंने तब भी उसे अपना प्रेमपत्र दिया और लड़-भिड़कर दूसरों से भी दिलवाया। मैं इस बार यह पुख्ता करना चाहता था कि मेरी यूपा लंगड़ी नहीं रहेगी। और भगवान ने मेरी सुन ली। मेरी यूपा इस बार अच्छे से चलने-फिरने लायक थी। हालांकि वो अब भी बैसाखियों के सहारे थी लेकिन पहले से स्थिर थी। मैंने मोहल्ले में मिठाई बंटवाई। लोग मुझे पागल कहते थे लेकिन क्या करें दिल तो बच्चा है जी, प्यार दीवाना होता है और हम दिल दे चुके सनम।


जमाना प्यार का दुश्मन होता ही है। हमारे भी दुश्मन कम न थे। लोग हमारे सामने यूपा की बुराई करते तो हमारा खून खौल उठता था। हमारे पिताजी भी यूपा को ताने मारते। पापा तो वैसे भी प्यार-व्यार के खिलाफ होते ही हैं। कल जब मैं दोपहर को सो रहा था तब मैंने लोगों के चिल्लाने की आवाज सुनी। बाहर निकलकर देखा तो लोग पेट्रोल की बढ़ी कीमतों के विरोध में हमारी यूपा का पुतला जलाने और उसका घेराव करने निकले थे। हमारे तन-बदन में आग लगाई। हमारे रहते कोई हमारी यूपा का घेराव करे। हमने एक कार्यकर्ता को बुलाकर पूछा कि ये क्या कर रहे हो। कार्यकर्ता कड़क आवाज में बोला- इस दुनिया के हो कि कहां के हो, दिख नहीं रहा हम सरकार का पुतला जलाने जा रहे हैं। इतना सुनना था कि हमारा पारा चढ़ गया, मैंने मुटठी बांधी एक जोरदार मुक्का उस कार्यकर्ता के मुंह पर जमा दिया। वो कार्यकर्ता वहीं ढेर हो गए। हम बाहें खोलकर अपनी विजय का जश्न मनाने लगे। लेकिन इतने में ही उसके चार-पांच साथी ने आकर हमारी हड्डी-पसली एक दी। हम कराहते पर हुए फिर बिस्तर पर पड़ गए।


हम समझ गए कि ये दुनिया हमारे प्यार को कभी नहीं समझ सकेगी। अरे भाई यूपा हमसे बहुत प्यार करती है और हमारे स्वास्थ्य को लेकर चिंतित रहती है। इसलिए जब हम तोंदियल होने लगे तो उसने हमारी स्वास्थ्य की खातिर अनाजों, सब्जियों, तेल के दाम बढ़ा दिए ताकि हम कम खाए। हम लाख प्रयास के बाद भी जब खुद को कम खाने के लिए प्रेरित न कर सके तो मजबूरी में यूपा को अनाज के दाम बढ़ाने ही पड़ गए। पर लोग ये प्यार कहां समझेंगे। कुछ दिनों से हम कुछ ज्यादा ही आरामपरस्त हो गए थे। हम लाख सोचते कि वॉक पर जाया करेंगे पर नहीं जा पाते। कल-कल करते महीने बीत गए लेकिन हम वॉक पर नहीं गए। ऐसे समय में हमारी यूपा को फिर कड़ा कदम उठाना पड़ा हमारे स्वास्थ्य के लिए। उसने पेट्रोल, डीजल के दाम बढ़ा दिए ताकि अब हमें पैदल चलना पड़े और हम फिर से चुस्त-दुरुस्त हो जाएं और साथ ही रसोई गैस के दाम भी बढ़ा दिए ताकि हम कम खाएं। क्या एक प्रेमिका को अपने प्रेमी का ख्याल रखने का हक नहीं है। वो जब भी हमें प्यार करती है, लोग उसका तिरस्कार करते है, हाहाकार करते हैं। लोगों के इस रवैये ने हमें दुखी कर दिया है। हमारे घरवाले भी यूपा को बुरा-भला कहते रहते हैं।


हाल में जब एंडरसन मुद्दा उठा तो लोगों ने कहा कि यूपा आखिर एंडरसन को वापस क्यूं नहीं लाती। तब हमने कहा कि यूपा संस्कारी और गुणी है। वो अतिथि देवो भवः में विश्वास रखती है। अब एंडरसन बाहर से आया था अर्थात अतिथि था, इसलिए अगर यूपा ने उस अतिथि को सकुशल उसके देश भेज दिया तो क्या बुरा किया। अतिथि देवो भवः का पालन करना पाप है क्या। अब जबकि अफजल और कसाब अब तक फांसी से बचे हुए हैं तो फिर कुछ लोगों ने सवाल उठाना शुरू कर दिया कि यूपा ऐसा क्यों कर रही है, वो उनको फांसी क्यों नहीं देती। मैंने उनको समझाने की कोशिश की और कहा कि मेरी यूपा बहुत सहृदयी है, वह पापी को नहीं पाप को खत्म करने में यकीन रखती है। शायद वो इंतजार कर रही है कि अफजल और कसाब के अंदर के शैतान खत्म हों। तो भी उन लोगों ने मेरी बात नहीं मानी और लगे धरना-प्रदर्शन करने।


loverboyलोग मुझे अब ये कहकर परेशान करने लगे हैं कि अगर ऐसा ही हाल रहा तो २०१४ के बाद यूपा वापस नहीं आएगी। मगर मैं भी सच्चा प्रेमी हूं मैं तब बड़ी संख्या में घूम-घूमकर अपनी यूपा के लिए प्रेमपत्र (वोट) इकट्ठे करूंगा और उसे मरने से बचाउंगा। मेरे दोस्त मुझे कहते हैं कि जब तू यूपा से इतना ही प्यार करता है तो राजनीति में उतरकर उसके पास दिल्ली क्यूं नहीं चला जाता है। मैंने कहा जिस दिन मैं राजनीति में उतर गया, उस दिन यूपा के लिए मेरा प्यार खत्म हो जाएगा, क्यूंकि ये राजनीति बड़ी बुरी चीज है। राजनीति में उतरते ही मेरी प्रेमिकाएं बदल जाएंगी, तब कभी राजग मेरी प्रेमिका बन जाएगी, तो कभी सपा, राजद क्योंकि राजनीति में टिके रहने के लिए मौकापरस्त होना बहुत जरूरी है। और क्या सच्चे प्रेमी मौकापरस्त हो सकते हैं, आप ही बताइए? इसलिए मैंने तय कर लिया है चाहे आप लोग कुछ भी बोले, मैं यूपा से प्यार करना नहीं छोड़ूंगा और यूपाधुन जपता रहूंगा। आईलवयू यू..यू..यू..यूपा।