valentine12आ गया.... आ गया.... प्यार का मौसम आ गया, प्यार करने का मौसम आ गया, प्यार जताने का मौसम आ गया। फरवरी के प्यार के महीने को शुरू हुए बस चंद दिन बीते हैं और चारों तरफ बस प्यार दिख रहा है। जहां देखो वहां प्यार। पहले प्यार अहसास का नाम हुआ करता था। अब प्यार ट्रैंड बन चुका है, फैशन बन चुका है। ऐसा लगता है जैसे "नफरत करने वालों के सीने में प्यार भर दूं,"- गीत गुनगुनाते हुए देव साहब ने पूरी दुनिया में फिल्मी प्यार भर दिया है, खासतौर से फरवरी महीने में। फरवरी के प्यार भरे महीने में भगवान भी ऊपर से जब पृथ्वी को देखते होंगे तो वो भी गोल न दिखकर दिल की आकृति के रूप में दिखती होगी।



आप २१वीं सदी में जी रहे हैं तो आपको एक बात गांठ बांध लेनी चाहिए कि भले ही साल के ३६४ दिन आप "एकला चलो रे" का नारा लगाते हुए बिना किसी गर्लफ्रैंड के गुजार लें लेकिन ३६५वें दिन यानी वेलेंटाइन डे के दिन आपको अपनी वेलेंटाइन के साथ दिखना ही चाहिए वरना जीवन निरर्थक है। आपको तुरंत सांसारिक मोहमाया छोड़कर जंगलों का रास्ता नाप लेना चाहिए। बहुतों का तो न्यू इयर शपथ ही होता है कि ४५ दिन में किसी न किसी को गर्लफ्रैंड बनाना ही है, किसी  को अपने प्यार में खींचना ही है।  १४ फरवरी को बाइक की पिछली सीट पर लड़की को घुमाते हुए दोस्तों के सामने से ले जाना है। जब तक १०-१५ दोस्तों के मुंह से आह...... नहीं निकलती तब तक क्या मजा वेलैंटाइन डे का।


valentine31जैसे बरसात आने के पहले लोग रेनकोट का बंदोबस्त कर लेते हैं। गर्मी के पहले कूलर और ठंडी के पहले गर्म कपड़ों के जुगाड़ में लग जाते हैं। इसी तरह वैलेंटाइन सीजन आने से पहले ही लोगों ने अपने वैलेंटाइन के लिए जुगाड़ जमाना चालू कर दिया।  कुछ डॉक्टर मरीज को तो बचे-खुचे अपनी नर्स को ही प्यार का इंजेक्शन देने लगे। प्रोफेसर टीचर की लव क्लासेस लेने में मशगूल रहते हैं  तो वकील भी प्यार भरे केस लड़ते रहते हैं। सरकारी दफ्तरों का हाल तो और भी निराला रहता है। दफ्तरों के बाबू मैडमों को अपने प्यार की फाइल अग्रेषित कर रहे थे। बड़े अफसर तो इससे आगे जाकर सर्कुलर के माध्यम से अपने प्यार का आर्डर दे रहे थे कि १४ फरवरी को वेलेंटाइन गार्डन में अपरान्ह २.०० बजे वेलेंटाइन डे पर प्यार की बैठक रखी गई है, आफिस में जो भी इच्छुक-अनिच्छुक महिला कर्मी हैं वे आ ही जाएं क्योंकि अगर गलती से हमारा वैलेंटाइन डे खराब हुआ तो अगले दिन से आपकी नौकरी खराब हो सकती है।। कुल मिलाकर फंडा ये कि सब अपने-अपने वैलेंटाइन डे की सेटिंग में बिजी हैं। लव के लिए इतनी सेटिंग देखकर सरकार तो फरवरी को लव मंथ, नो वर्क मंथ घोषित करने की भी तैयार कर रही थी, पर हमने ये घोषणा कुछ समय के लिए टलवा दी। कहा- इतनी भी जल्दी क्या है सरकार, हमारी लव सेटिंग तो होनी दीजिए फिर घोषित करते रहिएगा लव मंथ।


traffic1इतने लवेबल महीने में हमारे गुलगुल पांडे दुखी थे। सबके वेलेंटाइन प्लान जम चुके थे पर इनको तो अभी तक इनकी वेलेंटाइन भी नहीं मिली थी । पिछला वेलेंटाइन भी बिना गुल खिलाए निकल गया था और इस वर्ष भी कुछ ऐसा ही बुरे आसार नज़र आ रहे थे। पर क्या करें सारा कसूर इनकी  नौकरी का था। कभी यहां खड़े रहो, कभी वहां खड़े रहो- ट्रैफिक पुलिस वाले जो थे। कहीं कुछ सेटिंग होने लगती तो झट से अगले दिन शिफ्ट कर दिए जाते। खैर इस साल उन्होंने पूरी तैयारी की है। पिछले साल की ब्लाकब्लस्टर दबंग के सलमान खान की तर्ज पर इन्होंने भी आंखों पर काला चश्मा चढ़ा लिया, मूंछे उगा लीं और निकल पड़े अपनी मटकती हुई हिरोइन की तलाश में। लहराते- उछलते, एक इशारे पर सैंकड़ों गाड़ियों को रोकते, शहर के दबंग गुलगुल पांडे। शहर के हृदयस्थल स्थित चौक पर जबसे इनकी ड्यटी लगी थी इनकी चांदी हो गई थी। हर मिनट चौक से गुजरती  अनगिनत स्कूटी और उस पर बैठी अप्सरा सी स्कूटीवालियां। गुलगुलजी के दिल में तो प्यार के मीठे मीठे गुलगुले बनने लगे। ये सोच उनका दिल बाग-बाग हो जाता कि इस वेलेंटाइन डे पर एक क्या १४०० गर्लफ्रैंड पट जाएंगी। पिछले सारे वेलेंटाइन डे पर सिंगल रहने के पाप एक बार में धुल जाएंगे।


अगले ही दिन उनके नैन एक स्कूटी वाली के मस्त मस्त नैन से लड़ गए। गुलगुल पांडे तो मानो प्यार में सब भूल गए। हरे लाइट पर ट्रैफिक रुकवा देते तो लाल लाइट पर गाड़ियां छोड़ देते। जैसे ही किसी जोड़े को साथ घूमता देखते उनके दिल में प्यार की लहर और जोर से हिलोरें मारने लगती। जिस तरफ इनकी वेलेंटाइन गाडी लिए खड़ी रहती उसी तरफ की ट्रैफिक छोड़ देते। इनकी वेलेंटाइन भी रोज कातिल मुस्कान देते हुए निकल जाती जिसे देख ये और बांवरे हो जाते। दिन ब दिन ये बांवरापन बढ़ता गया और कुछ दिनों में ये शत-प्रतिशत बांवरे हो गए। पर कहते हैं न इश्क इज फुल ऑफ रिस्क। वेलेंटाइन डे के लिए वेलेंटाइन तो ताड़ ली थी पर वेलेंटाइन डे पर होने वाले खर्च के लिए वेलेंटाइन फंड अब भी खाली था। तो हमारे गुलगुलजी ने अगले ही दिन से शुरू कर दिया फंड भरो अभियान अर्थात वसूली अभियान। हर आती-जाती गाड़ी को रोककर किसी न किसी कारण उसका चालान काटते, चालान का डर दिखाकर ऑन द स्पॉट सेटिंग करते और अपनी जेब गर्म करतो। इस तरह चंद दिनों में अच्छा खासा फंड जमा भी जमा हो गया और लोगों में इनकी दहशत भी आ गई। इनकी दहशत देखकर अब लोग इनके पास गाड़ी तो क्या पैदल फटकने से भी कतराने लगे।


traffic love cartoonवेलेंटाइन भी देख ली थी, फंड भी इकट्ठा कर लिया, इंतजार था तो बस चाहत के इकरार का।  फिर आया वो हसीन दिन ९ फरवरी २०११। गुलगुल पांडे दूल्हे की सज-धजकर, गाना गुनगुनाते हुए निकले। बाहर निकले ही थे कि पड़ोसी ने टोक दिया- "ध्यान से गुलगुल जी ९.२.११ को प्रणय निवेदन करने जा रहे हो, कहीं आपकी वेलेंटाईन ही ९-२-११ न हो जाए।" गुलगुलजी जल्दी में थे इसलिए बस आंखें दिखाई और चल दिए। आंखों में चश्मा चढ़ाए, हाथों में फूल लिए वे स्कूलीवाली का चौक के बीचों बीच इंतजार करने लगे। उन्हें वो दूसरी तरफ खड़ी दिखाई दी। वे उसकी तरफ दबंग स्टाइल में बढ़ने लगे। पहले तो उन्हें देख उनकी वेलेंटाइन रोज़ की तरह मुस्कुराई लेकिन उनके दबंग स्टाइल को देख डर गई और सोचने लगी "कहीं ये चालान काटने तो नहीं आ रहा, मैंने तो लाइसेंस भी नहीं बनवाया अब तक, क्या बहाना बनाउंगी? क्या बोलूंगी?  रोज तो स्माइल देकर निकल जाती थी, पर कहीं आज फाइन न देना पड़ जाए। यहां से निकलने में ही भलाई है, कहीं ये पकड़ न ले। " ये सोचते हुए उसने गाड़ी स्टार्ट की और फरार्टे भरते हुए निकल ली। चुलबुल जी हाथ के पीछे गुलदस्ता दबाए उसे ताकते रह गए। कुछ देर में वो नजरों से ओझल हो गई। बस फिर क्या था वेलेंटाइन के जले गुलगुलजी ने फूल फेंका और प्रण ले लिया कि- "१४ फरवरी को कोई भी जोड़ा साथ दिखाई दिया तो इतने चालान काटूंगा, इतने चालान काटूंगा कि कन्फ्यूज हो जाएगा कि चालान पटाऊं या वेलेंटाइन डे मनाऊं।" सबका वेलेंटाइन खराब कर दूंगा। इस तरह गुलगुलजी का यह वेलेंटाइन भी वेलेंटाइनलैस निकला देखें अगले साल क्या होता है इनका। आशा करता हूं आप लोगों की वेलेंटाइन डे अच्छी रहेगी।
CoolClips_wb024699सर्वप्रथम मैं अप्सरा सी सुंदर न... न... साक्षात अप्सरा कैटरीना कैफ जी के फूलों से कोमल-कोमल गालों पर मुहांसों का वर्णन करने के लिए क्षमा चाहता हूं। आशा करता हूं कैटरीना जी के प्रशंसक मेरे पीछे नहा- धोकर नहीं पड़ेंगे। सच कहता हूं जिस दिन कैटरीनाजी के खूबसूरत गालों में एक छोटा सा मुंहासा भी हो गया, मैं पूरे देश में मुंहासे उन्मूलन कार्यक्रम चला दूंगा। परंतु यहां जिस कैटरीना की मैं बात करने जा रहा हूं वो शीला वाली कैटरीना नहीं, वरन हमारी कैटरीना हैं। हमारी कैटरीना जो  हमारे आसपास है, जो कदम-कदम पर हमारे साथ है, हमारी काली-कलूटी कैटरीना। दरअसल हमारे शहर की सड़क ही हमारी कैटरीना है।




अब इससे पहले आप पूछें कि हमने सड़क को कैटरीना की उपाधि क्यों दी तो हम याद दिला दें जैसे लालू ने एक जमाने में कहा था कि बिहार की सड़कें हेमा मालिनी के गालों की तरह चिकनी बनेंगी परंतु वो कितनी चिकनी बन पाई ये तो सब जानते हैं।  हमारे शहर रायपुर के राजधानी बनने के बाद बाकी के रंग-रोगन कार्य के साथ सड़क निर्माण का कार्य भी जोर-शोर से चहुंओर शुरू हो गया। चिकनी चिकनी सड़क को बनता देख हमारे मन प्रफुल्लित हो उठता कि हो न हो ये सड़क बिलकुल हेमा मालिनी के गालों की तरह चिकना बनेगी पर फिर यह विचार हमने त्याग दिया क्योंकि अब हेमाजी को गुजरे जमाने की अप्सरा हो गई ना।




bikeranimतो हमने तय किया कि अब हमें हेमाजी नहीं कैटरीना के गालों की तरह ही शहर की सड़कें चाहिए। कैटरीना आज की अफ्सरा हैं। वैसे भी कैटरीना और रायपुर का पुराना नाता है, दोनों में कई समानताएं भी हैं। जी नहीं, कैटरीनाजी कभी रायपुर नहीं आई। लेकिन जब वे सलमान खान के साथ गलबाहे डाले घूमते हुए जब बॉलीवुड में नई-नई आई थीं बस तभी हमारा शहर भी नया-नया राजधानी बना ही था। उस समय दोनों ही गुमनाम से थे। फिर धीरे धीरे दोनों ने सफलता की सीढ़ियां चलना चालू किया।  दोनों दिन-प्रतिदिन प्रगति करते रहे। और आज आलम यह है कि कैटरीना कैफ महंगी अभिनेत्रियों में शुमार हैं और रायपुर महंगे शहरों में। कैटरीना तो हमारे पहुंच से दूर थी ही, अब इस महंगे रायपुर में जीने के लिए जरूरी चीजें भी हमसे दूर हो गई  हैं।




road rollerअब ले चलता हूं आपको अपने शहर के सडकों की तरफ। पिघलता हुआ गरम-गरम डामर और उसे समतल करता रोड रोलर अहा! क्या नजारा रहता था। नई-नई चिकनी सड़क बिलकुल कैटरीना के गालों की तरह चिकनी। हमें तो मानो प्यार हो गया था इससे। उसी समय नई नई गाड़ी ली थी ऊपर से नई नई सड़क, क्या जोड़ी थी। चिकनी सड़कों पर फर्राटा भरती हमारी गाड़ी। बहुत बार मैं इन चिकनी सड़कों पर गिरा भी पर दर्द नहीं हुआ, प्यार में जो था। पर कुछ समय बाद हमारी कैटरीना के चिकने गालों पर मुहांसे हो गए। बहुत सारे मुंहांसे। चिकनी सड़क में इतने गड्ढे हो गए कि गाड़ी पे फर्राटा भरना तो दूर, चलना भी दूभर हो गया। समझ नहीं आता था सड़क पर गड्ढे हैं या गड्ढों पर सड़क। पता नहीं किस कलमुहें ने नजर लगा दिया हमारे शहर की चिकनी सड़क को। किस जलनखोर को हमारे सड़क के सौंदर्य से ईर्ष्या हो गई। इन गड्ढों की वजह से मैं बहुत बार गिरा और इस बार बहुत जोरदार चोटें भी खाईं। जिस चिकनी सड़क पर हम आकर्षित हुआ करते थे अब उनसे डर लगने लगा था। मैंने आखिर में सड़क से ब्रेकअप कर लिया और पैदल चलने की कसम खा ली।




बहुत समय बाद मेकअप वालों अर्थात सड़क निर्माण विभाग को कैटरीना के गालों की चिंता हुई। बस फिर क्या, शुरू हो गया मेकअप से मुहांसों को ढकने का काम। पर इससे भी कुछ खास बात न बनी। पता नहीं कैसा सस्ता मेकअप लगाया था जो कुछ दिनों में ही निकल गया। ये सिलसिला न जाने कितने सालों तक चलता रहा पर हर बार खराब क्वालिटी के मेकअप के कारण मुहांसे फिर उभरने लगते। हमारी कैटरीना के गालों की पहली वाली सुंदरता वापस न आ सकी। पहले तो प्यार में आकर हम गाड़ी से सड़क पर गिर भी जाया करते थे पर अब तो न.. न.. न..। मुहांसे भरी सड़क पर अब हिचकोले खाते हुए गाड़ी चलाने की हमने विवशतावश आदत बना ली थी।


motorcycle15खैर अच्छी बात यह है कि पिछले साल नवंबर में हमारे राज्य के दस वर्ष पूरे हुए। जश्न हुआ, समारोह हुए, योजनाएं भी बनी जिसमें हमारे मुहांसे भरेसड़क को वापस कैटरीना के गालों की तरह चिकना बनाने की योजना भी थी। बस फिर क्या था, पिघलते हुए डामर की खुशबू ने हमारी सांसों में उतरना शुरू कर दिया। रोडरोलर से चिकनी हुई सड़क फिर आकर्षित करने लगी। मेकअप के पश्चात चिकनी और सुंदर हुई सड़क पर हमारा दिल फिर आ ही गया। अब इस बार इसकी खूबसूरती कब तक रहेगी ये तो मेकअप वाले ही जानें पर अभी तो मैं चलता हूं अपना प्यार जताने, चिकनी चिकनी सड़क पर फर्राटा भरने।
neta spiritकुछ दिनों पहले अखबार में एक बड़ी रोचक खबर पढ़ने को मिली। फिल्म और खेल पन्ने के बीच में दबे-कुचले से पन्ने में छपी इस खबर पर मेरी नजर अटक गई। कैटरीना की टांगों ने मुझे फिल्म पेज की तरफ आकर्षित करने की कोशिश लेकिन मैं डिगा नहीं. सचिन ने भी बल्ला दिखाकर खेल पेज पढ़ने की पेशकश दी पर मैंने वो भी ठुकरा दी। आखिर में उस खबर को पढ़कर ही मैंने दम लिया। खबर का शीर्षक था- "२१ ग्राम की होती है आत्मा"। खबर पढ़कर मुझे विश्वास नहीं हुआ। आत्मा का वजन मात्र २१ ग्राम। ये कैसे मुमकिन है।


इन प्रयोगधर्मी खुरापाती वैज्ञानिकों ने न जाने किन उल-जुलूल परीक्षणों के आधार पर आत्मा का वजन निकाल लिया। पहले एक इंसान का मरने के पूर्व वजन किया और फिर मरने के उपरांत। दोनों में २१ ग्राम का फर्क आया। बस इसी आधार पर घोषणा कर दी कि आत्मा का वजन २१ ग्राम है। पर मेरा मन अब भी यह स्वीकार करने को तैयार नहीं था।

जरूर जिस व्यक्ति के शरीर को तौलकर आत्मा का वजन निकाला गया होगा वह बहुत सज्जन, ईमानदार और साफ दिल का रहा होगा। वैसे इस प्रजाति के लोग दुनिया में ज्यादा नहीं बचे हैं। जिस तरह बाघों को बचाने अभियान चलाया जा रहा है, इनको बचाने भी अभियान चलाने की जरूर है। खैर मुद्दे की तरफ वापस चलते हैं। वह शख्स जरूर सज्जन किस्म का इसलिए रहा होगा क्योंकि अगर उसने कुछ पाप वगैरह किए होते तो उसकी आत्मा पर बोझ रहता जिससे आत्मा का वजन बढ़ता ना। परंतु आत्मा का वजन मात्र २१ ग्राम निकला यानि उन्होंने कुछ छोटे-मोटे मामूली टाइप के पाप किए होंगे जिस पर उनको रियायत देते हुए भगवान ने उनको स्वर्ग में एंट्री दे ही दी होगी। आशा करते हूं वे वहां मज़े से होंगे और पृथ्वी पर दोबारा आने की गलती कतई नहीं करेंगे।

वैसे अंदर की खबर यह पता चली है कि इस व्यक्ति से पहले भारत के एक अति भ्रष्ट मंत्री की भी आत्मा का वजन लिया गया था। परंतु उनकी आत्मा में इतना मैल था कि उसका वजन उनके शरीर से भी ज्यादा निकल गया। ऊपर से उनके पेट से चिपका ५० किलो का मटका जो उनके द्वारा किए गए बड़े-बड़े घोटालों की बानगी दे रहा था। इनकी आत्मा का वजन निकालने में लगी मशीन ने तो वहीं हाथ-पैर जोड़ लिए और वजन निकालने से तौबा कर ली। वैज्ञानिकों ने भी इस खबर को बाहर जाने नहीं दिया वरना आम जनता तो मरने से भी डरने लगती।

दूसरी तरफ इन मंत्रीजी की भारी-भरकम किसी तरह घिस-घिसटकर स्वर्ग के दरवाजे तक तो पहुंच गई लेकिन इनकी हैवीवेट आत्मा स्वर्ग के छोटे से द्वार से कहां निकल पाती। कभी ये द्वारपाल से जुगाड़ जमाने की कोशिश करते तो कभी चित्रगुप्त से गुप्त रूप से मित्र बनने का प्रयास करते, पर सब व्यर्थ। अंत में चित्रगुप्त ने साफ साफ कह ही दिया कि जाओ डाइटिंग करो थोड़ा वजन घटाओ, इतने पाप करके आत्मा पर बोझ बढ़ा दिया जाओ बोझ कम करो फिर यहां आओ। अब मंत्रीजी की भारी भरकम आत्मा वापस पृथ्वी पर आकर भटक रही है। और अब वे अपने तरह के भ्रष्ट लोगों की पोल-पट्टी में खोलने में लगे हैं ताकि कुछ तो वजन घटे और स्वर्ग का टिकट कटे। इन दिनों में उन्होंने बहुतों के घोटाले की किताब खोलकर रख दी एक के बाद एक। वैसे आपने तो कुछ पाप-शाप नहीं किए ना। किए भी हैं तो टेंशन नॉट अभी उनका फोकस सिर्फ बड़े मुर्गों पर है पर पता नहीं कब छोटे-मोटे पापियों पर भी नजर रखने लग जाए। संभलकर रहिएगा कहीं वो आपके आसपास न हो, वैसे भी आत्मा दिखाई नहीं देती। म..म..मै... चलता हूं इनकी आत्मा तो मेरे पीछे ही खड़ी है। भागता हूं.... फिर मिलूंगा।

snakeसांप एक बहुत ही भोला-भाला, मासूम सा जीव है। अजी, सच कह रहा हूं। अब जो भोलेनाथ के सर की शोभा बढ़ाता है वो भी तो भोला होगा ना। नीतिवचन में कहा गया है कि सीधे वृक्ष काट दिए जाते हैं और टेढ़े-मेढ़े वृक्ष ज्यों के त्यों रहते हैं। ठीक उसी तरह सीधे-सादे सांप का मनुष्य ने बहुत शोषण किया। कभी बिना उसकी इजाजत के उसे मुहावरों में जबरन ठूंस-ठूंसकर उसे खलनायक का दर्जा दे दिया तो कभी फिल्मों में उसे फिट करके पैसे बना लिए और सांपों को रायल्टी तक नहीं दिया। यहां तक तो बेचारे सांप ने किसी तरह बर्दाश्त कर भी लिया मगर हद तो तब हो गई जब इंसानों ने उसके निजी जीवन तक को नहीं छोड़ा। जंगलों में कैमरे लगा दिए। नाग-नागिन रोमांस करने जाएं तो उसकी शूटिंग, बिल से बाहर निकले तो शूटिंग, बिल में छुपे रहे तो भी शूटिंग। इतनी शूटिंग हो गई कि दहशत में कई नागिनों ने तो अंडे देना ही बंद कर दिए। प्रणय के लिए जा रहे एक सांप को एक जीव वैज्ञानिक ने रास्ते में ही उठा लिया और उंगली दिखा-दिखाकर उसकी विशेषताएं बताने लगा। बेबस सा सांप फुफकारते हुए बोला- " मेरी जितनी विशेषताएं बताना है बता ले, लेकिन अगर आज मैं अपनी प्रेमिका से नहीं मिल पाया तो सोच लेना तुझे तेरी सुहागरात नहीं मनाने दूंगा।"  इंसानों की आबादी तो बढ़ती रही लेकिन सांपों की आबादी पर अल्पविराम लग गया।


फिर भी सांप सब कुछ रेंगते-रेंगते सहते रहे। सांप के आहार में चूहे, गिलहरी जैसे छोटे जानवर आते हैं लेकिन इंसानी करतूत के कारण इनका आहार भी छिन गया। गिलहरी और मेंढक तो ढूंढे नहीं मिलते हैं फिर भी जिस दिन मिल गए समझो उस दिन सांपों की दिवाली होती थी। इसलिए सांपों ने मजबूरन चूहे को ही अपने मेनू में टॉप पर रखा था पर यहां भी उनका निवाला छिन गया। यूरिया और खाद मिले अनाज खाने वाले चूहे को खाने से कई सांपों के पेट में मरोड़ होने लगा और कई तो मौके पर ही लुढ़क गए। सांपों की ऐसी दुर्गति देखकर सांपों ने प्रकृति के विपरीत जाकर शाकाहारी होने का फैसला किया। ऐसा ही एक शाकाहारी नाग सुबह अपनी प्रेमिका नागिन के लिए भोजन की तलाश में निकला। नागपंचमी के दिन तो दोनों ने दूध में "मिल्क बाथ" लिया लेकिन उसके बाद से उनको कोई पूछने नहीं आया और तब से उपवास ही चल रहा है। सांप सोचने लगा ये नागपंचमी रोज क्यों नहीं आती। सोचते-सोचते वह हनुमान मंदिर के पास पहुंचा। हनुमान जी की मूर्ति के पास भोग में चढ़ने वाला सामान रखा हुआ था। मिठाई, फल, आदि। सांप ने सोचा यहीं फन मारा जाए, मंदिर भी पास ही में है पांच मिनट में काम निपट जाएगा। बेचारा सब बटोर ही रहा था कि उसे किसी ने देख लिया। उसे देखने वाला सनसनी की खोज में निकला टीआरपी की मार से पीड़ित न्यूज चैनल का सनसनाता रिपोर्टर था। सांप को हनुमानजी को चढ़ा भोग खाता देख उसने उसे हनुमानभक्त सांप की पदवी दे दी और फौरन अपने जैसे अन्य सनसनीपिपासु पत्रकारों को वहां मिनटों में खड़ा कर दिया। लोग इकट्ठे होते चले गए, दो आए, चार आए, आठ आए, पलक झपकते ही पूरा मंदिर हाऊसफुल हो गया। कुछ देर बाद तो हनुमानभक्त सांप को देखने टिकट लगने लगा था। कुछ चलताऊ किस्म के टपोरियों ने तो वहां साइड में साइकिल और गाड़ी स्टैंड भी लगा दिया। सायकिल का १० मोटसायकिल का २० और कार का ५० रुपए मात्र। हां प्रेसवालों और वीआईपी लोगों के लिए मुफ्त।


हनुमानभक्त सांप ने अब तक कईयों का बेड़ा पार लगा दिया था। सुबह से दोपहर हो गई वह सांप उसी अवस्था में अपनी कुंडली में मिठाई, फल और भोग का प्रसाद लपेटे हुआ था। वो तो आया था ५ मिनट के लिए लेकिन इन खुरापानी इंसानों ने ५ घंटे रुकवा दिया। इतने में ही किसी पंडित ने घोषणा की कि यह सांप परम हनुमान भक्त है। पिछले जनम में ये परम हनुमान भक्त था और इस जन्म में सर्प रूप में फिर हनुमानजी के चरणों में अपनी भक्ति दिखाने आया है। सांप सोचने लगा- "खाली पेट न होय भक्ति, मैं तो खाना जुगाड़ने आया था या ये लोग मुझसे भक्ति करवाने पर तुले हैं। इस पंडित को अपने इस जन्म का ठीक से पता नहीं और मेरे पिछले जनम की कहानी सुना रहा है।" सभी रिपोर्टर पंडित की इस बात को लाइव दिखाने लगे। पंडित भी खुद को कैमरे के सामने पाकर अपने लुक पर ध्यान देने लगा और बीच-बीच में अपने बाल और धोती भी ठीक करता। इधर सांप बाहर निकलने के लिए जरा सी हलचल क्या करता कि सारे कैमरे और माइक उसी की ओर घूम जाते। सांप की तरह दिख रहे माइक उस हनुमान भक्त सांप को और भयभीत कर रहे थे। मगरमच्छ के मुंह की खुले हुए कैमरे उस हनुमानभक्त सांप को खा जाने को आतुर थे।


इसी बीच थका हुआ सांप जरा देर के लिए सो गया। तभी किसी ने हल्ला कर दिया कि हनुमानभक्त सांप को हनुमानजी के चरणों में अद्भुत शांति का अनुभव मिल रहा है, तभी वो उनके पैरों में सो गया। देखों किस तरह खुद को हनुमानजी के चरणों में खुद को अर्पित कर दिया है। इतना सुनते ही सांप फिर जाग गया। वह भगने के प्रयास में दाएं मुड़ता तो कोई एक नई कहानी के साथ पेश हो जाता है। बाएं मुड़ता तो फिर कोई कहानीकार नई कहानी बना देता। ऐसे लग रहा था मानो देश के सारे कहानीकार यहीं उपस्थित हो गए हैं और सांप के साथ अपना बैर निभा रहे हैं। एक चलते-फिरते भजन गायक ने तो तत्काल हनुमानभक्त सांप के ऊपर आरती बना दी और उसका आरती गायन भी शुरू कर दिया। कुल मिलाकर सबकी अपनी अलग-अलग कहानी थी, पर सबका हीरो एक ही था- "हनुमानभक्त सांप"।


अभी ये सब चल ही रहा था कि हनुमानभक्त सांप को दूध पिलाने लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा। कुंवारे-कुंवारियां विशेषकर दूध पिलाने आए क्योंकि पंडितजी ने घोषणा कर दी थी कि इस हनुमानभक्त सांप को दूध पिलाने वाले कुवारे-कुवारियों की शादी महीनेभर के भीतर हो जाएगी। सांप सोचने लगा- "अबे बेवकूफों, तुम लोगों के चक्कर में मेरी खुद की शादी नहीं हुई। बमुश्किल एक नागिन मिली है उसी के साथ लिव इन रिलेशनशिप में हूं और तुम लोग मुझे दूध पिलाकर अपनी शादी करवाने के जुगाड़ में हो। अरे निर्दयियों अगर मैंने इतना दूध पी लिया तो मेरा रंग तो ऐसे ही काले से गोरा हो जाना है और जात बाहर हो जाऊंगा वो अलग।" फिर भी लोग हनुमानभक्त सांप को दूध पिलाने लड़ते-मरते रहे।


हनुमानभक्त सांप बाहर निकलने का रास्ता तलाशने लगा। इसी जुगत में वह हनुमानजी की मूर्ति के चक्कर लगाने लगा। तो लोग इसका अर्थ निकालने लगे कि सांप भक्तिधुन में नाच रहा है और उसे मोक्ष मिलने वाला है। सांप भी परिक्रमा करते हुए सोचने लगा- "तुम लोगों को जो सोचना है सोचो, एक बार यहां से निकल जाऊं कसम खाता हूं दोबारा नहीं आऊंगा। मेरे लिए तो फिलहाल यहां से निकलना ही मोक्ष समान है।"


शाम से रात हो गई। सांप भी बाहर न जाने के कारण उकता गया था। सबकी नींद उड़ाने वाले रिपोर्टर धीरे-धीरे नींद की गिरफ्त में आ गए। सांप ने मौका देखा और अपनी केंचुली निकालकर वहां से खिसक लिया।  नींद खुलने के बाद रिपोर्टरों ने जब सांप को गायब देखा और सिर्फ उसकी केंचुली देखी तो फिर टीवी पर ब्रैकिंग न्यूज फ्लैश करने लगे- हनुमानभक्त सांप हनुमानजी में समा गया। ऐसी अद्भुत भक्ति  कभी किसी ने देखी न होगी। सांप अपनी केंचुली यहां छोड़कर हनुमानजी की मूर्ति में समा गया। जय हो हनुमानभक्त सांप की। सब रिपोर्टर फिर से हनुमानजी की मूर्ति और केंचुली की फोटो उतारने में मशगूल हो गए। लोगों द्वारा हनुमानभक्त सांप की आरती गायन और कहानी लेखन का कार्यक्रम फिर से शुरू हो गया। सांप दूर से ही यह सब देखता रहा और वापस चले गया।


बम्पर ऑफर- अगर आप लोग हनुमानभक्त सांप की आरती को अपना रिगटोन बनाना चाहते हैं तो अपने मोबाइल से saap लिखकर 55555 पर भेज दीजिए। हनुमानभक्त सांप की केंचुली के फोटो और उससे बने ताबीज के लिए आप संपर्क कर सकते हैं बाबा नागराज से। घरपहुंच सेवा उपलब्ध है। घरपहुंच सेवा का अतिरिक्त चार्ज लगेगा क्योंकि हमारे हॉकर कोई नागराज नहीं हैं जो उड़कर आप लोगों के घर टपक जाएंगे, गाड़ी से आना पड़ेगा और पेट्रोल भी महंगा हो गया है।

"बाढ़-बाढ़ देखो, हजार बार देखो कि देखने की चीज है हमारा देश डुबा।" भारत में हर साल आने वाले बाढ़ को देखकर मेरा मन यही कह उठता है। वैसे तो हमारा देश कई तरह के बाढ़ में डूबा हुआ है जैसे- घोटालों की बाढ़, भ्रष्टाचार की बाढ़, महंगाई की बाढ़ लेकिन यहां मैं पानी के बाढ़ के बात कर रहा हूं। अभी कुछ ही हफ्तों पहले गर्मी से तिलमिला रही दिल्ली अचानक पानी में डूब गई। वैसे दिल्ली के यूं अचानक डूब जाने की खबर ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि इसके पीछे किसका हाथ हो सकता है। वैसे भगवान ने जो चीज कम दी है (दिमाग) उसका उपयोग कम ही करना चाहिए लेकिन क्या करें बात ही ऐसी है कि हमें सोचना पड़ गया। सबसे पहला शक तो मुझे कलमाड़ी पर ही हुआ पर वो तो पहले ही कॉमनवेल्थ का बहुत पैसा डकारकर दिल्ली को डुबो चुके हैं और दूसरी बार डुबाने का उनके पास अभी चांस नहीं है इसलिए उनको इसका जिम्मेदार नहीं माना जा सकता था। बहुत दिनो से खबरें आ रही थीं कि स्वर्गलोक में तिकड़म भिड़ाकर कुछ नेता वहां पहुंच गए हैं। पहले तो लगा कि शायद गड़बड़ वहीं से हुई है। लेकिन इन्द्रदेव से संपर्क करने पर पता चला कि अभी तो वहां स्थिति नियंत्रण में है लेकिन कुछेक नेता और आ गए वहां तिकड़म भिड़ाकर तो स्वर्ग को नरक बनते देर नहीं लगेगी। (वो क्या है ना "काले मेघा पानी तो बरसा" व्यंग्य लिखने के बाद से अपनी इंद्रदेव से जमने लगी है इसलिए कभी कभी संपर्क उनसे भी साध लेते हैं।)


अब मैं किसी और को ढूंढने लगा जिस पर शक किया जा सके। तभी शक की सुई मणिशंकर अय्यर के तरफ गई। वह भी उन लोगों में से हैं जो नहीं चाहते कि कामनवेल्थ गेम्स हों। कामनवेल्थ गेम्स के बारे में विवादास्पद बयान के बाद से तो उनके दर्शन ही नहीं हुए। अब लग रहा है शायद वो तपस्या करने चले गए थे ताकि गेम्स न होने की उनकी इच्छा पूरी हो। पर जिस तरह से गेम्स की तैयारियां चल रही हैं गेम्स हो पाएंगे ऐसा लगता तो नहीं। बेवजह ही अय्यरजी तपस्या करने चले गए, खैर अगर भगवान के पास एक्सचेंज ऑफर चल रहा हो तो अय्यरजी अपनी इच्छा को एक्सचेंज करा सकते हैं और उसके बदले कुछ मंत्री-वंत्री पद का इच्छा पूरी करवा सकते हैं। 


बाढ़  से जनजीवन तो अस्तव्यस्त हुआ लेकिन इसने गरीब और अमीर के बीच की खाई को कुछ समय के लिए कम कर दिया। बाढ़ में डूबी कार के कारण अमीरों को भी गरीबों की तरह घुटने तक भरे पानी में अपनी पतलून को मोड़कर घर पहुंचना पड़ा। क्योंकि पैसे से कार तो खरीदा जा सकता है लेकिन बाढ़ का पानी कम नहीं किया जा सकता। 


हर साल आने वाले बाढ़ को देखते हुए कुछ दूरदर्शी लोगों ने मोटरगाड़ी के अलावा नाव भी खरीदकर रख लिया था क्योंकि उन्हें पता था कि जहां दिल्ली डूबी, न तो गाड़ी काम आएगी न सायकिल। बस नाव ही है जो नैया पार लगाएगी। इसलिए जैसे ही दिल्ली डूबी सब अपनी-अपनी नाव लेकर निकल पड़े डूबी हुई सड़क पर सवारियों को पकड़ने। अब अमीर हो या गरीब सब एक नाव पर साथ बैठे हैं, मजबूरी के मारे। दिल्ली में नाव की इतनी उपयोगिता देखते हुए कई बैंकों ने तो अब नाव लोन भी शुरू करने का मन बना लिया है वहीं कुछ बड़े और अपने स्टेटस का ख्याल रखने वाले उद्योगपति तो जहाज लेने की फिराक में है। अरे कोई  इन्हें बताओ अगर जहाज दिल्ली में उतरवा भी लिया तो चलाएंगे कैसे। कहीं तंग गलियों में इनकी जहाज फंस गई तो ५-६ महीने नहीं निकलने वाली और ईद, दशहरा, दिवाली सब इसी जहाज पर मन जाएगा। वैसे मानसून के समय डूबी हुई दिल्ली को देखते हुए मोटरसायकिल कंपनियां भी नाव या मोटरबोट निर्माण में उतरने को आतुर हैं। मगर अभी समय की अल्पता के चलते ट्यूब ऑफर से ही काम चला रही हैं। एक मोटरसायकिल के साथ दो ट्यूब मुफ्त। मियां-बीवी सुबह लांग ड्राइव पर निकलें, शाम तक अगर दिल्ली डूबी हुई मिले तो गाड़ी कोने में टिकाएं और दोनों ट्यूब पहनकर तैर-तैरकर अपने घर पहुंच जाएं।


बाढ़ के कारण लगे जाम में सबकी गाड़ियां फंसी रही। इनमें मंत्रीजी की भी गाड़ी शामिल थी। अब और दिन मंत्री जी की गाड़ी सायरन बजाते, सबको साइड करते निकल जाती थी लेकिन अब बाढ़ का पानी तो सायरन की आवाज से साइड होने से रहा ना इसलिए वे मुंह लटकाए चिंतन करते हुए बैठे रहे। न...न..न... अगले घोटाले का चिंतन नहीं बल्कि गाड़ी से बाहर कैसे निकलें उसका चिंतन। अब बाहर निकले तो घात लगाए बैठे रिपोर्टर सवालों की फायरिंग से मार देंगे। और डूबती हुई कार में कब तक बचा जा सकता है। इसलिए मंत्रीजी ने धीरे से कार का दरवाजा खोला और घुटने तक भरे पानी में मुंह छिपाए धीरे धीरे चलने लगे। लेकिन पानी के अंदर छुपे एक उच्च श्रेणी के चिपकू पत्रकार ने उनका पैर पकड़ लिया। मंत्रीजी को लगा कि किसी जोंक ने पकड़ लिया है, उन्होंने छुड़ाने की कोशिश की लेकिन छुड़ा न पाए क्योंकि पकड़ने वाला जोंक से भी ज्यादा चिपकू किस्म का पत्रकार था। वह पत्रकार माइक और कैमरे जैसे खतरनाक हथियारों से लैस  था। इतने में बाकी रिपोर्टरो ने भी उन्हें घेर लिया। सबने अपनी माइक उनके मुंह के सामने टिका दीं। मंत्रीजी को बचने का कोई रास्ता नहीं दिखा, और उन्होंने मजबूरन  कहा- "अब हमें धर ही लिया है तो पूछिए क्या पूछना है"। 

एक पत्रकार ने पूछा- "मंत्रीजी आप इस बाढ़ के लिए किसको जिम्मेदार मानते हैं।" 

मंत्रीजी- "इस बाढ़ के लिए कामनवेल्थ गेम्स और कलमाड़ी दोषी हैं "

पत्रकारों ने आश्चर्यचकित होकर पूछा- "आप कैसे कामनवेल्थ गेम्स को दोषी ठहरा सकते हैं?"

मंत्रीजी- "अरे सोचना कैसा। आजकल तो सीजन ही चल रहा है कामनवेल्थ गेम्स और कलमाड़ी पर दोष मढ़ने का। जिसे देखो वही अपना दोष उन पर मढ़ दे रहा है। मलेरिया फैल रहा है तो कामनवेल्थ गेम्स दोषी। पीलिया हो गया तो कलमाड़ी दोषी। ट्रैफिक जाम है कामनवेल्थ गेम्स दोषी और अकाल पड़ गया तो भी कामनवेल्थ गेम्स दोषी। अरे भई, सीज़नल ऑफर चल रहा है हमने थोड़ा फायदा उठा लिया तो क्या बुरा किया।"

असंतुष्ट पत्रकार फिर उबल पड़े- "आप इस तरह बच नहीं सकते। आपको बताना ही होगा कि कौन जिम्मेदार है इस बाढ़ के लिए।"

मंत्रीजी- "ठीक है आप इस तरह नहीं मानने वाले। मैं इस बाढ़ के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार मानता हूं।"

पत्रकार फिर चौंक पड़े- "अब पाकिस्तान कैसे इस बाढ़ के लिए जिम्मेदार हो गया?"

मंत्रीजी- "अरे जब पाकिस्तान अपने यहां आई बाढ़ के लिए भारत को जिम्मेदार ठहरा सकता है तो क्या मैं देशभक्त होने के नाते दिल्ली में आई बाढ़ के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकता। मैं चुप नहीं रहूंगा। मैं ईंट का जवाब पत्थर से दूंगा।"

पत्रकार फिर चिल्लाए- "आप ईंट का जवाब पत्थर से बाद में देते रहना पहले ये बताइए कि इस बाढ़ से निजात कैसे दिलाएंगे आप?"

मंत्रीजी झल्लाते हुए बोले- "अरे क्या आप लोग इस बाढ़ के पीछे पड़े हुए हैं। ऐसे बाढ़ तो आते-जाते रहते हैं। आप जाइए और भ्रष्टाचार और घोटालों की बाढ़ से देश को बचाइए। मुझे बख्शिइए।"

पत्रकार बोले- "अरे आपको कैसे बख्श दें मंत्रीजी। भ्रष्टाचार और घोटालों की बाढ़ भी तो आप ही लाते हो। अब हमारे बाकी सवालों के जवाब दीजिए।"

(फंसे हुए मंत्रीजी सकपकाए से खड़े रहे और पत्रकारों के सवालों की बाढ़ में डूबते रहे। )