हालांकि आज फादर्स डे है और मैं पिता के पितृत्व, उनके त्याग और प्यार को एक लेख के रूप में प्रस्तुत चाहता था लेकिन ४-५ दिनों पहले आए एक एसएमएस ने मेरे मन को कुछ और लिखने की तरफ आकृष्ट किया। यह था वह एसएमएस-
जनरेशन गैप का सबूत-
१९८८ में आमिर खान गाता है- पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा।
२०११ में इमरान खान गाता है - डैडी मुझसे बोला तू गलती है मेरी।
उस समय तो इस एसएमंएस तो देख थोड़ी हंसी आई लेकिन इसके भीतर छुपे एक अनकहे अर्थ को मैंने महसूस किया और उसे एक लघुकथा का रूप देकर आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूं-
" डैडी मुझसे बोला.... (लघुकथा)"

"डैडी मुझसे बोला तू गलती है मेरी..." गुनगुनाते हुए राहुल सीढ़ियों से नीचे उतरा। राहुल को देखते ही राहुल के पापा शर्मा जी मुंह बिचकाते हुए बोले- जब देखो कोई न कोई वाहियात गाना ही जुबान पे रहता है। कभी कुछ पढ़ाई के नोट्स भी गुनगुना लिया करो साहबज़ादे। राहुल उनकी बातों को अनसुना कर जाने लगा। तभी उसे टोकते हुए शर्माजी बोले- क्या ज़माना आ गया है। बाप यहां गला फाड़कर फाड़कर चिल्ला रहा है और बेटे के कान में जूं तक नहीं रेंग रही। एक हम थे जो अपने पिताजी की एक आवाज़ पर उनके सामने हाजिर हो जाया करते थे। तुम्हारे ऐसे लक्ष्ण देखकर तो लगता है तू सचमुच गलती है मेरी। १०० नालायक मरे होंगे तब भगवान ने तुझे मेरे घर भेजा होगा। तेरी उम्र में हम अपने पिताजी के रोज पैर छुआ करते थे। अरे नालायक सालभर तो पैर नहीं छूता कम से कम आज फादर्स डे के दिन ही पैर छू लेता, जब देखो तब बस पैसे मांगते रहता है जैसे मैं पापा नहीं कोई एटीएम हुआ। तभी राहुल आईपॉड को बंद करते हुए बोला- पापा अच्छा याद दिलाया आपने, जरा ५०० रुपए देना। दांत पीसते हुए शर्माजी ने पैसे दिए। राहुल जाते हुए बोला- डैडी टेबल पर आपकी कुछ चीज छूट गई है, याद से ले लेना। शर्माजी टेबल के पास पहुंचे तो देखा वहां एक घड़ी रखी है साथ मैं एक कार्ड था- लव यू डैडी, मैं मन से आपकी बहुत इज्जत करता हूं और मुझे इसे दिखाने की जरूरत नहीं। एक छोटी सी गिफ्ट आपके लिए अपने बचाए हुए पॉकेट मनी से। शर्माजी हाथ में घड़ी और कार्ड लिए मुस्कुरा ही रहे थे कि पीछे से शर्माजी के पिताजी की आवाज आई- बेटा, जरा आज का अखबार तो देना। शर्माजी के चेहरे पर छाई मुस्कान ने १८० डिग्री की करवट ले ली। वे झिड़कते हुए बोले- पिताजी, आपको मैं ही मिलता हूं क्या सुबह से, आपकी बहू से कह दो वो दे देगी।
रविवार, जून 19, 2011 |
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लघुकथा
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वर्ल्ड कप शुरू होने में दो दिन ही बचे है लेकिन माह भर पूर्व से ही वर्ल्ड कप से जुड़ी अटकलों, बयानबाजी और रायशुमारी का दौर शुरू हो गया था जिसमें दो बातें हर दूसरे खिलाड़ी के मुंह से सुनने मिलीं। पहला कि वर्तमान भारतीय टीम अब तक की सबसे सशक्त भारतीय टीम है और यह वर्ल्ड कप वही जीतेगी। और दूसरी बात कि सचिन का यह आखिरी वर्ल्ड कप है और टीम इंडिया इसे जीतकर सचिन को तोहफा देगी। इसमें दूसरी बात को लेकर चौतरफा कुछ ज्यादा ही हो-हल्ला हो रहा है। हाल ही में भारतीय टीम के अधिकांश युवा खिलाडियों ने यही बात दोहराई वहीं ज्यादातर विदेशी खिलाड़ियों के बयानों में भी इस बात का उल्लेख था। ऐसा माहौल क्यों बनाया जा रहा है जैसे ये सचिन का आखिरी वर्ल्ड कप है और इस बार ये कप हर हाल में उनके हाथों में थमाना ही है। ऐसे बयान टीम इंडिया और साथ ही सचिन पर सिर्फ बेवजह दबाव ही बना रहे हैं। इसका प्रमाण अभ्यास सत्र के दौरान देखा जा सकता है जहां सचिन अब ताबड़तोड़ रन बनाने के लिए भारी बल्ले से अभ्यास कर रहे हैं। टेनिस एल्बो से उबरने के बाद पिछले दो सालों में सचिन अपनी पुरानी रंगत में दिख रहे हैं। पिछला साल तो टेस्ट में रनों के लिहाज से उनका सर्वश्रेष्ट साल था। २०१० में उन्होंने ७८.१० की औसत से १५६२ रन बनाए जिसमें सात शतक शामिल थे। टेनिस एल्बो से उबरने के बाद सचिन ने हल्के बल्ले का इस्तेमाल शुरू किया क्योंकि उनका पुराना भारी बल्ला टेनिस एल्बो की समस्या को फिर से उभार सकता था। लेकिन अभ्यास सत्र में सचिन द्वारा भारी बल्ले का इस्तेमाल साफ दर्शाता है कि सचिन ने अपने उपर कितना दबाव ले रखा है। डर केवल इस बात का है कि कहीं यह दबाव टीम इंडिया पर हावी हो जाए।
वर्ल्ड कप जैसे महासंग्राम को नैसर्गिक खेल के द्वारा ही जीता जा सकता है । लेकिन जैसा माहौल अभी बनाया जा रहा है वह कहीं टीम इंडिया की तैयारियों को प्रभावित न कर दे। जब १९८३ में भारत ने वर्ल्ड कप जीता था तब भारत को कमजोर माना जा रहा था और कहा जा रहा था वह शुरूआती मैचों में ही बाहर हो जाएगी लेकिन भारत ने कपिल देव की अगुवाई में वेस्टइंडीज जैसी दिग्गज टीम को फायनल में हराकर अब तक का एकमात्र विश्व कप दिलाया। २००३ वर्ल्ड कप में शिरकत करने के पूर्व टीम इंडिया न्यूजीलैंड से ५-२ से हारी थी। विशेषज्ञों ने २००३ में टीम इंडिया की संभावनाओं को सिरे से नकार दिया था। सचिन भी अपने फार्म में नहीं थे। जहीर, हरभजन, युवराज, सहवाग आदि खिलाड़ी युवा थे और पहली बार वर्ल्ड कप में हिस्सा ले रहे थे। लेकिन टीम इंडिया ने तमाम अटकलों को झुठलाते हुए फायनल का सफर तय किया। विश्व कप से पूर्व आलोचकों के निशाने पर रहे सचिन-सौरव ने भी शानदार प्रदर्शन किया। जहां सचिन ने सर्वाधिक ६७३ रन बनाए वहीं सौरव ने ४६५ रन बनाए। विश्व कप में अच्छे प्रदर्शन के लिए सशक्त टीम की नहीं सही समय पर सटीक प्रदर्शन करने वाले ११ खिलाड़ियों की जरूरत होती है। अब जब भारत को विश्व कप का दावेदार माना जा रहा है तो ये बेवजह का दबाव टींम इंडिया को बिखेर सकता है। जब भी खिलाड़ी पिच पर उतरेंगे उनके दिमाग में यह बात उतरेगी कि उसे ये विश्वकप हर हाल में सचिन के लिए जीतना है वहीं सचिन भी जब एक-एक गेंद का सामना करेंगे उनके दिमाग में यह बात गूंजती रहेगी कि यह उनका आखिरी विश्वकप है और उन्हें इस बार अपना सब कुछ न्यौछावर करना होगा।
जहां तक सचिन के आखिरी विश्व कप को लेकर बातें हो रही हैं तो सचिन को तो उनके आलोचकों ने ४-५ सालों पहले ही खत्म मान लिया था। २००२ में भी उनके प्रदर्शन पर सवालिया निशान लगे थे लेकिन उन्होंने २००३ विश्व कप में लाजवाब प्रदर्शन किया। उसके बाद ३-४ साल वे खराब फार्म और टेनिस एल्बो की चोट से संघर्ष करते रहे लेकिन २००८ के बाद जैसे फिर युवा होकर अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में लौटे। सचिन ने अपनी मानसिक दृढ़ता, समर्पण, समय के साथ खुद में बदलाव लाते हुए अपने कैरियर की उम्र को बढ़ाया है और यह तो वो भी नहीं जानते उनका आखिरी मैच कब होगा। खुद कहा कि उनका सपना है विश्वकप जीतना पर जरूरी नहीं यह उनका आखिरी विश्व कप हो। मुमकिन है वे अगल विश्व कप भी खेलें। और हो सकता है युवराज, रैना और धोनी आदि युवा खिलाड़ी जो सचिन को विश्वकप की ट्राफी तोहफे में देने जैसी बातें कर रहे हैं खुद अगले वर्ल्ड कप में न दिखें। धोनी तो कप्तानी और किस्मत के सहारे अपनी खराब बल्लेबाजी को ढंक रहे हैं वहीं युवराज-रैना जैसे सितारों की चमक फीकी पड़ती जा रही है इसलिए क्या पता ये कब गुम हो जाएं, क्योंकि क्रिकेट में जो दिखता है वही टिकता है। और सचिन ने अपने खेल को हमेशा दिखाया है, आलोचकों को करारा जवाब दिया है। इसलिए जरूरी है कि खिलाड़ी भारतवासियों के लिए यह विश्व कप जीतें न कि सचिन के लिए या किसी और खिलाड़ी के लिए। विश्व कप की ट्राफी हाथ में थामना सचमुच एक अद्भुत अहसास है, चाहे वो सचिन हो या कोई युवा खिलाड़ी हर कोई इसे महसूस करना चाहेगा। इसलिए बस इतना कहूंगा दे घुमा के इंडिया।
बुधवार, फ़रवरी 16, 2011 |
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आलेख,
खेल
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आ गया.... आ गया.... प्यार का मौसम आ गया, प्यार करने का मौसम आ गया, प्यार जताने का मौसम आ गया। फरवरी के प्यार के महीने को शुरू हुए बस चंद दिन बीते हैं और चारों तरफ बस प्यार दिख रहा है। जहां देखो वहां प्यार। पहले प्यार अहसास का नाम हुआ करता था। अब प्यार ट्रैंड बन चुका है, फैशन बन चुका है। ऐसा लगता है जैसे "नफरत करने वालों के सीने में प्यार भर दूं,"- गीत गुनगुनाते हुए देव साहब ने पूरी दुनिया में फिल्मी प्यार भर दिया है, खासतौर से फरवरी महीने में। फरवरी के प्यार भरे महीने में भगवान भी ऊपर से जब पृथ्वी को देखते होंगे तो वो भी गोल न दिखकर दिल की आकृति के रूप में दिखती होगी।
आप २१वीं सदी में जी रहे हैं तो आपको एक बात गांठ बांध लेनी चाहिए कि भले ही साल के ३६४ दिन आप "एकला चलो रे" का नारा लगाते हुए बिना किसी गर्लफ्रैंड के गुजार लें लेकिन ३६५वें दिन यानी वेलेंटाइन डे के दिन आपको अपनी वेलेंटाइन के साथ दिखना ही चाहिए वरना जीवन निरर्थक है। आपको तुरंत सांसारिक मोहमाया छोड़कर जंगलों का रास्ता नाप लेना चाहिए। बहुतों का तो न्यू इयर शपथ ही होता है कि ४५ दिन में किसी न किसी को गर्लफ्रैंड बनाना ही है, किसी को अपने प्यार में खींचना ही है। १४ फरवरी को बाइक की पिछली सीट पर लड़की को घुमाते हुए दोस्तों के सामने से ले जाना है। जब तक १०-१५ दोस्तों के मुंह से आह...... नहीं निकलती तब तक क्या मजा वेलैंटाइन डे का।

जैसे बरसात आने के पहले लोग रेनकोट का बंदोबस्त कर लेते हैं। गर्मी के पहले कूलर और ठंडी के पहले गर्म कपड़ों के जुगाड़ में लग जाते हैं। इसी तरह वैलेंटाइन सीजन आने से पहले ही लोगों ने अपने वैलेंटाइन के लिए जुगाड़ जमाना चालू कर दिया। कुछ डॉक्टर मरीज को तो बचे-खुचे अपनी नर्स को ही प्यार का इंजेक्शन देने लगे। प्रोफेसर टीचर की लव क्लासेस लेने में मशगूल रहते हैं तो वकील भी प्यार भरे केस लड़ते रहते हैं। सरकारी दफ्तरों का हाल तो और भी निराला रहता है। दफ्तरों के बाबू मैडमों को अपने प्यार की फाइल अग्रेषित कर रहे थे। बड़े अफसर तो इससे आगे जाकर सर्कुलर के माध्यम से अपने प्यार का आर्डर दे रहे थे कि १४ फरवरी को वेलेंटाइन गार्डन में अपरान्ह २.०० बजे वेलेंटाइन डे पर प्यार की बैठक रखी गई है, आफिस में जो भी इच्छुक-अनिच्छुक महिला कर्मी हैं वे आ ही जाएं क्योंकि अगर गलती से हमारा वैलेंटाइन डे खराब हुआ तो अगले दिन से आपकी नौकरी खराब हो सकती है।। कुल मिलाकर फंडा ये कि सब अपने-अपने वैलेंटाइन डे की सेटिंग में बिजी हैं। लव के लिए इतनी सेटिंग देखकर सरकार तो फरवरी को लव मंथ, नो वर्क मंथ घोषित करने की भी तैयार कर रही थी, पर हमने ये घोषणा कुछ समय के लिए टलवा दी। कहा- इतनी भी जल्दी क्या है सरकार, हमारी लव सेटिंग तो होनी दीजिए फिर घोषित करते रहिएगा लव मंथ।

इतने लवेबल महीने में हमारे गुलगुल पांडे दुखी थे। सबके वेलेंटाइन प्लान जम चुके थे पर इनको तो अभी तक इनकी वेलेंटाइन भी नहीं मिली थी । पिछला वेलेंटाइन भी बिना गुल खिलाए निकल गया था और इस वर्ष भी कुछ ऐसा ही बुरे आसार नज़र आ रहे थे। पर क्या करें सारा कसूर इनकी नौकरी का था। कभी यहां खड़े रहो, कभी वहां खड़े रहो- ट्रैफिक पुलिस वाले जो थे। कहीं कुछ सेटिंग होने लगती तो झट से अगले दिन शिफ्ट कर दिए जाते। खैर इस साल उन्होंने पूरी तैयारी की है। पिछले साल की ब्लाकब्लस्टर दबंग के सलमान खान की तर्ज पर इन्होंने भी आंखों पर काला चश्मा चढ़ा लिया, मूंछे उगा लीं और निकल पड़े अपनी मटकती हुई हिरोइन की तलाश में। लहराते- उछलते, एक इशारे पर सैंकड़ों गाड़ियों को रोकते, शहर के दबंग गुलगुल पांडे। शहर के हृदयस्थल स्थित चौक पर जबसे इनकी ड्यटी लगी थी इनकी चांदी हो गई थी। हर मिनट चौक से गुजरती अनगिनत स्कूटी और उस पर बैठी अप्सरा सी स्कूटीवालियां। गुलगुलजी के दिल में तो प्यार के मीठे मीठे गुलगुले बनने लगे। ये सोच उनका दिल बाग-बाग हो जाता कि इस वेलेंटाइन डे पर एक क्या १४०० गर्लफ्रैंड पट जाएंगी। पिछले सारे वेलेंटाइन डे पर सिंगल रहने के पाप एक बार में धुल जाएंगे।
अगले ही दिन उनके नैन एक स्कूटी वाली के मस्त मस्त नैन से लड़ गए। गुलगुल पांडे तो मानो प्यार में सब भूल गए। हरे लाइट पर ट्रैफिक रुकवा देते तो लाल लाइट पर गाड़ियां छोड़ देते। जैसे ही किसी जोड़े को साथ घूमता देखते उनके दिल में प्यार की लहर और जोर से हिलोरें मारने लगती। जिस तरफ इनकी वेलेंटाइन गाडी लिए खड़ी रहती उसी तरफ की ट्रैफिक छोड़ देते। इनकी वेलेंटाइन भी रोज कातिल मुस्कान देते हुए निकल जाती जिसे देख ये और बांवरे हो जाते। दिन ब दिन ये बांवरापन बढ़ता गया और कुछ दिनों में ये शत-प्रतिशत बांवरे हो गए। पर कहते हैं न इश्क इज फुल ऑफ रिस्क। वेलेंटाइन डे के लिए वेलेंटाइन तो ताड़ ली थी पर वेलेंटाइन डे पर होने वाले खर्च के लिए वेलेंटाइन फंड अब भी खाली था। तो हमारे गुलगुलजी ने अगले ही दिन से शुरू कर दिया फंड भरो अभियान अर्थात वसूली अभियान। हर आती-जाती गाड़ी को रोककर किसी न किसी कारण उसका चालान काटते, चालान का डर दिखाकर ऑन द स्पॉट सेटिंग करते और अपनी जेब गर्म करतो। इस तरह चंद दिनों में अच्छा खासा फंड जमा भी जमा हो गया और लोगों में इनकी दहशत भी आ गई। इनकी दहशत देखकर अब लोग इनके पास गाड़ी तो क्या पैदल फटकने से भी कतराने लगे।

वेलेंटाइन भी देख ली थी, फंड भी इकट्ठा कर लिया, इंतजार था तो बस चाहत के इकरार का। फिर आया वो हसीन दिन ९ फरवरी २०११। गुलगुल पांडे दूल्हे की सज-धजकर, गाना गुनगुनाते हुए निकले। बाहर निकले ही थे कि पड़ोसी ने टोक दिया- "ध्यान से गुलगुल जी ९.२.११ को प्रणय निवेदन करने जा रहे हो, कहीं आपकी वेलेंटाईन ही ९-२-११ न हो जाए।" गुलगुलजी जल्दी में थे इसलिए बस आंखें दिखाई और चल दिए। आंखों में चश्मा चढ़ाए, हाथों में फूल लिए वे स्कूलीवाली का चौक के बीचों बीच इंतजार करने लगे। उन्हें वो दूसरी तरफ खड़ी दिखाई दी। वे उसकी तरफ दबंग स्टाइल में बढ़ने लगे। पहले तो उन्हें देख उनकी वेलेंटाइन रोज़ की तरह मुस्कुराई लेकिन उनके दबंग स्टाइल को देख डर गई और सोचने लगी "कहीं ये चालान काटने तो नहीं आ रहा, मैंने तो लाइसेंस भी नहीं बनवाया अब तक, क्या बहाना बनाउंगी? क्या बोलूंगी? रोज तो स्माइल देकर निकल जाती थी, पर कहीं आज फाइन न देना पड़ जाए। यहां से निकलने में ही भलाई है, कहीं ये पकड़ न ले। " ये सोचते हुए उसने गाड़ी स्टार्ट की और फरार्टे भरते हुए निकल ली। चुलबुल जी हाथ के पीछे गुलदस्ता दबाए उसे ताकते रह गए। कुछ देर में वो नजरों से ओझल हो गई। बस फिर क्या था वेलेंटाइन के जले गुलगुलजी ने फूल फेंका और प्रण ले लिया कि- "१४ फरवरी को कोई भी जोड़ा साथ दिखाई दिया तो इतने चालान काटूंगा, इतने चालान काटूंगा कि कन्फ्यूज हो जाएगा कि चालान पटाऊं या वेलेंटाइन डे मनाऊं।" सबका वेलेंटाइन खराब कर दूंगा। इस तरह गुलगुलजी का यह वेलेंटाइन भी वेलेंटाइनलैस निकला देखें अगले साल क्या होता है इनका। आशा करता हूं आप लोगों की वेलेंटाइन डे अच्छी रहेगी।
बुधवार, फ़रवरी 09, 2011 |
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व्यंग्य
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सर्वप्रथम मैं अप्सरा सी सुंदर न... न... साक्षात अप्सरा कैटरीना कैफ जी के फूलों से कोमल-कोमल गालों पर मुहांसों का वर्णन करने के लिए क्षमा चाहता हूं। आशा करता हूं कैटरीना जी के प्रशंसक मेरे पीछे नहा- धोकर नहीं पड़ेंगे। सच कहता हूं जिस दिन कैटरीनाजी के खूबसूरत गालों में एक छोटा सा मुंहासा भी हो गया, मैं पूरे देश में मुंहासे उन्मूलन कार्यक्रम चला दूंगा। परंतु यहां जिस कैटरीना की मैं बात करने जा रहा हूं वो शीला वाली कैटरीना नहीं, वरन हमारी कैटरीना हैं। हमारी कैटरीना जो हमारे आसपास है, जो कदम-कदम पर हमारे साथ है, हमारी काली-कलूटी कैटरीना। दरअसल हमारे शहर की सड़क ही हमारी कैटरीना है।
अब इससे पहले आप पूछें कि हमने सड़क को कैटरीना की उपाधि क्यों दी तो हम याद दिला दें जैसे लालू ने एक जमाने में कहा था कि बिहार की सड़कें हेमा मालिनी के गालों की तरह चिकनी बनेंगी परंतु वो कितनी चिकनी बन पाई ये तो सब जानते हैं। हमारे शहर रायपुर के राजधानी बनने के बाद बाकी के रंग-रोगन कार्य के साथ सड़क निर्माण का कार्य भी जोर-शोर से चहुंओर शुरू हो गया। चिकनी चिकनी सड़क को बनता देख हमारे मन प्रफुल्लित हो उठता कि हो न हो ये सड़क बिलकुल हेमा मालिनी के गालों की तरह चिकना बनेगी पर फिर यह विचार हमने त्याग दिया क्योंकि अब हेमाजी को गुजरे जमाने की अप्सरा हो गई ना।
तो हमने तय किया कि अब हमें हेमाजी नहीं कैटरीना के गालों की तरह ही शहर की सड़कें चाहिए। कैटरीना आज की अफ्सरा हैं। वैसे भी कैटरीना और रायपुर का पुराना नाता है, दोनों में कई समानताएं भी हैं। जी नहीं, कैटरीनाजी कभी रायपुर नहीं आई। लेकिन जब वे सलमान खान के साथ गलबाहे डाले घूमते हुए जब बॉलीवुड में नई-नई आई थीं बस तभी हमारा शहर भी नया-नया राजधानी बना ही था। उस समय दोनों ही गुमनाम से थे। फिर धीरे धीरे दोनों ने सफलता की सीढ़ियां चलना चालू किया। दोनों दिन-प्रतिदिन प्रगति करते रहे। और आज आलम यह है कि कैटरीना कैफ महंगी अभिनेत्रियों में शुमार हैं और रायपुर महंगे शहरों में। कैटरीना तो हमारे पहुंच से दूर थी ही, अब इस महंगे रायपुर में जीने के लिए जरूरी चीजें भी हमसे दूर हो गई हैं।
अब ले चलता हूं आपको अपने शहर के सडकों की तरफ। पिघलता हुआ गरम-गरम डामर और उसे समतल करता रोड रोलर अहा! क्या नजारा रहता था। नई-नई चिकनी सड़क बिलकुल कैटरीना के गालों की तरह चिकनी। हमें तो मानो प्यार हो गया था इससे। उसी समय नई नई गाड़ी ली थी ऊपर से नई नई सड़क, क्या जोड़ी थी। चिकनी सड़कों पर फर्राटा भरती हमारी गाड़ी। बहुत बार मैं इन चिकनी सड़कों पर गिरा भी पर दर्द नहीं हुआ, प्यार में जो था। पर कुछ समय बाद हमारी कैटरीना के चिकने गालों पर मुहांसे हो गए। बहुत सारे मुंहांसे। चिकनी सड़क में इतने गड्ढे हो गए कि गाड़ी पे फर्राटा भरना तो दूर, चलना भी दूभर हो गया। समझ नहीं आता था सड़क पर गड्ढे हैं या गड्ढों पर सड़क। पता नहीं किस कलमुहें ने नजर लगा दिया हमारे शहर की चिकनी सड़क को। किस जलनखोर को हमारे सड़क के सौंदर्य से ईर्ष्या हो गई। इन गड्ढों की वजह से मैं बहुत बार गिरा और इस बार बहुत जोरदार चोटें भी खाईं। जिस चिकनी सड़क पर हम आकर्षित हुआ करते थे अब उनसे डर लगने लगा था। मैंने आखिर में सड़क से ब्रेकअप कर लिया और पैदल चलने की कसम खा ली।
बहुत समय बाद मेकअप वालों अर्थात सड़क निर्माण विभाग को कैटरीना के गालों की चिंता हुई। बस फिर क्या, शुरू हो गया मेकअप से मुहांसों को ढकने का काम। पर इससे भी कुछ खास बात न बनी। पता नहीं कैसा सस्ता मेकअप लगाया था जो कुछ दिनों में ही निकल गया। ये सिलसिला न जाने कितने सालों तक चलता रहा पर हर बार खराब क्वालिटी के मेकअप के कारण मुहांसे फिर उभरने लगते। हमारी कैटरीना के गालों की पहली वाली सुंदरता वापस न आ सकी। पहले तो प्यार में आकर हम गाड़ी से सड़क पर गिर भी जाया करते थे पर अब तो न.. न.. न..। मुहांसे भरी सड़क पर अब हिचकोले खाते हुए गाड़ी चलाने की हमने विवशतावश आदत बना ली थी।
खैर अच्छी बात यह है कि पिछले साल नवंबर में हमारे राज्य के दस वर्ष पूरे हुए। जश्न हुआ, समारोह हुए, योजनाएं भी बनी जिसमें हमारे मुहांसे भरेसड़क को वापस कैटरीना के गालों की तरह चिकना बनाने की योजना भी थी। बस फिर क्या था, पिघलते हुए डामर की खुशबू ने हमारी सांसों में उतरना शुरू कर दिया। रोडरोलर से चिकनी हुई सड़क फिर आकर्षित करने लगी। मेकअप के पश्चात चिकनी और सुंदर हुई सड़क पर हमारा दिल फिर आ ही गया। अब इस बार इसकी खूबसूरती कब तक रहेगी ये तो मेकअप वाले ही जानें पर अभी तो मैं चलता हूं अपना प्यार जताने, चिकनी चिकनी सड़क पर फर्राटा भरने।
रविवार, जनवरी 30, 2011 |
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व्यंग्य
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कुछ दिनों पहले अखबार में एक बड़ी रोचक खबर पढ़ने को मिली। फिल्म और खेल पन्ने के बीच में दबे-कुचले से पन्ने में छपी इस खबर पर मेरी नजर अटक गई। कैटरीना की टांगों ने मुझे फिल्म पेज की तरफ आकर्षित करने की कोशिश लेकिन मैं डिगा नहीं. सचिन ने भी बल्ला दिखाकर खेल पेज पढ़ने की पेशकश दी पर मैंने वो भी ठुकरा दी। आखिर में उस खबर को पढ़कर ही मैंने दम लिया। खबर का शीर्षक था- "२१ ग्राम की होती है आत्मा"। खबर पढ़कर मुझे विश्वास नहीं हुआ। आत्मा का वजन मात्र २१ ग्राम। ये कैसे मुमकिन है।
इन प्रयोगधर्मी खुरापाती वैज्ञानिकों ने न जाने किन उल-जुलूल परीक्षणों के आधार पर आत्मा का वजन निकाल लिया। पहले एक इंसान का मरने के पूर्व वजन किया और फिर मरने के उपरांत। दोनों में २१ ग्राम का फर्क आया। बस इसी आधार पर घोषणा कर दी कि आत्मा का वजन २१ ग्राम है। पर मेरा मन अब भी यह स्वीकार करने को तैयार नहीं था।
जरूर जिस व्यक्ति के शरीर को तौलकर आत्मा का वजन निकाला गया होगा वह बहुत सज्जन, ईमानदार और साफ दिल का रहा होगा। वैसे इस प्रजाति के लोग दुनिया में ज्यादा नहीं बचे हैं। जिस तरह बाघों को बचाने अभियान चलाया जा रहा है, इनको बचाने भी अभियान चलाने की जरूर है। खैर मुद्दे की तरफ वापस चलते हैं। वह शख्स जरूर सज्जन किस्म का इसलिए रहा होगा क्योंकि अगर उसने कुछ पाप वगैरह किए होते तो उसकी आत्मा पर बोझ रहता जिससे आत्मा का वजन बढ़ता ना। परंतु आत्मा का वजन मात्र २१ ग्राम निकला यानि उन्होंने कुछ छोटे-मोटे मामूली टाइप के पाप किए होंगे जिस पर उनको रियायत देते हुए भगवान ने उनको स्वर्ग में एंट्री दे ही दी होगी। आशा करते हूं वे वहां मज़े से होंगे और पृथ्वी पर दोबारा आने की गलती कतई नहीं करेंगे।
वैसे अंदर की खबर यह पता चली है कि इस व्यक्ति से पहले भारत के एक अति भ्रष्ट मंत्री की भी आत्मा का वजन लिया गया था। परंतु उनकी आत्मा में इतना मैल था कि उसका वजन उनके शरीर से भी ज्यादा निकल गया। ऊपर से उनके पेट से चिपका ५० किलो का मटका जो उनके द्वारा किए गए बड़े-बड़े घोटालों की बानगी दे रहा था। इनकी आत्मा का वजन निकालने में लगी मशीन ने तो वहीं हाथ-पैर जोड़ लिए और वजन निकालने से तौबा कर ली। वैज्ञानिकों ने भी इस खबर को बाहर जाने नहीं दिया वरना आम जनता तो मरने से भी डरने लगती।
दूसरी तरफ इन मंत्रीजी की भारी-भरकम किसी तरह घिस-घिसटकर स्वर्ग के दरवाजे तक तो पहुंच गई लेकिन इनकी हैवीवेट आत्मा स्वर्ग के छोटे से द्वार से कहां निकल पाती। कभी ये द्वारपाल से जुगाड़ जमाने की कोशिश करते तो कभी चित्रगुप्त से गुप्त रूप से मित्र बनने का प्रयास करते, पर सब व्यर्थ। अंत में चित्रगुप्त ने साफ साफ कह ही दिया कि जाओ डाइटिंग करो थोड़ा वजन घटाओ, इतने पाप करके आत्मा पर बोझ बढ़ा दिया जाओ बोझ कम करो फिर यहां आओ। अब मंत्रीजी की भारी भरकम आत्मा वापस पृथ्वी पर आकर भटक रही है। और अब वे अपने तरह के भ्रष्ट लोगों की पोल-पट्टी में खोलने में लगे हैं ताकि कुछ तो वजन घटे और स्वर्ग का टिकट कटे। इन दिनों में उन्होंने बहुतों के घोटाले की किताब खोलकर रख दी एक के बाद एक। वैसे आपने तो कुछ पाप-शाप नहीं किए ना। किए भी हैं तो टेंशन नॉट अभी उनका फोकस सिर्फ बड़े मुर्गों पर है पर पता नहीं कब छोटे-मोटे पापियों पर भी नजर रखने लग जाए। संभलकर रहिएगा कहीं वो आपके आसपास न हो, वैसे भी आत्मा दिखाई नहीं देती। म..म..मै... चलता हूं इनकी आत्मा तो मेरे पीछे ही खड़ी है। भागता हूं.... फिर मिलूंगा।
रविवार, जनवरी 16, 2011 |
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व्यंग्य
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