घोटालों की होली
manmohan-singh-and-sonia-gandhi-cartoon










यूपीए तोड़ रही है,
भ्रष्टाचार के रिकार्ड सारे,
क्या अफसर, क्या नेता, भष्ट यहां हैं सारे,
सरकार के मंत्रियों पर चढ़ा घोटाले का रंग है,
देख के घोटाले की होली, सारी दुनिया दंग है,
किसी ने बनाया कॉमन से वेल्थ,
तो कोई हुआ 2जी से मालामाल,
जिसने चुना था इनको, वही जनता रही बेहाल,
बहुत हुआ सब घोटाला, अब जनता सबक सिखाएगी,
अगले साल चुनावी होली में अपना रंग दिखलाएगी,


अन्ना-अरविंद की होली
Cartoon-Anna-Arvind










सुन सरकार के घोटालों की किलकारी,
अन्ना-अरविंद तैयार हुए ले लोकपाल की पिचकारी।
लोकपाल का रंग भर दोनों कूदे मैदान में,
मांगे मनवाने अपनी किया अनशन मैदान में।
अनशन सफल नहीं हुआ, हो गई दोनों में अनबन
राजनीति करें या नहीं इस पर दोनों में गई ठन।
अरविंद को करनी थी राजनीति, बनाई आप पार्टी,
पोल खोलूंगा सबकी, नहीं चूकूंगा जरा भी।
अन्ना ने नहीं किया समर्थन, बस किया दूरदर्शन
मैं और मेरी टोली भली, इंडिया अगेंस्ट करप्शन।


''होली है, भई होली है। बुरा न मानो होली है।’ ’ होली के दिन ये जुमला हर दूसरे शख्स के मुंह से सुनने मिल जाता है। ये सुन ऐसा लगने लगता है कि होली  रंगों का नहीं बल्कि रुठने-मनाने का त्यौहार है। जहां तक मेरा आंकलन है होली पर बुरा मानने वाला पहला शख्स हिरण्यकश्यप रहा होगा। एक तो वह प्रह्लाद की विष्णुभक्ति के कारण वैसे ही बुरा मानकर बैठा रहता था, उस पर होलिका प्रहलाद को जलाने के चक्कर में खुद जल गई। करेले पर नीम चढ़े वाली इस हालत ने उसे और बुरा मानने पर मजबूर कर दिया। उसी समय शायद किसी अतिउत्साहित महाशय ने पहली होली की खुशी में हिरण्कश्यप के चेहरे पर गुलाल लगाते हुए कहा होगा - बुरा न मानो होली है। इसके बाद उन महाशय का क्या हुआ होगा यह इतिहासकार पता लगाते रहें, किसी के पेट पर लात मारना हमारी फितरत नहीं।

खैर यहां पेचीदा मामला यह है कि जब ''बुरा न मानो होली कहा जाता है- तब यह आदेशात्मक होता है या आग्रहात्मक, समझ नहीं आता? बस यही समझने हम चले गए एक होली मिलन समारोह में जिसमें उत्तम श्रेणी के बुरा मानने वाले शख्सियत शामिल थे। सबसे पहले एक रंग-बिरंगे शख्स से मुलाकात हुई जो ''बुरा न मानो होलीकहते हुए सब पर रंग उड़ेले जा रहे थे। उनके आग्रहात्मक अलाप से समझ आ गया कि ये हमारे पीएम हैं। वे डीएमके सांसदों के पीछे दौड़े चले जा रहे थे कि अब तो बुरा मत मानो होली है। मान भी जाओ होली है। पर वे भी ढीठ थे, बचते-बचाते निकल ही जाते थे- और कहते कि ''बुरा मानेंगे, होली है। हमें अपने रंग में रंगने की कोशिश न करो अब, हमें बेरंग करने वाले भी तुम ही थे, न तो हमारी मांगें मानी उल्टा समर्थन क्या वापस लिया सीबीआई की रेड पड़वा दी।

मनमोहनजी ने टाइम वेस्ट करना उचित नहीं समझा और चले रूठने में पीएचडी कर चुकी ममता बेनर्जी की तरफ। ये पिछले 8-10 महीने से रूठी ही हुई थीं। इन्हें उम्मीद थी कि रुठने के कुछ ही दिनों बाद उन्हें मनाया जाएगा, लेकिन ऐसा हो न सका। होली के समय रूठने-मनाने के ट्रेंड को देख लगता है कि सब इसी उम्मीद से रूठे रहते हैं कि होली के समय इन्हें मनाया जाएगा। जैसे मार्च के आखिर में सालभर का बैलेंस शीट रफा-दफा कर दिया जाता है उसी तरह ये भी अपने रूठने-मनाने का अकाउंट मार्च में ही क्लोज कराना पसंद करते हैं। मनमोहनजी को अपने समक्ष पाकर ममताजी मुंह फेरने लगी मानो ठान के बैठी हों, ''बुरा मानेंगे होली है, नहीं मानेंगे होली है। मनमोहनजी भी कभी गुलाल उड़ाते तो कभी पिचकारी मारते लेकिन ममताजी बिना कोई ममता दिखाए भाग चलीं। इतने में लेफ्ट वाले सामने आ गए, इनको देखते ही मनमोहनजी राइट हो लिए, 8 साल पहले भी ये लोग लेफ्ट-राइट करते थे और अब भी। वहीं एक बॉस जिसने इंक्रीमेंट के स्वप्निल गुब्बारे फोड़ दिए अपने कर्मचारियों को रंग लगाते हुए कहता है- ''बुरा न मानो होली है। बॉस का आदेश है, इसलिए कर्मचारी बुरा न मानते हुए रंग लगवाते हैं, इस उम्मीद से कि इंक्रीमेंट के गुब्बारे फूटे तो क्या शायद दीवाली में बोनस की मिठाई मिल जाए। ऐसी आदेशात्मक होली से बचने का कोई चांस नहीं।

आग्रहात्मक और आदेशात्मक होली के बाद हमने सद्भाव वाली होली भी देखी। एक गुब्बारा मारता तो दूसरा भी मारता। एक गुलाल उड़ाता तो दूसरा भी उड़ाता। ऐसा होलीमय तालमेल दिखा नरेन्द्र मोदी व नीतिश कुमार के बीच। चूंकि दोनों ही एक दूसरे से बुरा मानकर बैठे रहते हैं इसलिए ये तो होना था। नेगेटिव-नेगेटिव पॉजिटिव जो होता है। पीएम पद के लिए दोनों लड़ रहे हैं लेकिन अभी से ये पीएम इन वेटिंग वाला हश्र नहीं चाहते। इसलिए दुर्घटना से देर भली फिलहाल हम दोनों ही महाबली। वैसे बुरा मानने के मामले में हम भी कम नहीं। लेकिन हम होली के घंटे भर पहले ही रूठते हैं तभी तो होली के दिन भी एक घंटे से व्यंग्य लिख रहे हैं। हमें मनाने वाले भी आ गए, अब हम चलते हैं। मनाने वालों की टोली है, बुरा न मानो होली है।
हिन्दीभाषी राष्ट्र में कमजोर अंग्रेजी का खामियाजा किस तरह भुगतना पड़ता है इसका पता हमें कुछ दिनों पूर्व चला। हम टकटकी लगाए रोड के किनारे बनी बड़ी-बड़ी दुकानों को निहारते हुए जा रहे थे। चूंकि महंगाई डायन के शिकंजे में जकड़े हुए हैं इसलिए आजकल दूरदर्शन से ही संतोष करना पड़ता है। ऐसे में हमारी नजर एक दुकान पर ठहर गई। उस पर लिखा था "sale"  50 प्रतिशत की छूट। यह पढ़ते ही हमारी आंखों में चमक आ गई। हमारे निखट्टू (sale) साले ने कपड़े की दुकान खोल ली और अपने जीजा को 50 प्रतिशत की छूट दे रहा है। अपने साले के इस अविश्वसनीय व अकस्मात् प्रेम से अभिभूत मैं दुकान की ओर चल पड़ा।

काउंटर पर 100 वॉट की मुस्कान बिखेरती एक खूबसूरत अप्सरा बैठी थी। जिस तरह स्ट्रीट लाइट की रोशनी सैंकड़ों कीट-पतंगों को आकर्षित करती है उसी तरह वह मुस्काती अप्सरा अपनी चमकदार मुस्कान से कईयों को आकर्षित कर रही थी। उस प्रकाशपुंज से नजर हटाते ही हमारी नजर एक सेल्समेन पर पड़ी। हमने उससे अपने साले निखट्टू का नाम पूछा। उसने उस नाम से अनभिज्ञता जताई लेकिन कहा इसे आप अपनी ही दुकान समझिए और कपड़े खरीदिए। तभी दो और सेल्समेन खड़े हो गए एक पानी लिए और दूसरा रास्ता दिखाने। अब तक हम अपने ससुरालवालों खासकर अपने साले से काफी खफा रहा करते थे, लेकिन उसकी दुकान में ऐसा घरेलू माहौल व आतिथ्य देखकर हमारे आंसू निकल आए।

हमने अपने घडिय़ाली आंसू पोंछे और लगे कपड़े छांटने। चूंकि वहां कपड़े बदलने का कक्ष भी था हम एक के बाद एक कपड़े बदलते रहे। एक घंटे में हमने इतने कपड़े बदल लिए जितने अभी तक के जीवनकाल में नहीं पहने। इसके बावजूद दोनों सेल्समेन के सपाट चेहरों पर मुस्कान चस्पी हुई थी। हमने काउंटर पर बैठी उस मुस्कुराती अप्सरा को देखा, वह अब भी मुस्कुरा रही थी। पूरी दुकान में मुस्कान की सप्लाई वही कर रही थी। जो उन्हें देख ले मुस्काने लगता, मुस्कुराने का यह रोग कंजक्टीवाइटिस की तरह फैल रहा था। 50 कपड़े पहनने के बाद भी हमें कपड़े कुछ खास पसंद नहीं आ रहे थे, वहीं जय-विजय की तरह खड़े दोनों सेल्समेन हम पर कपड़े थोपे जा रहे थे। 

आखिर मैंने दो जोड़ी कपड़े ले ही लिए वह भी 50 प्रतिशत की छूट पर। महंगाई के जमाने में आपको छूट मिल जाए तो ऐसा लगता है भरी गर्मी में किसी ने ठंडा पानी पिला दिया। मगर ऐसे में लू लगने का खतरा भी रहता है। हम खुशी के मारे तुरंत घर लौटे लेकिन घर पहुंचते ही हमारी खुशी को लू लग गई। जो कपड़े हम खरीदकर लाए वह डिफेक्टिव थे, पेंट फटा था, शर्ट की सिलाई निकली थी। गुस्से से भरा मैं वापस दुकान गया। वहां का माहौल ही बदला हुआ था। मुस्कारती हुई अप्सरा अब फुफकारती हुई नागिन बन चुकी थी।  हममें भी उबाल कम न था, हमने उससे कहा- ये डिफेक्टिव कपड़े तुम लोगों ने दिया इसे वापस करो। वह फुफकारती हुई बोली- नहीं होगा और हमें एक नोट दिखाया जिस पर लिखा था बिका हुआ माल वापस नहीं होगा। मेरा गुस्सा 100 डिग्री से 50 डिग्री पर आ गया। मगर दिल में गर्मी अब भी थी, मैंने कहा- मेरे साले (sale) को बुलाओ जिसकी दुकान है और जिसका नाम बाहर बड़े अक्षरों में लिखा हुआ है। वह कुटिल हंसी हंसते हुए बोली- वह साले नहीं सेल लिखा है। कपड़ों का पता नहीं तुम्हारी अंग्रेजी जरूर डिफेक्टिव है। तुमने 50 कपड़े पहने फिर भी एक ढंग का कपड़ा नहीं छांट पाए, गलती तुम्हारी है। मेरा तापमान अब 50 डिग्री से 0 डिग्री हो चुका था, मैं बोला- लेकिन मेरे पास विकल्प ही नहीं थे, जो थे सब बेकार थे। युवती बोली- आपको समझाती ह, जब चुनाव में आपके सामने डिफेक्टिव प्रत्याशी खड़े किए जाते हैं तब तो कुछ नहीं बोलते, आखिर चुनते हो ना उनमें से कोई। जब इतने बड़े डिफेक्ट के साथ नेताओं को 5 साल चला लेते हो, वापस थोड़ी भेजते हो। तो इन कपड़ों में तो छोटा-मोटा डिफेक्ट है, घर में सीलकर चला लो। हार मानते हुए मैंने उनसे सुई-धागा की गुजारिश की जो उन्होंने मुस्कुराते हुए दिया। उनकी मुस्कान का 100 वॉट का बल्ब फिर जल चुका था। 

मैं भी डीप फ्रीजर से निकले आइसक्रीम की तरह ठंडा होकर वहां से निकला। सीढ़ी पर ही एक गुस्से से खौलते व्यक्ति से मुलाकात हो गई। शायद वह भी कपड़े वापस करवाने आया था। मैंने उसके कंधों पर हाथ रखा और कहा- ठंडे हो जाओ मित्र! बिका हुआ माल और चुना हुआ नेता वापस नहीं होते।

चाचा, आज फिर दातून कर रहे हो कभी कोलगेट भी कर लिया करो, दातून करते नत्थू चाचा से जैसे ही मैंने कहा वे अपना दातून थूकते हुए बोले- कर दी ना दिल तोडऩे वाली बात। कोलगेट का नाम सुनते ही लगता है जैसे मेरे किस्मत के सारे गेट बंद हो गए हों। जीवन में सब कुछ किया बस कोलगेट नहीं कर पाया। मैं बोला- चाचा इतनी सी बात, लो अभी दुकान से कोलगेट ले आता हूं। चाचा खिसियाते हुए बोले- अरे आधुनिक युग के पुरातन प्राणी मैं किस कोलगेट की बात कर रहा हूं और तू किस पर अटका है। अरे ये वो कोलगेट नहीं जो पैकेट में समा जाए बल्कि ये वो कोलगेट है जिसमें पूरा देश डूबा पड़ा है। एक कोलगेट दांत चमका रहा है और दूसरा नेताओं की किस्मत।


वैसे कोलगेट न कर पाने के लिए मैं खुद को ही दोषी मानता हूं। मैं सारी उम्र आम के अचार में ही मग्न रहा, कभी भ्रष्टाचार का स्वाद नहीं चख पाया। जिंदगीभर कष्ट सहता रहा पर भ्रष्ट नहीं बन पाया। और अब जिंदगी के आखिरी पड़ाव में खिसियानी बिल्ली बन खंबा नोच रहा हूं और नेता कोयला खोद रहे हैं। नेता कोलगेट कर रहे हैं मैं दातून करता रह गया, वे हीरो बन गए मैं कार्टून बनकर रह गया। गुस्साए चाचा ने अपनी दातून तोड़ी और मुझे समझाते हुए बोले- भ्रष्टाचार न कर मैंने तो खुद अपनी कब्र खोदी है पर बेटा, तुम ऐसा मत करना जब भी मौका मिले तुम भ्रष्टाचार की बड़ी-बड़ी सुरंगें खोदना। वैसे सुरंग खोदने के बहुत फायदे हैं, कभी अंडरग्राउंड होना पड़ा तो ये सुरंग बहुत काम आएंगी।

 नत्थू चाचा से मिल रहे ज्ञान को मैं बड़े ध्यान से सुन रहा था। मैंने आगे पूछा- चाचा, कोल ब्लॉक पर आपका क्या कहना है? चाचा बोले- कोल ब्लॉक के तो क्या कहने। इस कोल ब्लॉक ने तो कईयों के किस्मत को अनलॉक कर दिया पर देश की गाड़ी को ब्लॉक कर दिया है। देखो पूरा सत्र निकल गया पर संसद चली ही नहीं। एक जोरदार ठहाका मारते हुए मैं बोला- अरे चाचा, माना संसद का आकार गाड़ी के चक्के की तरह है, पर वो चलती थोड़ी है। खिसियाए चाचा बोले- अरे आधुनिक युग के पुरातन प्राणी मेरा मतलब है संसद चलेगी कैसे, कांग्रेस एक्सीलेटर बढ़ा रही है पर भाजपा ब्रेक दबाए बैठी है, कुछ पार्टियां चक्के पंक्चर करने में भिड़ी है। वहीं मुलायम सिंह कभी स्टेफनी लिए हाथ में दिखते हैं, तो कभी कील। उन्होंने दोनों विकल्प खुले रखे हैं, जरुरत पड़ी तो स्टेफनी बन जाएंगे नहीं तो सरकार की गाड़ी पंक्चर कर देंगे। इस एक्सीलेटर-ब्रेक के घमासान में देखो देश का इंजन जल रहा है।

मैंने आगे पूछा- कांग्रेस बहस चाहती है, भाजपा इस्तीफा। न बहस हो रही है न इस्तीफा मिल रहा है, बस कोल के झटके से पूरा देश हिल रहा है। चाचा बोले- बेटा पत्थर तो दोनों बरसाना चाहते हैं पर अपने कांच के घर देख हाथ खींच लेते हैं। तो कोल ब्लाक के इस बंदरबांट पर आप क्या कहेंगे चाचा, मैंने फिर सवाल दागा। अब तक पूरी तरह रिचार्ज हो चुके चाचा बोले- इसे बंदरबांट कहना जाय•ा नहीं होगा। इंसानों के फसाद में बेचारे बंदरों को इन्वाल्व करना ठीक नहीं, चाचा ने अपने अंग्रेजी ज्ञान का परिचय दिया। मैं बोला- फिर इसे हम अंधा बांटे रेवड़ी कह सकते हैं। चाचा बोले- नहीं नहीं, तुम गलत मुहावरों का प्रयोग कर रहे हो। अंधा तो जो हाथ में आए बांट देता है न कम देखता है न ज्यादा, न अपना देखता है न पराया। यहां जो आबंटन हुआ है वो गिद्घदृष्टि से हुआ है। गिद्घों के द्वारा, गिद्घों के लिए। गिद्घ की तरह कोयला खदानों पर नजर गड़ाए लोगों को आबंटन हुआ है। मैं चाचा को टोकते हुए बोला- आप ही मना कर रहे थे जानवरों को इंसानों के फसाद में इन्वाल्व करने से, और अब खुद ही गिद्घों को इसमें घुसा दिया। चाचा मामला संभालते हुए बोले- मैंने तो इस उम्मीद से नेताओं की गिद्घों से तुलना की कि जिस प्रकार गिद्घ दिनोंदिन लुप्तप्राय हो रहे हैं, तो शायद ये नेता भी....। मगर ये तो असंभव लगता है क्योंकि अब तो बंदरों की मानिंद नेता उछल-उछलकर आ रहे हैं।

पूरे पिक्चर की बात बहुत हो चुकी थी, हीरो तो छूट ही गया था। मैंने तुरंत पूछा चाचा कोयला घोटाले के हीरो मनमोहन सिंह के बारे में कुछ नहीं कहेंगे क्या? मुझे यकीन नहीं होता कि उनके कोयला मंत्रालय संभालते ये सब हो गया। चाचा ठहाका मारते हुए बोले- तू सचमुच एंटीक पीस है। अरे जब टाइम ने मनमोहन सिंह को अंडरअचीवर कहा तभी मैं समझ गया था कि अंदर का माल बाहर आने को है। मैं रोकते हुए बोला- पर अंडरअचीवर तो वो होता है जिसने अपेक्षा से कम हासिल किया हो। चाचा समझाते हुए बोला-तुझे तो अंग्रेजी आती ही नहीं। मैं समझाता हूं, अंडर मतलब होता है अंदर, तो जो अंदर से अचीव करे वो अंडरअचीवर। वैसे भी सब कुछ अंदर ही अंदर हुआ है, प्लानिंग भी, आबंटन भी और कोयले की खुदाई तो अंदर ही अंदर होती है। मेरे हिसाब से तो सभी अंडरअचीवर हैं। और अब जब मामला सामने आया तो लोगों के पैरों तले कोयला म..म..मतलब जमीन खिसक गई। खैर मनमोहन जब बेदाग निकलेंगे तब निकलेंगे, अभी तो कोयले की कालिख में सब पुते हैं।

मैं सोचते हुए बोला- चाचा, अब मैं सब समझ गया। पर जब कोलगेट खुले तब क्या करना चाहिये? चाचा बोले- बेटा जब कोलगेट खुले तो आम आदमी की तरह गेट के इस पार नहीं बल्कि उस पार रहना। दाग लगेंगे, पर आज के जमाने में दाग अच्छे हैं। दागी बनो बैरागी नहीं। दागी बने तो कोलगेट करोगे और बैरागी बने तो मेरी तरह दातून। इसलिए बेटा कोलगेट करबे दातून ले डरबे। कुछ देर बाद बड़बड़ाते और दातून चबाते हुए चाचा घर चल पड़े... कोयले सी तपती गुस्साई चाची हंगामा जो कर रही थी। और अब मैं बैठा इंतजार कर रहा हूं अगला कोलगेट खुलने का..।
लोग कहते हैं टेक्नॉलाजी ने इंसान के जीवन को सुगम बना दिया है, लेकिन इसने तो मेरी जिंदगी को दुर्गम बना दिया है। खबरें आ रही हैं कि करोड़ों रुपए देकर अब चांद की यात्रा की जा सकती है। बस इसी खबर ने मेरी नींद उड़ा दी है। पहले तो हम अपनी प्रियतमा को बोल बचन दे दिया करते थे कि तूझे चांद पर ले जाऊंगा, मगर ये सिरफिरे वैज्ञानिक तो सचमुच सेंटी हो गए और अब चांद की सैर कराने उतारु हो गए हैं। पिछली बार जब चांद पर जमीन खरीदने की बात आई तो मैंने अपनी प्रियतमा से कह दिया कि सब फर्जी है पर इस बार तो वो चांद पर जाने की अर्जी लेकर बैठ गई है। वैसे ये उसकी अर्जी नहीं असल में मर्जी है और मेरी जीवन का मर्ज। खैर मैंने इस बार फिर से उसे नेताजी की तरह बोल बचन देते हुए कह दिया है कि मंगल पर जाएंगे। आशा है कम से कम १५-२० साल तक मंगल पर जाने का कोई पैकेज नहीं आएगा। वैज्ञानिक शांत रहेंगे और मेरे जीवन में भी शांति कायम रहेगी।

मेरी चिंता तो खत्म हो गई लेकिन जैसा कि आप जानते हैं मैं चिंतक किस्म का हूं। अपनी चिंता खत्म हुई तो क्या पूरे जमाने की चिंता करने का अघोषित ठेका तो मैंने भगवान से लिया हुआ है वो भी बिना टेंडर भरे। सेटिंग है अपनी। बस अब जमाने की चिंता करने में जुटा हूं। वैसे चिंतक गुण के मामले में  खुद को अमेरिका की टक्कर का मानता हूं। दूसरे के फटे में टांग घुसाना मेरी प्रमुख खूबियों में एक है। और अगर फटा न तो हम पहले फाड़ते हैं, फिर अपनी टांग घुसाते हैं। चांद पर जाने की खबर क्या निकली चांद के प्यारे चांद पर पहुंचने बेताब हो गए।

इन्हीं चांद के प्यारों में से एक थे हमारे कवि मित्र उन्माद कुमार 'बेताब'। बेताबजी हमें सड़क पर मिले। उनके उन्मादी चेहरे पर चांद पर जाने की बेताबी साफ दिख रही थी। मैंने तपाक से कहा- चांद पर मत जाना चांद के प्यारे। वो बोले- क्यों। मैंने कहा- पहले तो चांद पर पहुंच पाओगे नहीं आप। वो बोले मैं धन का गरीब हूं मगर कलम का अमीर हूं। मेरे अप्रकाशित कविताओं के इतने पन्ने हैं कि अगर क्रमबद्ध तरीके से जमाऊं तो यूं ही चांद तक हाईवे बना दूंगा। आप लोगों ने तो हमें और हमारी कविताओं को हमेशा हल्के में लिया है, इसलिए जा रहे हैं चांद पर पूरी तरह हलके होने। वहां तो वैसे भी हर चीज ८ गुना हल्की हो जाती है। मैंने कहा- बेताबजी, आपने जुगाड़ तो अच्छा बिठाया है लेकिन भूलकर भी चांद पर न जाना, आप क्या मैं तो कहता हूं कोई कवि चांद पर न जाए। गलती से पहुंच भी गये तो चांद आपको वहीं गड्ढे में पाट देगा।

बेताबजी ने अचरज से पूछा- ऐसा क्यों? मैंने कहा- चांद बहुत खफा है आप लोगों से, कोई उसे अप्सरा बता देता है, कोई सुंदरता की मूरत, तो कोई चंदा मामा, तो कोई दागदार बदसूरती। जिसके मन में जो आता चांद को वही बना देता है, बिना पूछे उसका लिंग परिवर्तन कर दिया जाता है। खुद को सुंदरता की मूरत कहलाए जाने पर चांद शरमा ही रहा होता है कि कोई दूसरा कवि उसे मामा पुकारने लगता है। उस पर जो थोप दिया गया, वो उसे भारतीय जनता की तरह चुपचाप सहता गया। लेकिन अब नहीं, अब आंदोलनों की बयार छाई हुई है। इंडिया अगेंस्ट करप्शन और चांद अगेंस्ट इमेजिनेशन। चांद पर इतनी गड्ढे यूं ही नहीं पड़े। ये जो आप कवि महाशय चांद पर अपनी कल्पना के हवाईजहाज छोड़ते हैं, ये क्रैश लैंडिंग होकर वहीं गिरते हैं और गड्ढे बनाते हैं। चांद को तो बेसब्री से इंतजार है कि कोई कवि वहां आए और उसे गड्ढे में गाड़कर वो अपनी गड्ढे पाटे। इतना सुनता था और बेताबजी बेताब होकर अपने घर को भागे।

इधर मुझे बेचारेलाल जी दिखाई दिए दुखी मुद्रा में। मैंने जाते ही पूछा क्या हुआ बेचारेलालजी। अपनी दुखित मुद्रा बरकरार रखते हुए बेचारेलाल जी बोले- महंगाई सातवें आसमान पर हैं, सब चीजें सातवें आसमान पर है चाहे खाने के दाम हो या सोने के। समझ नहीं आता कैसे इनकी हासिल करूं, ये तो मेरी पहुंच से बहुत दूर हो गए हैं। मुझे मौका बिलकुल उपयुक्त लगा अपना वैज्ञानिक ज्ञान दिखाने का, मैंने तुरंत मोटा चश्मा चढ़ाया और कहा- देखिए यहां भौतिकी का नियम लागू होता है- गुरुत्वाकर्षण बल का। पहले आप भी जमीन पर थे और सामानों के दाम भी, सब लेवल में था। आप जमीन पर ही रहे... मगर दाम थोड़ा ऊपर उठी। दाम थोड़ा और उपर उठी.... मगर आप तब भी जमीन पर रहे। अब दाम सातवें आसमान पर है और आप वही के वही जमीन पर। तो बस अब आप कुछ जुगाड़ बिठाइए, गुरुत्वाकर्षण बल के खिलाफ जाइए और पहुंच जाइए चांद पर.... पृथ्वी में आसमान की पांच परतें हैं... ये हो गए पांच आसमान.... दो आसमान और आगे जाइए आ गया सातवां आसमान। यहां आपको महंगाई डायन व आपकी मूलभूत चीजें दिख जाएंगी। मगर आप यहां रुकना मत.. यहां से १० किलोमीटर और आगे जाना और चांद पर उतर जाना। चांद पर आप रहेंगे तो ये सातवें आसमान की चीजें आपके नीचे ही रहेंगी और १५-२० साल बाद अगर महंगाई बढ़ते-बढ़ते चांद तक पहुंच भी गई तो भी ये आपकी पहुंच से बाहर नहीं होंगी। इतना सुनते ही पिछले आधे घंटे से दुखित मुद्रा में दिख रहे बेचारेलाल प्रसन्न हो आगे बढ़ लिए। लोग कहते हैं निंदक नियरे राखिए, मैं तो कहूंगा चिंतक नियरे राखिए... वो भी मुझ जैसा।

खैर अब आगे बढ़ा तो नेताजी दिख गए उदासी में। नेताजी को उदास देखना हमें बिलकुल गवारा न हुआ। भारत में एक इनकी ही तो प्रजाति प्रसन्न मु्द्रा में रहती है, इनको भी किसी ने नजर लगा दी। मैंने पूछा- क्या हुआ नेताजी। नेताजी बिलखते हुए बोले- जिंदगी नीरस हो गई है....। इतने घोटाले किए, इतने भ्रष्टाचार किए...किसी को नहीं छोड़ा। अब तो धरती पर कुछ रहा ही नहीं जिसमें घोटाला कर सकूं, जिंदगी नीरस हो गई है। घोटाला भी करता हूं तो लोग ध्यान नहीं देते.... जैसे घोटाला न हुआ कोई सब्जी-भाजी हो गया। हमारे मेहनत की तो कोई वैल्यू ही नहीं रह गई है। इतना सुनते ही मेरी आंखें भर आई.... मैंने कहा- बस बहुत हो गया... आप सच्चे चांद के प्यारे हैं। आप चांद पर जाइए... वहां जाकर इंधन घोटाला कीजिए। जो भी चांद घूमने आए.. उसकी वापसी का इंधन पी जाइए। चांद के १००-१५० गड्ढों पर अवैध कब्जा कर लीजिए। नेताजी ने मेरी सुझाव लपका और चांद जाने वाली अंतरिक्ष यान लपकने चल दिए।

इतने लोगों को चांद पर लेक्चर देकर हम खुश बहुत थे। पर अब भी दो लोग खुश नहीं थे। एक तो चिंतक गुण में हमारी टक्कर वाला विदेशी 'अमेरिका' व दूसरी हमारी देसी गर्ल.. हमारी प्रियतमा।  इतने लोगों को हमने चांद पर जाने के लिए उत्प्रेरित कर दिया तो अमेरिका घबरा गया कि अब तक तो बस ३ अमेरिकी ही चांद पर पहुंच पाए थे... इसके बस चला तो ये तो १० प्रतिशत भारतीयों को वहीं बसा देगा, फिर अमरीकियों का नामलेवा कौन होगा। इसलिए अब अमेरिका हमारे पीछे लग गया है। और दूसरी हमारी प्रियतमा, जो वैसे ही हमारे पीछे लगी रहती है...अब और पीछे पड़ गई है। क्योंकि किसी ने उसको बता दिया कि मंगल पर १५-२० साल तक जाने का कोई चांस नहीं है। और अब वो फिर पीछे पड़ गई है अपनी चांद पर जाने की अपनी अर्जी लेकर... मतलब मर्जी लेकर... मतलब हुक्म लेकर...। अब मुझे जरुरत है एक चिंतक की, एक शुभचिंतक की, एक महाचिंतक की.....कोई है।