snakeसांप एक बहुत ही भोला-भाला, मासूम सा जीव है। अजी, सच कह रहा हूं। अब जो भोलेनाथ के सर की शोभा बढ़ाता है वो भी तो भोला होगा ना। नीतिवचन में कहा गया है कि सीधे वृक्ष काट दिए जाते हैं और टेढ़े-मेढ़े वृक्ष ज्यों के त्यों रहते हैं। ठीक उसी तरह सीधे-सादे सांप का मनुष्य ने बहुत शोषण किया। कभी बिना उसकी इजाजत के उसे मुहावरों में जबरन ठूंस-ठूंसकर उसे खलनायक का दर्जा दे दिया तो कभी फिल्मों में उसे फिट करके पैसे बना लिए और सांपों को रायल्टी तक नहीं दिया। यहां तक तो बेचारे सांप ने किसी तरह बर्दाश्त कर भी लिया मगर हद तो तब हो गई जब इंसानों ने उसके निजी जीवन तक को नहीं छोड़ा। जंगलों में कैमरे लगा दिए। नाग-नागिन रोमांस करने जाएं तो उसकी शूटिंग, बिल से बाहर निकले तो शूटिंग, बिल में छुपे रहे तो भी शूटिंग। इतनी शूटिंग हो गई कि दहशत में कई नागिनों ने तो अंडे देना ही बंद कर दिए। प्रणय के लिए जा रहे एक सांप को एक जीव वैज्ञानिक ने रास्ते में ही उठा लिया और उंगली दिखा-दिखाकर उसकी विशेषताएं बताने लगा। बेबस सा सांप फुफकारते हुए बोला- " मेरी जितनी विशेषताएं बताना है बता ले, लेकिन अगर आज मैं अपनी प्रेमिका से नहीं मिल पाया तो सोच लेना तुझे तेरी सुहागरात नहीं मनाने दूंगा।"  इंसानों की आबादी तो बढ़ती रही लेकिन सांपों की आबादी पर अल्पविराम लग गया।


फिर भी सांप सब कुछ रेंगते-रेंगते सहते रहे। सांप के आहार में चूहे, गिलहरी जैसे छोटे जानवर आते हैं लेकिन इंसानी करतूत के कारण इनका आहार भी छिन गया। गिलहरी और मेंढक तो ढूंढे नहीं मिलते हैं फिर भी जिस दिन मिल गए समझो उस दिन सांपों की दिवाली होती थी। इसलिए सांपों ने मजबूरन चूहे को ही अपने मेनू में टॉप पर रखा था पर यहां भी उनका निवाला छिन गया। यूरिया और खाद मिले अनाज खाने वाले चूहे को खाने से कई सांपों के पेट में मरोड़ होने लगा और कई तो मौके पर ही लुढ़क गए। सांपों की ऐसी दुर्गति देखकर सांपों ने प्रकृति के विपरीत जाकर शाकाहारी होने का फैसला किया। ऐसा ही एक शाकाहारी नाग सुबह अपनी प्रेमिका नागिन के लिए भोजन की तलाश में निकला। नागपंचमी के दिन तो दोनों ने दूध में "मिल्क बाथ" लिया लेकिन उसके बाद से उनको कोई पूछने नहीं आया और तब से उपवास ही चल रहा है। सांप सोचने लगा ये नागपंचमी रोज क्यों नहीं आती। सोचते-सोचते वह हनुमान मंदिर के पास पहुंचा। हनुमान जी की मूर्ति के पास भोग में चढ़ने वाला सामान रखा हुआ था। मिठाई, फल, आदि। सांप ने सोचा यहीं फन मारा जाए, मंदिर भी पास ही में है पांच मिनट में काम निपट जाएगा। बेचारा सब बटोर ही रहा था कि उसे किसी ने देख लिया। उसे देखने वाला सनसनी की खोज में निकला टीआरपी की मार से पीड़ित न्यूज चैनल का सनसनाता रिपोर्टर था। सांप को हनुमानजी को चढ़ा भोग खाता देख उसने उसे हनुमानभक्त सांप की पदवी दे दी और फौरन अपने जैसे अन्य सनसनीपिपासु पत्रकारों को वहां मिनटों में खड़ा कर दिया। लोग इकट्ठे होते चले गए, दो आए, चार आए, आठ आए, पलक झपकते ही पूरा मंदिर हाऊसफुल हो गया। कुछ देर बाद तो हनुमानभक्त सांप को देखने टिकट लगने लगा था। कुछ चलताऊ किस्म के टपोरियों ने तो वहां साइड में साइकिल और गाड़ी स्टैंड भी लगा दिया। सायकिल का १० मोटसायकिल का २० और कार का ५० रुपए मात्र। हां प्रेसवालों और वीआईपी लोगों के लिए मुफ्त।


हनुमानभक्त सांप ने अब तक कईयों का बेड़ा पार लगा दिया था। सुबह से दोपहर हो गई वह सांप उसी अवस्था में अपनी कुंडली में मिठाई, फल और भोग का प्रसाद लपेटे हुआ था। वो तो आया था ५ मिनट के लिए लेकिन इन खुरापानी इंसानों ने ५ घंटे रुकवा दिया। इतने में ही किसी पंडित ने घोषणा की कि यह सांप परम हनुमान भक्त है। पिछले जनम में ये परम हनुमान भक्त था और इस जन्म में सर्प रूप में फिर हनुमानजी के चरणों में अपनी भक्ति दिखाने आया है। सांप सोचने लगा- "खाली पेट न होय भक्ति, मैं तो खाना जुगाड़ने आया था या ये लोग मुझसे भक्ति करवाने पर तुले हैं। इस पंडित को अपने इस जन्म का ठीक से पता नहीं और मेरे पिछले जनम की कहानी सुना रहा है।" सभी रिपोर्टर पंडित की इस बात को लाइव दिखाने लगे। पंडित भी खुद को कैमरे के सामने पाकर अपने लुक पर ध्यान देने लगा और बीच-बीच में अपने बाल और धोती भी ठीक करता। इधर सांप बाहर निकलने के लिए जरा सी हलचल क्या करता कि सारे कैमरे और माइक उसी की ओर घूम जाते। सांप की तरह दिख रहे माइक उस हनुमान भक्त सांप को और भयभीत कर रहे थे। मगरमच्छ के मुंह की खुले हुए कैमरे उस हनुमानभक्त सांप को खा जाने को आतुर थे।


इसी बीच थका हुआ सांप जरा देर के लिए सो गया। तभी किसी ने हल्ला कर दिया कि हनुमानभक्त सांप को हनुमानजी के चरणों में अद्भुत शांति का अनुभव मिल रहा है, तभी वो उनके पैरों में सो गया। देखों किस तरह खुद को हनुमानजी के चरणों में खुद को अर्पित कर दिया है। इतना सुनते ही सांप फिर जाग गया। वह भगने के प्रयास में दाएं मुड़ता तो कोई एक नई कहानी के साथ पेश हो जाता है। बाएं मुड़ता तो फिर कोई कहानीकार नई कहानी बना देता। ऐसे लग रहा था मानो देश के सारे कहानीकार यहीं उपस्थित हो गए हैं और सांप के साथ अपना बैर निभा रहे हैं। एक चलते-फिरते भजन गायक ने तो तत्काल हनुमानभक्त सांप के ऊपर आरती बना दी और उसका आरती गायन भी शुरू कर दिया। कुल मिलाकर सबकी अपनी अलग-अलग कहानी थी, पर सबका हीरो एक ही था- "हनुमानभक्त सांप"।


अभी ये सब चल ही रहा था कि हनुमानभक्त सांप को दूध पिलाने लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा। कुंवारे-कुंवारियां विशेषकर दूध पिलाने आए क्योंकि पंडितजी ने घोषणा कर दी थी कि इस हनुमानभक्त सांप को दूध पिलाने वाले कुवारे-कुवारियों की शादी महीनेभर के भीतर हो जाएगी। सांप सोचने लगा- "अबे बेवकूफों, तुम लोगों के चक्कर में मेरी खुद की शादी नहीं हुई। बमुश्किल एक नागिन मिली है उसी के साथ लिव इन रिलेशनशिप में हूं और तुम लोग मुझे दूध पिलाकर अपनी शादी करवाने के जुगाड़ में हो। अरे निर्दयियों अगर मैंने इतना दूध पी लिया तो मेरा रंग तो ऐसे ही काले से गोरा हो जाना है और जात बाहर हो जाऊंगा वो अलग।" फिर भी लोग हनुमानभक्त सांप को दूध पिलाने लड़ते-मरते रहे।


हनुमानभक्त सांप बाहर निकलने का रास्ता तलाशने लगा। इसी जुगत में वह हनुमानजी की मूर्ति के चक्कर लगाने लगा। तो लोग इसका अर्थ निकालने लगे कि सांप भक्तिधुन में नाच रहा है और उसे मोक्ष मिलने वाला है। सांप भी परिक्रमा करते हुए सोचने लगा- "तुम लोगों को जो सोचना है सोचो, एक बार यहां से निकल जाऊं कसम खाता हूं दोबारा नहीं आऊंगा। मेरे लिए तो फिलहाल यहां से निकलना ही मोक्ष समान है।"


शाम से रात हो गई। सांप भी बाहर न जाने के कारण उकता गया था। सबकी नींद उड़ाने वाले रिपोर्टर धीरे-धीरे नींद की गिरफ्त में आ गए। सांप ने मौका देखा और अपनी केंचुली निकालकर वहां से खिसक लिया।  नींद खुलने के बाद रिपोर्टरों ने जब सांप को गायब देखा और सिर्फ उसकी केंचुली देखी तो फिर टीवी पर ब्रैकिंग न्यूज फ्लैश करने लगे- हनुमानभक्त सांप हनुमानजी में समा गया। ऐसी अद्भुत भक्ति  कभी किसी ने देखी न होगी। सांप अपनी केंचुली यहां छोड़कर हनुमानजी की मूर्ति में समा गया। जय हो हनुमानभक्त सांप की। सब रिपोर्टर फिर से हनुमानजी की मूर्ति और केंचुली की फोटो उतारने में मशगूल हो गए। लोगों द्वारा हनुमानभक्त सांप की आरती गायन और कहानी लेखन का कार्यक्रम फिर से शुरू हो गया। सांप दूर से ही यह सब देखता रहा और वापस चले गया।


बम्पर ऑफर- अगर आप लोग हनुमानभक्त सांप की आरती को अपना रिगटोन बनाना चाहते हैं तो अपने मोबाइल से saap लिखकर 55555 पर भेज दीजिए। हनुमानभक्त सांप की केंचुली के फोटो और उससे बने ताबीज के लिए आप संपर्क कर सकते हैं बाबा नागराज से। घरपहुंच सेवा उपलब्ध है। घरपहुंच सेवा का अतिरिक्त चार्ज लगेगा क्योंकि हमारे हॉकर कोई नागराज नहीं हैं जो उड़कर आप लोगों के घर टपक जाएंगे, गाड़ी से आना पड़ेगा और पेट्रोल भी महंगा हो गया है।

"बाढ़-बाढ़ देखो, हजार बार देखो कि देखने की चीज है हमारा देश डुबा।" भारत में हर साल आने वाले बाढ़ को देखकर मेरा मन यही कह उठता है। वैसे तो हमारा देश कई तरह के बाढ़ में डूबा हुआ है जैसे- घोटालों की बाढ़, भ्रष्टाचार की बाढ़, महंगाई की बाढ़ लेकिन यहां मैं पानी के बाढ़ के बात कर रहा हूं। अभी कुछ ही हफ्तों पहले गर्मी से तिलमिला रही दिल्ली अचानक पानी में डूब गई। वैसे दिल्ली के यूं अचानक डूब जाने की खबर ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि इसके पीछे किसका हाथ हो सकता है। वैसे भगवान ने जो चीज कम दी है (दिमाग) उसका उपयोग कम ही करना चाहिए लेकिन क्या करें बात ही ऐसी है कि हमें सोचना पड़ गया। सबसे पहला शक तो मुझे कलमाड़ी पर ही हुआ पर वो तो पहले ही कॉमनवेल्थ का बहुत पैसा डकारकर दिल्ली को डुबो चुके हैं और दूसरी बार डुबाने का उनके पास अभी चांस नहीं है इसलिए उनको इसका जिम्मेदार नहीं माना जा सकता था। बहुत दिनो से खबरें आ रही थीं कि स्वर्गलोक में तिकड़म भिड़ाकर कुछ नेता वहां पहुंच गए हैं। पहले तो लगा कि शायद गड़बड़ वहीं से हुई है। लेकिन इन्द्रदेव से संपर्क करने पर पता चला कि अभी तो वहां स्थिति नियंत्रण में है लेकिन कुछेक नेता और आ गए वहां तिकड़म भिड़ाकर तो स्वर्ग को नरक बनते देर नहीं लगेगी। (वो क्या है ना "काले मेघा पानी तो बरसा" व्यंग्य लिखने के बाद से अपनी इंद्रदेव से जमने लगी है इसलिए कभी कभी संपर्क उनसे भी साध लेते हैं।)


अब मैं किसी और को ढूंढने लगा जिस पर शक किया जा सके। तभी शक की सुई मणिशंकर अय्यर के तरफ गई। वह भी उन लोगों में से हैं जो नहीं चाहते कि कामनवेल्थ गेम्स हों। कामनवेल्थ गेम्स के बारे में विवादास्पद बयान के बाद से तो उनके दर्शन ही नहीं हुए। अब लग रहा है शायद वो तपस्या करने चले गए थे ताकि गेम्स न होने की उनकी इच्छा पूरी हो। पर जिस तरह से गेम्स की तैयारियां चल रही हैं गेम्स हो पाएंगे ऐसा लगता तो नहीं। बेवजह ही अय्यरजी तपस्या करने चले गए, खैर अगर भगवान के पास एक्सचेंज ऑफर चल रहा हो तो अय्यरजी अपनी इच्छा को एक्सचेंज करा सकते हैं और उसके बदले कुछ मंत्री-वंत्री पद का इच्छा पूरी करवा सकते हैं। 


बाढ़  से जनजीवन तो अस्तव्यस्त हुआ लेकिन इसने गरीब और अमीर के बीच की खाई को कुछ समय के लिए कम कर दिया। बाढ़ में डूबी कार के कारण अमीरों को भी गरीबों की तरह घुटने तक भरे पानी में अपनी पतलून को मोड़कर घर पहुंचना पड़ा। क्योंकि पैसे से कार तो खरीदा जा सकता है लेकिन बाढ़ का पानी कम नहीं किया जा सकता। 


हर साल आने वाले बाढ़ को देखते हुए कुछ दूरदर्शी लोगों ने मोटरगाड़ी के अलावा नाव भी खरीदकर रख लिया था क्योंकि उन्हें पता था कि जहां दिल्ली डूबी, न तो गाड़ी काम आएगी न सायकिल। बस नाव ही है जो नैया पार लगाएगी। इसलिए जैसे ही दिल्ली डूबी सब अपनी-अपनी नाव लेकर निकल पड़े डूबी हुई सड़क पर सवारियों को पकड़ने। अब अमीर हो या गरीब सब एक नाव पर साथ बैठे हैं, मजबूरी के मारे। दिल्ली में नाव की इतनी उपयोगिता देखते हुए कई बैंकों ने तो अब नाव लोन भी शुरू करने का मन बना लिया है वहीं कुछ बड़े और अपने स्टेटस का ख्याल रखने वाले उद्योगपति तो जहाज लेने की फिराक में है। अरे कोई  इन्हें बताओ अगर जहाज दिल्ली में उतरवा भी लिया तो चलाएंगे कैसे। कहीं तंग गलियों में इनकी जहाज फंस गई तो ५-६ महीने नहीं निकलने वाली और ईद, दशहरा, दिवाली सब इसी जहाज पर मन जाएगा। वैसे मानसून के समय डूबी हुई दिल्ली को देखते हुए मोटरसायकिल कंपनियां भी नाव या मोटरबोट निर्माण में उतरने को आतुर हैं। मगर अभी समय की अल्पता के चलते ट्यूब ऑफर से ही काम चला रही हैं। एक मोटरसायकिल के साथ दो ट्यूब मुफ्त। मियां-बीवी सुबह लांग ड्राइव पर निकलें, शाम तक अगर दिल्ली डूबी हुई मिले तो गाड़ी कोने में टिकाएं और दोनों ट्यूब पहनकर तैर-तैरकर अपने घर पहुंच जाएं।


बाढ़ के कारण लगे जाम में सबकी गाड़ियां फंसी रही। इनमें मंत्रीजी की भी गाड़ी शामिल थी। अब और दिन मंत्री जी की गाड़ी सायरन बजाते, सबको साइड करते निकल जाती थी लेकिन अब बाढ़ का पानी तो सायरन की आवाज से साइड होने से रहा ना इसलिए वे मुंह लटकाए चिंतन करते हुए बैठे रहे। न...न..न... अगले घोटाले का चिंतन नहीं बल्कि गाड़ी से बाहर कैसे निकलें उसका चिंतन। अब बाहर निकले तो घात लगाए बैठे रिपोर्टर सवालों की फायरिंग से मार देंगे। और डूबती हुई कार में कब तक बचा जा सकता है। इसलिए मंत्रीजी ने धीरे से कार का दरवाजा खोला और घुटने तक भरे पानी में मुंह छिपाए धीरे धीरे चलने लगे। लेकिन पानी के अंदर छुपे एक उच्च श्रेणी के चिपकू पत्रकार ने उनका पैर पकड़ लिया। मंत्रीजी को लगा कि किसी जोंक ने पकड़ लिया है, उन्होंने छुड़ाने की कोशिश की लेकिन छुड़ा न पाए क्योंकि पकड़ने वाला जोंक से भी ज्यादा चिपकू किस्म का पत्रकार था। वह पत्रकार माइक और कैमरे जैसे खतरनाक हथियारों से लैस  था। इतने में बाकी रिपोर्टरो ने भी उन्हें घेर लिया। सबने अपनी माइक उनके मुंह के सामने टिका दीं। मंत्रीजी को बचने का कोई रास्ता नहीं दिखा, और उन्होंने मजबूरन  कहा- "अब हमें धर ही लिया है तो पूछिए क्या पूछना है"। 

एक पत्रकार ने पूछा- "मंत्रीजी आप इस बाढ़ के लिए किसको जिम्मेदार मानते हैं।" 

मंत्रीजी- "इस बाढ़ के लिए कामनवेल्थ गेम्स और कलमाड़ी दोषी हैं "

पत्रकारों ने आश्चर्यचकित होकर पूछा- "आप कैसे कामनवेल्थ गेम्स को दोषी ठहरा सकते हैं?"

मंत्रीजी- "अरे सोचना कैसा। आजकल तो सीजन ही चल रहा है कामनवेल्थ गेम्स और कलमाड़ी पर दोष मढ़ने का। जिसे देखो वही अपना दोष उन पर मढ़ दे रहा है। मलेरिया फैल रहा है तो कामनवेल्थ गेम्स दोषी। पीलिया हो गया तो कलमाड़ी दोषी। ट्रैफिक जाम है कामनवेल्थ गेम्स दोषी और अकाल पड़ गया तो भी कामनवेल्थ गेम्स दोषी। अरे भई, सीज़नल ऑफर चल रहा है हमने थोड़ा फायदा उठा लिया तो क्या बुरा किया।"

असंतुष्ट पत्रकार फिर उबल पड़े- "आप इस तरह बच नहीं सकते। आपको बताना ही होगा कि कौन जिम्मेदार है इस बाढ़ के लिए।"

मंत्रीजी- "ठीक है आप इस तरह नहीं मानने वाले। मैं इस बाढ़ के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार मानता हूं।"

पत्रकार फिर चौंक पड़े- "अब पाकिस्तान कैसे इस बाढ़ के लिए जिम्मेदार हो गया?"

मंत्रीजी- "अरे जब पाकिस्तान अपने यहां आई बाढ़ के लिए भारत को जिम्मेदार ठहरा सकता है तो क्या मैं देशभक्त होने के नाते दिल्ली में आई बाढ़ के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकता। मैं चुप नहीं रहूंगा। मैं ईंट का जवाब पत्थर से दूंगा।"

पत्रकार फिर चिल्लाए- "आप ईंट का जवाब पत्थर से बाद में देते रहना पहले ये बताइए कि इस बाढ़ से निजात कैसे दिलाएंगे आप?"

मंत्रीजी झल्लाते हुए बोले- "अरे क्या आप लोग इस बाढ़ के पीछे पड़े हुए हैं। ऐसे बाढ़ तो आते-जाते रहते हैं। आप जाइए और भ्रष्टाचार और घोटालों की बाढ़ से देश को बचाइए। मुझे बख्शिइए।"

पत्रकार बोले- "अरे आपको कैसे बख्श दें मंत्रीजी। भ्रष्टाचार और घोटालों की बाढ़ भी तो आप ही लाते हो। अब हमारे बाकी सवालों के जवाब दीजिए।"

(फंसे हुए मंत्रीजी सकपकाए से खड़े रहे और पत्रकारों के सवालों की बाढ़ में डूबते रहे। )

swamiji_lineartcolorसत्संग अर्थात सत्य का संग या अच्छाई का संग। वेद-पुराणों में भी कहा गया है कि बुराई का संग नहीं बल्कि अच्छाई का संग करना चाहिए। भारत वैसे तो कृषि प्रधान देश माना जाता है लेकिन यह धर्म और भक्ति प्रधान देश भी है। यहां सभी धर्मों को बराबर मौका मिलता है फलने फूलने और साथ में फलते-फूलते हैं सत्संग कराने वाले तरह-तरह बाबा। जितनी वैरायटी बाबाओं की यहां मिलती है उतनी कहीं नहीं मिलती। भारत जैसे खुशमिजाज देश में दुःखों की कोई कमी नहीं है। सुख के बाद दुख आता है और हर दुख को भगाने के लिए संत-महात्मा आते हैं। आदमी हर त्यौहार पर खुशी मनाता है और अगले ही दिन से दुख का रोना रोने लगता है। इसलिए अपने देश में बाबागिरी पर कभी भी आर्थिक मंदी की मार नहीं पड़ने वाली। बहुत सेफ सेक्टर है ये। दुख के वक्त अपने लिए १० रुपए खर्च नहीं कर सकने वाला आदमी भी पता नहीं कहां से बाबा के चरणों में ५० रुपए चढ़ा देता है शायद इस उम्मीद में कि बाबा ५० का ५० हजार करके देंगे। और ऐसे दुखियारों की भारत में बहुतायात में हैं।




कभी-कभी मुझे लगता है भारत में कृषि और धर्म की गाड़ी लगभग एक जैसी ही चलती है। पहले भारत में पारंपरिक खेती चला करती थी। दो बैल, हल, प्राकृतिक बीज बस इतना काफी था और ठीक-ठाक पैदावार भी हो जाती थी। लेकिन अब तो जमीन से जबरदस्ती अन्न उगलवाया जाता है। दस प्रकार के खाद, उर्वरक और यहां इंजेक्शन लगा-लगाकर पैदावर बढ़ाई जा रही है। ठीक उसी प्रकार पहले संत-महात्मा जंगल में आश्रम में अपनी भक्ति किया करते थे। और उनके ज्ञान से प्रभावित होकर ठीक-ठाक पबिल्क आ ही जाती थी। लेकिन अब तो जैसे बाबाओं की बाढ़ आ गई है। पकड़-पकड़कर प्रवचनों और सत्संगों में भक्त जुगाड़े जा रहे हैं। कहीं सत्संग सूना न हो जाए इसलिए खूब तिकड़म किए जा रहे हैं। दिन-ब-दिन नए बाबाओं को पैदा होते देख डर लगता है कि कहीं ऐसा दिन न आ जाए कि भक्तों से ज्यादा संख्या बाबाओं की आ जाए। खैर वो तो बाद की बात है अभी मैं आपका सत्संग की खूबियों से वाकिफ कराता हूं।



हमारे शहर में भी आजकल सत्संग पे सत्संग हो रहे हैं। एक बाबा शहर से गए नहीं होते हैं कि दो और टपक पड़ते हैं। कभी-कभी तो आयोजन स्थल की ही कमी पड़ जाती है। एडजस्ट करते हुए अगल-बगल ही दो-दो सत्संग करवाने पड़ते हैं। बहुत बार तो भक्त ही चक्कर में पड़ जाते हैं, निकले होते हैं गीता पाठ सुनने और बैठ जाते हैं रामचरित मानस के पाठ में। जब भीड़ की ऐसी अदला-बदला हो रही हो तो कई बार बाबाओं के चेले-चपाटी ही आपस में उलझ जाते हैं। कुछ ही दिनों पहले एक सत्संग में जाना हुआ। भीड़ तो इतनी थी मानो आज यहां सब अपना पाप धोकर ही जाएंगे और यहां से थोक में नीति पुरुष एवं महिलाएं ही निकलेंगे। भीड़ देखते ही मैं समझ गया सब पापी हैं। तभी "मोह माया से दूर रहो" की बात करने वाले श्री मोहानंद मनमोहिनी कार में अपने चेलों के साथ उपस्थित हुए। वे कहते हैं शरीर नश्वर है, भयभीत न हो ईश्वर तुम्हारे साथ है, लेकिन खुद सुरक्षाकर्मियों के घेरे में थे शायद उनको ईश्वर से ही भय था। ये बाबा कभी आपका पीछा नहीं छोड़ते। सत्संग से छूटे तो ताबीजों और मालाओं में जकड़ लेते हैं, और नहीं तो फोटोरूप में आपके घर की शोभा बढ़ाते हैं। आप दिन में जितनी बार आईना नहीं देखते होंगे उतनी बार इनकी फोटो से आंखें टकरानी पड़ती है।



मैं सत्संग पर लाख व्यंग्य कस लूं लेकिन खुद को सत्संग में जाने से रोक नहीं सकता क्योंकि सत्संग में वो आती है जिसका मुझे संग चाहिए। मेरी छोड़िए और सत्संग से और भी बहुत से लोग के काम बन जाते हैं और ये सब सत्संग का बेसब्री से इंतजार करते हैं। जैसे- पानठेले, चाय ठेले, चाट ठेलों की तो निकल पड़ती है। बस सत्संग के आसपास अपने ठेलों को टिका दिया। चाट ठेलों के पास दो लड़की आएंगी और उन लड़कियों के पीछे दस लड़के और उन लड़कों को लड़कियों से दूर रखने उन लड़कियों के परिवार वाले भी आ जाते हैं। मतलब एक बार में ही २०-२५ ग्राहक खड़े-खड़े मिल जाते हैं। जितनी आमदानी इन लोगों को सत्संग वाले दिन होती है उतनी तो महीने भर नसीब न हो। यही वजह है कि बाबा लोगों को ये पानठेले वाले लाख दुआएं देते हैं इस तरह दोनो की गाड़ी मक्खन की तरह चलती रहती है।



अब बात करते हैं जेबकतरों की। इन्हें तो सत्संग का बेसब्री से इंतजार रहता है। ये मंदिरों में जा-जाकर मत्था टेकते हैं कि और कामना करते हैं कि रोज सत्संग हो और इनके पास पैसों का संग हो। कुछ अति संवेदनशील जेबकतरे तो अपनी कामना पूर्ति के लिए मनोकामना कलश और मौली धागा तक बांध आते हैं। सत्संग में जब बाबा कह रहे होते हैं कि "इंसान खाली हाथ आता है, और खाली हाथ जाता है" तब ये लोग अपनी जेब दूसरे के पर्स और नोट से भर रहे होते हैं। ये लोग खाली हाथ आते हैं पर खाली हाथ नहीं जाते। ये जेब कतरे तो असली सत्संगी प्रतीत होते हैं, बाबा तो सिर्फ बोल बचन देते हैं लेकिन इसे व्यवहार में उतारते हैं ये "जेबकतरे"। जैसे ही बाबा बोलते हैं "इंसान को मोह-माया से दूर रहना चाहिए" ये लोग तत्क्षण सत्संग में आए भक्तों के जेब काटना और पर्स मारकर भक्तों को मोह-माया से दूर कर देते हैं। दुखी महिलाओं का सुख उनके पति छीन लेते हैं और चैन ये जेबकतरे। ये जेबकतरे हर सत्संग में नियमित रूप से पहुंचते हैं और इतना ज्ञान पी चुके होते हैं कि कुछ सालों बाद ये खुद बाबा बनकर अपना सत्संग कराने लगते हैं और भक्तों की जेब काटना नहीं बल्कि उनके जेब पर खुलेआम डाका डालते हैं।



जैसा कि सब जानते हैं हम सभी पापी हैं। कम-ज्यादा मात्रा में ही सही पाप तो सबने किया है। अब पाप किया है तो प्रायिश्चत तो करना पड़ेगा वरना मन हल्का नहीं होता। तो मन हल्का करने का सबसे सरल, सुलभ तरीका है- सत्संग में जाइए और मन और जेब दोनों हल्का कीजिए। अब पिछले ही दिनों लाखों का घोटाला करके बैठा एक अधिकारी बैचेन था। इसलिए वह सत्संग में गया और दानपेटी में १००० रुपए डाल दिए। १००० रुपए दान करने के बाद उसके चेहरे पर ऐसी अद्भुत शांति थी जैसे लाखों का पाप उतर गया हो। जाते हुए उसने अपने से उच्च श्रेणी के भ्रष्ट बाबा के पैर छूकर उनसे भविष्य में और बड़े घोटाले करने का आशीर्वाद भी मांग लिया। महिलाओं तो सत्संग के नाम ही दौड़ पड़ती हैं क्योंकि सत्संग में बड़ी संख्या में महिलाओं के होने से इनके चुगली के मसाले के लिए कोई कमी नही रहती। दोपहर को "कटु वचन न कहो" का ज्ञान सुनने वाली महिलाएं शाम होते ही फिर अपनी चुगलबंदी में लग जाती हैं। इस तरह सभी किसी न किसी तरह सत्संग से अपना स्वार्थ निकाल ही लेते हैं।



इन बाबाओं के आगे-पीछे घूमते हैं ऊंचे घराने वाले और ये ही इन्हें अपने घर में ठहराते हैं। इस बहाने थोड़ा धरम-करम भी हो जाता है। काली कमाई भी छुप जाती है और थोड़ा रसूख भी बढ़ जाता है। एक पंथ कई काज, सभी दर्द का एक इलाज। सब सत्संग में पधारे लेकिन नेताजी छूट जाएं ऐसा कैसे हो सकता है। नेताजी सबसे आखिर में आते हैं। प्रवचन के अंतिम दिन वे आते हैं प्रवचनकर्ता बाबा के चरण छूते हैं और उन्हें शांत भाव से एकटक निहारते रहते हैं। वे बाबा के जादुई व्यक्तित्व से प्रेरणा लेने की कोशिश करते हैं। वे बाबा के चरण स्पर्श करते हुए मन में कहते हैं- "हम तो लोगों को बेवकूफ बना-बनाकर परेशान हो जाते हैं और आप हो कि इतनी आसानी से इनको फांस लेते हो। थोड़ा जादू हमको भी सिखा दो, हमारी आमसभा में भी थोड़ी भीड़ आ जाएगी और थोड़े और वोट मिल जाएंगे। आप जैसे परम भ्रष्टाचारी को प्रणाम। हम तो मतलब के लिए धर्म का उपयोग करते हैं, आपने तो धर्म को ही अपना मतलब बना लिया। वाह क्या बात है।"



चलिए अब मैं आप सबसे आज्ञा चाहूंगा। मेरे घर के पास चल रहे सत्संग का आज आखिरी दिन है। सबने अपने स्वार्थ सिद्ध कर ही लिए हैं सत्संग में तो थोड़ा हक तो मेरा भी बनता है ना। वहां आज १०८ परिक्रमा होने हैं। अब मैं मेरी प्रिये के साथ सात फेरे ले पाऊंगा कि नहीं ये तो भगवान ही जानता है लेकिन आज उसके साथ १०८ फेरे तो ले ही लेता हूं। चलिए अब जल्दी चलता हूं क्योंकि यहां तो एक अनार सौ बीमार वाला मामला है।


इतने दिनों तक व्यस्तता के चलते इंटरनेट से दूर रहा और इस दरम्यान बहुत से मुद्दों लिखने से छूट गए। सब मुद्दे मेरे नजरों के सामने से गुजरते रहते लेकिन व्यस्तता के चलते किसी को भी पकड़कर कुछ लिखते नहीं बना। अब फुर्सत मिली तो सोचा कि लिख मारता हूं आज एक। इतने दिनों से कामनवेल्थ गेम्स खूब सुर्खियां बटोर रहा है। कॉमनवेल्थ की खबरें पहले पन्ने से हटने का नाम ही नहीं ले रही। रोज कोई न कोई खबर आकर अपनी जगह बना ही लेती है। जितनी खबरें अभी कॉमनवेल्थ गेम्स की छप रही हैं उतनी तो शायद जब गेम्स होंगे तब भी नहीं छपेंगी। खेल पेज को अपनी खबरों से पाट देने वाला क्रिकेट उपेक्षित महसूस कर रहा है। कभी आधे-आधे पन्ने तक छपने वाले क्रिकेटरों के फोटो को अब पासपोर्ट साइज में निपटाया जा रहा है। और ये सब हुआ है घोटाले और भ्रष्टाचार का नया अध्याय रचने वाले श्री सुरेश कालमाड़ी की वजह से। वैसे मुझे किसी के नाम के आगे श्री लगाने बिलकुल अच्छा नहीं लगता। अरे किसी को फ्री फंड में इतनी इज्जत क्यों दें भला। मगर कालमाड़ी जी ने काम ही ऐसा किया कि उनके नाम के आगे श्री तो लगाना ही पड़ेगा। कम आन वेल्थ गेम्स म..म.माफी कीजिएगा कॉमनवेल्थ गेम्स को इतना प्रसिद्ध बना दिया है कि अब पूरी दुनिया को पता चल गया है कि अपने यहां भी कोई गेम-वेम हो रहे हैं नहीं तो पहले तो इतना सन्नाटा पसरा हुआ था कि पता ही नहीं चल रहा था कि अपने यहां कुछ हो भी रहा है। देश-विदेश के मंत्री-अफसर बार-बार हमारे देश में तांक-झांक करने आ रहे हैं। वैसे कॉमनवेल्थ गेम्स को "कम ऑन वेल्थ गेम्स" कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। कॉमनवेल्थ गेम्स ने साबित कर ही दिया कि "कम ऑन, वेल्थ और भी गेम्स में हैं।" सच तो है पैसा तो सब खेलों में कब से दबा पड़ा है बस निकालने वाला परिश्रमी पुरुष चाहिए था। और इस पैसे को अपने अथक परिश्रम से निकालने का पुण्य काम किया है श्री श्री कलमाड़ी जी ने। (माफ कीजिएगा अतिउत्साह में मैंने दो-दो बार श्री लगा दिया लेकिन क्या करूं कलमाड़ीजी ने काम ही ऐसा किया है) कॉमनवेल्थ गेम्स की ऐसी धूम और चर्चा देखकर तो ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरून भी घबरा गए क्योंकि अगले साल उनके यहां होने वाले ओलंपिक को कोई पूछ तक नहीं रहा और इधर कॉमनवेल्थ गेम्स है कि सूर्खियों पर सूर्खियां बटोरे जा रहा है। अखबारों में कॉमनवेल्थ, टीवी में कॉमनवेल्थ, रेडियो में कॉमनवेल्थ, एसएमएस में कॉमनवेल्थ  और यहां तक गली-नुक्कड़ में होने वाली गप्पबाजी में भी कॉमनवेल्थ। बस यही देखकर उन्हें भी कोफ्त हो गई और उन्होंने तैयारियों के अभाव के कारण कॉमनवेल्थ गेम्स अपने यहां कराने की पेशकश कर दी। दरअसल वो इस फिराक में थे कि कॉमनवेल्थ गेम्स उनके यहां हो जाएं तो शायद थोड़ी सुर्खियां उन्हें भी मिल जाएं। कैमरून के दर्द को समझा जा सकता है। वैसे मेरी राय है कि उन्हें अगर अपने लंदन ओलंपिक्स को सुर्खियों में लाना ही है तो उन्हें अपने देश में कलमाड़ी टाइप के किसी तारणहार की जरूरत है जो उनका उद्धार कर सके। वरना लंदन ओलंपिक्स हो जाएंगे और किसी को पता भी नहीं चलेगा। मैं तो कहता हूं कलमाड़ी को ही लंदन ओलंपिक्स की समिति का अध्यक्ष बना देना चाहिए फिर देखिए कलमाड़ीजी की करस्तानी से कैसे अखबारों के पन्ने लंदन ओलंपिक्स की खबरों से पटते हैं।

कॉमनवेल्थ गेम्स की खबरें और कलमाड़ी अब देशभर में इतनी चर्चित हो चुकी हैं कि इसने इतने समय से भारत में सीना तानकर कर चलने वाले क्रिकेट को डरा दिया है। क्रिकेट को अपना एकछत्र राज्य डगमगाता हुआ दिखाई दे रहा है। जो क्रिकेट मैच, आईपीएल और मोदी आए दिन सास-बहु सीरियल की तरह बोर करने लगे थे, उनसे छुटकारा दिलाया है एक योद्धा ने- श्री श्री श्री कलमाड़ी ने (माफ कीजिएगा पूर्व की अपेक्षा इस बार अति अति उत्साह में मैंने तीन बार श्री लगा दिया पर क्या करें कलमाड़ी जी ने काम ही ऐसा...)। जब-जब धरती पर क्रिकेट रूपी राक्षस अपने आतंक से टीवी, अखबारों और लोगों के दिमाग में छा जाते हैं तब-तब लोगों को जगाने एक योद्धा अवतरित होता है और ये योद्धा हैं- सही पहचाना..... कलमाड़ीजी। मोदी ने आईपीएल में छोटा सा घोटाला क्या कर दिया बस सबके सिर पर नाचने लग गया था लेकिन कलमाड़ीजी ने बता दिया कि घोटाला किसे कहते हैं और घोटाला किस स्तर का होना चाहिए।

पहले देश में लोग रोया करते थे कि क्रिकेट छोड़ किसी खेल में पैसा नहीं है लेकिन कलमाड़ीजी ने दिखा दिया कि अगर सच्ची मेहनत, लगन व इच्छाशक्ति से कुछ काम किया जाए तो फल अवश्य मिलता है। उन्होंने खुद तो खूब फल खाए ही औरों को भी खूब फल बांटे। जो हजारों के पीछे भागा करते थे उन्हें करोड़ों की सवारी करा दी। वाह कलमाड़ीजी गजब लीला है आपकी। कलमाड़ी को पैसे में तैरता देख शरद पवार भी सोच में पड़ गए कि पता नहीं क्यों वे आईसीसी प्रमुख बन गए उन्हें भी राष्ट्रमंडल खेलों में ट्राई मारना चाहिए था।

अपने अद्भुत पराक्रम से कलमाड़ीजी ने कईयों को एक साथ जवाब दे दिए। जो एक जवाब मांगते थे उनके मुंह पर चार मार दिए। देश में गरीबी और आर्थिक मंदी का रोना रोने वालों को उन्होंने दिखा दिया कि भारत कोई गरीब देश नहीं है और न यहां आर्थिक मंदी है। जहां एक कुर्सी की जरूरत हो वहां हम चार खरीदने की हैसियत रखते हैं। १०० रुपए की चीज १००० में हम यूं ही खरीद लेते हैं। हमें नहीं जरूरत विश्व बैंक और अन्य देशों से खैरात की। इधर एक रिपोर्टर उनसे पूछ बैठा कि- "कामनवेल्थ गेम्स के लिए हो रहे घटिया निर्माण से वे विश्व के सामने भारत की कैसी तस्वीर पेश कर रहे हैं।" इस पर कलमाड़ीजी भड़क उठे और बोले- "देखिए, मैं एक सच्चा आदमी हूं। मैं दुनिया को धोखा नहीं दे सकता। मैं भारत की सच्ची तस्वीर ही दुनिया के सामने रखना चाहता हूं। भारत में घटिया सड़कें बनती हैं, घोटाले होते हैं, मिलावट होती है, ट्रेफिक जाम होता है। जो सच है मैं तो वही दुनिया के सामने पेश कर रहा हूं। मैं आशा करता हूं कि विदेश से यहां आने वाले खिलाड़ी "जैसा देश, वैसा भेष" में विश्वास करते होंगे और यहां आकर हमारे देश के हिसाब से ढल जाएंगे।"

कलमाड़ी जी ने अपने कारनामे से न केवल बहुतों को लाल किया बल्कि लगे हाथ ठल्ले बैठे कई लोगों को काम भी दे दिया मसलन मसाले की तलाश में रहने वाले मीडियावालों को मसाला, अखबारों को चटपटी खबरें और कलमकारों को मुद्दा, बहुत से कार्टूनिस्टों-कामेडियनों की रोजी-रोटी भी कलमाड़ीजी ही चला रहे हैं। इस तरह बहुमुखी प्रतिभा के धनी श्री कलमाड़ी ने अपनी पराक्रम से कॉमनवेल्थ गेम्स को कम ऑन वेल्थ गेम्स बनाकर एक ऐसा उदाहरण पेश किया जिसकी मिसाल आने वाले पीढ़ी के घोटालेबाज देंगे और उनका अनुसरण करेंगे। ऐसे हैं श्री श्री श्री श्री श्री श्री कलमाड़ी जी और ऐसा है उनका कम ऑन वेल्थ गेम्स (माफ कीजिएगा लेख के अंत तक मै इतना उत्साहित हो गया कि ५-६ बार श्री लगा दिया पर क्या करें कलमाड़ीजी ने काम ही ऐसा किया है)
bihar 2"तीन हॉफ चाय और समोसे देना भैया।" मैंने होटलवाले को चाय का आर्डर दिया। रोज की तरह मैं, विकास और हेमंत राजू होटल में गप्प मारने और साथ ही चाय पीते-पीते अखबार के पन्ने चाटने पहुंच चुके थे। हमारी तिकड़ी का यह अड्डा है टाइमपास का। हम यहां अपना कीमती वक्त बड़े मजे से बर्बाद करते हैं। अपनी बैठक वहां रोज बैठती है और इस बैठक में देश-विदेश से लेकर व्यापार, खेल, फिल्में, पड़ोसी गर्लफ्रैंड तक सभी की बातें होती हैं। कभी-कभी गलती से हम श्रद्धा, भक्ति और आराधना पर भी चर्चा कर लेते हैं। कोई भी अपनी हांकने में कोई कमी नहीं करता। सब एक से बढ़कर एक लपेटु। कुछ ही देर मे हम तीनों की चाय आ गई। तभी चुस्कियां लेते-लेते मेरी नजर अखबार पर पड़ी। वैसे अखबार में हमें खेल और फिल्म पन्ने के सिवाय कुछ नहीं भाता । हमारा बस चले तो हम अखबार के सभी पन्नों को खेल और फिल्म की खबरों से भर दें। मगर उस दिन ऐसी खबर पढ़ी की नजर वहीं अटक गई-"बिहार के सदन में हाथापाई, अध्यक्ष पर फेंकी चप्पल।"


ऐसी चटपटी खबर मिले और उस पर चर्चा न हो, ये तो हो नहीं सकता। तभी विकास तपाक से बोला- "नेताओं ने तो सदन और संसद को अखाड़ा बना दिया है। मेरा भी मन है नेता बनने का लेकिन यह सब पढ़कर मेरा मन नेतागिरी से उचट हो जाता है।" मैं बोला- "जिस चीज के प्रति तुम्हें आसक्त रहना चाहिए उससे तुम विरक्त क्यों हो रहे हो।" राह भटकते विकास को मैंने राह दिखाने की कोशिश की। "अरे तुमने बिलकुल सही क्षेत्र चुना है। राजनीति में भरपूर पैसा है, पहचान है, नाम (बदनाम) है, हर समय आगे-पीछे घूमने वाले पिछलग्गू भी मिलेंगे। अगर तुम अपने अंदर के ईमानदारी वाले गुण को बाहर निकाल  दो और बेइमानी के गुण ठूंस दो तुम्हे परफेक्ट नेता बनते देर नहीं लगेगी।"

विकास सकुचाते हुए बोला- "नेता तो मैं बनना चाहता हूं लेकिन सदन में होने वाले दंगल से मैं डरता हूं इस दंगल में खुद को कैसे बचा पाउंगा ।" मैंने कहा- "तुम भी कमाल करते हो। अरे कल ही तो तुमने जिम ज्वाइन किया है। मैं तो कहता हूं छोड़ दो जिम। खूब खाओ तोंद निकालो। भारत के नेताओं को तोंदूल होना चाहिए। बड़ी सी तोंद यह साबित करती है कि यह नेता बहुत बड़ा खाऊ है और यह डामर, चारा, गिट्टी, तोप, गोले ताबूत से लेकर हर चीज पचा सकता है, इससे तम्हारा गुडविल(बैडविल) बढ़ेगा।"

bihar 1विकास मेरी बात पर सहमति जताने लगा तभी हेमंत बोल पड़ा- "लेकिन तुम्हें नहीं लगता कि आजकल सदन अखाड़ा बन गया है। इस अखाड़े में बात और लात दोनों चलती है। हमारा विकास अगर गलती से सदन पहुंच भी गया तो इसमें कैसे टिक पाएगा। " मैंने कहा- "सदन तो है ही अखाड़ा, बातों का अखाड़ा। यहां वाकयुद्ध होता है। जब बातों से बात नहीं बनती तो लातयुद्ध भी होता है। माइकें तोड़ी जाती हैं, कुर्सी फेंकी जाती है। यहां आरोप लगते हैं, सफाई पेश होती है, हंगामा होता है दंगल होता है। पूरा माहौल जमा रहता है। मैं तो कहना चाहूंगा कि सदन को अखाड़ा शब्द का पर्यायवाची ही माना जाए और इसे बकायदा शब्दकोष में शामिल कर लिया जाए। सदन में हंगामे का इतना मसाला रहता है कि ये टीआरपी में सास-बहु सीरियलों को भी पछाड़ सकती हैं। सबसे बड़ी बात यहां बीच-बीच में वो दुखदायी विज्ञापन भी नहीं आते। आप नॉनस्टाप मजा ले सकते हैं।"

हेमंत फिर कहने लगा- "मगर सभापति पर चप्पल फेंकने वाली बात मुझे हजम नहीं हुई। एक तो ये नेता वैसे ही सदन में बहुत कम आते हैं और जब आते हैं तब हंगामा खड़ा कर देते हैं।" मैंने समझाते हुए कहा-"तुम अभी नादान हो। अभी तुम्हारे पास नेताओं वाला दिमाग नहीं है ना। सबसे पहले तो ये समझ लो कि अगर नेता हर समय सदन में ही घुसे रहेंगे तो बाकी जरूरी काम जैसे घोटाले, भ्रष्टाचार, बवाल कहां से करेंगे। ये सब नेतागिरी के महत्वपूर्ण शब्द हैं। सदन ज्यादा आएंगे तो घोटाले करने का टाइम कैसे मिलेगा और घोटाले नहीं किए तो नेता बिरादरी में नाक न कट जाएगी।

लेकिन तुम्हारी बात से मैं सहमत हूं सभापति को चप्पल से नहीं मारना चाहिए था। इससे यह सिद्ध होता है कि उस नेता ने जरूर तरक्की नहीं की होगी, कोई घोटाला नहीं किया होगा इसलिए अभी तक चप्पलें घिस रहा था। या फिर ऐसा भी हो सकता है कि उसने नया-ताजा घोटाला किया होगा और अपने पहले घोटाले की खुशी में नए जूते लिए होंगे लेकिन पुराने चप्पल कहां फेंकूं इसी कश्मकश में रहा होगा। अंत में सदन में हुए मारपीट के बीच उसने चुपके से अपनी पुरानी चप्पलें फेंककर नए जूते पहन लिए होंगे। अगर इसकी थोड़ी जांच कराई जाए तो पता चल सकता है कि चप्पलमारू विधायक कौन था।

वैसे इस चप्पल फेंकने वाले प्रकरण से सभापति बहुत क्षुब्ध थे। उनका गुस्सा चप्पल मारने वाले के ऊपर कम और मीडिया पर ज्यादा था। मारने वाले ने तो एक चप्पल मारा मीडिया ने उसे दिखा-दिखाकर 100-200 बार चप्पल खिलवा दिए। इसलिए विकास मैं कहता हूं तुम नेता जरूर बनना लेकिन भूलकर भी सभापति मत बनना वरना किसके जूते-चप्पल खाने पड़ जाएं पता भी नहीं चलेगा और चिल्लाकर गला अलग दर्द करने लगेगा। पार्टी के भीतर तुम्हारे विरोधी तुम्हे सभापति बनाने पर तुले होंगे लेकिन तुम उनका पैंतरा उन्हीं पर आजमाना और सभापति बनने पर उनके मुंह पर एक चप्पल जमा ही देना और वो भी सबको दिखाकर इसी बहाने मीडिया अटेंशन भी मिलेगा। मीडिया को चटपटी खबर मिल जाएगी और तुमको सुर्खियां। दोनों के काम बन जाएंगे। इसलिए बोल रहा हूं तुम भिड़ जाओ नेतागिरी में, कूद पड़ो, देर न करो बहुत हैं लाइन में। "

तभी हेमंत बोला- "सदन में नेता माइक्रोफोन और कुर्सी तोड़ देते हैं ये ठीक नहीं है।" मैंने उत्तर दिया- "हो सकता है कि नेताओं के कुर्सी और माइक्रोफोन खराब होंगे और इस कारण वह सदन में अपने मन की कह नहीं पा रहे होंगे। इसलिए उन्होंने माइक्रोफोन और कुर्सी तोड़कर अपनी भड़ास निकाल दी ताकि इसी बहाने नए कुर्सी और माइक्रोफोन आ जाएंगे। इसलिए विकास तुम जब विधायक बनकर सदन में जाओगे तो अपने माइक्रोफोन के साथ दूसरों के भी माइक्रोफोन तोड़ना ताकि कोई तुम्हारे खिलाफ कुछ कह न पाए। सदन के अखाड़े में धोबीपछाड़ कर तुम ही विजेता बनकर उभरना।"

मेरी प्रेरणास्पद उपदेश से विकास के अंदर का नेता उबाल मारने लगा था। अब उसके नेता बनने की इच्छा इरादे का रूप ले चुकी थी। वह जाने लगा तभी मैंने उसे टोका-"विकास नेता बनने वाला है तो कम से कम होटल में अपना पिछला उधारी तो पटा दे वरना राजू भाई का वोट तुझे कैसे मिलेगा।" विकास आया और होटलवाले को एक हजार रुपए देते हुए बोला, "ये लो पिछला बकाया काट लो और बाकी रख लो। अब मैं चिल्हर वापस नहीं लूंगा। मैं बड़ा नेता हूं।" मैं हेमंत की तरफ देखकर मुस्कुराने लगा और उसे चलने के लिए कहा क्योंकि कल भी तो विकास के साथ इसी होटल पर बैठक जमाना है।