हिन्दीभाषी राष्ट्र में कमजोर अंग्रेजी का खामियाजा किस तरह भुगतना पड़ता है इसका पता हमें कुछ दिनों पूर्व चला। हम टकटकी लगाए रोड के किनारे बनी बड़ी-बड़ी दुकानों को निहारते हुए जा रहे थे। चूंकि महंगाई डायन के शिकंजे में जकड़े हुए हैं इसलिए आजकल दूरदर्शन से ही संतोष करना पड़ता है। ऐसे में हमारी नजर एक दुकान पर ठहर गई। उस पर लिखा था "sale"  50 प्रतिशत की छूट। यह पढ़ते ही हमारी आंखों में चमक आ गई। हमारे निखट्टू (sale) साले ने कपड़े की दुकान खोल ली और अपने जीजा को 50 प्रतिशत की छूट दे रहा है। अपने साले के इस अविश्वसनीय व अकस्मात् प्रेम से अभिभूत मैं दुकान की ओर चल पड़ा।

काउंटर पर 100 वॉट की मुस्कान बिखेरती एक खूबसूरत अप्सरा बैठी थी। जिस तरह स्ट्रीट लाइट की रोशनी सैंकड़ों कीट-पतंगों को आकर्षित करती है उसी तरह वह मुस्काती अप्सरा अपनी चमकदार मुस्कान से कईयों को आकर्षित कर रही थी। उस प्रकाशपुंज से नजर हटाते ही हमारी नजर एक सेल्समेन पर पड़ी। हमने उससे अपने साले निखट्टू का नाम पूछा। उसने उस नाम से अनभिज्ञता जताई लेकिन कहा इसे आप अपनी ही दुकान समझिए और कपड़े खरीदिए। तभी दो और सेल्समेन खड़े हो गए एक पानी लिए और दूसरा रास्ता दिखाने। अब तक हम अपने ससुरालवालों खासकर अपने साले से काफी खफा रहा करते थे, लेकिन उसकी दुकान में ऐसा घरेलू माहौल व आतिथ्य देखकर हमारे आंसू निकल आए।

हमने अपने घडिय़ाली आंसू पोंछे और लगे कपड़े छांटने। चूंकि वहां कपड़े बदलने का कक्ष भी था हम एक के बाद एक कपड़े बदलते रहे। एक घंटे में हमने इतने कपड़े बदल लिए जितने अभी तक के जीवनकाल में नहीं पहने। इसके बावजूद दोनों सेल्समेन के सपाट चेहरों पर मुस्कान चस्पी हुई थी। हमने काउंटर पर बैठी उस मुस्कुराती अप्सरा को देखा, वह अब भी मुस्कुरा रही थी। पूरी दुकान में मुस्कान की सप्लाई वही कर रही थी। जो उन्हें देख ले मुस्काने लगता, मुस्कुराने का यह रोग कंजक्टीवाइटिस की तरह फैल रहा था। 50 कपड़े पहनने के बाद भी हमें कपड़े कुछ खास पसंद नहीं आ रहे थे, वहीं जय-विजय की तरह खड़े दोनों सेल्समेन हम पर कपड़े थोपे जा रहे थे। 

आखिर मैंने दो जोड़ी कपड़े ले ही लिए वह भी 50 प्रतिशत की छूट पर। महंगाई के जमाने में आपको छूट मिल जाए तो ऐसा लगता है भरी गर्मी में किसी ने ठंडा पानी पिला दिया। मगर ऐसे में लू लगने का खतरा भी रहता है। हम खुशी के मारे तुरंत घर लौटे लेकिन घर पहुंचते ही हमारी खुशी को लू लग गई। जो कपड़े हम खरीदकर लाए वह डिफेक्टिव थे, पेंट फटा था, शर्ट की सिलाई निकली थी। गुस्से से भरा मैं वापस दुकान गया। वहां का माहौल ही बदला हुआ था। मुस्कारती हुई अप्सरा अब फुफकारती हुई नागिन बन चुकी थी।  हममें भी उबाल कम न था, हमने उससे कहा- ये डिफेक्टिव कपड़े तुम लोगों ने दिया इसे वापस करो। वह फुफकारती हुई बोली- नहीं होगा और हमें एक नोट दिखाया जिस पर लिखा था बिका हुआ माल वापस नहीं होगा। मेरा गुस्सा 100 डिग्री से 50 डिग्री पर आ गया। मगर दिल में गर्मी अब भी थी, मैंने कहा- मेरे साले (sale) को बुलाओ जिसकी दुकान है और जिसका नाम बाहर बड़े अक्षरों में लिखा हुआ है। वह कुटिल हंसी हंसते हुए बोली- वह साले नहीं सेल लिखा है। कपड़ों का पता नहीं तुम्हारी अंग्रेजी जरूर डिफेक्टिव है। तुमने 50 कपड़े पहने फिर भी एक ढंग का कपड़ा नहीं छांट पाए, गलती तुम्हारी है। मेरा तापमान अब 50 डिग्री से 0 डिग्री हो चुका था, मैं बोला- लेकिन मेरे पास विकल्प ही नहीं थे, जो थे सब बेकार थे। युवती बोली- आपको समझाती ह, जब चुनाव में आपके सामने डिफेक्टिव प्रत्याशी खड़े किए जाते हैं तब तो कुछ नहीं बोलते, आखिर चुनते हो ना उनमें से कोई। जब इतने बड़े डिफेक्ट के साथ नेताओं को 5 साल चला लेते हो, वापस थोड़ी भेजते हो। तो इन कपड़ों में तो छोटा-मोटा डिफेक्ट है, घर में सीलकर चला लो। हार मानते हुए मैंने उनसे सुई-धागा की गुजारिश की जो उन्होंने मुस्कुराते हुए दिया। उनकी मुस्कान का 100 वॉट का बल्ब फिर जल चुका था। 

मैं भी डीप फ्रीजर से निकले आइसक्रीम की तरह ठंडा होकर वहां से निकला। सीढ़ी पर ही एक गुस्से से खौलते व्यक्ति से मुलाकात हो गई। शायद वह भी कपड़े वापस करवाने आया था। मैंने उसके कंधों पर हाथ रखा और कहा- ठंडे हो जाओ मित्र! बिका हुआ माल और चुना हुआ नेता वापस नहीं होते।

चाचा, आज फिर दातून कर रहे हो कभी कोलगेट भी कर लिया करो, दातून करते नत्थू चाचा से जैसे ही मैंने कहा वे अपना दातून थूकते हुए बोले- कर दी ना दिल तोडऩे वाली बात। कोलगेट का नाम सुनते ही लगता है जैसे मेरे किस्मत के सारे गेट बंद हो गए हों। जीवन में सब कुछ किया बस कोलगेट नहीं कर पाया। मैं बोला- चाचा इतनी सी बात, लो अभी दुकान से कोलगेट ले आता हूं। चाचा खिसियाते हुए बोले- अरे आधुनिक युग के पुरातन प्राणी मैं किस कोलगेट की बात कर रहा हूं और तू किस पर अटका है। अरे ये वो कोलगेट नहीं जो पैकेट में समा जाए बल्कि ये वो कोलगेट है जिसमें पूरा देश डूबा पड़ा है। एक कोलगेट दांत चमका रहा है और दूसरा नेताओं की किस्मत।


वैसे कोलगेट न कर पाने के लिए मैं खुद को ही दोषी मानता हूं। मैं सारी उम्र आम के अचार में ही मग्न रहा, कभी भ्रष्टाचार का स्वाद नहीं चख पाया। जिंदगीभर कष्ट सहता रहा पर भ्रष्ट नहीं बन पाया। और अब जिंदगी के आखिरी पड़ाव में खिसियानी बिल्ली बन खंबा नोच रहा हूं और नेता कोयला खोद रहे हैं। नेता कोलगेट कर रहे हैं मैं दातून करता रह गया, वे हीरो बन गए मैं कार्टून बनकर रह गया। गुस्साए चाचा ने अपनी दातून तोड़ी और मुझे समझाते हुए बोले- भ्रष्टाचार न कर मैंने तो खुद अपनी कब्र खोदी है पर बेटा, तुम ऐसा मत करना जब भी मौका मिले तुम भ्रष्टाचार की बड़ी-बड़ी सुरंगें खोदना। वैसे सुरंग खोदने के बहुत फायदे हैं, कभी अंडरग्राउंड होना पड़ा तो ये सुरंग बहुत काम आएंगी।

 नत्थू चाचा से मिल रहे ज्ञान को मैं बड़े ध्यान से सुन रहा था। मैंने आगे पूछा- चाचा, कोल ब्लॉक पर आपका क्या कहना है? चाचा बोले- कोल ब्लॉक के तो क्या कहने। इस कोल ब्लॉक ने तो कईयों के किस्मत को अनलॉक कर दिया पर देश की गाड़ी को ब्लॉक कर दिया है। देखो पूरा सत्र निकल गया पर संसद चली ही नहीं। एक जोरदार ठहाका मारते हुए मैं बोला- अरे चाचा, माना संसद का आकार गाड़ी के चक्के की तरह है, पर वो चलती थोड़ी है। खिसियाए चाचा बोले- अरे आधुनिक युग के पुरातन प्राणी मेरा मतलब है संसद चलेगी कैसे, कांग्रेस एक्सीलेटर बढ़ा रही है पर भाजपा ब्रेक दबाए बैठी है, कुछ पार्टियां चक्के पंक्चर करने में भिड़ी है। वहीं मुलायम सिंह कभी स्टेफनी लिए हाथ में दिखते हैं, तो कभी कील। उन्होंने दोनों विकल्प खुले रखे हैं, जरुरत पड़ी तो स्टेफनी बन जाएंगे नहीं तो सरकार की गाड़ी पंक्चर कर देंगे। इस एक्सीलेटर-ब्रेक के घमासान में देखो देश का इंजन जल रहा है।

मैंने आगे पूछा- कांग्रेस बहस चाहती है, भाजपा इस्तीफा। न बहस हो रही है न इस्तीफा मिल रहा है, बस कोल के झटके से पूरा देश हिल रहा है। चाचा बोले- बेटा पत्थर तो दोनों बरसाना चाहते हैं पर अपने कांच के घर देख हाथ खींच लेते हैं। तो कोल ब्लाक के इस बंदरबांट पर आप क्या कहेंगे चाचा, मैंने फिर सवाल दागा। अब तक पूरी तरह रिचार्ज हो चुके चाचा बोले- इसे बंदरबांट कहना जाय•ा नहीं होगा। इंसानों के फसाद में बेचारे बंदरों को इन्वाल्व करना ठीक नहीं, चाचा ने अपने अंग्रेजी ज्ञान का परिचय दिया। मैं बोला- फिर इसे हम अंधा बांटे रेवड़ी कह सकते हैं। चाचा बोले- नहीं नहीं, तुम गलत मुहावरों का प्रयोग कर रहे हो। अंधा तो जो हाथ में आए बांट देता है न कम देखता है न ज्यादा, न अपना देखता है न पराया। यहां जो आबंटन हुआ है वो गिद्घदृष्टि से हुआ है। गिद्घों के द्वारा, गिद्घों के लिए। गिद्घ की तरह कोयला खदानों पर नजर गड़ाए लोगों को आबंटन हुआ है। मैं चाचा को टोकते हुए बोला- आप ही मना कर रहे थे जानवरों को इंसानों के फसाद में इन्वाल्व करने से, और अब खुद ही गिद्घों को इसमें घुसा दिया। चाचा मामला संभालते हुए बोले- मैंने तो इस उम्मीद से नेताओं की गिद्घों से तुलना की कि जिस प्रकार गिद्घ दिनोंदिन लुप्तप्राय हो रहे हैं, तो शायद ये नेता भी....। मगर ये तो असंभव लगता है क्योंकि अब तो बंदरों की मानिंद नेता उछल-उछलकर आ रहे हैं।

पूरे पिक्चर की बात बहुत हो चुकी थी, हीरो तो छूट ही गया था। मैंने तुरंत पूछा चाचा कोयला घोटाले के हीरो मनमोहन सिंह के बारे में कुछ नहीं कहेंगे क्या? मुझे यकीन नहीं होता कि उनके कोयला मंत्रालय संभालते ये सब हो गया। चाचा ठहाका मारते हुए बोले- तू सचमुच एंटीक पीस है। अरे जब टाइम ने मनमोहन सिंह को अंडरअचीवर कहा तभी मैं समझ गया था कि अंदर का माल बाहर आने को है। मैं रोकते हुए बोला- पर अंडरअचीवर तो वो होता है जिसने अपेक्षा से कम हासिल किया हो। चाचा समझाते हुए बोला-तुझे तो अंग्रेजी आती ही नहीं। मैं समझाता हूं, अंडर मतलब होता है अंदर, तो जो अंदर से अचीव करे वो अंडरअचीवर। वैसे भी सब कुछ अंदर ही अंदर हुआ है, प्लानिंग भी, आबंटन भी और कोयले की खुदाई तो अंदर ही अंदर होती है। मेरे हिसाब से तो सभी अंडरअचीवर हैं। और अब जब मामला सामने आया तो लोगों के पैरों तले कोयला म..म..मतलब जमीन खिसक गई। खैर मनमोहन जब बेदाग निकलेंगे तब निकलेंगे, अभी तो कोयले की कालिख में सब पुते हैं।

मैं सोचते हुए बोला- चाचा, अब मैं सब समझ गया। पर जब कोलगेट खुले तब क्या करना चाहिये? चाचा बोले- बेटा जब कोलगेट खुले तो आम आदमी की तरह गेट के इस पार नहीं बल्कि उस पार रहना। दाग लगेंगे, पर आज के जमाने में दाग अच्छे हैं। दागी बनो बैरागी नहीं। दागी बने तो कोलगेट करोगे और बैरागी बने तो मेरी तरह दातून। इसलिए बेटा कोलगेट करबे दातून ले डरबे। कुछ देर बाद बड़बड़ाते और दातून चबाते हुए चाचा घर चल पड़े... कोयले सी तपती गुस्साई चाची हंगामा जो कर रही थी। और अब मैं बैठा इंतजार कर रहा हूं अगला कोलगेट खुलने का..।
लोग कहते हैं टेक्नॉलाजी ने इंसान के जीवन को सुगम बना दिया है, लेकिन इसने तो मेरी जिंदगी को दुर्गम बना दिया है। खबरें आ रही हैं कि करोड़ों रुपए देकर अब चांद की यात्रा की जा सकती है। बस इसी खबर ने मेरी नींद उड़ा दी है। पहले तो हम अपनी प्रियतमा को बोल बचन दे दिया करते थे कि तूझे चांद पर ले जाऊंगा, मगर ये सिरफिरे वैज्ञानिक तो सचमुच सेंटी हो गए और अब चांद की सैर कराने उतारु हो गए हैं। पिछली बार जब चांद पर जमीन खरीदने की बात आई तो मैंने अपनी प्रियतमा से कह दिया कि सब फर्जी है पर इस बार तो वो चांद पर जाने की अर्जी लेकर बैठ गई है। वैसे ये उसकी अर्जी नहीं असल में मर्जी है और मेरी जीवन का मर्ज। खैर मैंने इस बार फिर से उसे नेताजी की तरह बोल बचन देते हुए कह दिया है कि मंगल पर जाएंगे। आशा है कम से कम १५-२० साल तक मंगल पर जाने का कोई पैकेज नहीं आएगा। वैज्ञानिक शांत रहेंगे और मेरे जीवन में भी शांति कायम रहेगी।

मेरी चिंता तो खत्म हो गई लेकिन जैसा कि आप जानते हैं मैं चिंतक किस्म का हूं। अपनी चिंता खत्म हुई तो क्या पूरे जमाने की चिंता करने का अघोषित ठेका तो मैंने भगवान से लिया हुआ है वो भी बिना टेंडर भरे। सेटिंग है अपनी। बस अब जमाने की चिंता करने में जुटा हूं। वैसे चिंतक गुण के मामले में  खुद को अमेरिका की टक्कर का मानता हूं। दूसरे के फटे में टांग घुसाना मेरी प्रमुख खूबियों में एक है। और अगर फटा न तो हम पहले फाड़ते हैं, फिर अपनी टांग घुसाते हैं। चांद पर जाने की खबर क्या निकली चांद के प्यारे चांद पर पहुंचने बेताब हो गए।

इन्हीं चांद के प्यारों में से एक थे हमारे कवि मित्र उन्माद कुमार 'बेताब'। बेताबजी हमें सड़क पर मिले। उनके उन्मादी चेहरे पर चांद पर जाने की बेताबी साफ दिख रही थी। मैंने तपाक से कहा- चांद पर मत जाना चांद के प्यारे। वो बोले- क्यों। मैंने कहा- पहले तो चांद पर पहुंच पाओगे नहीं आप। वो बोले मैं धन का गरीब हूं मगर कलम का अमीर हूं। मेरे अप्रकाशित कविताओं के इतने पन्ने हैं कि अगर क्रमबद्ध तरीके से जमाऊं तो यूं ही चांद तक हाईवे बना दूंगा। आप लोगों ने तो हमें और हमारी कविताओं को हमेशा हल्के में लिया है, इसलिए जा रहे हैं चांद पर पूरी तरह हलके होने। वहां तो वैसे भी हर चीज ८ गुना हल्की हो जाती है। मैंने कहा- बेताबजी, आपने जुगाड़ तो अच्छा बिठाया है लेकिन भूलकर भी चांद पर न जाना, आप क्या मैं तो कहता हूं कोई कवि चांद पर न जाए। गलती से पहुंच भी गये तो चांद आपको वहीं गड्ढे में पाट देगा।

बेताबजी ने अचरज से पूछा- ऐसा क्यों? मैंने कहा- चांद बहुत खफा है आप लोगों से, कोई उसे अप्सरा बता देता है, कोई सुंदरता की मूरत, तो कोई चंदा मामा, तो कोई दागदार बदसूरती। जिसके मन में जो आता चांद को वही बना देता है, बिना पूछे उसका लिंग परिवर्तन कर दिया जाता है। खुद को सुंदरता की मूरत कहलाए जाने पर चांद शरमा ही रहा होता है कि कोई दूसरा कवि उसे मामा पुकारने लगता है। उस पर जो थोप दिया गया, वो उसे भारतीय जनता की तरह चुपचाप सहता गया। लेकिन अब नहीं, अब आंदोलनों की बयार छाई हुई है। इंडिया अगेंस्ट करप्शन और चांद अगेंस्ट इमेजिनेशन। चांद पर इतनी गड्ढे यूं ही नहीं पड़े। ये जो आप कवि महाशय चांद पर अपनी कल्पना के हवाईजहाज छोड़ते हैं, ये क्रैश लैंडिंग होकर वहीं गिरते हैं और गड्ढे बनाते हैं। चांद को तो बेसब्री से इंतजार है कि कोई कवि वहां आए और उसे गड्ढे में गाड़कर वो अपनी गड्ढे पाटे। इतना सुनता था और बेताबजी बेताब होकर अपने घर को भागे।

इधर मुझे बेचारेलाल जी दिखाई दिए दुखी मुद्रा में। मैंने जाते ही पूछा क्या हुआ बेचारेलालजी। अपनी दुखित मुद्रा बरकरार रखते हुए बेचारेलाल जी बोले- महंगाई सातवें आसमान पर हैं, सब चीजें सातवें आसमान पर है चाहे खाने के दाम हो या सोने के। समझ नहीं आता कैसे इनकी हासिल करूं, ये तो मेरी पहुंच से बहुत दूर हो गए हैं। मुझे मौका बिलकुल उपयुक्त लगा अपना वैज्ञानिक ज्ञान दिखाने का, मैंने तुरंत मोटा चश्मा चढ़ाया और कहा- देखिए यहां भौतिकी का नियम लागू होता है- गुरुत्वाकर्षण बल का। पहले आप भी जमीन पर थे और सामानों के दाम भी, सब लेवल में था। आप जमीन पर ही रहे... मगर दाम थोड़ा ऊपर उठी। दाम थोड़ा और उपर उठी.... मगर आप तब भी जमीन पर रहे। अब दाम सातवें आसमान पर है और आप वही के वही जमीन पर। तो बस अब आप कुछ जुगाड़ बिठाइए, गुरुत्वाकर्षण बल के खिलाफ जाइए और पहुंच जाइए चांद पर.... पृथ्वी में आसमान की पांच परतें हैं... ये हो गए पांच आसमान.... दो आसमान और आगे जाइए आ गया सातवां आसमान। यहां आपको महंगाई डायन व आपकी मूलभूत चीजें दिख जाएंगी। मगर आप यहां रुकना मत.. यहां से १० किलोमीटर और आगे जाना और चांद पर उतर जाना। चांद पर आप रहेंगे तो ये सातवें आसमान की चीजें आपके नीचे ही रहेंगी और १५-२० साल बाद अगर महंगाई बढ़ते-बढ़ते चांद तक पहुंच भी गई तो भी ये आपकी पहुंच से बाहर नहीं होंगी। इतना सुनते ही पिछले आधे घंटे से दुखित मुद्रा में दिख रहे बेचारेलाल प्रसन्न हो आगे बढ़ लिए। लोग कहते हैं निंदक नियरे राखिए, मैं तो कहूंगा चिंतक नियरे राखिए... वो भी मुझ जैसा।

खैर अब आगे बढ़ा तो नेताजी दिख गए उदासी में। नेताजी को उदास देखना हमें बिलकुल गवारा न हुआ। भारत में एक इनकी ही तो प्रजाति प्रसन्न मु्द्रा में रहती है, इनको भी किसी ने नजर लगा दी। मैंने पूछा- क्या हुआ नेताजी। नेताजी बिलखते हुए बोले- जिंदगी नीरस हो गई है....। इतने घोटाले किए, इतने भ्रष्टाचार किए...किसी को नहीं छोड़ा। अब तो धरती पर कुछ रहा ही नहीं जिसमें घोटाला कर सकूं, जिंदगी नीरस हो गई है। घोटाला भी करता हूं तो लोग ध्यान नहीं देते.... जैसे घोटाला न हुआ कोई सब्जी-भाजी हो गया। हमारे मेहनत की तो कोई वैल्यू ही नहीं रह गई है। इतना सुनते ही मेरी आंखें भर आई.... मैंने कहा- बस बहुत हो गया... आप सच्चे चांद के प्यारे हैं। आप चांद पर जाइए... वहां जाकर इंधन घोटाला कीजिए। जो भी चांद घूमने आए.. उसकी वापसी का इंधन पी जाइए। चांद के १००-१५० गड्ढों पर अवैध कब्जा कर लीजिए। नेताजी ने मेरी सुझाव लपका और चांद जाने वाली अंतरिक्ष यान लपकने चल दिए।

इतने लोगों को चांद पर लेक्चर देकर हम खुश बहुत थे। पर अब भी दो लोग खुश नहीं थे। एक तो चिंतक गुण में हमारी टक्कर वाला विदेशी 'अमेरिका' व दूसरी हमारी देसी गर्ल.. हमारी प्रियतमा।  इतने लोगों को हमने चांद पर जाने के लिए उत्प्रेरित कर दिया तो अमेरिका घबरा गया कि अब तक तो बस ३ अमेरिकी ही चांद पर पहुंच पाए थे... इसके बस चला तो ये तो १० प्रतिशत भारतीयों को वहीं बसा देगा, फिर अमरीकियों का नामलेवा कौन होगा। इसलिए अब अमेरिका हमारे पीछे लग गया है। और दूसरी हमारी प्रियतमा, जो वैसे ही हमारे पीछे लगी रहती है...अब और पीछे पड़ गई है। क्योंकि किसी ने उसको बता दिया कि मंगल पर १५-२० साल तक जाने का कोई चांस नहीं है। और अब वो फिर पीछे पड़ गई है अपनी चांद पर जाने की अपनी अर्जी लेकर... मतलब मर्जी लेकर... मतलब हुक्म लेकर...। अब मुझे जरुरत है एक चिंतक की, एक शुभचिंतक की, एक महाचिंतक की.....कोई है।



मध्यम कुमार बेतहाशा दौड़े जा रहे थे, उन्हें इस तरह भागता देख लग रहा था मानो वे फर्राटा धावक का 100 मीटर का रिकार्ड तोड़ देंगे। वैसे तो इस देश में सब भाग ही रहे हैं- नेता अपने वादों से, अधिकारी अपने काम से, जनता अपने कर्तव्यों से, परिवारवाले बेटियों से भाग रहे हैं, कोई घोटाला करके भाग रहा है, तो कोई घोटाला करने के लिए भाग रहा है। इतने भागदौड़ वाला देश भी जब ओलम्पिक दौड़ में मेडल नहीं ला पाता है, तो बड़ा अचरज होता है। खैर यह सब तो चिंतनीय बातें है, लेकिन अभी हम चिंतक नहीं ईष्र्यालु मूड में हैं और मध्यम कुमार हमारी आंखों के सामने दौडऩे का रिकार्ड बना दे, ऐसा कतई नहीं हो सकता। उनके इस दौड़ में व्यवधान उपस्थित करने हम भी उनके पीछे-पीछे दौडऩे लगे। हमने उन्हें आवाज दी। हमारी आवाज सुनकर उन्होंने अपनी स्पीड धीमी की, हमें थोड़ी खुशी मिली। हमने पूछा- कहां भागे जा रहे हो मध्यम कुमार। पर वे हमारी बात को अनसुना कर फिर भागने लगे। पर अपनी ढीठ प्रवृत्ति के अनुरूप हमने भागते हुए फिर पूछा- कहा जा रहे हो। इस बार मध्यम कुमार रुके और बोले- आज हमें मत रोकिए। आज हम अपना कौशल दिखाकर रहेंगे। आज हमारे मोहल्ले में दो पक्षों का विवाद हो गया है। और जब-जब भी ऐसे विवाद होते हैं, तब-तब जरुरत पड़ती है एक मध्यस्थ की, और वो हैं हम।


मैंने आश्चर्य से पूछा- आप और मध्यस्थ? मध्यमकुमार जी मामला साफ करते हुए बोले- आप तो हमेशा हमें नजरअंदाज ही कर देते हैं। अजी, हम तो पैदाइशी मध्सस्थ हैं, एकदम खालिस। एक तो हम मध्यमवर्गीय परिवार से हैं। तीन भाईयों में हम मंझले हैं। हमारी शादी  के समय जब हम लड़की देखने गए तब तीन बहनों में हमें छोटी लड़की पसंद थी. पर परिवार वाले हमारी शादी बड़ी लड़की से कराना चाहते थे। बड़ी विकट घड़ी थी, विवाद की स्थिति भी बन रही थी, लगा जैसे जुड़ता हुआ रिश्ता टूट जाएगा । ऐसा लग रहा था जैसे मारा तो बल्ले से छक्का था, लेकिन बाउंड्री लाइन पर लपक लिए जाएंगे। ऐसे संकटपूर्ण स्थिति में अवतरित हुए मध्यम कुमार यानी कि हम। हमने तय किया कि हम मंझली लड़की से विवाह करें। सब मान गए और हो गया हैप्पी एंडिंग। बस तब से हमने अपने कौशल को भांपते हुए और जनता की मांग पर अपने नाम के आगे मध्यस्थ उपनाम जोड़ लिया और हम हो गए मध्यम कुमार 'मध्यस्थ'। तो ये थी मध्यम कुमार 'मध्यस्थ' के अवतरण की छोटी सी कथा।


हम मध्यम कुमार को टोकते हुए बोले कि जनता ने कब आपसे मांग की कि आप 'मध्यस्थ' उपनाम जोडि़ए। वे समझाते हुए बोले- देखिए सुमितजी, ये सब भावनाओं का खेल है। जनता साफ-साफ कुछ नहीं कहती, बस आपको उसका मन पढऩा आना चाहिए। मौका देख चौका मारिए और खुद को उन पर थोप दीजिए, जनता झेल लेगी। जैसे नेता चुनने का हक हमको नहीं है., बस जो चुनके सामने रख दिए गए हैं उनको वोट देकर जीता दो, यही काम है। देखिए अब कहीं भी झगड़ा होगा तो हम भी अपनी मध्यस्थता थोप देंगे। हम उनकी मध्यस्थता एक्सप्रेस को रोकते हुए बोले- मतलब मध्यस्थ वह होता है जो दूसरे के फटे में जबरन टांग अड़ाए। ध्यमकुमार खीझते हुए बोले- नहीं, नहीं। मध्यस्थ वह होता है जो उस फटे की सिलाई करे, बिलकुल दर्जी की तरह।


मध्यम कुमार आगे बोले- मध्यस्थों का माखौल उड़ाने से पहले सुमितजी, इतिहास उठा कर देख लीजिए।  जितनी भी बड़ी लड़ाईयां हुई हैं, वे सब नहीं हुई होती, अगर उस समय हमारी श्रेणी व हमारी क्षमता का कोई मध्यस्थ वहां होता। पर यह तो नसीब का खेल है। ये तो इस युग की खुशकिस्मती है कि हम जैसे आला दर्जे के मध्यस्थ ने इस युग में जन्म लिया है। हमने आगे मध्यम कुमार से पूछा-, हम आपका माखौल नहीं उड़ा रहे लेकिन पिछली बार आप दो लोगों के विवाद में बिना बुलाए पहुंच गए थे मध्यस्थता करने। उस समय दोनों ही पक्षों ने आपको मध्यस्थ बनाने से इंकार कर दिया था, तब क्या आपके आत्मसम्मान को ठेस नहीं पहुंच थी। मध्यम कुमार बोले- देखिए, हमें ठेस नहीं पहुंची, बल्कि हमने इसे एक और मौके के रूप में लिया है। क्योंकि अभी इनका विवाद अस्थायी तौर पर निपटा है, अगली बार जब इनका विवाद होगा तब इन्हें हम ही याद आएंगे, और तब हम दिखाएंगे अपना जलवा। हम तो परमानेंट मामला सुलझाने वालों में से है।

मध्यमकुमार आगे बोले- हमें न लडऩा-झगडऩा पसंद है, न हम आपकी तरह तटस्थ रह सकते हैं, हमें तो बस मध्यस्थता करना पसंद है, और इसमे तो हम उस्ताद हैं। ये बीत दीगर है कि हमें कभी अपनी उस्तादी दिखाने का कोई बड़ा मौका नहीं मिला। पर आज मोहल्ले में बड़ा विवाद हुआ है। और इस विवाद को सुलझाने के बाद हमें मध्यस्थ शिरोमणि की उपाधि जरुर मिल जाएगी। धत्त तेरी की, आप जैसे तटस्थ से बात करने के चक्कर में कहीं हम मध्यस्थता करने का मौका न गंवा दें। जल्दी दौडि़ए इससे पहले कि कोई और मध्यस्थ बीच ममें कूदकर मामला सुलझा दे। मध्यम कुमार जी फिर फर्राटा गति से दौड़ लगाकर कर चल दिए। हम भी मजबूर देश के मजबूर नागरिक की तरह उनके पीछे-पीछे चल दिए। विवाद वाली जगह पर पहुंचकर जो नजारा मध्यम कुमार ने देखा, उसके बाद उनको काटो तो खून नहीं। किसी दूसरे मध्यस्थ ने आकर मामला पहले ही सुलझा दिया था। विवादित पक्षों में मिलने-मिलने का कार्यक्रम चल रहा था। मध्यम कुमार की हालत ऐसी हो गई थी, जैसे शादी उनकी हो और दुल्हन से फेरे कोई और ले बैठा।


मध्यम कुमार का चेहरा हताश, निराश और देवदास सरीखा हो गया था। मौके की गमगीनी को देख मैंने तुरंत एक शायरी दे मारी कि-
मोहब्बत का अंजाम देख्र डर रहे हो, 
निगाहों में अपनी लहू भर रहे हो, 
तेरी प्रेमिका ले उड़ा और कोई
इक तुम हो कि मातम मना रहे हैं
इतना सुनते ही मध्यम कुमार अब दीर्घ होते हुए मेरे पास आए। उनके अंदर का गुस्सा खौल रहा था और वे उबलते हुए बोले- सब तुम्हारे कारण हैं। तुमने हमारा समय खराब किया और हमने मध्यस्थता करने का एक अदद मौका खो दिया। इतना सुन मैंने भी अपने पैने-पैने शब्दबाण उन पर छोड़े। अब हम दोनों में विवाद हो रहा है और हमें जरुरत है एक मध्यस्थ की। हे 'मध्यस्थ' प्रकट भव:।


छत्तीसगढ़ में ग्राम सुराज अभियान शुरु हो चुका है और मुझे इस दौरान गांव जाने की बेहद इच्छा थी। यूं तो ग्राम सुराज की खबरें टीवी, अखबारों में आती ही रहती हैं और मैं उनके जरिए भी गांवों की विकासगाथा सुन सकता था, मगर हम थोड़े अलग किस्म के बंदे हैं। हमें हर चीज लाइव देखना पसंद है, जैसे क्रिकेट मैच का मजा तो टीवी पर भी लिया जा सकता है, लेकिन स्टेडियम पर अपनी आंखों के सामने चौके-छक्के बरसते देखने का आनंद ही कुछ और ही है। रसखान ने कहा था कि- ''रसखान कबहु इन आंखिन सो, ब्रज के बन-बाग, तड़ाग निहारौ''। रसखान अपनी आंखों से ब्रज को निहारने लालायित थे। उसी तरह हम भी अपने गांव के खेत-खलिहान, विकास और सुराज को देखने लालायित थे। अपनी इसी पिपासा को शांत करने और ग्राम सुराज लाइव देखने हम अपने गांव धमक पड़े।


गांव में कदम रखते ही मित्र से मुलाकात हो जाए, इससे अच्छी कोई बात हो ही नहीं सकती। अपने मित्र समारू से मिलते ही हमने कहा- मित्र समारू बधाई हो, ग्राम सुराज अभियान शुरु हो चुका है, आज तो सुराज दल तुम्हारे यहां आने वाला है। हमारे मित्र ने पूछा- ग्राम सुराज? ये क्या होता है भई। मैने कहा- वही ग्राम सुराज अभियान, जो सरकार चलाती है और ऑन द स्पॉट सभी समस्याओं का निराकरण करती है। और जो समस्याएं बच जाती हैं उनको भी निपटाने का वो कमिटमेंट करती है। और एक बार जो सरकार ने कमिटमेंट कर दी फिर वो अपने आप की भी नहीं सुनती। समारू कुछ सोचते हुए बोला- अच्छा, सुराज मतलब होता क्या है? मैंने कहा- गांव में रहने का यही प्राब्लम है, हर चीज समझाना पड़ता है। हिंदी की कक्षा में संधि-विच्छेद पड़े हो ना। समारू सिर हिलाते हुए हां, बोला। मैंने कहा- बस, अब देखो सु+राज= सुराज। सुराज का मतलब होता है- अच्छा राज। जहां विकास ही विकास हो।


समारू फिर सकुचाते हुए बोला- ये तो ठीक है, पर विकास का मतलब क्या है। मैंने झुंझलाते हुए उत्तर दिया- विकास मतलब इंग्लिश में डेव्हलपमेंट। इतना सुनते ही समारू जोर से बोला- ऐसे बोलो ना डेव्हलपमेंट, क्या कबसे हिन्दी में विकास-विकास की रट लगा रहे थे। तो तुम्हारा मतलब कि सुराज मतलब, अच्छा राज, जहां विकास हो, समस्याओं का निराकरण हो, खुशहाली आदि। मैं खुश होते हुए बोला- सही समझे समारू। समारू फिर बोला- अच्छा किया भाई, बता दिए। वरना मैं तो इतने समय से सुराज का कुछ और ही मतलब निकाल कर बैठा था। मैंने आश्चर्य से पूछा- ऐसा क्या मतलब निकाला था तुमने। समारू बोला- मैं तो अब तक सोच रहा था कि सुराज = सुर+आज। मतलब आओ आज सुर लगाते हैं। और ग्राम सुराज का मतलब समझ रहा था कि आओ आज गांव पहुंचकर विकास का सुर अलापते हैं। मेरी तो मत मारी गई थी, अच्छा हुआ मित्र जो आज तुमने मुझे इसका मतलब समझाया। पिछली बार तो आम के पेड़ की घनी छांव में चौपाल लगाकर जब विकास का सुर अलापा जा रहा था तो सुराज दल वालों ने मुझे भी कुछ कहने के लिए बोला। मैं समझा मुझे भी गाने के लिए बोल रहे हैं, तो मैंने मना कर दिया। क्योंकि गाने के मामले में तो मैं कौवों को भी फेल कर देता हूं। धत्ते तेरी की, वो मुझसे मेरी समस्याएं पूछ रहे थे, और मैं अभागा क्या समझ बैठा।


मौके की नजाकत को भांप मैंने तुरंत श्री मैथीलीशरण जी की कविता दे मारी- ''नर हो न निराश करो मन को, कुछ काम करो, कुछ काम करो''। निराश समारू बोला- क्या काम करूं। मैंने कहा- पिछली बार चूक गए, कोई बात नहीं। इस दफे जब सुराज वाले तुम्हारे गांव आएंगे तो उन्हें अपनी समस्याओं की टोकरी पकड़ा देना। समारू आश्चर्य से पूछा- उससे क्या होगा। मैंने सरकारी मशीनरी, गजब की मशीनरी है। सरकारी मशीनरी में एक सिरे से समस्याओं की टोकरी जाती है और दूसरे सिरे से निराकरित होकर निकलती है। जैसे हम धोबी को गंदे कपड़े धोने देते हैं, तो वो उसी कपड़े को धोकर, चकाचक करके हमें वापस करता है। समारू बोला- लेकिन हमारे यहां का धोबी तो कपड़े के दाग तक नहीं निकाल पाता और कई बार तो कपड़े का गठरी ही गुमा देता है। तो क्या सरकारी मशीनरी भी धोबी की तरह काम करती है। मैं मामला साफ करते हुए बोला- नहीं बंधु, धोबी सरकारी मशीनरी की तरह काम करता है। अब देखो थोड़ी बहुत भूल-चूक तो चलती रहती है न। ये तो आपस की बात है।


समारू आगे बोला- लेकिन हमारे यहां तो सबकी समस्याएं पिछले साल से जस की तस है। मैं अवाक होकर बोला- क्या बात करते हो मित्र। कुछ दिन पहले ही मैंने खबर पढ़ी है कि पिछले साल जितनी शिकायतें मिली थीं उनसे ज्यादा का तो निराकरण हो गया। इससे साफ साबित होता है कि हमारी सरकार दूरदर्शी होने के साथ-साथ हमारी मित्र भी है। क्योकि मित्र वो नहीं होता जो समस्या आने के बाद मदद के लिए आए, बल्कि मित्र वो होता है जो समस्या के पैदा होने के पहले ही उसे हल कर दे। इस तरह सरकार का यह मित्रवत व्यवहार अति उत्तम है। इस मित्रवत व्यवहार के बाद तो मुझे लगता है कि एक ग्राम मित्रता अभियान भी बस शुरू होने को है। समारू मंद-मंद मुस्काते हुए बोला- मित्र पर तुम एक बात भूल गए कि जहां-जहां भी अब तक समस्याओं का हल नहीं हो पाया है, वहां पर सुराज दल के पहुंचते ही पूरे दल को बंधक बना रहे हैं। ऐसा तो कई बार हो चुका है। और जिस तरह इतने देर से तुम विकास का सुर अलाप रहे हो, मुझे शक है तुम भी सुराज दल के लग रहे हो, बल्कि तुम तो उस दल के प्रमुख लग रहे हो। पकड़ लो इसे, समारू चिल्लाया। इतने में तनी हुए भौहों के साथ कुछ लोग वहां उपस्थित हुए और मुझे रस्सी से बांध कर स्कूल में ले गए। स्कूल तो बहुत गया हूं पर ऐसे कभी नहीं। ग्राम सुराज लाइव देखने आया था और बंधक बनके बैठा हूं। बोर भी हो रहा हूं, लेकिन चिंता की बात नहीं ओरिजिनल सुराज दल वाले भी बंधक बनकर आते ही होंगे, फिर होगा अपना एंटरटेनमेंट, वो भी लाइव।