swamiji_lineartcolorसत्संग अर्थात सत्य का संग या अच्छाई का संग। वेद-पुराणों में भी कहा गया है कि बुराई का संग नहीं बल्कि अच्छाई का संग करना चाहिए। भारत वैसे तो कृषि प्रधान देश माना जाता है लेकिन यह धर्म और भक्ति प्रधान देश भी है। यहां सभी धर्मों को बराबर मौका मिलता है फलने फूलने और साथ में फलते-फूलते हैं सत्संग कराने वाले तरह-तरह बाबा। जितनी वैरायटी बाबाओं की यहां मिलती है उतनी कहीं नहीं मिलती। भारत जैसे खुशमिजाज देश में दुःखों की कोई कमी नहीं है। सुख के बाद दुख आता है और हर दुख को भगाने के लिए संत-महात्मा आते हैं। आदमी हर त्यौहार पर खुशी मनाता है और अगले ही दिन से दुख का रोना रोने लगता है। इसलिए अपने देश में बाबागिरी पर कभी भी आर्थिक मंदी की मार नहीं पड़ने वाली। बहुत सेफ सेक्टर है ये। दुख के वक्त अपने लिए १० रुपए खर्च नहीं कर सकने वाला आदमी भी पता नहीं कहां से बाबा के चरणों में ५० रुपए चढ़ा देता है शायद इस उम्मीद में कि बाबा ५० का ५० हजार करके देंगे। और ऐसे दुखियारों की भारत में बहुतायात में हैं।




कभी-कभी मुझे लगता है भारत में कृषि और धर्म की गाड़ी लगभग एक जैसी ही चलती है। पहले भारत में पारंपरिक खेती चला करती थी। दो बैल, हल, प्राकृतिक बीज बस इतना काफी था और ठीक-ठाक पैदावार भी हो जाती थी। लेकिन अब तो जमीन से जबरदस्ती अन्न उगलवाया जाता है। दस प्रकार के खाद, उर्वरक और यहां इंजेक्शन लगा-लगाकर पैदावर बढ़ाई जा रही है। ठीक उसी प्रकार पहले संत-महात्मा जंगल में आश्रम में अपनी भक्ति किया करते थे। और उनके ज्ञान से प्रभावित होकर ठीक-ठाक पबिल्क आ ही जाती थी। लेकिन अब तो जैसे बाबाओं की बाढ़ आ गई है। पकड़-पकड़कर प्रवचनों और सत्संगों में भक्त जुगाड़े जा रहे हैं। कहीं सत्संग सूना न हो जाए इसलिए खूब तिकड़म किए जा रहे हैं। दिन-ब-दिन नए बाबाओं को पैदा होते देख डर लगता है कि कहीं ऐसा दिन न आ जाए कि भक्तों से ज्यादा संख्या बाबाओं की आ जाए। खैर वो तो बाद की बात है अभी मैं आपका सत्संग की खूबियों से वाकिफ कराता हूं।



हमारे शहर में भी आजकल सत्संग पे सत्संग हो रहे हैं। एक बाबा शहर से गए नहीं होते हैं कि दो और टपक पड़ते हैं। कभी-कभी तो आयोजन स्थल की ही कमी पड़ जाती है। एडजस्ट करते हुए अगल-बगल ही दो-दो सत्संग करवाने पड़ते हैं। बहुत बार तो भक्त ही चक्कर में पड़ जाते हैं, निकले होते हैं गीता पाठ सुनने और बैठ जाते हैं रामचरित मानस के पाठ में। जब भीड़ की ऐसी अदला-बदला हो रही हो तो कई बार बाबाओं के चेले-चपाटी ही आपस में उलझ जाते हैं। कुछ ही दिनों पहले एक सत्संग में जाना हुआ। भीड़ तो इतनी थी मानो आज यहां सब अपना पाप धोकर ही जाएंगे और यहां से थोक में नीति पुरुष एवं महिलाएं ही निकलेंगे। भीड़ देखते ही मैं समझ गया सब पापी हैं। तभी "मोह माया से दूर रहो" की बात करने वाले श्री मोहानंद मनमोहिनी कार में अपने चेलों के साथ उपस्थित हुए। वे कहते हैं शरीर नश्वर है, भयभीत न हो ईश्वर तुम्हारे साथ है, लेकिन खुद सुरक्षाकर्मियों के घेरे में थे शायद उनको ईश्वर से ही भय था। ये बाबा कभी आपका पीछा नहीं छोड़ते। सत्संग से छूटे तो ताबीजों और मालाओं में जकड़ लेते हैं, और नहीं तो फोटोरूप में आपके घर की शोभा बढ़ाते हैं। आप दिन में जितनी बार आईना नहीं देखते होंगे उतनी बार इनकी फोटो से आंखें टकरानी पड़ती है।



मैं सत्संग पर लाख व्यंग्य कस लूं लेकिन खुद को सत्संग में जाने से रोक नहीं सकता क्योंकि सत्संग में वो आती है जिसका मुझे संग चाहिए। मेरी छोड़िए और सत्संग से और भी बहुत से लोग के काम बन जाते हैं और ये सब सत्संग का बेसब्री से इंतजार करते हैं। जैसे- पानठेले, चाय ठेले, चाट ठेलों की तो निकल पड़ती है। बस सत्संग के आसपास अपने ठेलों को टिका दिया। चाट ठेलों के पास दो लड़की आएंगी और उन लड़कियों के पीछे दस लड़के और उन लड़कों को लड़कियों से दूर रखने उन लड़कियों के परिवार वाले भी आ जाते हैं। मतलब एक बार में ही २०-२५ ग्राहक खड़े-खड़े मिल जाते हैं। जितनी आमदानी इन लोगों को सत्संग वाले दिन होती है उतनी तो महीने भर नसीब न हो। यही वजह है कि बाबा लोगों को ये पानठेले वाले लाख दुआएं देते हैं इस तरह दोनो की गाड़ी मक्खन की तरह चलती रहती है।



अब बात करते हैं जेबकतरों की। इन्हें तो सत्संग का बेसब्री से इंतजार रहता है। ये मंदिरों में जा-जाकर मत्था टेकते हैं कि और कामना करते हैं कि रोज सत्संग हो और इनके पास पैसों का संग हो। कुछ अति संवेदनशील जेबकतरे तो अपनी कामना पूर्ति के लिए मनोकामना कलश और मौली धागा तक बांध आते हैं। सत्संग में जब बाबा कह रहे होते हैं कि "इंसान खाली हाथ आता है, और खाली हाथ जाता है" तब ये लोग अपनी जेब दूसरे के पर्स और नोट से भर रहे होते हैं। ये लोग खाली हाथ आते हैं पर खाली हाथ नहीं जाते। ये जेब कतरे तो असली सत्संगी प्रतीत होते हैं, बाबा तो सिर्फ बोल बचन देते हैं लेकिन इसे व्यवहार में उतारते हैं ये "जेबकतरे"। जैसे ही बाबा बोलते हैं "इंसान को मोह-माया से दूर रहना चाहिए" ये लोग तत्क्षण सत्संग में आए भक्तों के जेब काटना और पर्स मारकर भक्तों को मोह-माया से दूर कर देते हैं। दुखी महिलाओं का सुख उनके पति छीन लेते हैं और चैन ये जेबकतरे। ये जेबकतरे हर सत्संग में नियमित रूप से पहुंचते हैं और इतना ज्ञान पी चुके होते हैं कि कुछ सालों बाद ये खुद बाबा बनकर अपना सत्संग कराने लगते हैं और भक्तों की जेब काटना नहीं बल्कि उनके जेब पर खुलेआम डाका डालते हैं।



जैसा कि सब जानते हैं हम सभी पापी हैं। कम-ज्यादा मात्रा में ही सही पाप तो सबने किया है। अब पाप किया है तो प्रायिश्चत तो करना पड़ेगा वरना मन हल्का नहीं होता। तो मन हल्का करने का सबसे सरल, सुलभ तरीका है- सत्संग में जाइए और मन और जेब दोनों हल्का कीजिए। अब पिछले ही दिनों लाखों का घोटाला करके बैठा एक अधिकारी बैचेन था। इसलिए वह सत्संग में गया और दानपेटी में १००० रुपए डाल दिए। १००० रुपए दान करने के बाद उसके चेहरे पर ऐसी अद्भुत शांति थी जैसे लाखों का पाप उतर गया हो। जाते हुए उसने अपने से उच्च श्रेणी के भ्रष्ट बाबा के पैर छूकर उनसे भविष्य में और बड़े घोटाले करने का आशीर्वाद भी मांग लिया। महिलाओं तो सत्संग के नाम ही दौड़ पड़ती हैं क्योंकि सत्संग में बड़ी संख्या में महिलाओं के होने से इनके चुगली के मसाले के लिए कोई कमी नही रहती। दोपहर को "कटु वचन न कहो" का ज्ञान सुनने वाली महिलाएं शाम होते ही फिर अपनी चुगलबंदी में लग जाती हैं। इस तरह सभी किसी न किसी तरह सत्संग से अपना स्वार्थ निकाल ही लेते हैं।



इन बाबाओं के आगे-पीछे घूमते हैं ऊंचे घराने वाले और ये ही इन्हें अपने घर में ठहराते हैं। इस बहाने थोड़ा धरम-करम भी हो जाता है। काली कमाई भी छुप जाती है और थोड़ा रसूख भी बढ़ जाता है। एक पंथ कई काज, सभी दर्द का एक इलाज। सब सत्संग में पधारे लेकिन नेताजी छूट जाएं ऐसा कैसे हो सकता है। नेताजी सबसे आखिर में आते हैं। प्रवचन के अंतिम दिन वे आते हैं प्रवचनकर्ता बाबा के चरण छूते हैं और उन्हें शांत भाव से एकटक निहारते रहते हैं। वे बाबा के जादुई व्यक्तित्व से प्रेरणा लेने की कोशिश करते हैं। वे बाबा के चरण स्पर्श करते हुए मन में कहते हैं- "हम तो लोगों को बेवकूफ बना-बनाकर परेशान हो जाते हैं और आप हो कि इतनी आसानी से इनको फांस लेते हो। थोड़ा जादू हमको भी सिखा दो, हमारी आमसभा में भी थोड़ी भीड़ आ जाएगी और थोड़े और वोट मिल जाएंगे। आप जैसे परम भ्रष्टाचारी को प्रणाम। हम तो मतलब के लिए धर्म का उपयोग करते हैं, आपने तो धर्म को ही अपना मतलब बना लिया। वाह क्या बात है।"



चलिए अब मैं आप सबसे आज्ञा चाहूंगा। मेरे घर के पास चल रहे सत्संग का आज आखिरी दिन है। सबने अपने स्वार्थ सिद्ध कर ही लिए हैं सत्संग में तो थोड़ा हक तो मेरा भी बनता है ना। वहां आज १०८ परिक्रमा होने हैं। अब मैं मेरी प्रिये के साथ सात फेरे ले पाऊंगा कि नहीं ये तो भगवान ही जानता है लेकिन आज उसके साथ १०८ फेरे तो ले ही लेता हूं। चलिए अब जल्दी चलता हूं क्योंकि यहां तो एक अनार सौ बीमार वाला मामला है।


इतने दिनों तक व्यस्तता के चलते इंटरनेट से दूर रहा और इस दरम्यान बहुत से मुद्दों लिखने से छूट गए। सब मुद्दे मेरे नजरों के सामने से गुजरते रहते लेकिन व्यस्तता के चलते किसी को भी पकड़कर कुछ लिखते नहीं बना। अब फुर्सत मिली तो सोचा कि लिख मारता हूं आज एक। इतने दिनों से कामनवेल्थ गेम्स खूब सुर्खियां बटोर रहा है। कॉमनवेल्थ की खबरें पहले पन्ने से हटने का नाम ही नहीं ले रही। रोज कोई न कोई खबर आकर अपनी जगह बना ही लेती है। जितनी खबरें अभी कॉमनवेल्थ गेम्स की छप रही हैं उतनी तो शायद जब गेम्स होंगे तब भी नहीं छपेंगी। खेल पेज को अपनी खबरों से पाट देने वाला क्रिकेट उपेक्षित महसूस कर रहा है। कभी आधे-आधे पन्ने तक छपने वाले क्रिकेटरों के फोटो को अब पासपोर्ट साइज में निपटाया जा रहा है। और ये सब हुआ है घोटाले और भ्रष्टाचार का नया अध्याय रचने वाले श्री सुरेश कालमाड़ी की वजह से। वैसे मुझे किसी के नाम के आगे श्री लगाने बिलकुल अच्छा नहीं लगता। अरे किसी को फ्री फंड में इतनी इज्जत क्यों दें भला। मगर कालमाड़ी जी ने काम ही ऐसा किया कि उनके नाम के आगे श्री तो लगाना ही पड़ेगा। कम आन वेल्थ गेम्स म..म.माफी कीजिएगा कॉमनवेल्थ गेम्स को इतना प्रसिद्ध बना दिया है कि अब पूरी दुनिया को पता चल गया है कि अपने यहां भी कोई गेम-वेम हो रहे हैं नहीं तो पहले तो इतना सन्नाटा पसरा हुआ था कि पता ही नहीं चल रहा था कि अपने यहां कुछ हो भी रहा है। देश-विदेश के मंत्री-अफसर बार-बार हमारे देश में तांक-झांक करने आ रहे हैं। वैसे कॉमनवेल्थ गेम्स को "कम ऑन वेल्थ गेम्स" कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। कॉमनवेल्थ गेम्स ने साबित कर ही दिया कि "कम ऑन, वेल्थ और भी गेम्स में हैं।" सच तो है पैसा तो सब खेलों में कब से दबा पड़ा है बस निकालने वाला परिश्रमी पुरुष चाहिए था। और इस पैसे को अपने अथक परिश्रम से निकालने का पुण्य काम किया है श्री श्री कलमाड़ी जी ने। (माफ कीजिएगा अतिउत्साह में मैंने दो-दो बार श्री लगा दिया लेकिन क्या करूं कलमाड़ीजी ने काम ही ऐसा किया है) कॉमनवेल्थ गेम्स की ऐसी धूम और चर्चा देखकर तो ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरून भी घबरा गए क्योंकि अगले साल उनके यहां होने वाले ओलंपिक को कोई पूछ तक नहीं रहा और इधर कॉमनवेल्थ गेम्स है कि सूर्खियों पर सूर्खियां बटोरे जा रहा है। अखबारों में कॉमनवेल्थ, टीवी में कॉमनवेल्थ, रेडियो में कॉमनवेल्थ, एसएमएस में कॉमनवेल्थ  और यहां तक गली-नुक्कड़ में होने वाली गप्पबाजी में भी कॉमनवेल्थ। बस यही देखकर उन्हें भी कोफ्त हो गई और उन्होंने तैयारियों के अभाव के कारण कॉमनवेल्थ गेम्स अपने यहां कराने की पेशकश कर दी। दरअसल वो इस फिराक में थे कि कॉमनवेल्थ गेम्स उनके यहां हो जाएं तो शायद थोड़ी सुर्खियां उन्हें भी मिल जाएं। कैमरून के दर्द को समझा जा सकता है। वैसे मेरी राय है कि उन्हें अगर अपने लंदन ओलंपिक्स को सुर्खियों में लाना ही है तो उन्हें अपने देश में कलमाड़ी टाइप के किसी तारणहार की जरूरत है जो उनका उद्धार कर सके। वरना लंदन ओलंपिक्स हो जाएंगे और किसी को पता भी नहीं चलेगा। मैं तो कहता हूं कलमाड़ी को ही लंदन ओलंपिक्स की समिति का अध्यक्ष बना देना चाहिए फिर देखिए कलमाड़ीजी की करस्तानी से कैसे अखबारों के पन्ने लंदन ओलंपिक्स की खबरों से पटते हैं।

कॉमनवेल्थ गेम्स की खबरें और कलमाड़ी अब देशभर में इतनी चर्चित हो चुकी हैं कि इसने इतने समय से भारत में सीना तानकर कर चलने वाले क्रिकेट को डरा दिया है। क्रिकेट को अपना एकछत्र राज्य डगमगाता हुआ दिखाई दे रहा है। जो क्रिकेट मैच, आईपीएल और मोदी आए दिन सास-बहु सीरियल की तरह बोर करने लगे थे, उनसे छुटकारा दिलाया है एक योद्धा ने- श्री श्री श्री कलमाड़ी ने (माफ कीजिएगा पूर्व की अपेक्षा इस बार अति अति उत्साह में मैंने तीन बार श्री लगा दिया पर क्या करें कलमाड़ी जी ने काम ही ऐसा...)। जब-जब धरती पर क्रिकेट रूपी राक्षस अपने आतंक से टीवी, अखबारों और लोगों के दिमाग में छा जाते हैं तब-तब लोगों को जगाने एक योद्धा अवतरित होता है और ये योद्धा हैं- सही पहचाना..... कलमाड़ीजी। मोदी ने आईपीएल में छोटा सा घोटाला क्या कर दिया बस सबके सिर पर नाचने लग गया था लेकिन कलमाड़ीजी ने बता दिया कि घोटाला किसे कहते हैं और घोटाला किस स्तर का होना चाहिए।

पहले देश में लोग रोया करते थे कि क्रिकेट छोड़ किसी खेल में पैसा नहीं है लेकिन कलमाड़ीजी ने दिखा दिया कि अगर सच्ची मेहनत, लगन व इच्छाशक्ति से कुछ काम किया जाए तो फल अवश्य मिलता है। उन्होंने खुद तो खूब फल खाए ही औरों को भी खूब फल बांटे। जो हजारों के पीछे भागा करते थे उन्हें करोड़ों की सवारी करा दी। वाह कलमाड़ीजी गजब लीला है आपकी। कलमाड़ी को पैसे में तैरता देख शरद पवार भी सोच में पड़ गए कि पता नहीं क्यों वे आईसीसी प्रमुख बन गए उन्हें भी राष्ट्रमंडल खेलों में ट्राई मारना चाहिए था।

अपने अद्भुत पराक्रम से कलमाड़ीजी ने कईयों को एक साथ जवाब दे दिए। जो एक जवाब मांगते थे उनके मुंह पर चार मार दिए। देश में गरीबी और आर्थिक मंदी का रोना रोने वालों को उन्होंने दिखा दिया कि भारत कोई गरीब देश नहीं है और न यहां आर्थिक मंदी है। जहां एक कुर्सी की जरूरत हो वहां हम चार खरीदने की हैसियत रखते हैं। १०० रुपए की चीज १००० में हम यूं ही खरीद लेते हैं। हमें नहीं जरूरत विश्व बैंक और अन्य देशों से खैरात की। इधर एक रिपोर्टर उनसे पूछ बैठा कि- "कामनवेल्थ गेम्स के लिए हो रहे घटिया निर्माण से वे विश्व के सामने भारत की कैसी तस्वीर पेश कर रहे हैं।" इस पर कलमाड़ीजी भड़क उठे और बोले- "देखिए, मैं एक सच्चा आदमी हूं। मैं दुनिया को धोखा नहीं दे सकता। मैं भारत की सच्ची तस्वीर ही दुनिया के सामने रखना चाहता हूं। भारत में घटिया सड़कें बनती हैं, घोटाले होते हैं, मिलावट होती है, ट्रेफिक जाम होता है। जो सच है मैं तो वही दुनिया के सामने पेश कर रहा हूं। मैं आशा करता हूं कि विदेश से यहां आने वाले खिलाड़ी "जैसा देश, वैसा भेष" में विश्वास करते होंगे और यहां आकर हमारे देश के हिसाब से ढल जाएंगे।"

कलमाड़ी जी ने अपने कारनामे से न केवल बहुतों को लाल किया बल्कि लगे हाथ ठल्ले बैठे कई लोगों को काम भी दे दिया मसलन मसाले की तलाश में रहने वाले मीडियावालों को मसाला, अखबारों को चटपटी खबरें और कलमकारों को मुद्दा, बहुत से कार्टूनिस्टों-कामेडियनों की रोजी-रोटी भी कलमाड़ीजी ही चला रहे हैं। इस तरह बहुमुखी प्रतिभा के धनी श्री कलमाड़ी ने अपनी पराक्रम से कॉमनवेल्थ गेम्स को कम ऑन वेल्थ गेम्स बनाकर एक ऐसा उदाहरण पेश किया जिसकी मिसाल आने वाले पीढ़ी के घोटालेबाज देंगे और उनका अनुसरण करेंगे। ऐसे हैं श्री श्री श्री श्री श्री श्री कलमाड़ी जी और ऐसा है उनका कम ऑन वेल्थ गेम्स (माफ कीजिएगा लेख के अंत तक मै इतना उत्साहित हो गया कि ५-६ बार श्री लगा दिया पर क्या करें कलमाड़ीजी ने काम ही ऐसा किया है)
bihar 2"तीन हॉफ चाय और समोसे देना भैया।" मैंने होटलवाले को चाय का आर्डर दिया। रोज की तरह मैं, विकास और हेमंत राजू होटल में गप्प मारने और साथ ही चाय पीते-पीते अखबार के पन्ने चाटने पहुंच चुके थे। हमारी तिकड़ी का यह अड्डा है टाइमपास का। हम यहां अपना कीमती वक्त बड़े मजे से बर्बाद करते हैं। अपनी बैठक वहां रोज बैठती है और इस बैठक में देश-विदेश से लेकर व्यापार, खेल, फिल्में, पड़ोसी गर्लफ्रैंड तक सभी की बातें होती हैं। कभी-कभी गलती से हम श्रद्धा, भक्ति और आराधना पर भी चर्चा कर लेते हैं। कोई भी अपनी हांकने में कोई कमी नहीं करता। सब एक से बढ़कर एक लपेटु। कुछ ही देर मे हम तीनों की चाय आ गई। तभी चुस्कियां लेते-लेते मेरी नजर अखबार पर पड़ी। वैसे अखबार में हमें खेल और फिल्म पन्ने के सिवाय कुछ नहीं भाता । हमारा बस चले तो हम अखबार के सभी पन्नों को खेल और फिल्म की खबरों से भर दें। मगर उस दिन ऐसी खबर पढ़ी की नजर वहीं अटक गई-"बिहार के सदन में हाथापाई, अध्यक्ष पर फेंकी चप्पल।"


ऐसी चटपटी खबर मिले और उस पर चर्चा न हो, ये तो हो नहीं सकता। तभी विकास तपाक से बोला- "नेताओं ने तो सदन और संसद को अखाड़ा बना दिया है। मेरा भी मन है नेता बनने का लेकिन यह सब पढ़कर मेरा मन नेतागिरी से उचट हो जाता है।" मैं बोला- "जिस चीज के प्रति तुम्हें आसक्त रहना चाहिए उससे तुम विरक्त क्यों हो रहे हो।" राह भटकते विकास को मैंने राह दिखाने की कोशिश की। "अरे तुमने बिलकुल सही क्षेत्र चुना है। राजनीति में भरपूर पैसा है, पहचान है, नाम (बदनाम) है, हर समय आगे-पीछे घूमने वाले पिछलग्गू भी मिलेंगे। अगर तुम अपने अंदर के ईमानदारी वाले गुण को बाहर निकाल  दो और बेइमानी के गुण ठूंस दो तुम्हे परफेक्ट नेता बनते देर नहीं लगेगी।"

विकास सकुचाते हुए बोला- "नेता तो मैं बनना चाहता हूं लेकिन सदन में होने वाले दंगल से मैं डरता हूं इस दंगल में खुद को कैसे बचा पाउंगा ।" मैंने कहा- "तुम भी कमाल करते हो। अरे कल ही तो तुमने जिम ज्वाइन किया है। मैं तो कहता हूं छोड़ दो जिम। खूब खाओ तोंद निकालो। भारत के नेताओं को तोंदूल होना चाहिए। बड़ी सी तोंद यह साबित करती है कि यह नेता बहुत बड़ा खाऊ है और यह डामर, चारा, गिट्टी, तोप, गोले ताबूत से लेकर हर चीज पचा सकता है, इससे तम्हारा गुडविल(बैडविल) बढ़ेगा।"

bihar 1विकास मेरी बात पर सहमति जताने लगा तभी हेमंत बोल पड़ा- "लेकिन तुम्हें नहीं लगता कि आजकल सदन अखाड़ा बन गया है। इस अखाड़े में बात और लात दोनों चलती है। हमारा विकास अगर गलती से सदन पहुंच भी गया तो इसमें कैसे टिक पाएगा। " मैंने कहा- "सदन तो है ही अखाड़ा, बातों का अखाड़ा। यहां वाकयुद्ध होता है। जब बातों से बात नहीं बनती तो लातयुद्ध भी होता है। माइकें तोड़ी जाती हैं, कुर्सी फेंकी जाती है। यहां आरोप लगते हैं, सफाई पेश होती है, हंगामा होता है दंगल होता है। पूरा माहौल जमा रहता है। मैं तो कहना चाहूंगा कि सदन को अखाड़ा शब्द का पर्यायवाची ही माना जाए और इसे बकायदा शब्दकोष में शामिल कर लिया जाए। सदन में हंगामे का इतना मसाला रहता है कि ये टीआरपी में सास-बहु सीरियलों को भी पछाड़ सकती हैं। सबसे बड़ी बात यहां बीच-बीच में वो दुखदायी विज्ञापन भी नहीं आते। आप नॉनस्टाप मजा ले सकते हैं।"

हेमंत फिर कहने लगा- "मगर सभापति पर चप्पल फेंकने वाली बात मुझे हजम नहीं हुई। एक तो ये नेता वैसे ही सदन में बहुत कम आते हैं और जब आते हैं तब हंगामा खड़ा कर देते हैं।" मैंने समझाते हुए कहा-"तुम अभी नादान हो। अभी तुम्हारे पास नेताओं वाला दिमाग नहीं है ना। सबसे पहले तो ये समझ लो कि अगर नेता हर समय सदन में ही घुसे रहेंगे तो बाकी जरूरी काम जैसे घोटाले, भ्रष्टाचार, बवाल कहां से करेंगे। ये सब नेतागिरी के महत्वपूर्ण शब्द हैं। सदन ज्यादा आएंगे तो घोटाले करने का टाइम कैसे मिलेगा और घोटाले नहीं किए तो नेता बिरादरी में नाक न कट जाएगी।

लेकिन तुम्हारी बात से मैं सहमत हूं सभापति को चप्पल से नहीं मारना चाहिए था। इससे यह सिद्ध होता है कि उस नेता ने जरूर तरक्की नहीं की होगी, कोई घोटाला नहीं किया होगा इसलिए अभी तक चप्पलें घिस रहा था। या फिर ऐसा भी हो सकता है कि उसने नया-ताजा घोटाला किया होगा और अपने पहले घोटाले की खुशी में नए जूते लिए होंगे लेकिन पुराने चप्पल कहां फेंकूं इसी कश्मकश में रहा होगा। अंत में सदन में हुए मारपीट के बीच उसने चुपके से अपनी पुरानी चप्पलें फेंककर नए जूते पहन लिए होंगे। अगर इसकी थोड़ी जांच कराई जाए तो पता चल सकता है कि चप्पलमारू विधायक कौन था।

वैसे इस चप्पल फेंकने वाले प्रकरण से सभापति बहुत क्षुब्ध थे। उनका गुस्सा चप्पल मारने वाले के ऊपर कम और मीडिया पर ज्यादा था। मारने वाले ने तो एक चप्पल मारा मीडिया ने उसे दिखा-दिखाकर 100-200 बार चप्पल खिलवा दिए। इसलिए विकास मैं कहता हूं तुम नेता जरूर बनना लेकिन भूलकर भी सभापति मत बनना वरना किसके जूते-चप्पल खाने पड़ जाएं पता भी नहीं चलेगा और चिल्लाकर गला अलग दर्द करने लगेगा। पार्टी के भीतर तुम्हारे विरोधी तुम्हे सभापति बनाने पर तुले होंगे लेकिन तुम उनका पैंतरा उन्हीं पर आजमाना और सभापति बनने पर उनके मुंह पर एक चप्पल जमा ही देना और वो भी सबको दिखाकर इसी बहाने मीडिया अटेंशन भी मिलेगा। मीडिया को चटपटी खबर मिल जाएगी और तुमको सुर्खियां। दोनों के काम बन जाएंगे। इसलिए बोल रहा हूं तुम भिड़ जाओ नेतागिरी में, कूद पड़ो, देर न करो बहुत हैं लाइन में। "

तभी हेमंत बोला- "सदन में नेता माइक्रोफोन और कुर्सी तोड़ देते हैं ये ठीक नहीं है।" मैंने उत्तर दिया- "हो सकता है कि नेताओं के कुर्सी और माइक्रोफोन खराब होंगे और इस कारण वह सदन में अपने मन की कह नहीं पा रहे होंगे। इसलिए उन्होंने माइक्रोफोन और कुर्सी तोड़कर अपनी भड़ास निकाल दी ताकि इसी बहाने नए कुर्सी और माइक्रोफोन आ जाएंगे। इसलिए विकास तुम जब विधायक बनकर सदन में जाओगे तो अपने माइक्रोफोन के साथ दूसरों के भी माइक्रोफोन तोड़ना ताकि कोई तुम्हारे खिलाफ कुछ कह न पाए। सदन के अखाड़े में धोबीपछाड़ कर तुम ही विजेता बनकर उभरना।"

मेरी प्रेरणास्पद उपदेश से विकास के अंदर का नेता उबाल मारने लगा था। अब उसके नेता बनने की इच्छा इरादे का रूप ले चुकी थी। वह जाने लगा तभी मैंने उसे टोका-"विकास नेता बनने वाला है तो कम से कम होटल में अपना पिछला उधारी तो पटा दे वरना राजू भाई का वोट तुझे कैसे मिलेगा।" विकास आया और होटलवाले को एक हजार रुपए देते हुए बोला, "ये लो पिछला बकाया काट लो और बाकी रख लो। अब मैं चिल्हर वापस नहीं लूंगा। मैं बड़ा नेता हूं।" मैं हेमंत की तरफ देखकर मुस्कुराने लगा और उसे चलने के लिए कहा क्योंकि कल भी तो विकास के साथ इसी होटल पर बैठक जमाना है।
rupes symbolतो भइया, आखिरकार रुपए को उसका चिन्ह मिल ही गया। इतने लंबे इंतजार के बाद रुपए को उसकी पहचान मिलना सचमुच खुशी की बात है। और जैसा कि भारत जैसे खुशमिजाज देश में अक्सर होता है, खुशियां मनाई जा रही हैं। जिन्हें इस बारे में पता है वो भी खुश है, और जिन्हें नहीं पता वे भी खुश हैं। और खुश हो भी क्यों न। अमीर इसलिए खुश है क्योंकि जिस पैसे में वो तैरता है उसे पहचान मिल गई तो गरीब इसलिए खुश है क्योंकि खुश रहना  उसने अपनी आदत बना ली है, चाहे सोना २०,००० पहुंचे या मुद्रास्फीति १० का आंकड़ पार कर जाए गरीब अपने हाल पर खुश होने सीख लेता है। मगर सरकार की नीतियों और महंगाई की मार से सबसे ज्यादा पीटने वाला मध्यम वर्ग तो कुछ ज्यादा ही खुश है। उसे शायद यह भ्रम हो गया है कि रुपए का चिन्ह बन जाने से महंगाई में कुछ कमी आएगी। शायद रुपए का चिन्ह मिल जाने की खुशी में सरकार उसे महंगाई पर डिस्काउंट देगी या फिर एक दिन के लिए सस्ता पेट्रोल देगी। वर्माजी की पत्नी को जैसे ही पता चला कि रुपए को चिन्ह मिल गया है उन्होंने घर में हलवा-पुरी बना दिया। शायद उन्हें उम्मीद थी कि इससे उनके पति की तनख्वाह बढ़ेगी। थके-हारे वर्माजी जब घर आए तो हलवे की खुशबू से तुरंत चैतन्य हो गए। अपनी पत्नी से बोले- "अपने मायके से लाई हो क्या हलवा?" पत्नी मुस्कुराते हुए बोली-"नहीं जी, घर में ही बना।" इतना सुनते ही वर्माजी के होश फाख्ते हो गए, वे गरियाने लगे- "अब पूरे हफ्ते खिचड़ी से ही काम चलाना पड़ेगा क्योंकि हफ्ते भर का तेल तो तुमने आज हलवा-पूरी पर ही उड़ेल दिया। अरे कभी अपने मायके से भी कुछ मंगवा लिया करो। पिछले महीने ही तुम्हारे मायकेवालों ने हमारे यहां रुककर अपना पूरे महीने का राशन बचाया है  और तुम हो कि...।" पत्नी भी उखड़ते हुए बोली- "तो मैं और क्या करती। wifeमुझे लगा रुपए को उसका चिन्ह मिल गया है तो शायद तुम्हारा प्रमोशन हुआ होगा या फिर तनख्वाह तो बढ़ी ही होगी, इसी खुशी में ये सब बनाया था।" वर्माजी समझाते हुए बोले- "अरी भाग्यवान! जिस रुपए के लिए हम रोज रोते हैं, सरकार ने उसका चिन्ह बना दिया है ताकि अब हम खाली बैठकर न रोएं, बल्कि रुपए के चिन्ह को फोटो फ्रेम कराकर दीवाल पर लटकाकर रोएं। समझी।"


वैसे रुपए का चिन्ह मिल जाने से बहुत लोगों को फायदा हुआ है। पहला तो यह कि मुझ निठल्ले को कुछ काम मिला और लिखने को कुछ सूझा वरना इतने दिनों से दिमाग में कोई विचार दस्तक ही नहीं दे रहा था। दूसरा यह कि मेरे वीरान पड़े मोहल्ले में भी कुछ जान आई। जिस दिन रुपए का चिन्ह जारी हुआ उस दिन शाम को चौक पर बूढ़े-जवान सब मिलकर अपनी-अपनी झाड़ने लगे। मैं चौक पर ही खड़ा सबको झेल रहा था। रामू बोला- "अरे मुझे तो कल पता चला कि सरकार ने कोई प्रतियोगिता भी रखी थी रुपए के चिन्ह के डिजाइन के लिए। ये भी कोई डिजाइन बनाई है। अगर मैं बनाता तो लगता कि कुछ चिन्ह है। अगर मुझे पता चलता इस प्रतियोगिता का तो समझो वो ढाई लाख तो मेरे ही थे।" इतने में माखन बोला- "अरे जो डिजाइन बना है वैसे तो मेरा ५ साल का बेटा सोनू रोज बनाता है। हिंदी वर्णमाला लिखते समय "र" के बीच में डंडी लगा देता है और उसकी टीचर रोज उस पर लाल गोला बना देती है। उस मैडम को क्या पता था कि वही डंडी लगा "र" रुपए का चिन्ह बनेगा। मुझे भी अपने बेटे की कॉपी दिल्ली भिजवा  देनी चाहिए थी। क्या पता मेरा बेटा ही मुझे ढाई लाख कमाकर दे देता।" इतने देर से चुप बैठे-बैठे घनसू के पेट में भी दर्द होने लगा था। इस बहस में वह भी कूद पड़ा। घनसू बोला-"कमाल की बात है, मुझे तो कल ही पता चला कि रुपए को INR कहते हैं। मैं इतने दिन से सोच रहा था कि INR कोई जासूसी एजेंसी-वेजेंसी होगी। वैसे हमने तो पहले ही रुपए को कई उपनाम दे रखे थे। जैसे- रोकड़ा, हरियाली, लक्ष्मी, खर्चा-पानी, गांधीजी का फोटो छपा होने की वजह से गांधी। इतने उपनामों से तो हमारा काम चल जाया करता था इसलिए रुपए को चिन्ह देने की जरूरत ही नहीं थी। हम तो उंगलियां के इशारे से समझ जाते हैं कि कितनी रिश्वत लेनी है और कितनी देनी है।"

बहस का रंग अभी चढ़ने ही लगा था कि शाम को आफिस से छूटकर आ रहे एक अधिकारी जो घनसू के मित्र थे वहां रुक गए। वैसे ये अधिकारी आफिस तो जाते नहीं थे पर आज शायद मूहूर्त निकला था इसलिए आफिस चले गए। कार का गेट खोलते हुए वे उतरे और फिर आंखें से काला चश्मा उतारते हुए वे प्रस्तुत हुए। पान दबाते हुए बोले-"भई या तो सरकार पगला गई है या उसे पैसे मुफ्त बांटने का शौक है। तभी तो जनता से रुपए का डिजाइन मांग रही थी। अरे महीने में २९ दिन पैसे को रोने वाला मध्यम वर्ग और पैसे से दूर-दूर तक वास्ता न रखने वाले गरीब क्या खाक रुपए का चिन्ह बनाकर देंगे। अरे हमसे कहा होता हम बना देते डिजाइन और इसी बहाने हमको भी ढाई लाख मिल जाते वो भी व्हाइट मनी। रुपए को तो हम जैसे लोग ही अच्छी तरह से पहचान सकते हैं। अरे भई, हमारा दिन-रात उठadhikari rupes symbolना बैठना रहता है रुपयों के साथ। वरना २० हजार की पगार में कोई ऐसे ही थोड़ी ना ३ बंगले, ६ कार, हजारों एकड़ जमीन, नौकर-चाकर वगैरह-वगैरह का मालिक बन जाता है। रुपयों और हमारा तो नजदीक का रिश्ता है, एकदम करीबी। हम तो एक जिस्म, दो जान है। हम तो अपनी अर्धांगिनी को भूल जाएं पर सर्वांगिनी "रुपए" को नहीं भूल सकते।" पान की पीक थूकते हुए वे आगे बोले-"रुपए का डिजाइन हम जैसे रुपएदार लोग ज्यादा अच्छे से बना सकते थे न कि कोई और। हमारा डिजाइन ऐसा होता- "र" अक्षर के दोनों तरफ हाथ होते एक रुपए देते हुए और एक लेते हुए। तब लगता रुपए का चिन्ह। तब तो पता लगता कि देश में रुपए का आदान-प्रदान सुचारू रूप से चल रहा है और चलता रहेगा। दुनिया हमको गरीब समझती है पर हम हैं नहीं। दुनिया को पता चल जाता कि भारत में पैसों का प्रवाह कितना तेज है। मुझे ही देखिए मैं साल में ५-१० बार अमेरिका, ब्रिटेन, स्वीट्जरलैंड घूमकर आता हूं क्योंकि मेरे पास पैसे हैं लेकिन वहां के लोग क्या आते हैं भारत साल में इतनी बार। नहीं ना, क्योंकि वे गरीब हैं और घूमने-फिरने के लिए दस बार सोचते हैं।"

अपनी रईसीकथा सुनाने के बाद वे कुछ देर रुके। फिर बोले- "देखिए इस रुपए के चिन्ह को। इस रुपए के चिन्ह में तो बस "र" के बीच में एक रेखा खींच दी है। ऐसा लग रहा है जैसे कि ये महंगाई की रेखा है जो पैसों को आने ही नहीं दे रही। इस चिन्ह में तो रुपए का नामोंनिशान ही नहीं है। अरे डिजाइन तो हम बनाते.....हम..." बुदबुदाते हुए वे कार में बैठे और काला चश्मा लगाकर गाड़ी चालू कर चल दिए।

जब से रुपए का चिन्ह जारी हुआ है,  तब से इस बात पर न जाने इतनी बहस हो चुकी है, कितने लेख लिखे जा चुके हैं, ऐसे में मेरा खुरापाती दिमाग कैसे चुप रह सकता था। अगले दिन मैंने भी क्लास में अपने टीचर पर सवाल दाग दिया कि रुपए का चिन्ह बनाने का फायदा क्या होगा? टीचर बोले-" बेटा, रुपए का चिन्ह बन जाने से अब रुपए को अंतर्राष्ट्रीय पहचान मिल जाएगी। अब वो यूरो, डालर येन जैसी मुद्राओं की श्रेणी में आ चुका है जिनके अपने पहचान चिन्ह हैं।" मैं उनकी बात बड़े ध्यान से सुन रहा था इसलिए नहीं कि कुछ समझ सकूं बल्कि इसलिए कि दूसरा प्रश्न पूछ सकूं और कालेज में जमा की गई फीस को टीचर का दिमाग खाकर वसूल सकूं। उनके रुकते ही मैंने फिर पूछा- "लेकिन इससे फायदा क्या होगा?" टीचर अब समझाते हुए बोले- "बेटा इधर आओ। तुमने महंगे-महंगे कपड़ों के teacherशोरूम देखे हैं।" मैंने कहा-"हां देखे हैं।" टीचर बोले- "देखें हैं लेकिन कभी वहां से कपड़े खरीदे हैं। नहीं ना। वही तो मैं समझा रहा हूं कि इन बड़े-बड़े शोरूम को देखकर तुम खुश हो सकते हो,  ब्रांडेड कंपनियों के "मोनो" को देखकर खुश हो सकते हो, शोरूम के बाहर लगी मेनीक्वीन पर टंगे कपड़ों को तुम्हारे ऊपर कैसे लगेगा सोच सकते हो लेकिन उसे खरीद नहीं सकते क्योंकि जेब गरम नहीं है। बस उसी तरह सरकार ने रुपए का चिन्ह (मोनो) बना दिया है ताकि आम जनता रुपए के चिन्ह को देखकर ही खुश हो ले कि हमारा देश बहुत तरक्की कर रहा है और इसका आर्थिक तंत्र बहुत मजबूत है वगैरह-वगैरह ।पर न तो महंगाई कम होने वाली है न टमाटर-सब्जी-तेल के दाम कम होंगे। न तो रिश्वतखोरी रुकने वाली है न भ्रष्टाचार। इसलिए फालतू सवाल पूछना बंद करो और अपनी पढ़ाई करो वरना तुम्हारे रिजल्ट पर चिन्ह होगा "फेल" का।"

टीचर की करेले जैसी जुबान से ऐसा कड़वा सच सुनने के बाद मैं बाहर निकला। टीचर के भाषण से मुझे न पहले फर्क पड़ता था और न अब पड़ा। मैने डी.उदय कुमार का नाम अपने कॉपी में उतारा और याद करने लगा क्योंकि मुझे पता है किसी न किसी प्रतियोगी परीक्षा में यह सवाल जरूर पूछा जाएगा कि रुपए का चिन्ह किसने डिजाइन किया, तब कम से कम मैं एक सही उत्तर तो लिख ही सकता हूं। कॉलेज से निकला तो बाहर अपना गैंग था और वहां पर भी रुपए के चिन्ह पर ही बात चल रही थी। मुझे इस विषय में और बातें कर अपने दिमाग का अचार बनाने का कोई शौक नहीं था। मैं घर की तरफ चल दिया सोचा थोड़ा खाकर सुस्ता लिया जाए क्योंकि शाम को कोई न कोई फिर आकर मुझसे रुपए के डिजाइन के बारे में बातें कर मेरे दिमाग का डिजाइन खराब करेगा।
dead ladyचारों तरफ एक अजीब सी शांति है। लोगों को आना-जाना लगा हुआ है। मंत्रीजी के निवास पर वैसे तो रोज ही आगंतुकों की भीड़ लगी रहती है लेकिन आज इतनी भीड़ के बाद सन्नाटा पसरा है। दरअसल मंत्रीजी की मां का कुछ ही दिनों पूर्व निधन हुआ। आज उनकी याद में शोकसभा आयोजित की गई है। एक के बाद एक लोग आकर माताजी की फोटो के सामने रोकर दुख प्रकट कर रहे हैं और कुछ मंत्रीजी को ढांढस बंधा रहे हैं। अमूमन मगरमच्छ के आंसू बहाने वाले मंत्रीजी की आंखें आज सचमुच नम हैं। उनके पीछे उनके समर्थक भी दहाड़ मार-मारकर रो रहे हैं।


उधर उनका एक समर्थक राजू जैसे ही अपने घर से शोकसभा में जाने के लिए निकला, पीछे से बीवी ने आवाज दी- "अजी, कहां जा रहे हो? माताजी की तबीयत खराब है जरा डॉक्टर को दिखा दो, कल रात से ही खांस रही हैं।" वह चिढ़ता हुआ बोला- "कितनी बार कहा है अच्छे काम से जा रहा हूं तो पीछे से टोका मत करो। ऐसा करो घर में कोई दवाई रखी हो तो मां को खिला दो। शोकसभा से आते ही उन्हें डॉक्टर के  पास ले जाऊंगा। मेरा अभी शोकसभा में जाना बहुत जरूरी है। चुनाव नजदीक हैं, दुख के वक्त मंत्रीजी के साथ रहकर उनकी नजरों में चढ़ना जरूरी है तभी तो पार्टी समिति में कोई अच्छा पद मिलेगा। कब तक यूं ही कार्यकर्ता बना रहूंगा। अब जाओ अंदर।" इतना सुन बीवी इतना अंदर चली गई और दवाई खोजने लगी। दौड़ता-दौड़ता राजू शोकसभा में पहुंचा। जैसे ही पहुंचा भीड़ को देखकर उसकी आंखें फट गईं। यहां तो रोने वालों की लाइन लगी थी। उसका नंबर आते तक कितने ही कार्यकर्ता से सचिव बन जाएंगे और वो कार्यकर्ता का कार्यकर्ता ही रह जाएगा। मंत्रीजी के पीछे टोली बनाकर कार्यकर्ता कोरस में गा रहे थे। उस टोली में श्याम, रवि और किशोर भी थे जिन्होंने उसे कल रात भर दारू पिलाकर टल्ली किया और मंत्रीजी को मक्खन लगाने की जुगत में खुद सुबह सुबह खुद शोकसभा में पहुंच गए। उन तीनों को देख राजू का पारा चढ़ने लगा था। पर वो अब क्या करता इस भीड़ के छंटने का इंतजार भी नहीं किया जा सकता था क्योंकि तब तक मंत्रीजी कितनों के मक्खन में पूरी तरह फिसल चुके होते। इसी पशोपेश में उसे एक तरीका सूझा। उसने दो कदम पीछे लिए और यूसेन बोल्ट का रिकार्ड तोड़ते हुए मेन गेट से माताजी की फोटो तक की दूरी मात्र ८ सेकंड में पूरी कर ली। इसी फर्राटा दौड़ के दौरान उसने कितनों की साडि़यों पर कीचड़ छींटे और कईयों के कुर्ते मैले कर दिए लेकिन इन सबके की परवाह न करते हुए वह सीधा माताजी के फोटो के सामने आकर रुक गया। उसकी एक्सप्रेस गति से माताजी की फोटो भी हिल गई और पास में लगे नारियल और अगरबत्ती भी। किसी तरह उसने अगरबत्ती और नारियल को व्यवस्थित रखने की कोशिश की और फिर गला फाड़-फाड़कर रोने लगा। रोते-रोते वह उन कार्यकर्तां की टोली की तरफ भी देखने लगा, शायद यह जताना चाह रहा था कि "जाओ तुम लोग सिंगल-सिंगल रन लो मैंने तो सीधा छक्का मार दिया है"।

तभी मंत्रीजी आए और उसे उठाते हुए धीरे से कान में बोले- "तुम्हें दुख है मुझे पता है लेकिन जाते हुए मेरे साले से जरूर मिलते जाना। अपनी फर्राटा दौड़ के दौरान तुमने उसके कुर्ते और उसकी पत्नी की साड़ी पर जो कीचड़ की पेंटिंग की है, उसका इनाम देने के लिए वो तुम्हारा इंतजार कर रहा है।" यह सुनकर राजू का गला सूख गया। छुपती नजरों से उसने गेंडे जैसे मंत्रीजी के साले को देखा जिसकी आंखें गुस्से से लाल थी। यह सब देख कार्यकर्ताओं की टोली धीरे से मुस्कुराई और फिर पहले की तरह अपनी रुदाली एक्सप्रेस शुरू कर दी। यह टोली रोने में रुदालियों को भी मात दे रही थी। उस टोली को पता था कि सिंगल-सिंगल लेकर अर्धशतक बनाने में ही समझदारी है, राजू की तरह छक्का मारने पर कैच आउट होने का डर है।

rotlu netaरोने का यह सिलसिला चल ही रहा था कि अचानक गेट के पास बड़ी भीड़ दिखाई दी। कुछ ही महीनों पहले अनुशासनहीनता के कारण पार्टी से निष्कासित नेता राममुरारी अपनी समर्थकों के साथ शोकसभा में शामिल होने आए। सफेद कुर्तेधारियों से घिरे रामुरारी मोटी-मोटी आखों से अश्रुधारा बहाते हुए उपस्थित हुए। राममुरारी की मोटी-मोटी अश्रुधाराओं ने उनकी मोटी-मोटी मूंछों को भींगा दिया था। अपने आंसू पोछते हुए वे मंत्रीजी की तरफ बढ़े और कंधे पर हाथ रखते हुए बोले- "मंत्रीजी की माताजी के आकस्मिक देहांत से मुझे बहुत दुख हुआ है। मैंने नहीं सोचा था कि वे इस तरह हमें छोड़कर चली जाएंगी। ये अवसाद का पल है। मंत्रीजी को माताजी के जाने का बहुत दुख है। पर असल बात तो यह है कि मंत्रीजी की माताजी इनकी मां नहीं थी, वो मेरी मां थी।" इतना सुनते ही मीडियावालों के कैमरे, माइक और डायरियों ने रामुरारी की तरफ रुख कर दिया। राममुरारी की तरफ से किसी विस्फोटक रहस्योद्गाटन की आस में मीडिया पलके बिछाए खड़ी थी। तभी आंख और नाक पोछते हुए राममुरारी ने  कहा- "ये मंत्रीजी की मां नहीं थी, ये आपकी, मेरी और हम सब की मां थी। इन्होंने अपने बेटे की तरह हम सबको अपनी ममता प्रदान की। वे राज्यमाता थी।" ये सब सुनकर किसी मसालेदार खबर की आस में बैठे मीडियावालों के कंधे निराशा में झुक गए और साथ ही उनके कैमरे और माइक भी। रामुरारी ने कहा-"मैं माताजी की गोद में खेला हूं। आज भले ही मुझे पार्टी से निष्कासित कर दिया गया है लेकिन मैंने हमेशा माताजी को अपनी मां माना है और मंत्रीजी को अपना भाई। मुझे आज भी वो दिन याद है जब माताजी प्यार से मुझे अपने हाथों से आलू के पराठे खिलाती थी।" मंत्रीजी सोच में पड़ गए और बोले-"मगर माताजी को तो आलू के पराठे बनाने आते ही नहीं थे। आलू के पराठे तो शांता हमारी आयाबाई बनाती थी।" राममुरारी बात को संभालते हुए बोले-"हां वही तो मैं कह रहा हूं, कि हमारी माताजी आधुनिक थी और इसलिए हमें पिज्जा खिलाया करती थी।" मंत्रीजी फिर बीच में टोकते हुए बोले-"राममुरारी, तुम भूल रहे हो माताजी तो हमारे लिए पिज्जा बनाती नहीं थी बल्कि पिज्जा आर्डर कर हमको आयाबाई के हवाले करके महिला सम्मेलनों में जाती थी।" राममुरारी ने छूटती डोर को पकड़ा और बोले- "वही तो बोल रहा हूं मंत्रीजी, कि माताजी हमारे लिए बड़े प्यार से पिज्जा आर्डर करती थी। और आज उसी प्यार और ममता की कमी महसूस हो रही है। मैं यहां अपना निष्कासन रद्द करवाने और पार्टी में वापसी का कोई जुगाड़ लगाने नहीं आया हूं। मैं इसलिए आया हूं ताकि माताजी के जाने से मेरे जीवन में जो रिक्तस्थान हुआ है उसे रो-रोकर भरने की कोशिश कर सकूं। इसलिए मैं और मेरे समर्थक आज पूरा दिन मंत्रीजी के साथ रहकर उनका दुख बांटेंगे।" मंत्रीजी समझ चुके थे कि ये पट्ठा ऐसे पीछा नहीं छोड़ने वाला। आज बिना पार्टी में वापसी किए ये पीछा नहीं छोड़ेगा। इसलिए उन्होंने राममुरारी को उठाया और अपने साथ बैठा लिया ताकि और लोगों को भी रोने का बराबर मौका मिले।

neta-ji1_thumbरोने और सांत्वना देने का यह सिलसिला शाम तक चलता रहा। सब लोगों ने बारी बारी से अपने रुदनकौशल का परिचय दिया और जमकर रोए। कुछ ने मंत्रीजी के कंधों पर हाथ रखकर अपने करीबी होने का अहसास दिलाने की कोशिश की। मंत्रीजी भी इन सब प्रपंच से वाकिफ थे लेकिन मौके की नजाकत को देखते हुए इन सबका ड्रामा झेल रहे थे और इनके फिल्मी डायलॉग किसी तरह हलफ के नीचे उतार रहे थे। बार-बार वही डायलॉग सुन-सुनकर मंत्रीजी को भी अपचन हो गई थी। जो मंत्रीजी डामर, तेल, चारा से लेकर बारदाना, पेन, पेंसिल तक पचा चुके थे, वे आज इन पिछलग्गुओं के ड्रामे पचाने में असक्षम थे। पर उनकी आंखें किसी और का इंतजार कर रही थी, उनके पार्टी अध्यक्ष का। दरअसल कुछ महीनों बाद चुनाव थे और इस बार उनकी सीट खतरे में थी।

मंत्रीजी सोच में डूबे थे तभी धीर-गंभीर अंदाज में पार्टी अध्यक्ष का आगमन हुआ। उन्होंने बिना किसी औपचारिकता निभाए और रोने -गाने में समय व्यर्थ किए माताजी के फोटो के समक्ष हाथ जोड़े और मंत्रीजी की तरफ मुखातिब हुए। मंत्रीजी के पास जाकर बोले- "आपकी माताजी के निधन का हमें दुख है। पिताजी के जाने के बाद वही आपका साया थी लेकिन उनका आशीर्वाद आपके साथ हमेशा रहेगा। और उन्हीं के आशीर्वाद से खतरे में पड़ी आपकी सीट बच गई। पार्टी ने निर्णय लिया है कि आने वाले चुनाव में आप अपनी इसी सीट से लड़ेंगे। अपना खोया हुआ जनाधार पाने का यह स्वर्णिम मौका है। माताजी के देहांत के बाद आपको भरपूर सांत्वना वोट मिलेंगे। इसलिए कल से ही चुनाव की तैयारी करते हुए जनसम्पर्क शुरू कर दीजिए। " मंत्रीजी यही बात तो सुनना चाहते थे। उन्होंने पार्टी अध्यक्ष को धन्यवाद दिया और पलटकर अपनी माताजी की फोटो की तरफ देखा। उनकी आंखों में आंसू थे- खुशी के, गम के और ग्लानि के। ग्लानि के आंसू इसलिए क्योंकि शायद वह अपनी माता से मन ही मन कह रहे थे- "मुझे माफ कर देना। लेकिन इस चुनाव को जीतने के लिए तेरी मौत का भी तमाशा बनाना पड़ेगा।" मंत्रीजी पार्टी अध्यक्ष को बाहर ले गए और बात को आगे बढ़ाने लगे। शाम हो चुकी थी। लोग अब वापस जाने लगे थे। माताजी की तस्वीर पर चढ़ा हार गिर चुका था और उनके सामने जल रहा दीया भी बुझ चुका था। लेकिन अब उसे ठीक करने वाले कोई नहीं था क्योंकि शोकसभा में आए लोगों के अपने-अपने काम हो चुके थे।