तारीफ सुनना सब पसंद करते हैं। सबकी ख्वाहिश होती है कि वे जहां जाएं उनकी तारीफ हो। मगर ये कमबख्त इंसानी फितरत..... हम तारीफ तो थोक में सुनना चाहते हैं लेकिन दूसरे की तारीफ चिल्हरों में करते हैं। जैसे खुद चंदा मांगने जाएं तो १०० से कम में नहीं मानेंगे लेकिन किसी भिखारी को १ रुपये से ज्यादा दान देने पर जान निकल जाती है। वैसे तारीफपसंद लोगों की भी काफी वैरायटी होती है। कुछ अपने मुंह मिट्ठू मियां बनते हैं, ऐसे लोग खुद ही अपना गुणगान कर अपना काम चला लेते हैं..। ये लोग बड़े खुद्दार किस्म के होते हैं, तारीफ के मामले में ये किसी का एहसान लेने में यकीन नहीं करते थे। पर पिछले दशक के आखिर तक ये खुद्दाम किस्म के मिट्ठु लुप्तप्राय हो गए। फिर जमाना आया दूसरों के मुंह मिट्ठू मियां बनने वालों का। ये कुछेक लोगों के मुंह से अपने तारीफ सुन सातवें आसमान पर पहुंच जाया करते थे। कुछ समय बाद ये ज्यादा तारीफें झेल नहीं पाए और आठवें आसमान पर पहुंचकर ये मिट्ठू भी लुप्तप्राय हो गए।

बंधुवर आज का जमाना है सबके मुंह मिट्ठू मियां बनने वालों का। ऐसे लोग तारीफ करने वालों का जत्था लिए ही साथ में चलते हैं। जब तक ५-६ लोग थोक में इनकी तारीफ न करें, इनका खाना नहीं पचता। इसी बिरादरी में हमारे एक मित्र भी आते हैं। वे बड़े ही सभ्य व सज्जन टाईप हैं और जब भी उन्हें अपनी तारीफ करवानी होती है, वे साथ खड़े चार-पांच लोगों को आगे कर देते हैं। एक बार इनके पिताजी ने इनसे पूछा कि परीक्षा कैसी गई। हमारे मित्र ने कहा- बहुत अच्छी गई, लेकिन हमने कैसे लिखा यह आपको हमारे मित्र बताएंगे। इतना कहते ही उन्होंने हम चार दोस्तों को आगे कर दिया। हम उनके शेर सदृश्य पिताजी के सामने निरीह बकरियों की तरह खड़े थे। एक बार यही मित्र इंटरव्यू देने गए जहां इनसे पूछा गया कि आप अपनी तारीफ में क्या कहना चाहेंगे। इतना सुनते ही हमारे मित्र ने हम सात-आठ दोस्तों को फोन किया और हमें वहां बुलाकर तारीफों का ऐसा टेप बजवाया कि उनकी तो नौकरी लग गई लेकिन हमारी लगी-लगाई नौकरी छूट गई। पर क्या करें हर एक फ्रेंड जरुरी होता है...।

आजकल जमाना आउटसोर्सिंग का है। अपना काम किसी दूसरे से करवाना। बेचारे सरकारी मुलाजिम आउटसोर्सिंग नहीं कर पाते इसलिए आपस में ही फाइल को आगे बढ़ा-बढाकर, तो कभी भी गोल-गोल घुमाकर आउटसोर्सिंग का लुत्फ उठाने की कोशिश करते रहते हैं.। इसलिए हमारे मित्र की तरह बहुत से लोग तारीफों की आउटसोर्सिंग भी करवाने लगे हैं। जब शादियां से लेकर तलाक तक ठेके पर करवाई जा सकती है, तो तारीफें क्यो नहीं। तारीफों के पुल बांधना कोई बच्चा का खेल तो है नहीं ना..। दूसरों के मुंह से तारीफ करवाने का एक फायदा यह है कि तारीफों ज्यादा ऑथेंटिक यानी विश्वसनीय लगती हैं। पर जैसे की मैंने उपर बताया कि इंसानी फितरत...। किसी दूसरे के लिए तारीफों के दो शब्द बड़े जतन से निकलते हैं। तारीफों की डिमांड ज्यादा है पर सप्लाई कम। तारीफ पाना हर इंसान का मौलिक अधिकार है, और किसी के मौलिक अधिकारों का हनन मुझे कतई मंजूर नहीं। भले ही मैं स्कूल में नागरिक शास्त्र की कक्षाओं में नदारद रहा हूं, लेकिन तारीफ का अधिकार तो मैं सबको दिलाकर रहूंगा।


बस इसी तारीफों की कमी को पूरा करने के लिए ही तो भगवान ने मुझे धरती पर भेजा है। छोटे-मोटे काम करके मैं वैसे भी ऊब चुका था, उपर से घरवाले मुझ पर बरस पड़ते कि- पता नहीं ये लड़का क्या करेगा।  वैसे भी कहते हैं खाली दिमाग शैतान का घर.....। मेरे दिमाग में भी कई बार यह ख्याल आया कि आखिर मैं दुनिया में करने क्या आया हूं। पर, अब मुझे पता चल चुका है कि मैं जनकल्याण के लिए आया हूं। बस इसी जनकल्याण के विचार को मन में लिए मैंने अपनी कंपनी तारीफ कंस्ट्रक्शन्स खोली है। न हींग न फिटकरी और रंग बिलकुल चोखा। बिलकुल मस्त धंधा है। नो इन्वेस्टमेंट फुल प्राफिट। जब लोग दूसरों की शादी (बर्बादी) कराकर पैसा कमा सकते हैं तो मैं तारीफ करके पैसा क्यों नहीं कमा सकता। तारीफ सुनकर चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। और वैसे भी किसी बहुत ज्ञानी आदमी ने कहा है कि किसी के चेहरे पर मुस्कान लाने से बड़ा कोई पुण्य नहीं। उस ज्ञानी आदमी का नाम मैं आपको बताता..... पर वो आदमी अभी लिखने में व्यस्त है।


वैसे मेरी कंपनी तारीफों के सिर्फ पुल ही नही बनाती। जब बंदे का काम तारीफों की दो सीढ़ियों में ही निपट सकता है तो फिजूल ही तारीफों का पुल बनाकर तारीफें बर्बाद क्यों करना। मटेरियल बच गया तो दूसरे के काम आ जाएंगी। ग्राहक भगवान होता है और और ग्राहक के डिमांड के हिसाब से तारीफों की सीढ़ी, तारीफों के कदम, जरुरत पड़ने पर कई बार तारीफों के अंडरब्रिज, फ्लाईओवर, ४ लेन, ८ लेन रोड भी बनवा  देते हैं।


एक कर्मचारी हमारे पास आए जो साल दर साल अपने बॉस की तारीफ कर प्रमोशन पाए जा रहे थे, लेकिन इस बार उनका डिमोशन हो गया, कारण कि बॉस हर बार वही पुरानी तारीफें सुनकर उब चुका था। हमने तुरंत अपनी रेस्क्यू टीम को उनके आफिस भेजा जिन्होंने ऐसी तारीफें की कि उसकी नौकरी तो बची ही, साथ ही प्रमोशन भी हो गया। कुछ समय बाद एक दुखी लेखक हमारे पास आए। लेखन उनका ठीक-ठाक था, मगर ताउम्र तारीफों का अकाल रहा। लेखक क्या चाहे, बस दो तारीफ। हमारी टीम ने उनके कवि सम्मेलन में तारीफों की जो शुरूआत की, उसके बाद तो भेड़चाल की आदि भीड़ १५ मिनट तक ताली बजाती रही। हालांकि, सच कहें तो उनकी लिखी कविता सच में सिरदर्द थी। पर सिर के दर्द को सिर का सेहरा बनाना ही तो तारीफ कंस्ट्रक्शंस का काम है।

कुछ समय पहले एक महिला हमारे पास आई जिन्हें लगता था कि उनके पति उनसे प्यार नहीं करते क्योंकि वे आजकल उनकी तारीफ में कसीदे नहीं पढ़ते। वो तो तलाक लेने पर उतारु थीं, तभी हमने उनके पति को हमारी तारीफ पब्लीशर्स की लेटेस्ट किताब तारीफ के काबिल पकड़ाई, साथ ही गारंटी दी कि १० साल तक तो तारीफें खत्म नहीं होंगी। इस तरह हमने उनकी शादीशुदा लाइफ में १० साल का टॉप अप डाल दिया। इस केस के बाद मुझे लगा मुझे मेट्रीमोनी में भी हाथ आजमाना चाहिए। वैसे तारीफ कंस्ट्रक्शंस ने जितनी जल्दी तरक्की की है उसके बाद भविष्य में बहुत कुछ शुरु करने का इरादा है। फिलहाल के लिए आपसे एक दरख्वास्त। अगर आपकी कहीं थोक के भाव तारीफ हो रही हो, तो समझ लीजिएगा इसमें थोड़ा हाथ तारीफ कंस्ट्रक्शंस का भी होगा। अगर आप मुझे धन्यवाद देना चाहें, तो बेशक दीजिएगा। क्योंकि भले ही तारीफों का कुआं खोद कर रखा है हमने, पर तारीफों के प्यासे तो हम भी हैं।

Comments (2)

On 24 फ़रवरी 2012 को 11:11 pm , kanhaiya lal Pandey ने कहा…

khadi aur sachchi vishay pad likhane ke liye,dhanyavad swikar kijiye,padkar kafi umda laga,sachchai kadwi hoti hai phir bhi hazm hojay to swastha ke liye achchha hota hai.samaj me badhate is nayi sanskriti ke virudh bahut badiya saugat.

 
On 25 फ़रवरी 2012 को 1:24 am , संजय @ मो सम कौन ? ने कहा…

तारीफ़ के प्यासे जी, यूँ तो कुँआ आपके पास है ही लेकिन हम जानते हैं कि ’नाईन अपने पाँव खुद नहीं धोती’ इसलिये रामजी की गिलहरी की तरह आपके पुल में हमारी तारीफ़ की रेत भी अर्पित करते हैं:)